जगन ने मानी गलती, अब NDA के सहयोगियों की बारी! सत्ता का साथ देंगे या जनता और संविधान का?

जगन मोहन रेड्डी ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कानून पर अपना रुख बदला। अब सवाल NDA के सहयोगी दलों से है—वे सत्ता का साथ देंगे या जनता, संविधान और लोकतंत्र का? जानिए संसद की जवाबदेही और लोकतांत्रिक अधिकारों पर विस्तृत विश्लेषण।

जगन ने मानी गलती, अब NDA के सहयोगियों की बारी! सत्ता का साथ देंगे या जनता और संविधान का?

सत्ता का साथ या जनता का साथ? जगन मोहन रेड्डी की स्वीकारोक्ति से NDA के सहयोगी दलों को सबक लेने की जरूरत

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर बदला रुख किसी राजनीतिक गठबंधन का सवाल नहीं, बल्कि लोकतंत्र, संवैधानिक जवाबदेही और जनता के प्रति राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी का सवाल है।

लोकतंत्र में सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं होता कि कौन किस गठबंधन में शामिल है, कौन किस नेता के साथ खड़ा है और किस पार्टी को सत्ता में बने रहने का अवसर मिल रहा है। असली प्रश्न यह है कि जब सत्ता कोई ऐसा निर्णय लेती है जो लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता, नागरिकों के अधिकारों और जनता की संप्रभुता को प्रभावित करता है, तब राजनीतिक दल किसके साथ खड़े होते हैं—सत्ता के साथ या जनता के साथ?

वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित 2023 के कानून का समर्थन करने पर सार्वजनिक रूप से पछतावा व्यक्त किया और नियुक्ति प्रक्रिया में भारत के मुख्य न्यायाधीश को दोबारा शामिल करने की मांग की। इस घटनाक्रम को केवल उनके राजनीतिक रुख में बदलाव या विपक्ष के साथ संभावित निकटता के रूप में देखना वास्तविक मुद्दे से ध्यान हटाना होगा। महत्वपूर्ण बात यह है कि एक राजनीतिक दल ने अपने पुराने फैसले पर पुनर्विचार किया है। अब प्रश्न यह है कि क्या राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के अन्य सहयोगी दल भी अपने निर्णयों की समीक्षा करने का राजनीतिक साहस दिखाएंगे?

गलती स्वीकार करना कमजोरी नहीं, लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है

राजनीति में गलती स्वीकार करने की परंपरा कमजोर हुई है। नेता अपने पुराने निर्णयों का बचाव करते रहते हैं, भले ही उन निर्णयों के परिणामों पर गंभीर प्रश्न खड़े हो चुके हों। राजनीतिक दलों के लिए सत्ता का समीकरण अक्सर संवैधानिक सिद्धांतों से अधिक महत्वपूर्ण दिखाई देने लगता है। यही प्रवृत्ति लोकतंत्र को भीतर से कमजोर करती है।

जगन मोहन रेड्डी की स्वीकारोक्ति का मूल्यांकन इसी संदर्भ में होना चाहिए। उनके पुराने निर्णय की आलोचना की जा सकती है, उनसे यह पूछा जा सकता है कि उन्होंने 2023 में उस कानून का समर्थन क्यों किया और अब उनकी समझ में क्या बदलाव आया है। लेकिन यदि कोई राजनीतिक दल अपने पुराने निर्णय को गलत मानकर उसमें सुधार की मांग करता है, तो उस मांग का मूल्यांकन उसके वर्तमान तर्कों और संवैधानिक प्रभावों के आधार पर होना चाहिए।

सवाल यह नहीं है कि जगन किसके साथ जाएंगे। सवाल यह है कि दूसरे राजनीतिक दल अपनी अंतरात्मा और संवैधानिक जिम्मेदारी के साथ कब खड़े होंगे।

NDA के सहयोगी दलों को भी स्वयं से पूछना चाहिए कि क्या उन्होंने अब तक सरकार के प्रत्येक महत्वपूर्ण निर्णय का समर्थन पर्याप्त विचार-विमर्श के बाद किया है? क्या उन्होंने संसद में अपनी स्वतंत्र भूमिका निभाई है? क्या उन्होंने उन कानूनों के संभावित परिणामों पर सवाल उठाए हैं जो नागरिकों के अधिकारों और लोकतांत्रिक संस्थाओं को प्रभावित कर सकते हैं?

यदि इन प्रश्नों के उत्तर असुविधाजनक हैं, तो राजनीतिक पुनर्विचार आवश्यक है।

संसद को कानून बनाने का अधिकार है, लेकिन क्या यह अधिकार असीमित है?

भारतीय संविधान संसद को कानून बनाने की शक्ति देता है। लेकिन यह शक्ति निरंकुश नहीं है। संसद संविधान से ऊपर नहीं है, सरकार संसद से ऊपर नहीं है और किसी राजनीतिक गठबंधन को जनता के अधिकारों से ऊपर खड़े होने का अधिकार नहीं है।

कानून बनाने की शक्ति और किसी भी प्रकार का कानून बनाने की असीमित छूट—दो बिल्कुल अलग बातें हैं।

संसद कानून बनाती है, लेकिन उसे संविधान की सीमाओं, मौलिक अधिकारों और न्यायिक समीक्षा के सिद्धांतों का सम्मान करना होता है। कोई कानून केवल इसलिए लोकतांत्रिक या न्यायसंगत नहीं हो जाता कि उसे संसद ने पारित कर दिया है। उसके संवैधानिक आधार, उद्देश्य, प्रभाव और नागरिकों के अधिकारों के साथ उसकी संगति की जांच की जा सकती है।

यदि संसद को केवल बहुमत के आधार पर प्रत्येक निर्णय को उचित ठहराने की छूट दे दी जाए, तो लोकतंत्र का अर्थ चुनाव जीतने और उसके बाद पांच वर्षों तक बिना प्रभावी जवाबदेही के शासन करने तक सीमित हो जाएगा।

क्या जनता ने अपने प्रतिनिधियों को इसलिए चुना है कि वे उसके अधिकारों की रक्षा करें या इसलिए कि वे बहुमत के बल पर ऐसे निर्णय भी लें जिनसे उन्हीं अधिकारों को नुकसान पहुंचे?

इस प्रश्न का उत्तर भारतीय संविधान की मूल भावना में मौजूद है। जनता लोकतंत्र का आधार है। संसद जनता की प्रतिनिधि संस्था है, जनता की मालिक नहीं।

चुनाव आयोग: लोकतंत्र की निष्पक्षता का प्रश्न

चुनाव आयोग की स्वतंत्रता का मुद्दा इसी संवैधानिक बहस के केंद्र में है।

मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने Anoop Baranwal v. Union of India मामले में व्यवस्था दी थी कि संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश की समिति की सलाह पर की जाएगी।

दिसंबर 2023 में संसद ने नियुक्ति संबंधी नया कानून पारित किया। इसके तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता को शामिल किया गया। इस प्रकार समिति में सरकार के दो प्रतिनिधि और विपक्ष का एक प्रतिनिधि होता है।

इस संरचना पर गंभीर संस्थागत सवाल उठे हैं। आलोचकों का तर्क है कि ऐसी व्यवस्था में सरकार को चयन प्रक्रिया पर अधिक प्रभाव प्राप्त होता है। दूसरी ओर, कानून के समर्थक संसद के विधायी अधिकार और निर्धारित नियुक्ति प्रक्रिया का बचाव करते हैं।

यहां बहस का उद्देश्य किसी नियुक्त अधिकारी को बिना प्रमाण पक्षपाती घोषित करना नहीं है। वास्तविक प्रश्न यह है कि चुनाव कराने वाली संस्था के नेतृत्व की नियुक्ति ऐसी प्रक्रिया से होनी चाहिए या नहीं, जिस पर सरकार के प्रभाव को लेकर संदेह पैदा हो सकता है।

चुनाव आयोग की निष्पक्षता केवल चुनाव कराने की प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं है। इसका सीधा संबंध जनता के मतदान के अधिकार और सत्ता परिवर्तन की लोकतांत्रिक संभावना से है। यदि नियुक्ति प्रक्रिया पर व्यापक अविश्वास उत्पन्न होता है, तो उसका समाधान राजनीतिक आरोपों को खारिज करने मात्र से नहीं होगा। उसके लिए पारदर्शिता, विश्वसनीय संस्थागत सुरक्षा और जवाबदेही की आवश्यकता होगी।

NDA के सहयोगी दलों के सामने अब वास्तविक परीक्षा है

NDA केवल भाजपा का नाम नहीं है। यह विभिन्न राजनीतिक दलों का गठबंधन है, जिनके अपने मतदाता, राजनीतिक इतिहास और सार्वजनिक दायित्व हैं। इसलिए गठबंधन में शामिल प्रत्येक दल की अपनी स्वतंत्र संवैधानिक और राजनीतिक जिम्मेदारी भी है।

गठबंधन की एकता का अर्थ यह नहीं हो सकता कि प्रत्येक सहयोगी दल सरकार के हर निर्णय का समर्थन करने के लिए बाध्य हो जाए। गठबंधन सरकार चलाने के लिए साझा कार्यक्रम और राजनीतिक सहयोग आवश्यक हो सकते हैं, लेकिन लोकतांत्रिक जिम्मेदारी का अर्थ है कि सहयोगी दल गलत निर्णयों पर प्रश्न उठाने का अधिकार और साहस बनाए रखें।

यदि कोई कानून नागरिकों के अधिकारों को प्रभावित करता है, किसी संवैधानिक संस्था की स्वतंत्रता पर सवाल उठाता है या जनता के हितों के विपरीत परिणाम पैदा कर सकता है, तो सहयोगी दलों को केवल सत्ता में अपनी भागीदारी बचाने के लिए उसका समर्थन नहीं करना चाहिए।

उन्हें यह देखना चाहिए कि उनके निर्णय का प्रभाव आम नागरिक पर क्या पड़ता है। किसान, मजदूर, बेरोजगार युवा, छोटे व्यापारी, विद्यार्थी और सामाजिक रूप से वंचित समुदाय केवल चुनाव के समय याद किए जाने वाले समूह नहीं हैं। लोकतंत्र में उनके अधिकारों की रक्षा सरकार और संसद की स्थायी जिम्मेदारी है।

किसी राजनीतिक दल के लिए सबसे बड़ा संकट विपक्ष में बैठना नहीं है। उससे बड़ा संकट यह है कि वह सत्ता में बने रहने के लिए अपने मतदाताओं के हितों और अपने संवैधानिक दायित्वों के बीच अंतर करना बंद कर दे।

संसद की आड़ में अधिनायकवादी प्रवृत्तियों को वैधता नहीं दी जा सकती

अधिनायकवाद हमेशा संसद को समाप्त करके ही स्थापित नहीं होता। लोकतांत्रिक संस्थाएं औपचारिक रूप से मौजूद रह सकती हैं, चुनाव होते रह सकते हैं और कानून भी पारित होते रह सकते हैं। फिर भी, यदि सत्ता पर प्रभावी नियंत्रण कमजोर पड़ जाए, असहमति के लिए स्थान सिकुड़ने लगे और संस्थागत स्वतंत्रता पर लगातार प्रश्न उठें, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।

इसलिए संसद का नाम लेकर हर निर्णय को आलोचना से परे घोषित करना लोकतांत्रिक जवाबदेही की अवधारणा को कमजोर करता है।

संसद में बहुमत होना शासन करने का अधिकार देता है, लेकिन हर निर्णय को नैतिक, संवैधानिक और सार्वजनिक जांच से मुक्त नहीं करता। विधायी प्रक्रिया में बहुमत महत्वपूर्ण है, परंतु संविधान की सीमाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।

भारत में न्यायिक समीक्षा, स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाएं, विपक्ष की भूमिका और नागरिकों की असहमति लोकतांत्रिक व्यवस्था के आवश्यक हिस्से हैं। इन सभी का उद्देश्य सत्ता को निष्क्रिय बनाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि सत्ता अपनी निर्धारित सीमाओं में रहकर जनता के प्रति जवाबदेह बनी रहे।

यदि कोई राजनीतिक दल लोकतंत्र की रक्षा की बात करता है, तो उसकी परीक्षा केवल उसके भाषणों से नहीं होगी। परीक्षा इस बात से होगी कि वह संसद में किन कानूनों का समर्थन करता है, किन पर आपत्ति उठाता है और जनता के अधिकारों के प्रश्न पर कितना स्वतंत्र रुख अपनाता है।

सत्ता से बड़ा है जनता का विश्वास

राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि जनता उन्हें केवल सरकार बनाने के लिए नहीं चुनती। जनता उनसे जवाबदेही, पारदर्शिता और अपने अधिकारों की रक्षा की अपेक्षा भी करती है।

जो दल सत्ता के प्रत्येक निर्णय के साथ खड़े रहते हैं, उन्हें यह बताना चाहिए कि वे अपने मतदाताओं के प्रति कितने जवाबदेह हैं। जो दल किसी कानून पर अपना रुख बदलते हैं, उन्हें अपने पुराने निर्णय की समीक्षा का आधार स्पष्ट करना चाहिए। और जो दल सरकार का विरोध करते हैं, उन्हें भी अपने तर्कों को तथ्यों तथा संवैधानिक सिद्धांतों पर आधारित रखना चाहिए।

सही का साथ देना किसी एक गठबंधन या विपक्ष का विशेषाधिकार नहीं है। यह प्रत्येक राजनीतिक दल की जिम्मेदारी है।

जगन मोहन रेड्डी के बयान से NDA के सहयोगी दलों को यही सबक लेना चाहिए कि संसद में मतदान केवल राजनीतिक प्रबंधन का हिस्सा नहीं है। वह जनता के अधिकारों और देश की संस्थागत व्यवस्था को प्रभावित करने वाला निर्णय है।

निष्कर्ष: फैसला समय रहते करना होगा

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NDA सरकार के भविष्य को लेकर राजनीतिक दावे किए जा सकते हैं, लेकिन किसी गठबंधन की हार या जीत को निश्चित बताने के बजाय उसके सहयोगी दलों को अपने वर्तमान निर्णयों की समीक्षा करनी चाहिए। लोकतंत्र में किसी भी सरकार का भविष्य जनता तय करती है, और जनता का विश्वास केवल सत्ता के गणित से सुरक्षित नहीं रखा जा सकता।

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आज प्रत्येक राजनीतिक दल के सामने एक बुनियादी प्रश्न है—वह अपने राजनीतिक हितों की रक्षा कर रहा है या उन लोगों के अधिकारों की, जिनके मतों से उसे प्रतिनिधित्व मिला है?

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NDA के सहयोगी दलों को भी यह फैसला समय रहते करना चाहिए। यदि उन्हें किसी कानून, नीति या संस्थागत व्यवस्था पर गंभीर संवैधानिक आपत्ति है, तो उसे गठबंधन की मजबूरी के पीछे छिपाने के बजाय स्पष्ट रूप से सामने रखना चाहिए। सरकार के भीतर रहते हुए भी असहमति जताना संभव है, और जरूरत पड़ने पर किसी निर्णय का समर्थन करने से इनकार करना भी लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा है।

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देश को ऐसे राजनीतिक दलों की आवश्यकता है जो सत्ता को अंतिम लक्ष्य न मानें, बल्कि जनता के अधिकारों की रक्षा को अपनी जिम्मेदारी समझें।

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सवाल यह नहीं है कि कौन किसके साथ खड़ा है। सवाल यह है कि जब सत्ता और जनता के हितों के बीच टकराव दिखाई दे, तब कौन संविधान, लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों के साथ खड़ा होता है।

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इतिहास में राजनीतिक दलों का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होगा कि उन्होंने कितने समय तक सत्ता में भागीदारी की। उनका मूल्यांकन इस आधार पर भी होगा कि जब लोकतांत्रिक जवाबदेही की परीक्षा सामने आई, तब उन्होंने क्या निर्णय लिया।

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सत्ता अस्थायी है, गठबंधन बदलते रहते हैं, लेकिन जनता के अधिकार और संविधान की सर्वोच्चता किसी भी राजनीतिक समीकरण से बड़े हैं।

https://politicsinsightindia.com/jantar-mantar-protest-ban-government-public-rights-democracy

संदर्भ एवं स्रोत (References)

  1. The Indian Express — जगन मोहन रेड्डी ने 2023 के चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून का समर्थन करने पर जताया पछतावा और चयन समिति में CJI को बहाल करने की मांग।
    The Indian Express की रिपोर्ट

  2. India Today — जगन की स्वीकारोक्ति और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार की मांग।
    India Today की रिपोर्ट

  3. NDTV — चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया पर जगन का बयान और निष्पक्ष चयन व्यवस्था की मांग।
    NDTV की रिपोर्ट

  4. The News Minute — चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कानून पर YSRCP के पुराने समर्थन और जगन के बदले रुख का विश्लेषण।
    The News Minute की रिपोर्ट

  5. The Indian Express — 2023 के कानून की संवैधानिक वैधता पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई और न्यायाधीशों के मतभेद का विवरण।
    सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही पर रिपोर्ट

  6. The Times of India — चंद्रबाबू नायडू की जगन के बदले रुख पर प्रतिक्रिया।
    The Times of India की रिपोर्ट

  7. राज्यसभा सचिवालय — 12 दिसंबर 2023 की आधिकारिक संसदीय कार्यवाही।
    राज्यसभा की आधिकारिक कार्यवाही

Disclaimer: यह लेख सार्वजनिक स्रोतों पर आधारित संपादकीय विश्लेषण है। इसमें व्यक्त विचार लेखक के हैं। उद्देश्य किसी राजनीतिक दल का समर्थन या विरोध करना नहीं, बल्कि लोकतंत्र, संविधान और जनता के प्रति जवाबदेही पर चर्चा को प्रोत्साहित करना है।

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