चौधरी चरण सिंह : किसान, लोकतंत्र और भारतीय अर्थव्यवस्था का अनकहा इतिहास
भारत की कृषि सभ्यता, अंग्रेज़ी शासन की भूमि नीतियों, जमींदारी व्यवस्था और किसान संकट की ऐतिहासिक पड़ताल। जानिए कैसे इन परिस्थितियों ने चौधरी चरण सिंह के आर्थिक और राजनीतिक विचारों को आकार दिया तथा उन्हें किसान हितों का सबसे प्रभावशाली नेता बनाया।
चौधरी चरण सिंह : किसान, लोकतंत्र और भारतीय अर्थव्यवस्था का अनकहा इतिहास
भाग–1 (अध्याय–1)
भारत की आत्मा, किसान और एक विचारक का जन्म
"किसी राष्ट्र की समृद्धि केवल उसके शहरों की ऊँची इमारतों से नहीं मापी जाती, बल्कि उन खेतों से मापी जाती है जहाँ अन्न उगाने वाला किसान सम्मान के साथ जीवन जी सके।"
प्रस्तावना : एक प्रश्न जो आज भी हमारे सामने खड़ा है
जब भी भारत की अर्थव्यवस्था की चर्चा होती है, अक्सर महानगरों की चमक, उद्योगों की ऊँची चिमनियाँ, शेयर बाज़ार की तेज़ी, विदेशी निवेश और तकनीकी प्रगति को विकास का प्रतीक माना जाता है। लेकिन यदि यही प्रश्न भारत के किसी छोटे गाँव के किसान से पूछा जाए कि विकास क्या है, तो उसका उत्तर भिन्न हो सकता है। उसके लिए विकास का अर्थ है—समय पर वर्षा, सिंचाई का पानी, खेत का उचित मूल्य, बच्चों की शिक्षा, परिवार के लिए सम्मानजनक जीवन और ऐसा भविष्य जिसमें खेती घाटे का सौदा न हो।
यहीं से इस पुस्तक की यात्रा आरम्भ होती है।
यह केवल एक व्यक्ति की जीवनी नहीं है। यह उस विचारधारा की कहानी है जिसने भारत के विकास को गाँव की मिट्टी, खेतों की मेड़ और किसान के श्रम की दृष्टि से समझने का प्रयास किया। उस विचारधारा का सबसे प्रभावशाली चेहरा थे—चौधरी चरण सिंह।
उन्हें केवल भारत का पाँचवाँ प्रधानमंत्री कहना उनके व्यक्तित्व को सीमित कर देना होगा। वे एक विधिवेत्ता थे, एक प्रशासनिक सुधारक थे, भूमि सुधार के समर्थक थे, कृषि-अर्थशास्त्र के गंभीर विद्यार्थी थे और सबसे बढ़कर एक ऐसे राजनेता थे जिन्होंने बार-बार यह कहा कि भारत की आर्थिक नीतियों का केंद्र किसान होना चाहिए।
लेकिन इस विचार को समझने के लिए पहले भारत को समझना आवश्यक है।
अध्याय 1 : भारत—एक कृषि सभ्यता
भारत को लंबे समय तक केवल "कृषि प्रधान देश" कहकर वर्णित किया जाता रहा। यह वाक्य जितना सामान्य लगता है, उसका अर्थ उतना ही गहरा है।
हजारों वर्षों तक इस भूभाग की अर्थव्यवस्था, सामाजिक व्यवस्था, संस्कृति और स्थानीय शासन का आधार कृषि रही। गाँव केवल रहने की जगह नहीं थे; वे उत्पादन, व्यापार, परंपरा और सामाजिक जीवन की मूल इकाइयाँ थे।
कृषि केवल भोजन उपलब्ध कराने का साधन नहीं थी। उसी से राज्य को कर मिलता था, उसी से व्यापार चलता था, उसी से कुटीर उद्योगों को कच्चा माल मिलता था और उसी से समाज की आर्थिक स्थिरता बनी रहती थी।
कपास खेतों में उगती थी, उससे सूत बनता था, सूत से वस्त्र तैयार होते थे। गन्ने से गुड़ बनता था। तिलहन से तेल निकलता था। पशुपालन खेती का सहायक था। यह एक परस्पर जुड़ी हुई ग्रामीण अर्थव्यवस्था थी।
इस व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि गाँव उत्पादन और उपभोग दोनों के केंद्र थे। स्थानीय आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा स्थानीय स्तर पर ही पूरा हो जाता था।
इसका अर्थ यह नहीं कि सब कुछ आदर्श था। सामाजिक असमानताएँ थीं, जातिगत विभाजन था, अनेक क्षेत्रों में किसानों पर करों का बोझ भी था। फिर भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार भूमि और श्रम का प्रत्यक्ष संबंध था।
किसान केवल उत्पादक नहीं था
आधुनिक अर्थशास्त्र में किसान को अक्सर "प्रोड्यूसर" कहा जाता है। परंतु भारतीय समाज में किसान की भूमिका इससे कहीं व्यापक थी।
वह—
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अन्न उत्पादक था,
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पशुपालक था,
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जल संरक्षण का संरक्षक था,
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बीजों का संरक्षक था,
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स्थानीय ज्ञान का संवाहक था,
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और आने वाली पीढ़ियों के लिए भूमि को बचाकर रखने वाला व्यक्ति भी था।
भारत की अनेक पारंपरिक कृषि पद्धतियाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक ज्ञान के रूप में आगे बढ़ीं। बीजों का चयन, वर्षा का अनुमान, मिट्टी की पहचान, फसलों का चक्र—ये सब आधुनिक विश्वविद्यालयों से पहले गाँवों की सामूहिक बुद्धि का हिस्सा थे।
गाँव और लोकतंत्र
भारत में स्थानीय स्वशासन की अवधारणा भी नई नहीं थी।
अनेक क्षेत्रों में पंचायतें विवाद निपटाने, सामुदायिक निर्णय लेने और संसाधनों के प्रबंधन का कार्य करती थीं। उनकी संरचना समय और क्षेत्र के अनुसार बदलती रही, परंतु यह स्पष्ट है कि ग्रामीण समाज केवल कृषि उत्पादन का केंद्र नहीं था; वह सामाजिक संगठन की भी आधारशिला था।
इसी कारण महात्मा गांधी ने स्वतंत्र भारत के लिए ग्राम स्वराज की कल्पना की।
चौधरी चरण सिंह ने भी गाँव को केवल भावनात्मक प्रतीक नहीं माना। उन्होंने उसे आर्थिक इकाई के रूप में देखा।
जब भारत बदलने लगा
अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी भारत के लिए बड़े परिवर्तन का समय थीं।
राजनीतिक सत्ता बदल रही थी। व्यापारिक हित बढ़ रहे थे। औपनिवेशिक शासन का विस्तार हो रहा था। कृषि से प्राप्त होने वाला राजस्व ब्रिटिश प्रशासन की वित्तीय व्यवस्था का प्रमुख आधार बन गया।
यहीं से भूमि, किसान और राज्य के बीच संबंधों में गहरा परिवर्तन आया।
कई क्षेत्रों में ऐसी व्यवस्थाएँ लागू की गईं जिनका उद्देश्य स्थानीय कृषि विकास से अधिक नियमित राजस्व सुनिश्चित करना था। विभिन्न प्रांतों में अलग-अलग भू-राजस्व प्रणालियाँ लागू हुईं। इनका प्रभाव किसानों पर भी अलग-अलग पड़ा।
भूमि का प्रश्न अब केवल खेती का प्रश्न नहीं रह गया था; वह शासन, कर, अधिकार और न्याय का प्रश्न बन चुका था।
किसान की बदलती स्थिति
एक किसान के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज़ उसकी भूमि होती है।
जब भूमि पर अधिकार अस्पष्ट हो, कर का बोझ बढ़े, मौसम प्रतिकूल हो और ऋण की व्यवस्था कमजोर हो, तब खेती धीरे-धीरे जोखिमपूर्ण बन जाती है।
ऐतिहासिक अभिलेख बताते हैं कि कई क्षेत्रों में किसानों को प्राकृतिक आपदाओं, कर्ज़ और करों के कारण कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। यह अनुभव पूरे देश में समान नहीं था, लेकिन इतना स्पष्ट था कि कृषि प्रश्न राष्ट्रीय महत्व का विषय बन चुका था।
इसी पृष्ठभूमि में किसान आंदोलनों, भूमि सुधार की मांग और ग्रामीण न्याय के विचार धीरे-धीरे मजबूत होने लगे।
स्वतंत्रता आंदोलन और किसान प्रश्न
भारत का स्वतंत्रता आंदोलन केवल राजनीतिक स्वतंत्रता का आंदोलन नहीं था।
उसके भीतर कई धाराएँ थीं।
कुछ नेताओं का ध्यान औद्योगिक विकास पर था।
कुछ सामाजिक सुधारों पर बल दे रहे थे।
कुछ शिक्षा और लोकतांत्रिक संस्थाओं के निर्माण को प्राथमिकता दे रहे थे।
और एक महत्वपूर्ण धारा ऐसी थी जो यह मानती थी कि यदि भारत का किसान आर्थिक रूप से सशक्त नहीं होगा, तो स्वतंत्रता अधूरी रहेगी।
इसी धारा से आगे चलकर कई महत्वपूर्ण किसान नेता उभरे।
चौधरी छोटूराम, सरदार वल्लभभाई पटेल, एन. जी. रंगा, स्वामी सहजानंद सरस्वती और बाद के वर्षों में चौधरी चरण सिंह—इन सभी ने अलग-अलग परिस्थितियों में किसान प्रश्न को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाया।
हालाँकि इन सभी की विचारधाराएँ एक जैसी नहीं थीं, लेकिन एक साझा चिंता अवश्य थी—ग्रामीण भारत की उपेक्षा लंबे समय तक राष्ट्र के लिए घातक सिद्ध हो सकती है।
एक बच्चे का जन्म, जिसे अभी कोई नहीं जानता
23 दिसंबर 1902।
उत्तर भारत के एक साधारण कृषक परिवार में एक बालक जन्म लेता है।
उस समय किसी को नहीं पता था कि यही बालक आगे चलकर भारतीय राजनीति में किसान की आवाज़ का सबसे प्रभावशाली प्रतिनिधि बनेगा।
उसका नाम था—चौधरी चरण सिंह।
वह किसी राजघराने में पैदा नहीं हुए।
न उनके परिवार के पास अपार संपत्ति थी।
न उनके सामने सत्ता का तैयार रास्ता था।
उन्होंने जिस समाज को बचपन से देखा, वह खेतों, ऋतुओं, मेहनत, ऋण, फसल और ग्रामीण जीवन से बना समाज था।
यही अनुभव आगे चलकर उनके आर्थिक चिंतन की सबसे बड़ी पूँजी बना।
क्यों अलग थे चरण सिंह?
भारतीय राजनीति में अनेक नेता किसानों की बात करते रहे हैं।
लेकिन चरण सिंह की विशेषता यह थी कि उन्होंने किसान को केवल चुनावी वर्ग नहीं माना।
उन्होंने किसान पर लिखा।
उसकी आर्थिक समस्याओं का अध्ययन किया।
भूमि संबंधों का विश्लेषण किया।
ग्रामीण उत्पादन की संरचना को समझा।
और फिर उन निष्कर्षों के आधार पर राजनीतिक दृष्टिकोण विकसित किया।
यही कारण है कि उन्हें केवल किसान नेता कहना पर्याप्त नहीं है। वे कृषि-अर्थशास्त्र और सार्वजनिक नीति के गंभीर चिंतक भी थे।
इस पुस्तक की यात्रा
आगे के अध्यायों में हम केवल घटनाओं का वर्णन नहीं करेंगे।
हम यह समझने का प्रयास करेंगे—
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भारत की भूमि व्यवस्था कैसे बदली?
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जमींदारी उन्मूलन क्यों आवश्यक माना गया?
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चौधरी चरण सिंह ने नेहरू के औद्योगिक मॉडल से कहाँ और क्यों असहमति जताई?
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क्या उनके आर्थिक विचार आज भी प्रासंगिक हैं?
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आधुनिक भारत की कृषि नीति में उनके विचारों की क्या छाप दिखाई देती है?
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और अंततः, क्या भारत ने अपने सबसे बड़े ग्रामीण अर्थशास्त्रियों में से एक को पर्याप्त रूप से समझा?
यह यात्रा इतिहास, अर्थशास्त्र, राजनीति और ग्रामीण समाज—चारों को साथ लेकर चलेगी।
क्योंकि चौधरी चरण सिंह को समझना केवल एक नेता को समझना नहीं है; यह भारत की उस बहस को समझना है जो आज भी जारी है—क्या राष्ट्र की समृद्धि का रास्ता गाँव से होकर जाता है, या केवल शहरों से?
अध्याय–2
अंग्रेज़ी शासन, भूमि व्यवस्था और किसान संकट
"जब किसी राष्ट्र की भूमि पर अधिकार बदलता है, तब केवल मालिक नहीं बदलते—समाज, अर्थव्यवस्था और भविष्य भी बदल जाता है।"
एक नया शासन, एक नई आर्थिक सोच
अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक भारत का राजनीतिक मानचित्र तेजी से बदल रहा था। ईस्ट इंडिया कंपनी, जो एक व्यापारिक संस्था के रूप में भारत आई थी, धीरे-धीरे एक शासक शक्ति में बदलने लगी। प्लासी (1757) और बक्सर (1764) जैसी निर्णायक घटनाओं के बाद कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा के विशाल क्षेत्रों में राजस्व वसूलने का अधिकार प्राप्त हुआ।
यहीं से एक ऐसा परिवर्तन आरम्भ हुआ जिसने भारतीय किसान के जीवन की दिशा बदल दी।
कंपनी का मूल उद्देश्य कृषि सुधार नहीं था। उसका उद्देश्य था—स्थिर और अधिकतम राजस्व। भारत की उपजाऊ भूमि अब केवल अन्न उत्पादन का साधन नहीं रही; वह औपनिवेशिक शासन की आय का प्रमुख स्रोत बन गई।
भूमि का मूल्य अब उसकी सामाजिक उपयोगिता से अधिक उसकी कर-उत्पादन क्षमता से आँका जाने लगा।
भूमि और किसान का पारंपरिक संबंध
औपनिवेशिक शासन से पहले भारत में भूमि संबंधों की व्यवस्था पूरे देश में एक जैसी नहीं थी। अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग परंपराएँ थीं। कहीं स्थानीय सरदारों का प्रभाव था, कहीं ग्राम समुदाय की भूमिका अधिक थी, तो कहीं शासक सीधे राजस्व लेते थे।
लेकिन एक सामान्य विशेषता यह थी कि किसान और भूमि का संबंध अपेक्षाकृत प्रत्यक्ष था। खेती करने वाला व्यक्ति केवल श्रमिक नहीं था; वह स्थानीय समाज का हिस्सा था। भूमि उसके जीवन, परिवार और सामाजिक पहचान से जुड़ी हुई थी।
ब्रिटिश प्रशासन ने इस जटिल व्यवस्था को राजस्व संग्रह की दृष्टि से पुनर्गठित करना शुरू किया।
स्थायी बंदोबस्त और जमींदारी व्यवस्था
1793 में लॉर्ड कॉर्नवालिस ने बंगाल में स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement) लागू किया।
इस व्यवस्था का उद्देश्य था कि सरकार को निश्चित राजस्व नियमित रूप से मिलता रहे। इसके अंतर्गत अनेक जमींदारों को भूमि से राजस्व वसूलने का अधिकार दिया गया। उन्हें राज्य और किसान के बीच मध्यस्थ बना दिया गया।
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सैद्धांतिक रूप से जमींदार सरकार को निश्चित कर देते थे और शेष व्यवस्था का संचालन करते थे। व्यवहार में अनेक क्षेत्रों में किसानों पर अतिरिक्त बोझ बढ़ा। सभी क्षेत्रों का अनुभव समान नहीं था, किंतु अनेक इतिहासकारों का मत है कि इस व्यवस्था ने कई स्थानों पर किसानों की स्थिति को कमजोर किया।
भूमि पर खेती किसान करता था, लेकिन अधिकार और नियंत्रण की परतें बढ़ती चली गईं।
रैयतवारी व्यवस्था
दक्षिण और पश्चिम भारत के कई हिस्सों में अलग मॉडल अपनाया गया, जिसे रैयतवारी व्यवस्था कहा गया।
इस प्रणाली में सरकार का सीधा संबंध किसान (रैयत) से स्थापित किया गया। सिद्धांततः इससे मध्यस्थों की भूमिका कम हुई, लेकिन कर निर्धारण, मौसम की अनिश्चितता और प्रशासनिक कठोरता जैसी समस्याएँ बनी रहीं।
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जब फसल अच्छी होती थी, तब भी किसान को कर देना पड़ता था; और जब फसल खराब होती थी, तब भी राजस्व का दबाव बना रहता था। अनेक क्षेत्रों में यह स्थिति ऋणग्रस्तता का कारण बनी।
महालवारी व्यवस्था
उत्तर भारत के बड़े हिस्से, विशेषकर वर्तमान उत्तर प्रदेश और पंजाब के कुछ क्षेत्रों में महालवारी व्यवस्था लागू की गई।
इसमें गाँव या महाल को राजस्व की इकाई माना गया। कई स्थानों पर ग्राम समुदाय और स्थानीय भू-स्वामियों की संयुक्त जिम्मेदारी तय की गई।
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कागज़ पर यह व्यवस्था संतुलित दिखाई देती थी, लेकिन व्यवहार में स्थानीय परिस्थितियों, प्रशासनिक दबाव और राजस्व लक्ष्यों के कारण किसानों को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
किसान की सबसे बड़ी समस्या – अनिश्चितता
खेती स्वभाव से ही जोखिमपूर्ण कार्य है।
वर्षा कम हो सकती है।
बाढ़ आ सकती है।
कीट लग सकते हैं।
फसल का भाव गिर सकता है।
ऐसी स्थिति में यदि कर व्यवस्था लचीली न हो, तो किसान सबसे पहले कर्ज़ लेता है।
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और जब कर्ज़ चुकाने की क्षमता घटती है, तब भूमि गिरवी रखनी पड़ती है।
यही चक्र कई क्षेत्रों में दिखाई देता है—कम आय, बढ़ता कर्ज़, और आर्थिक असुरक्षा।
साहूकार और ग्रामीण ऋण
औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था ग्रामीण भारत में बहुत सीमित थी।
ऐसे में किसान स्थानीय साहूकारों, व्यापारियों या महाजनों से ऋण लेते थे। अनेक मामलों में ये ऋण खेती चलाने के लिए आवश्यक थे, लेकिन ऊँची ब्याज दरों और कमजोर कानूनी सुरक्षा के कारण कई परिवार वर्षों तक ऋण के बोझ से बाहर नहीं निकल सके।
यह कहना उचित नहीं होगा कि हर साहूकार शोषक था या हर किसान पीड़ित, क्योंकि स्थानीय परिस्थितियाँ भिन्न थीं। फिर भी ग्रामीण ऋण का प्रश्न इतना गंभीर था कि आगे चलकर यह अनेक किसान आंदोलनों और राजनीतिक बहसों का प्रमुख विषय बन गया।
यही वह प्रश्न था जिस पर बाद में चौधरी चरण सिंह ने विशेष ध्यान दिया।
अकाल और कृषि
उन्नीसवीं शताब्दी में भारत ने कई बड़े अकाल देखे।
इन अकालों के कारण केवल वर्षा की कमी नहीं थी। परिवहन, प्रशासन, स्थानीय बाज़ार, भंडारण व्यवस्था और शासन की नीतियाँ भी महत्वपूर्ण कारक थीं।
इतिहासकारों के बीच इस विषय पर अलग-अलग मत हैं, लेकिन इस बात पर व्यापक सहमति है कि बार-बार आने वाले अकालों ने ग्रामीण समाज को गहराई से प्रभावित किया।
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जब खेत सूखते हैं, तो केवल अन्न की कमी नहीं होती; शिक्षा रुकती है, पशुधन बिकता है, परिवार कर्ज़ में डूबते हैं और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी प्रभावित होता है।
किसान आंदोलनों का उदय
किसान केवल पीड़ा सहने वाला वर्ग नहीं था।
जब परिस्थितियाँ असहनीय हुईं, तब देश के विभिन्न भागों में किसान आंदोलनों ने जन्म लिया।
इन आंदोलनों की प्रकृति अलग-अलग थी।
कहीं करों के विरुद्ध विरोध हुआ।
कहीं नील की खेती का प्रतिरोध हुआ।
कहीं भूमि अधिकारों की माँग उठी।
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कहीं ग्रामीण ऋण राहत की माँग की गई।
इन आंदोलनों ने भारत की राजनीति को यह सिखाया कि किसान केवल आर्थिक इकाई नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक शक्ति भी है।
स्वतंत्रता आंदोलन में कृषि प्रश्न
बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक यह स्पष्ट हो चुका था कि भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई केवल राजनीतिक अधिकारों की लड़ाई नहीं हो सकती।
यदि स्वतंत्र भारत में भी किसान भूमिहीन, ऋणग्रस्त और निर्धन रहेगा, तो स्वतंत्रता अधूरी मानी जाएगी।
इसीलिए राष्ट्रीय आंदोलन के भीतर भूमि सुधार, ग्रामीण ऋण, सिंचाई, सहकारिता और कृषि उत्पादन जैसे विषयों पर चर्चा बढ़ने लगी।
कई प्रांतीय नेताओं ने अपने-अपने क्षेत्रों में किसान संगठनों का निर्माण किया।
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इसी वातावरण में एक युवा वकील, जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण समाज को निकट से समझता था, सार्वजनिक जीवन में प्रवेश कर रहा था।
उसका नाम था—चौधरी चरण सिंह।
एक विचार का जन्म
चरण सिंह ने किसान की समस्या को केवल भावनात्मक दृष्टि से नहीं देखा।
उन्होंने एक मूल प्रश्न पूछा—
यदि भारत की अधिकांश आबादी कृषि पर निर्भर है, तो राष्ट्रीय आर्थिक नीति का केंद्र कृषि क्यों नहीं है?
यह प्रश्न आगे चलकर उनके पूरे आर्थिक दर्शन का आधार बना।
उनके लिए भूमि केवल संपत्ति नहीं थी; वह उत्पादन, सम्मान, सामाजिक न्याय और लोकतंत्र की आधारशिला थी।
इसी कारण जब वे राजनीति में सक्रिय हुए, तो उनका सबसे बड़ा ध्यान भूमि सुधार, ग्रामीण ऋण, किसान अधिकार और कृषि-आधारित विकास मॉडल पर केंद्रित रहा।
अगले अध्याय की भूमिका
बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में भारत का किसान संघर्ष कर रहा था, लेकिन उसी समय एक नई पीढ़ी भी तैयार हो रही थी—ऐसी पीढ़ी जिसने कानून पढ़ा, स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया और ग्रामीण भारत की समस्याओं को सत्ता तक पहुँचाने का संकल्प लिया।
इसी पीढ़ी में एक नाम धीरे-धीरे उभर रहा था—चौधरी चरण सिंह।
अगले अध्याय में हम उनके बचपन, पारिवारिक संस्कार, शिक्षा, वकालत, स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी और उन प्रारम्भिक अनुभवों का अध्ययन करेंगे जिन्होंने आगे चलकर उन्हें भारत का सबसे प्रभावशाली किसान चिंतक बनाया।
**(अध्याय–2 समाप्त) अगले कुछ दिनों तक प्रतिदिन एक भाग लिखेंगे . कृपया पढ़िए और कमेंट भी कीजिये **
धन्यवाद्
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