उत्तर प्रदेश में आटे में सेलखड़ी की मिलावट: आगरा से अलीगढ़ तक बड़ा सवाल
आगरा में 1800 किलो सेलखड़ी और 1350 किलो आटा जब्त होने के बाद यूपी में खाद्य सुरक्षा पर सवाल। अलीगढ़, बुलंदशहर, फिरोजाबाद और मैनपुरी के मामलों की पड़ताल।
उत्तर प्रदेश की रोटी में पत्थर? आगरा से अलीगढ़ तक सेलखड़ी वाले आटे का बढ़ता खतरा
By- Ch. Sudhir Taliyan
क्या उत्तर प्रदेश में मिलावटखोरों का नेटवर्क इतना मजबूत हो गया है कि गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों की रोज की रोटी भी सुरक्षित नहीं रही?
उत्तर प्रदेश में आटे में सेलखड़ी, टैल्क या पत्थर जैसे पदार्थ मिलाए जाने के लगातार सामने आ रहे मामले केवल खाद्य मिलावट की खबरें नहीं हैं। ये राज्य की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था, निगरानी तंत्र और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल हैं।
आगरा के फतेहपुर सीकरी में अगस्त 2026 में एक मिल से करीब 1,800 किलोग्राम सेलखड़ी और 1,350 किलोग्राम आटा जब्त होने के बाद यह मामला फिर राष्ट्रीय चर्चा में आया है। खाद्य सुरक्षा विभाग ने जिस प्रतिष्ठान पर कार्रवाई की, उसके पास खाद्य तेल और मसालों से संबंधित लाइसेंस था, जबकि वहां आटा निर्माण होता मिला। आटे और सेलखड़ी के नमूने प्रयोगशाला जांच के लिए भेजे गए हैं।
लेकिन असली सवाल आगरा से बड़ा है।
क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में अलीगढ़, बुलंदशहर, फिरोजाबाद, मैनपुरी और आगरा से इसी तरह के मामले सामने आ चुके हैं। कहीं सेलखड़ी की बोरियां मिलीं, कहीं पैक्ड आटा जब्त हुआ, कहीं आटा तैयार करने की प्रक्रिया पर सवाल उठे और कहीं दिल्ली-NCR या दूसरे राज्यों तक सप्लाई की आशंका सामने आई।
ऐसे में उत्तर प्रदेश सरकार से यह पूछना जरूरी है:
अगर अलग-अलग जिलों में एक जैसी मिलावट बार-बार पकड़ी जा रही है, तो सरकार इसे अलग-अलग घटनाओं की तरह क्यों देख रही है?
आगरा में 1,800 किलो सेलखड़ी: सिर्फ एक मिल की कहानी नहीं
13 अगस्त 2026 को फतेहपुर सीकरी के जौतना डाबर रोड स्थित समृद्धि ऑयल मिल पर खाद्य सुरक्षा विभाग ने छापा मारा।
मौके से लगभग:
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1,800 किलो सेलखड़ी
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1,350 किलो आटा
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विभिन्न ब्रांडों के पैक्ड आटे
जब्त किए गए।
समृद्धि, उत्तम और श्याम भोग चक्की फ्रेश नाम वाले आटे के नमूने भी जांच के लिए लिए गए। अधिकारियों के अनुसार सेलखड़ी का इस्तेमाल आटे की चमक और वजन बढ़ाने के लिए किए जाने की आशंका है। हालांकि यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि जब्त आटे में सेलखड़ी की अंतिम वैज्ञानिक पुष्टि प्रयोगशाला रिपोर्ट से ही होगी।
यह सावधानी इसलिए जरूरी है क्योंकि पत्रकारिता में आरोप और वैज्ञानिक रूप से सिद्ध तथ्य को एक ही मान लेना उचित नहीं है।
लेकिन सवाल फिर भी कायम है।
आटा बनाने वाली जगह पर 1,800 किलो सेलखड़ी क्यों थी?
अगर जांच में यह साबित होता है कि इसका इस्तेमाल खाद्य उत्पाद में किया जा रहा था, तो यह बेहद गंभीर खाद्य धोखाधड़ी का मामला बन सकता है।
लाइसेंस तेल और मसाले का, उत्पादन आटे का
आगरा मामले का एक दूसरा पहलू और भी चिंताजनक है।
रिपोर्टों के मुताबिक संबंधित प्रतिष्ठान के पास खाद्य तेल के फुटकर विक्रेता और खाद्य मसालों के थोक विक्रेता की श्रेणी का लाइसेंस था, लेकिन निरीक्षण के दौरान वहां आटा तैयार किया जा रहा था। खाद्य विभाग ने आटा निर्माण बंद कराया और मशीनें सील कीं।
यहीं से सरकार की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठता है।
अगर कोई खाद्य इकाई जिस काम के लिए लाइसेंस प्राप्त करती है, उससे अलग खाद्य उत्पादन करने लगे तो निगरानी तंत्र को इसका पता कब चलता है?
क्या नियमित inspection हुआ था?
क्या लाइसेंस verification केवल कागजों तक सीमित था?
क्या स्थानीय स्तर पर अधिकारियों को पता था कि वहां आटा बनाया जा रहा है?
और सबसे महत्वपूर्ण—
अगर खाद्य सुरक्षा विभाग ने खुद छापे में यह अंतर पकड़ा, तो यह गतिविधि कितने समय से चल रही थी?
इन सवालों के जवाब जनता को मिलने चाहिए।
मैनपुरी में 43 बोरी टैल्क पाउडर: संयोग या पैटर्न?
आगरा की कार्रवाई से कुछ दिन पहले मैनपुरी में भी खाद्य सुरक्षा विभाग ने एक आटा मिल पर कार्रवाई की थी।
रिपोर्ट के अनुसार वहां 43 बोरी टैल्क पाउडर और आटा बरामद किया गया। इकाई को बंद कराया गया और नमूने जांच के लिए भेजे गए।
अब आगरा और मैनपुरी की खबरों को साथ रखिए।
एक जगह—
1,800 किलो सेलखड़ी।
दूसरी जगह—
43 बोरी टैल्क पाउडर।
दोनों जगह—
आटा।
यह जरूरी नहीं कि दोनों मामले एक ही गिरोह से जुड़े हों। अभी ऐसा निष्कर्ष निकालना जांच से पहले उचित नहीं होगा।
लेकिन खाद्य सुरक्षा अधिकारियों के लिए यह पर्याप्त संकेत जरूर है कि पश्चिमी और मध्य उत्तर प्रदेश में आटा निर्माण इकाइयों की targeted inspection की आवश्यकता है।
फिरोजाबाद: यह कहानी पहले भी सामने आ चुकी थी
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासन ने पुराने मामलों से कोई सबक लिया?
फिरोजाबाद में 2025 और 2026 के दौरान आटे में पत्थर/सेलखड़ी से जुड़े मामलों की रिपोर्टिंग हुई है।
अगस्त 2026 से पहले भी फिरोजाबाद में खाद्य सुरक्षा कार्रवाई में आटे और सेलखड़ी से जुड़े मामले सामने आए थे। इसके बाद जुलाई-अगस्त 2026 में फिर से इसी तरह की शिकायतें और कार्रवाई रिपोर्ट हुईं।
यह स्थिति प्रशासन के सामने एक सीधा सवाल रखती है:
एक ही जिले में अगर एक बार मिलावट पकड़ी जाती है, तो क्या उसके बाद पूरे जिले की flour mills की व्यापक जांच की जाती है?
या कार्रवाई केवल उस दिन की खबर बनकर रह जाती है?
यही वह जगह है जहां उत्तर प्रदेश सरकार की जवाबदेही सबसे ज्यादा जरूरी हो जाती है।
अलीगढ़: 2024 की घटना को भूलना नहीं चाहिए
यह मामला अचानक 2026 में पैदा नहीं हुआ।
जुलाई 2024 में अलीगढ़ की तालानगरी स्थित एक आटा फैक्टरी पर कार्रवाई की रिपोर्ट सामने आई थी। वहां करीब 13 क्विंटल पैक्ड आटा और सेलखड़ी से संबंधित कार्रवाई हुई थी। रिपोर्ट में अधिकारियों के हवाले से आटे में सेलखड़ी मिलाने की आशंका बताई गई थी।
एक रिपोर्ट में अधिकारियों के हवाले से यह भी बताया गया था कि सेलखड़ी का इस्तेमाल आटे में लगभग 10 प्रतिशत तक किए जाने का अनुमान था।
इसके बाद अलीगढ़ मामले में प्रयोगशाला जांच को लेकर भी रिपोर्ट प्रकाशित हुईं, जिनमें सेलखड़ी की मिलावट पाए जाने का दावा किया गया।
अगर 2024 में एक जिले में ऐसी घटना सामने आई थी, तो 2025 और 2026 में सामने आए मामलों को देखते हुए राज्य स्तर पर एक historical pattern analysis किया जाना चाहिए था।
यही वह काम है जो सरकार को अब करना चाहिए।
बुलंदशहर: दिल्ली-NCR तक पहुंचने का सवाल
जनवरी 2025 में बुलंदशहर से प्रकाशित रिपोर्ट में गेहूं के आटे में सेलखड़ी पाउडर मिलाने और दिल्ली-NCR तक आपूर्ति किए जाने की बात सामने आई थी।
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि खाद्य मिलावट का असर केवल उस जिले के उपभोक्ताओं तक सीमित नहीं रहता।
एक फ्लोर मिल से निकला उत्पाद:
मिल → distributor → wholesaler → retailer → उपभोक्ता
के रास्ते कई जिलों और राज्यों तक पहुंच सकता है।
इसलिए खाद्य सुरक्षा की जांच का मॉडल भी बदलना होगा।
केवल मिल को सील कर देना पर्याप्त नहीं है।
यह पता लगाना जरूरी है कि पहले से बाजार में जा चुका उत्पाद कहां गया।
सवाल सिर्फ आटे में क्या मिला, यह नहीं है
मिलावट की चर्चा अक्सर केवल एक सवाल तक सीमित रहती है:
“आटे में क्या मिलाया गया?”
लेकिन असली जांच इससे कहीं आगे जाती है।
सरकार को पूछना चाहिए:
1. सेलखड़ी आई कहां से?
किस supplier ने बेची?
2. कितनी मात्रा में खरीदी गई?
एक मिल में 1,800 किलो मिलने का मतलब है कि supply chain की जांच होनी चाहिए।
3. भुगतान कैसे हुआ?
Cash?
Bank transfer?
Invoice?
GST records?
4. किस वाहन से आई?
Transport records क्या कहते हैं?
5. किन जिलों में भेजी गई?
6. किस distributor ने खरीदी?
7. कौन-कौन से retailers तक पहुंची?
8. कितने brands के नाम से पैकिंग हुई?
9. क्या batch numbers trace किए गए?
10. क्या बाजार से संदिग्ध product वापस लिया गया?
जब तक इन सवालों का जवाब नहीं मिलेगा, तब तक कार्रवाई अधूरी मानी जाएगी।
क्या यह “पूरे उत्तर प्रदेश का रैकेट” है?
यहां भी तथ्यों के साथ चलना होगा।
अभी उपलब्ध सार्वजनिक रिपोर्टों के आधार पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि पूरे उत्तर प्रदेश में एक ही संगठित सेलखड़ी-आटा रैकेट सक्रिय है।
लेकिन यह कहना बिल्कुल उचित है कि:
उत्तर प्रदेश के कई जिलों में एक समान प्रकार की आटा मिलावट के मामले सामने आए हैं और इन मामलों को जोड़कर राज्यव्यापी जांच की आवश्यकता पैदा हो गई है।
यह फर्क बहुत महत्वपूर्ण है।
एक जिम्मेदार पत्रकार को “रैकेट” शब्द तभी इस्तेमाल करना चाहिए जब:
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supplier एक ही हो,
-
buyers आपस में जुड़े हों,
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financial transactions मिलते हों,
-
transport records एक chain दिखाएं,
-
brands/manufacturers का संबंध स्थापित हो,
-
और जांच एजेंसियां conspiracy या organized network की पुष्टि करें।
अभी इन तथ्यों की व्यापक सार्वजनिक पुष्टि बाकी है।
लेकिन investigation की जरूरत से इनकार भी नहीं किया जा सकता।
गरीब की थाली सबसे आसान निशाना क्यों बनती है?
उत्तर प्रदेश में आटा कोई luxury product नहीं है।
यह करोड़ों परिवारों की रोजमर्रा की जरूरत है।
गरीब परिवार अक्सर कीमत देखकर खाद्य उत्पाद चुनते हैं। यदि कोई मिलावटखोर सस्ते पदार्थ से उत्पाद का वजन बढ़ाकर उसे सामान्य आटे की कीमत पर बेचता है, तो नुकसान केवल स्वास्थ्य का नहीं होता।
यह आर्थिक धोखा भी है।
एक मजदूर, किसान, छोटा दुकानदार या निम्न-मध्यम वर्गीय परिवार अपने सीमित बजट में राशन खरीदता है।
वह पांच किलो आटा खरीदता है तो उसे उम्मीद होती है कि पांच किलो का उत्पाद गेहूं से बना खाद्य पदार्थ है।
अगर उसमें गैर-अनुमोदित filler मिलाकर वजन बढ़ाया जाता है तो गरीब उपभोक्ता को दो बार नुकसान होता है—
पैसा भी जाता है और गुणवत्ता भी।
यही कारण है कि खाद्य मिलावट को केवल “व्यापारिक अनियमितता” समझना गलत है।
यह सामाजिक न्याय का सवाल भी है।
सफेद आटा देखकर उपभोक्ता भ्रमित हो सकता है
रिपोर्टों में अधिकारियों के हवाले से यह आशंका सामने आई है कि सेलखड़ी का इस्तेमाल आटे की सफेदी/चमक बढ़ाने और वजन बढ़ाने के लिए किया जा सकता है।
यही मिलावटखोरी का सबसे खतरनाक मनोवैज्ञानिक पक्ष है।
उपभोक्ता अक्सर सोचता है:
जितना सफेद, उतना अच्छा।
जबकि खाद्य पदार्थ का रंग अकेले उसकी गुणवत्ता का प्रमाण नहीं है।
मिलावटखोर इसी perception का फायदा उठा सकता है।
इसलिए उपभोक्ता शिक्षा भी उतनी ही जरूरी है जितनी enforcement।
स्वास्थ्य के नाम पर डर फैलाना भी गलत होगा
इस मुद्दे पर सोशल मीडिया में कई तरह के दावे चल सकते हैं।
लेकिन पत्रकारिता में हमें सनसनी से बचना चाहिए।
यह कहना कि “सेलखड़ी वाला आटा खाते ही कैंसर होगा” वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है।
दूसरी तरफ, यह कहना भी उचित नहीं कि “पत्थर है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।”
किस mineral की मौजूदगी है, वह food-grade है या नहीं, उसमें कौन से contaminants हैं और कितनी मात्रा है—इन सवालों के उत्तर laboratory analysis से मिलेंगे।
इसलिए आगरा के मामले में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज आने वाली laboratory reports होंगी।
उत्तर प्रदेश सरकार की सबसे बड़ी परीक्षा अब शुरू हुई है
छापा पड़ गया।
माल जब्त हो गया।
मशीनें सील हो गईं।
लेकिन जनता की सुरक्षा यहीं खत्म नहीं होती।
असल परीक्षा अब है।
अगर laboratory report में मिलावट साबित होती है तो:
कितना माल बाजार में गया?
किस batch में गया?
किन जिलों में गया?
क्या recall किया गया?
कितने retailers की जांच हुई?
क्या distributor chain की जांच हुई?
क्या supplier तक पहुंचा गया?
क्या financial investigation हुई?
कितने मामलों में prosecution हुआ?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या एक साल बाद भी वही पदार्थ किसी दूसरी मिल में मिलता है?
यदि जवाब हां है, तो इसका मतलब है कि enforcement model में बुनियादी कमी है।
सरकार को “छापा मॉडल” से “सप्लाई-चेन मॉडल” पर जाना होगा
उत्तर प्रदेश सरकार यदि वास्तव में खाद्य मिलावट रोकना चाहती है तो उसे केवल surprise raids पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।
एक statewide Flour Adulteration Surveillance Programme बनाया जा सकता है।
इसके तहत high-risk districts चिन्हित किए जाएं।
पहला चरण: Mapping
राज्य की सभी flour mills, atta manufacturers और private-label packers का digital database।
दूसरा चरण: Risk scoring
जिन इकाइयों में:
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पिछले मामलों का रिकॉर्ड हो,
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licence irregularity हो,
-
बहुत कम कीमत पर उत्पाद बिक रहा हो,
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unusual mineral purchases हों,
-
consumer complaints ज्यादा हों,
उनका risk score बढ़ाया जाए।
तीसरा चरण: Random sampling
हर जिले से नियमित random samples लिए जाएं।
चौथा चरण: Laboratory turnaround
Sample से report तक का समय कम किया जाए।
पांचवां चरण: Public disclosure
सिद्ध adulteration के मामलों में batch, product और कार्रवाई की जानकारी जनता तक पहुंचाई जाए।
https://politicsinsightindia.com/new/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
छठा चरण: Recall
यदि कोई batch unsafe पाया जाता है तो केवल manufacturer को दंडित करने के बजाय market recall कराया जाए।
राजस्थान से उत्तर प्रदेश तक: mineral supply chain की जांच क्यों जरूरी?
आगरा की ताजा कार्रवाई में सेलखड़ी की बोरियों पर उदयपुर मिनरल डेवलपमेंट सिंडिकेट प्राइवेट लिमिटेड का नाम होने की रिपोर्ट सामने आई है। अधिकारियों ने कंपनी से बिक्री रिकॉर्ड मांगे जाने की बात कही है।
मैनपुरी से जुड़ी रिपोर्टों में भी राजस्थान से टैल्क पाउडर आने का angle सामने आया है।
यहां जांच का एक महत्वपूर्ण रास्ता खुलता है:
Mineral supplier → trader → flour mill → packaging → distributor → retailer
अगर इस chain में कई जिलों के नाम सामने आते हैं तो मामला बहुत गंभीर हो सकता है।
https://politicsinsightindia.com/new/gen-alpha-activism-up-school-children-protest-for-fans-water
लेकिन यह भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी mineral company का नाम बोरी पर मिल जाना अपने आप उस कंपनी को खाद्य मिलावट में दोषी नहीं बनाता।
उसकी भूमिका निर्धारित करने के लिए sales records और अन्य evidence जरूरी होगा।
सरकार को हर जिले का “मिलावट मानचित्र” जारी करना चाहिए
उत्तर प्रदेश देश के सबसे बड़े राज्यों में है।
जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसके जिले में खाद्य सुरक्षा की स्थिति क्या है।
सरकार हर महीने एक public dashboard जारी कर सकती है:
जिला | samples | failed samples | product | violation | action | prosecution | recall
इससे जनता को भी जानकारी मिलेगी और अधिकारियों की जवाबदेही भी बढ़ेगी।
https://politicsinsightindia.com/new/digital-politics-troll-army-gundagardi-democracy-genz
आज स्थिति यह है कि किसी जिले में छापा पड़ता है तो खबर आती है।
कुछ समय बाद मामला गायब हो जाता है।
फिर दूसरे जिले में वैसी ही खबर सामने आती है।
यही cycle तोड़नी होगी।
सिर्फ छोटे कारोबारियों पर कार्रवाई क्यों?
यह भी एक महत्वपूर्ण सवाल है।
खाद्य सुरक्षा enforcement में यह देखना जरूरी है कि छोटे स्थानीय चक्की मालिक से लेकर बड़े packaged-food supply chain तक समान मानक लागू हों।
यदि छोटा दुकानदार पकड़ा जाता है तो तत्काल कार्रवाई होती है, लेकिन यदि कोई बड़ा manufacturer या distributor नियम तोड़ता है तो भी समान कठोरता होनी चाहिए।
कानून का आकार कारोबार के आकार के हिसाब से नहीं बदलना चाहिए।
उपभोक्ता क्या करे?
जब तक संबंधित जांच पूरी नहीं होती, उपभोक्ताओं को घबराने की जरूरत नहीं है।
लेकिन सावधानी जरूरी है।
पैक्ड आटा खरीदते समय:
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manufacturer का नाम देखें।
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FSSAI licence details देखें।
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batch/lot number देखें।
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packaging और seal जांचें।
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अत्यधिक असामान्य रंग/गंध/texture पर ध्यान दें।
- https://politicsinsightindia.com/new/lal-kile-se-kya-kahenge-pradhanmantri-mehangai-berojgari-shiksha-kisan-jawabdehi
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bill/receipt सुरक्षित रखें।
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किसी specific batch के recall की सरकारी सूचना हो तो उसे इस्तेमाल न करें।
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संदिग्ध उत्पाद की शिकायत खाद्य सुरक्षा विभाग/FSSAI व्यवस्था में करें।
सबसे महत्वपूर्ण बात:
सोशल मीडिया पर वायरल घरेलू टेस्ट को laboratory confirmation न मानें।
आगरा की 1,800 किलो सेलखड़ी सरकार के लिए चेतावनी है
उत्तर प्रदेश सरकार के सामने अब दो रास्ते हैं।
पहला रास्ता है—
एक और छापा, एक और सील, एक और FIR और फिर इंतजार।
दूसरा रास्ता है—
https://politicsinsightindia.com/new/chandrapur-ashram-shalaon-mein-sarkari-laparwahi-aur-jawabdehi
आगरा से जांच शुरू करके पूरे राज्य की flour supply chain को खंगालना।
दूसरा रास्ता कठिन है, लेकिन जनता के हित में यही जरूरी है।
क्योंकि सवाल सिर्फ एक मिल का नहीं है।
अलीगढ़ में मामला सामने आया।
बुलंदशहर में मामला सामने आया।
फिरोजाबाद में मामला सामने आया।
मैनपुरी में मामला सामने आया।
और अब आगरा में 1,800 किलो सेलखड़ी के साथ बड़ी कार्रवाई सामने आई है।
इन घटनाओं को जोड़कर देखना सरकार की जिम्मेदारी है।
निष्कर्ष: उत्तर प्रदेश की जनता को “सील की हुई मिल” नहीं, सुरक्षित रोटी चाहिए
सरकारें अक्सर किसी बड़े खाद्य मिलावट मामले के बाद कहती हैं कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।
लेकिन जनता का सवाल इससे आगे है।
जनता पूछती है:
दोषी कौन है?
मिलावट कितने समय से चल रही थी?
कितना माल बाजार में गया?
किस-किस जिले में गया?
किस supplier ने पदार्थ दिया?
किस distributor ने माल उठाया?
कितने उपभोक्ताओं तक पहुंचा?
कितने batches वापस लिए गए?
कितनी prosecutions हुईं?
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या अगली बार किसी दूसरे जिले में फिर वही सेलखड़ी नहीं मिलेगी?
आगरा में 1,800 किलो सेलखड़ी और 1,350 किलो आटे की बरामदगी को सिर्फ सनसनीखेज खबर बनाकर छोड़ देना आसान है।
लेकिन अगर उत्तर प्रदेश सरकार इस मामले को गंभीरता से लेती है तो यही घटना एक बड़े statewide food-safety audit की शुरुआत बन सकती है।
अलीगढ़ 2024 से आगरा 2026 तक सामने आए मामलों को जोड़कर देखें तो कम-से-कम इतना स्पष्ट है कि आटे में mineral/stone powder जैसी मिलावट के कई documented enforcement cases उत्तर प्रदेश में सामने आ चुके हैं। इसे पूरे प्रदेश में फैले संगठित रैकेट का प्रमाण कहना अभी जल्दबाजी होगा, लेकिन इसे महज अलग-अलग स्थानीय घटनाएं मान लेना भी प्रशासनिक रूप से संतोषजनक नहीं होगा।
उत्तर प्रदेश सरकार को अब घोषणा नहीं, डेटा चाहिए।
छापे नहीं, सप्लाई-चेन जांच चाहिए।
सिर्फ जब्ती नहीं, लैब रिपोर्ट चाहिए।
सिर्फ FIR नहीं, prosecution और conviction की पारदर्शी जानकारी चाहिए।
और सबसे बढ़कर—
उत्तर प्रदेश की जनता को ऐसी रोटी चाहिए जिसमें गेहूं हो, धोखा नहीं।
आगरा की 1,800 किलो सेलखड़ी अब उत्तर प्रदेश की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था के सामने एक सीधा सवाल है:
क्या सरकार मिलावटखोरों के पीछे सिर्फ तब जाएगी, जब वे पकड़े जाएंगे—या अब उन रास्तों को भी बंद करेगी जिनसे मिलावट उपभोक्ता की थाली तक पहुंचती है?
स्रोत
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अमर उजाला — आगरा में 1,800 किलो सेलखड़ी और 1,350 किलो आटा बरामद, तीन राज्यों में सप्लाई की आशंका: रिपोर्ट पढ़ें
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आज तक — फतेहपुर सीकरी में 1,800 किलो सेलखड़ी, 1,350 किलो आटा और लाइसेंस संबंधी अनियमितता: रिपोर्ट पढ़ें
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किसान तक — आगरा कार्रवाई, नमूने और लैब जांच का विवरण: रिपोर्ट पढ़ें
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अमर उजाला — मैनपुरी में 43 बोरी टैल्क पाउडर और आटा मिल पर कार्रवाई: रिपोर्ट पढ़ें
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अमर उजाला — अलीगढ़ में सेलखड़ी मिलाने की कार्रवाई: रिपोर्ट पढ़ें
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अमर उजाला — बुलंदशहर में सेलखड़ी मिश्रित आटे की दिल्ली-NCR सप्लाई का मामला: रिपोर्ट पढ़ें
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FSSAI — खाद्य सुरक्षा और मानक संबंधी आधिकारिक जानकारी: FSSAI
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