10 नवंबर से चारधामों में देव पूजा का विधान शुरू, जानें कब बंद होंगे गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बदरीनाथ के कपाट
उत्तराखंड के चारधाम गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बदरीनाथ के कपाट नवंबर में शीतकाल के लिए बंद होंगे। जानिए कपाट बंद होने की तिथियां, देव पूजा की पौराणिक परंपरा, शीतकालीन पूजा स्थलों और वर्ष 2026 की चारधाम यात्रा की अवधि से जुड़ी प्रमुख जानकारियां।
10 नवंबर से शुरू होगी, चार धामों में देव पूजा
10 नवंबर को गंगोत्री, 11 को यमुनोत्री और केदारनाथ और 16 नवंबर को होंगे, बदरीनाथ मंदिर के कपाट बंद
डॉ. बृजेश सती
उत्तराखंड स्थित चार धामों में मंदिरों के कपाट बंद होने का क्रम तय हो गया है। पौराणिक परंपरा अनुसार सबसे पहले गंगोत्री मंदिर के कपाट आगामी 10 नवंबर को शीतकाल के लिए बंद किए जाएंगे। इसके बाद परंपरा अनुसार यमुनोत्री और केदारनाथ मंदिर के कपाट भैया दूज के दिन और बदरीनाथ मंदिर के कपाट मार्गशीर्ष माह की दो पूजा के बाद 16 नवंबर को विधि-विधान के साथ शीतकाल के लिए बंद किए जाएंगे।
उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड स्थित चार धाम गंगोत्री, यमुनोत्री, बदरीनाथ और केदारनाथ में छह महीने नर पूजा और छह महीने देवताओं के द्वारा पूजा का विधान है। यहां पर क्रमानुसार पूजाएं संपादित की जाती हैं। गंगोत्री मंदिर के कपाट सबसे पहले बंद होने का विधान है। आगामी 10 नवंबर को अभिजीत मुहूर्त में अन्नकूट पर्व के दिन दोपहर 12:05 पर शीतकाल के लिए बंद किए जाएंगे। इसके बाद मां गंगा जी की भोग मूर्ति पहले पड़ाव में मार्कंडेय मंदिर पहुंचेंगी। भैया दूज के दिन मां गंगा जी की भोग मूर्ति मुखबा स्थित शीतकालीन पूजा स्थल के गर्भ गृह में प्रतिष्ठित की जाएगी।
यमुनोत्री मंदिर के कपाट भैया दूज के दिन 10:28 पर बंद होंगे। उसके बाद मां यमुना की भोग मूर्ति अपने शीतकालीन पूजा स्थल खरसाली मंदिर पहुंचेगी।
केदारनाथ मंदिर के कपाट भी भैया दूज के दिन ही बंद किए जाते हैं। इसके बाद केदारनाथ जी की पंचमुखी मूर्ति शीतकालीन पूजा स्थल ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ के लिए प्रस्थान करेगी। इसके तहत पहले पड़ाव में डोली यात्रा रामपुर में रात्रि विश्राम करेगी। 12 नवंबर को विश्वनाथ मंदिर गुप्तकाशी और 13 नवंबर को ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ पहुंचेगी।
बदरीनाथ मंदिर के कपाट 16 नवंबर को रात्रि 9:37 पर विधि-विधान के साथ बंद किए जाएंगे।
उल्लेखनीय है कि बदरीनाथ मंदिर के कपाट बंद होने से पूर्व मार्गशीर्ष माह में दो पूजा की जानी अनिवार्य है। तय मुहूर्त में 17 नवंबर को उद्धव जी, कुबेर जी की डोली पांडुकेश्वर और गरुड़ के साथ आदि गुरु शंकराचार्य की गद्दी अपने शीतकालीन प्रवास स्थल नृसिंह मंदिर ज्योतिर्मठ के लिए प्रस्थान करेगी।
बदरीनाथ धाम में सबसे लंबा और केदारनाथ में सबसे कम अवधि
चार धाम यात्रा के तहत दर्शनकाल के लिहाज से बदरीनाथ मंदिर की अवधि सबसे अधिक, जबकि केदारनाथ में श्रद्धालुओं को सबसे कम अवधि तक दर्शन का अवसर मिला।
चारधाम यात्रा का शुभारंभ 19 अप्रैल को अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के कपाट खुलने के साथ हुआ। इसके बाद 22 अप्रैल को बाबा केदारनाथ और 23 अप्रैल को भगवान बदरी विशाल के कपाट श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोले गए। कपाट खुलने के साथ ही चारों धामों में आस्था, श्रद्धा और भक्ति का अनूठा संगम देखने को मिला।
दर्शन की अवधि पर नजर डालें तो बदरीनाथ धाम 208 दिनों तक श्रद्धालुओं के लिए खुला रहेगा। वहीं, यमुनोत्री धाम में 206 दिन और गंगोत्री धाम में 205 दिन तक दर्शन होंगे। दूसरी ओर, केदारनाथ धाम में दर्शन की अवधि 204 दिन की रहेगी, जो चारों धामों में सबसे कम है।
वर्ष 2025 में यमुनोत्री धाम 176 दिन, गंगोत्री धाम 175 दिन और केदारनाथ धाम 174 दिन तक खुले रहे। पिछले वर्ष की तुलना करें तो उस दौरान बदरीनाथ धाम की यात्रा अवधि 192 दिन की रही।
इस बार गंगोत्री और केदारनाथ 30 दिन अधिक, यमुनोत्री 29 दिन और बदरीनाथ धाम की अवधि में 16 दिन की वृद्धि हुई। हालांकि इस बार बदरीनाथ मंदिर के द्वार 9 दिन पहले बंद होंगे।
चार धाम में देव पूजा का विधान
उत्तराखंड स्थित चार धाम यात्रा अनादि काल से चली आ रही है। यह यात्रा भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और मोक्ष प्राप्ति के लिए की जाती है।
चार धामों के कपाट बंद होने और शीतकालीन पूजा स्थलों में पूजा की परंपरा के पीछे धार्मिक, पौराणिक एवं भौगोलिक कारण हैं। दरअसल, ऐसा माना जाता है कि शीतकाल में देवी, देवता, यक्ष, किन्नर, गंधर्व आदि इन स्थानों में तीर्थ सेवन करते हैं। इस दौरान इन धामों में देवताओं के द्वारा पूजा की जाती है। यह एक धार्मिक पक्ष है।
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इसके अलावा इसका पर्यावरणीय पहलू भी है। शीतकाल में धामों में अत्यधिक ठंड होती है। तापमान सामान्य से काफी कम हो जाता है और अधिक बर्फबारी होती है। जिसके चलते यहां आवागमन आसान नहीं रहता। इसलिए प्रकृति और परंपराओं के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए पूजा स्थलों में परिवर्तन की परंपरा और व्यवस्था बनाई गई।
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