अमेरिका की दोहरी नीति, चाहता है एशिया पर नियंत्रण, दुहाई लोकतंत्र की दे रहा है
अमेरिका द्वारा ईरान पर किए गए हालिया मिसाइल हमलों ने उसकी मंशा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ अमेरिका ईरान के साथ समझौता वार्ता की बात करता है, दूसरी तरफ सैन्य कार्रवाई जारी रखता है। अमेरिका इन हमलों को “सेल्फ डिफेन्स” बता रहा है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि जब तत्काल सैन्य खतरा स्पष्ट नहीं था, तब यह कार्रवाई केवल दबाव की राजनीति लगती है। इसी दौरान “अब्राहम एकॉर्ड” जैसे राजनीतिक मुद्दों को उठाना भी यह संकेत देता है कि अमेरिका केवल परमाणु समझौते तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे मध्य-पूर्व की राजनीतिक दिशा को नियंत्रित करना चाहता है। लेख में इराक, लीबिया और वेनेजुएला जैसे उदाहरणों के जरिए यह दिखाने की कोशिश की गई है कि अमेरिका ने पहले भी सुरक्षा, लोकतंत्र और मानवाधिकार के नाम पर हस्तक्षेप किए, लेकिन उन देशों के तेल, संसाधनों और रणनीतिक महत्व से उसे आर्थिक और भू-राजनीतिक लाभ भी मिले। आलोचकों का मानना है कि डॉलर आधारित वैश्विक व्यवस्था और सैन्य ताकत के सहारे अमेरिका दुनिया पर अपना प्रभाव बनाए रखना चाहता है। यदि ईरान संकट और बढ़ता है, तो तेल कीमतों, महंगाई और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बड़ा
सुधीर तालियान
चौधरी- तलान खाप
आज तड़के अमेरिका द्वारा Iran पर किए गए मिसाइल हमलों ने पूरी दुनिया में एक बार फिर वही पुराना सवाल खड़ा कर दिया है — क्या अमेरिका वास्तव में शांति चाहता है, या वह “Negotiation” और “Military Pressure” को साथ-साथ चलाकर दुनिया पर अपना प्रभाव बनाए रखना चाहता है?
अमेरिका ने इन हमलों को “Self Defence” बताया। लेकिन सवाल यह है कि यदि उस समय Iran की तरफ़ से कोई खुली सैन्य कार्रवाई नहीं हो रही थी, तो फिर यह आत्मरक्षा कैसे हुई? यही वह बिंदु है जहाँ अमेरिकी विदेश नीति पर संदेह गहराता है। एक तरफ़ वार्ता की बात होती है, दूसरी तरफ़ मिसाइलें चलती हैं। दुनिया को यह संदेश जाता है कि अमेरिका बातचीत भी करना चाहता है और दबाव भी बनाए रखना चाहता है।
हाल की रिपोर्टों के अनुसार अमेरिकी सेना ने दक्षिणी ईरान में मिसाइल लॉन्च साइट्स और कथित रूप से माइन बिछाने वाली नौकाओं को निशाना बनाया। अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने इसे अपने सैनिकों की सुरक्षा के लिए “डिफेंसिव स्ट्राइक” कहा। (Reuters)
लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में केवल “आधिकारिक बयान” ही सच्चाई नहीं होते। देशों की नीयत अक्सर उनके लंबे इतिहास और रणनीतिक व्यवहार से समझी जाती है।
इसी बीच “Abraham Accords” का मुद्दा फिर उठना भी कई सवाल पैदा करता है। अमेरिका लंबे समय से मध्य-पूर्व में एक ऐसा गठबंधन बनाना चाहता रहा है जिसमें अरब देश और Israel एक साझा सुरक्षा ढांचे में आ जाएँ। लेकिन जब वार्ता के बीच इस तरह के राजनीतिक प्रस्ताव सामने आते हैं, तो कई देशों को यह लगता है कि अमेरिका केवल परमाणु समझौता नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की राजनीतिक दिशा तय करना चाहता है।
अमेरिका की विदेश नीति: समझौता या दबाव की राजनीति?
अमेरिका की विदेश नीति को समझने के लिए केवल आज की घटना देखना काफी नहीं है। इतिहास बताता है कि अमेरिका ने कई देशों में “लोकतंत्र”, “मानवाधिकार”, “आतंकवाद विरोध” या “सुरक्षा” के नाम पर हस्तक्षेप किया, लेकिन उन हस्तक्षेपों के पीछे आर्थिक और सामरिक हित भी गहराई से जुड़े रहे।
इराक: तेल, युद्ध और टूटता हुआ देश
2003 में Iraq पर हमला “Weapons of Mass Destruction” यानी सामूहिक विनाश के हथियारों के आरोप पर किया गया। लेकिन बाद में ऐसे हथियार नहीं मिले। इसके बावजूद युद्ध हुआ, लाखों लोग प्रभावित हुए और पूरा क्षेत्र अस्थिर हो गया।
उस युद्ध के बाद अमेरिकी और पश्चिमी तेल कंपनियों को इराक के तेल क्षेत्र में बड़े कॉन्ट्रैक्ट मिले। यह वही बिंदु है जहाँ आलोचक कहते हैं कि युद्ध केवल सुरक्षा के लिए नहीं था, बल्कि ऊर्जा संसाधनों पर प्रभाव बनाए रखने का भी मामला था।
इराक युद्ध ने केवल मध्य-पूर्व नहीं बदला, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया। तेल की कीमतों में उछाल आया, क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ी और आतंकवादी संगठनों को भी नया मैदान मिला।
आज जब लोग अमेरिका की ईरान नीति पर सवाल उठाते हैं, तो उनके दिमाग में इराक का अनुभव भी मौजूद रहता है।
लीबिया: शासन बदला, लेकिन स्थिरता नहीं आई
2011 में Libya में नाटो हस्तक्षेप को “मानवीय हस्तक्षेप” बताया गया। लेकिन शासन परिवर्तन के बाद लीबिया स्थिर नहीं हो पाया। देश कई गुटों में बंट गया, हथियारों का प्रसार हुआ और पूरा उत्तर अफ्रीका अस्थिरता से प्रभावित हुआ।
यहाँ भी आलोचकों का आरोप यही रहा कि पश्चिमी शक्तियाँ शासन परिवर्तन तो करती हैं, लेकिन उसके बाद बनने वाले राजनीतिक शून्य की जिम्मेदारी नहीं लेतीं।
वेनेजुएला: तेल और आर्थिक प्रतिबंध
Venezuela दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाले देशों में गिना जाता है। अमेरिका ने वहां की सरकार पर लगातार आर्थिक प्रतिबंध लगाए। आधिकारिक तर्क लोकतंत्र और मानवाधिकार था, लेकिन आलोचकों का कहना है कि असली लड़ाई ऊर्जा नियंत्रण और भू-राजनीतिक प्रभाव की थी।
प्रतिबंधों ने वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था को गहरे संकट में डाल दिया। मुद्रा का मूल्य गिरा, महंगाई बढ़ी और लाखों लोग देश छोड़ने को मजबूर हुए।
इसीलिए जब अमेरिका ईरान पर दबाव बनाता है, तो दुनिया के कई हिस्सों में यह धारणा बनती है कि यह केवल सुरक्षा नीति नहीं, बल्कि आर्थिक शक्ति की राजनीति भी है।
डॉलर की ताकत और वैश्विक नियंत्रण
अमेरिका की सबसे बड़ी शक्ति केवल उसकी सेना नहीं, बल्कि डॉलर आधारित वैश्विक वित्तीय व्यवस्था भी है। दुनिया के अधिकांश तेल व्यापार डॉलर में होते हैं। अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग सिस्टम पर अमेरिकी प्रभाव बहुत बड़ा है।
जब अमेरिका किसी देश पर प्रतिबंध लगाता है, तो वह केवल उस देश को नहीं, बल्कि उससे व्यापार करने वाले देशों को भी प्रभावित करता है।
Iran वर्षों से प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। उसकी बैंकिंग, तेल निर्यात और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भारी असर पड़ा। यही वजह है कि ईरान लगातार वैकल्पिक व्यापार व्यवस्थाओं की बात करता है।
अमेरिका पर आलोचना करने वाले विशेषज्ञ कहते हैं कि डॉलर की यह शक्ति केवल आर्थिक व्यवस्था नहीं, बल्कि एक “Strategic Weapon” बन चुकी है।
क्या युद्ध से अमेरिका को आर्थिक लाभ मिलता है?
यह एक विवादास्पद लेकिन महत्वपूर्ण सवाल है।
इतिहास बताता है कि बड़े युद्धों के दौरान हथियार उद्योग, ऊर्जा बाजार और सुरक्षा उद्योग को भारी लाभ होता है। अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा रक्षा बजट रखने वाला देश है। कई अमेरिकी रक्षा कंपनियाँ युद्ध और तनाव के दौर में बड़े कॉन्ट्रैक्ट हासिल करती हैं।
हालांकि यह कहना गलत होगा कि अमेरिका केवल लाभ के लिए युद्ध करता है। लेकिन यह भी सच है कि युद्धों से कुछ शक्तिशाली आर्थिक समूहों को लाभ मिलता है।
यही कारण है कि अमेरिकी विदेश नीति को लेकर अक्सर यह आलोचना होती है कि वहाँ “Military-Industrial Complex” यानी सैन्य और कॉर्पोरेट हितों का प्रभाव बहुत अधिक है।
ईरान क्यों महत्वपूर्ण है?
Iran केवल एक देश नहीं, बल्कि मध्य-पूर्व की शक्ति संतुलन का बड़ा केंद्र है।
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वह दुनिया के सबसे बड़े तेल और गैस भंडार वाले देशों में शामिल है।
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स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग के पास स्थित है।
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क्षेत्रीय राजनीति में उसका प्रभाव Iraq, Lebanon, Syria और यमन तक फैला हुआ माना जाता है।
यदि ईरान कमजोर होता है, तो पूरे मध्य-पूर्व की शक्ति संरचना बदल सकती है। इसलिए अमेरिका, Israel और खाड़ी देशों की रणनीति में ईरान हमेशा केंद्र में रहता है।
बातचीत और बमबारी साथ-साथ क्यों?
यही सबसे बड़ा प्रश्न है।
हालिया रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता अभी भी जारी है, लेकिन उसी समय सैन्य कार्रवाई भी हो रही है। (Reuters)
कई विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका “Negotiation from Position of Strength” की नीति अपनाता है। यानी बातचीत करते समय भी सैन्य दबाव बनाए रखना।
लेकिन इस रणनीति की सबसे बड़ी समस्या विश्वास की कमी है। जब एक पक्ष बातचीत के दौरान हमला करता है, तो दूसरे पक्ष को यह संदेश जाता है कि वार्ता केवल समय खरीदने का माध्यम है।
यही कारण है कि अमेरिका की मंशा पर लगातार संदेह बना रहता है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर खतरा
यदि अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष बढ़ता है, तो उसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा।
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तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं।
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समुद्री व्यापार प्रभावित हो सकता है।
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महंगाई बढ़ सकती है।
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विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।
भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति बेहद संवेदनशील हो सकती है क्योंकि ऊर्जा आयात पर निर्भरता बहुत अधिक है।
युद्ध केवल सीमा पर नहीं लड़ा जाता — उसका असर पेट्रोल पंप, खाद्य कीमतों, रोजगार और आम नागरिक की जिंदगी तक पहुंचता है।
लेखक की राय
दुनिया अब उस दौर में पहुँच चुकी है जहाँ “लोकतंत्र”, “मानवाधिकार” और “सुरक्षा” जैसे शब्दों का इस्तेमाल कई बार रणनीतिक हितों के साथ जुड़ जाता है। अमेरिका खुद को वैश्विक व्यवस्था का रक्षक बताता है, लेकिन उसके कई कदम ऐसे रहे हैं जिन्होंने दुनिया के बड़े हिस्से में अविश्वास पैदा किया है।
इराक, लीबिया और वेनेजुएला जैसे उदाहरणों ने यह धारणा मजबूत की कि अमेरिकी हस्तक्षेप अक्सर संसाधनों, रणनीतिक प्रभाव और वैश्विक शक्ति संतुलन से जुड़ा होता है।
आज ईरान के मामले में भी यही संदेह सामने आ रहा है। यदि अमेरिका सचमुच समझौता चाहता है, तो उसे वार्ता और सैन्य कार्रवाई की दोहरी नीति से बाहर आना होगा। क्योंकि बम और बातचीत साथ-साथ चल सकते हैं, लेकिन भरोसा नहीं बन सकता।
दुनिया की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं कि युद्ध होते हैं। असली समस्या यह है कि महाशक्तियाँ अक्सर अपने हितों को “वैश्विक शांति” का नाम देकर पेश करती हैं।
और जब ऐसा होता है, तब छोटे और विकासशील देश सबसे ज्यादा कीमत चुकाते हैं।
आज पूरी दुनिया को केवल अमेरिका या ईरान की नहीं, बल्कि उस वैश्विक व्यवस्था की चिंता करनी चाहिए जहाँ आर्थिक प्रतिबंध, सैन्य दबाव और भू-राजनीतिक गठबंधन मिलकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति को नियंत्रित कर रहे हैं।
अगर महाशक्तियाँ संवाद को ईमानदारी से नहीं अपनातीं, तो आने वाले वर्षों में दुनिया केवल युद्ध के मैदान नहीं, बल्कि आर्थिक तूफानों का भी सामना करेगी।https://politicsinsightindia.com/new/rahul-gandhi-economic-storm-india-deep-analysis
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