क्या उत्तर प्रदेश सरकार गरीब छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं देना चाहती? लखनऊ में सड़क पर उतरे बच्चे, व्यवस्था पर बड़ा सवाल
लखनऊ में शिक्षकों की कमी के खिलाफ छात्रों के सड़क पर उतरने ने उत्तर प्रदेश की सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या गरीब बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही है? शिक्षक भर्ती, सरकारी स्कूलों और शिक्षा नीति की पड़ताल।
By- Nimisha Singh
लखनऊ में शिक्षकों की कमी के खिलाफ सड़क पर उतरे स्कूली छात्रों ने उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था पर एक असहज सवाल खड़ा कर दिया है। सवाल सिर्फ एक स्कूल का नहीं है—सवाल यह है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले गरीब और मध्यमवर्गीय बच्चों को क्या वही शैक्षणिक अवसर मिल रहे हैं, जो निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को मिलते हैं?
14 अगस्त 2026 को लखनऊ के बुद्धेश्वर चौराहे के पास स्कूली छात्रों का सड़क पर उतरना किसी सामान्य यातायात घटना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। पारा थाना क्षेत्र में बड़ी संख्या में छात्र स्कूल यूनिफॉर्म में सड़क पर बैठे और शिक्षकों की कमी के खिलाफ विरोध किया। छात्रों का आरोप था कि पर्याप्त शिक्षक नहीं होने के कारण नियमित कक्षाएं प्रभावित हो रही हैं, महत्वपूर्ण विषयों की पढ़ाई बाधित है और इसका असर उनकी परीक्षा की तैयारी पर पड़ रहा है। घटना इतनी बड़ी हुई कि यातायात प्रभावित हुआ और उत्तर प्रदेश सरकार के समाज कल्याण मंत्री असीम अरुण भी जाम में फंस गए। उन्होंने मौके पर रुककर छात्रों से बातचीत की और उनकी शिकायतें सुनीं।
यह घटना उत्तर प्रदेश सरकार के लिए असहज इसलिए है क्योंकि जिस शिक्षा व्यवस्था में बच्चों को अपनी कक्षा छोड़कर सड़क पर अपनी पढ़ाई के अधिकार की आवाज उठानी पड़े, उस व्यवस्था से केवल यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता कि "छात्रों ने सड़क जाम किया।"
असल सवाल है—बच्चों को सड़क पर आने की जरूरत क्यों पड़ी?
सड़क पर छात्र, कटघरे में शिक्षा व्यवस्था
किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारियों में शिक्षा सबसे ऊपर होनी चाहिए। खासकर सरकारी विद्यालयों की शिक्षा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि समाज का बड़ा गरीब और निम्न-मध्यमवर्गीय तबका अपने बच्चों की बेहतर जिंदगी की उम्मीद इन्हीं संस्थानों से करता है।
एक संपन्न परिवार अपने बच्चे को निजी स्कूल में भेज सकता है। जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त ट्यूशन, कोचिंग, ऑनलाइन कक्षाएं और व्यक्तिगत शिक्षक की व्यवस्था भी कर सकता है। लेकिन गरीब परिवार के बच्चे के लिए सरकारी स्कूल ही अक्सर उसकी पूरी शैक्षणिक दुनिया होता है।
ऐसे बच्चे के स्कूल में यदि गणित का शिक्षक नहीं है, विज्ञान का शिक्षक नियमित नहीं आता, अंग्रेजी की कक्षा नहीं चलती या किसी महत्वपूर्ण विषय के लिए शिक्षक उपलब्ध नहीं है, तो उस बच्चे के पास विकल्प क्या है?
यही असमानता शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता है।
लखनऊ के छात्रों का विरोध इसी असमानता की ओर संकेत करता है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार छात्रों ने कहा कि शिक्षकों की कमी ने पढ़ाई और शैक्षणिक गतिविधियों को प्रभावित किया है तथा महत्वपूर्ण विषयों की कक्षाएं नियमित नहीं हो पा रही हैं।
सरकार के लिए यह सिर्फ एक प्रशासनिक कमी नहीं होनी चाहिए। यह बच्चों के भविष्य से जुड़ा सवाल है।
सरकार कह सकती है—भर्ती हो रही है, लेकिन बच्चे आज पढ़ना चाहते हैं
उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से यह तर्क दिया जा सकता है कि शिक्षक भर्ती की प्रक्रिया चल रही है। जून 2026 की रिपोर्टों के अनुसार उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग लगभग 60,000 शिक्षक पदों पर भर्ती की तैयारी कर रहा था। यह निश्चित रूप से बताता है कि राज्य में शिक्षक रिक्तियों की समस्या मौजूद है और सरकार उसे भरने की दिशा में काम करने का दावा कर रही है।
लेकिन यहीं सरकार से सबसे कठिन सवाल पूछा जाना चाहिए।
भर्ती की तैयारी और कक्षा में शिक्षक की मौजूदगी—दो अलग चीजें हैं।
किसी छात्र की परीक्षा अगले साल नहीं, उसके सामने होती है। उसका शैक्षणिक सत्र अभी चल रहा है। यदि आज शिक्षक नहीं है तो तीन महीने बाद होने वाली भर्ती प्रक्रिया उसके आज के नुकसान की भरपाई कैसे करेगी?
सरकार को यह समझना होगा कि शिक्षा में "प्रक्रिया" और "परिणाम" के बीच बहुत बड़ा अंतर होता है।
रिक्तियां चिन्हित करना प्रक्रिया है।
विज्ञापन निकालना प्रक्रिया है।
परीक्षा आयोजित करना प्रक्रिया है।
परिणाम घोषित करना प्रक्रिया है।
नियुक्ति पत्र देना प्रक्रिया है।
लेकिन बच्चे को नियमित और गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई मिलना परिणाम है।
सरकार की जवाबदेही परिणाम के लिए होनी चाहिए।
60 हजार रिक्तियां: यह संख्या खुद एक सवाल है
यदि लगभग 60,000 शिक्षक पदों को भरने की जरूरत सामने आ रही है, तो यह पूछना स्वाभाविक है कि इतनी बड़ी संख्या में रिक्तियां बनी कैसे?
क्या सेवानिवृत्ति के बाद पद लंबे समय तक खाली रहे?
क्या भर्ती प्रक्रिया में अनावश्यक देरी हुई?
क्या विभागों ने समय पर रिक्तियों का सही आकलन नहीं किया?
क्या स्थानांतरण और पुनर्नियोजन की नीतियां प्रभावी नहीं रहीं?
या सरकार ने स्कूलों की वास्तविक जरूरत के मुकाबले मानव संसाधन नियोजन को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं दी?
इन सवालों का जवाब जनता को मिलना चाहिए।
क्योंकि शिक्षक की कमी अचानक पैदा होने वाली प्राकृतिक आपदा नहीं है। शिक्षकों की सेवानिवृत्ति, स्वीकृत पद, छात्र संख्या, विषयवार आवश्यकता और संभावित रिक्तियां वर्षों पहले से अनुमानित की जा सकती हैं।
फिर सवाल उठता है—अगर सरकार को पता था कि शिक्षक कम हैं, तो बच्चों को शिक्षक मिलने में इतनी देर क्यों हुई?
लखनऊ की घटना कोई अकेली प्रशासनिक चूक नहीं
लखनऊ की घटना को केवल एक विद्यालय की समस्या मानना भी आसान रास्ता होगा।
उत्तर प्रदेश में शिक्षक नियुक्ति, स्थानांतरण और पुनर्नियोजन को लेकर लंबे समय से विवाद और प्रशासनिक चुनौतियां सामने आती रही हैं।
2026 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष शिक्षक पुनर्नियोजन से संबंधित मामलों में छात्र-शिक्षक अनुपात, उपलब्ध आंकड़ों और पारदर्शी प्रक्रिया का मुद्दा उठा। अदालत से जुड़े हालिया मामलों में यह स्पष्ट हुआ है कि शिक्षक तैनाती जैसी नीतियों को केवल प्रशासनिक सुविधा से नहीं, बल्कि छात्रों के हित और उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर भी देखना होगा।
लखनऊ जिला प्रशासन की वेबसाइट पर भी 2026 में सरकारी माध्यमिक विद्यालयों में विषयवार और पदवार रिक्तियों तथा surplus teachers से संबंधित सूचनाएं प्रकाशित की गई हैं। इसका मतलब है कि रिक्ति और शिक्षक तैनाती का प्रश्न प्रशासन के रिकॉर्ड में मौजूद है।
फिर भी यदि विद्यार्थी सड़क पर उतरते हैं तो सवाल उठेगा कि रिकॉर्ड में समस्या दर्ज होने और कक्षा में उसका समाधान होने के बीच इतनी दूरी क्यों है?
गरीब बच्चे सबसे ज्यादा नुकसान में क्यों रहते हैं?
शिक्षा में असमानता का सबसे क्रूर पहलू यह है कि खराब सरकारी शिक्षा का नुकसान गरीब परिवार के बच्चे को कई गुना अधिक होता है।
मान लीजिए एक निजी स्कूल में शिक्षक उपलब्ध नहीं है। परिवार स्कूल बदल सकता है।
बच्चे की पढ़ाई कमजोर है। परिवार ट्यूशन लगा सकता है।
बोर्ड परीक्षा नजदीक है। परिवार कोचिंग करा सकता है।
लेकिन एक दिहाड़ी मजदूर, छोटे किसान, रिक्शा चालक, घरेलू कामगार या कम आय वाले परिवार के पास ये विकल्प कितने हैं?
सरकारी स्कूल की व्यवस्था ही उसके बच्चे का मुख्य सहारा है।
इसलिए सरकारी स्कूल में शिक्षक का खाली पद वास्तव में केवल सरकारी नौकरी का खाली पद नहीं है।
वह किसी गरीब बच्चे के भविष्य में पैदा हुआ खाली स्थान है।
यही कारण है कि शिक्षा पर सरकारी खर्च को केवल बजट की मद के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह सामाजिक बराबरी का सबसे बड़ा साधन है।
क्या सरकार गरीब बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं देना चाहती?
यह सवाल राजनीतिक रूप से तीखा है, लेकिन तथ्यात्मक रूप से इसे सावधानी से समझना जरूरी है।
यह कहना कि "उत्तर प्रदेश सरकार जानबूझकर गरीब छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं देना चाहती"—इसके लिए स्पष्ट प्रमाण चाहिए। उपलब्ध तथ्यों से सरकार की मंशा को सीधे साबित नहीं किया जा सकता।
लेकिन एक दूसरा सवाल पूरी मजबूती से पूछा जा सकता है:
क्या सरकार की नीतियों और प्रशासनिक परिणामों से गरीब छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का पर्याप्त अधिकार मिल रहा है?
लखनऊ की घटना, शिक्षक रिक्तियों का बड़ा आंकड़ा और शिक्षक तैनाती को लेकर लगातार चल रही प्रशासनिक-कानूनी बहस इस सवाल को गंभीर बनाती है।
लोकतंत्र में सरकार की मंशा से ज्यादा महत्वपूर्ण उसके परिणाम होते हैं।
अगर सरकार गरीब बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा चाहती है, तो उसका प्रमाण भाषणों में नहीं बल्कि स्कूल की कक्षा में दिखाई देना चाहिए।
जहां शिक्षक चाहिए वहां शिक्षक हो।
जहां विज्ञान की प्रयोगशाला चाहिए वहां प्रयोगशाला हो।
जहां पुस्तकें चाहिए वहां पुस्तकें हों।
जहां छात्रावास है वहां भोजन और स्वास्थ्य व्यवस्था हो।
और सबसे महत्वपूर्ण—
हर बच्चे को यह भरोसा हो कि उसकी गरीबी उसके भविष्य की सीमा नहीं बनेगी।
सर्वोदय विद्यालय की विडंबना
लखनऊ की घटना का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि यह विवाद जिस विद्यालय से जुड़ा बताया जा रहा है, वह सर्वोदय विद्यालय व्यवस्था से संबंधित है।
सर्वोदय विद्यालयों का उद्देश्य ही ऐसे विद्यार्थियों को बेहतर शैक्षणिक अवसर देना है जिन्हें सामाजिक या आर्थिक कारणों से उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा के अवसर कम मिलते हैं।
इसलिए यदि ऐसे संस्थान में शिक्षक की कमी के कारण बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है तो समस्या सामान्य सरकारी विद्यालय से भी अधिक गंभीर हो जाती है।
यहां सरकार से पूछा जाना चाहिए—
यदि राज्य गरीब और वंचित बच्चों के लिए विशेष विद्यालय चला रहा है, तो उन विद्यालयों में शिक्षक उपलब्ध कराना सर्वोच्च प्राथमिकता क्यों नहीं है?
2025 में भी लखनऊ में समाज कल्याण विभाग के सर्वोदय विद्यालयों में शिक्षकों की कमी की शिकायत सामने आने के बाद मंत्री असीम अरुण ने अतिथि शिक्षकों की व्यवस्था करने के निर्देश दिए थे। उस समय भी शिक्षक कमी को तत्काल समाधान की आवश्यकता के रूप में रिपोर्ट किया गया था।
यदि एक साल बाद भी विद्यार्थी शिक्षक की कमी को लेकर सड़क पर उतर रहे हैं, तो सरकार को अपनी व्यवस्था की समीक्षा गंभीरता से करनी चाहिए।
एक मंत्री का जाम में फंसना खबर है, लेकिन असली खबर कुछ और है
असीम अरुण का जाम में फंसना और छात्रों से बातचीत करना इस घटना का दृश्य रूप से सबसे चर्चित हिस्सा बन सकता है।
लेकिन असली खबर मंत्री का जाम में फंसना नहीं है।
असली खबर यह है कि बच्चे अपनी पढ़ाई बचाने के लिए सड़क पर क्यों बैठे।
मंत्री ने छात्रों से बात की, उनकी शिकायतें सुनीं और उन्हें वापस विद्यालय ले जाने की कोशिश की—यह तत्काल तनाव कम करने वाला कदम था। लेकिन लोकतांत्रिक प्रशासन का अगला कदम आश्वासन से आगे जाना होना चाहिए।
छात्रों को यह जानने का अधिकार है कि:
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उनके स्कूल में कितने शिक्षक स्वीकृत हैं?
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कितने शिक्षक कार्यरत हैं?
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कौन-कौन से पद खाली हैं?
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विषयवार कितने शिक्षक चाहिए?
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रिक्तियां कब भरी जाएंगी?
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तब तक वैकल्पिक शिक्षक कौन उपलब्ध कराएगा?
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परीक्षा की तैयारी का नुकसान कैसे पूरा किया जाएगा?
इन सवालों के लिखित जवाब मिलने चाहिए।
सरकार को विज्ञापन नहीं, "Teacher Availability Dashboard" देना चाहिए
उत्तर प्रदेश सरकार यदि वास्तव में शिक्षा व्यवस्था को पारदर्शी बनाना चाहती है तो हर सरकारी स्कूल के लिए सार्वजनिक डिजिटल डैशबोर्ड बनाया जा सकता है।
हर स्कूल के सामने लिखा हो:
कुल छात्र — स्वीकृत शिक्षक — कार्यरत शिक्षक — रिक्त पद — विषयवार रिक्तियां — शिक्षक उपस्थिति — अंतिम निरीक्षण — शिकायत की स्थिति।
इससे अभिभावक, छात्र और स्थानीय जनप्रतिनिधि जान सकेंगे कि उनके स्कूल में वास्तविक स्थिति क्या है।
आज डिजिटल शासन की बात होती है। लेकिन डिजिटल शासन का सबसे उपयोगी इस्तेमाल यही होगा कि सरकारी स्कूल के बच्चे और उनके माता-पिता यह जान सकें कि उनके स्कूल में कितने शिक्षक होने चाहिए और कितने हैं।
यदि किसी विद्यालय में तीन महीने से विज्ञान शिक्षक नहीं है, तो सिस्टम जिला प्रशासन को स्वतः अलर्ट करे।
यदि किसी स्कूल में छात्र-शिक्षक अनुपात निर्धारित सीमा से खराब है, तो वहां तत्काल वैकल्पिक व्यवस्था हो।
शिक्षा व्यवस्था को reactive नहीं, predictive बनाना होगा।
भर्ती के साथ अंतरिम व्यवस्था क्यों जरूरी है?
मान लीजिए सरकार 60,000 शिक्षकों की भर्ती करती है। यह स्वागत योग्य कदम होगा।
लेकिन नियुक्ति पूरी होने में समय लगेगा।
इसलिए सरकार को तीन स्तरों पर काम करना चाहिए।
पहला—तत्काल समाधान
जहां विषयवार शिक्षक नहीं हैं, वहां योग्य अतिथि शिक्षकों, सेवानिवृत्त शिक्षकों या वैकल्पिक शैक्षणिक व्यवस्था के जरिए तत्काल कक्षाएं शुरू की जाएं—बशर्ते नियुक्ति और भुगतान की प्रक्रिया पारदर्शी और कानूनी हो।
दूसरा—मध्यम अवधि का समाधान
रिक्त पदों पर भर्ती प्रक्रिया को समयबद्ध किया जाए और हर चरण की सार्वजनिक समयसीमा घोषित हो।
तीसरा—स्थायी समाधान
शिक्षक नियोजन को पांच-दस वर्ष की जरूरत के आधार पर तैयार किया जाए, ताकि हर वर्ष वही संकट दोबारा पैदा न हो।
सरकार हर बार आग लगने के बाद पानी लेकर न दौड़े; उसे आग लगने की संभावना पहले से पहचाननी होगी।
शिक्षा में देरी का नुकसान पैसा देकर भी पूरा नहीं होता
एक सड़क खराब हो तो अगले साल बनाई जा सकती है।
एक सरकारी भवन देर से बने तो कुछ समय बाद बन सकता है।
लेकिन शिक्षा में खोया हुआ समय हमेशा वापस नहीं आता।
कक्षा 10 का विद्यार्थी अगर पूरे साल गणित की मजबूत शिक्षा से वंचित रहा तो अगले साल सिर्फ एक अतिरिक्त शिक्षक नियुक्त कर देने से उसके पिछले वर्ष की कमी पूरी नहीं होगी।
बच्चे का आत्मविश्वास प्रभावित होता है।
प्रतियोगी परीक्षाओं की नींव कमजोर होती है।
उच्च शिक्षा में प्रवेश की क्षमता घटती है।
और अंततः गरीब बच्चा शिक्षा की उस दौड़ में पीछे रह जाता है जिसमें अमीर बच्चा पहले से अतिरिक्त संसाधनों के साथ दौड़ रहा है।
इसलिए शिक्षक की कमी को "मानव संसाधन की समस्या" कहना अधूरा है।
यह सामाजिक न्याय की समस्या है।
निजी स्कूल बनाम सरकारी स्कूल: क्या दो भारत बन रहे हैं?
उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में एक गंभीर खतरा यह है कि शिक्षा व्यवस्था दो अलग-अलग भारत बना दे।
एक भारत के बच्चों के पास महंगे निजी स्कूल, प्रशिक्षित शिक्षक, स्मार्ट क्लास, ट्यूशन, कोचिंग और डिजिटल संसाधन हों।
दूसरे भारत के बच्चे ऐसे सरकारी स्कूल में पढ़ें जहां शिक्षक का पद खाली हो और उन्हें अपनी समस्या बताने के लिए सड़क पर बैठना पड़े।
अगर ऐसा अंतर बढ़ता है तो आर्थिक असमानता पीढ़ी दर पीढ़ी कायम रहेगी।
शिक्षा का उद्देश्य इस अंतर को कम करना होना चाहिए, बढ़ाना नहीं।
सरकार को तय करना होगा कि सरकारी विद्यालय गरीबों के लिए मजबूरी हैं या गरीबों के बच्चों के लिए अवसर।
छात्रों को अनुशासन चाहिए, लेकिन सरकार को भी जवाबदेही चाहिए
यह भी स्पष्ट है कि सड़क जाम करना सार्वजनिक व्यवस्था की समस्या पैदा कर सकता है। छात्रों की शिकायत सही हो, फिर भी विरोध का ऐसा तरीका यातायात और आम लोगों को प्रभावित करता है।
लेकिन प्रशासन को केवल विरोध के तरीके पर ध्यान देकर मूल शिकायत को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
छात्रों को कानून और अनुशासन समझाना सरकार का दायित्व है।
उसी तरह सरकार को भी यह समझना होगा कि प्रशासनिक चुप्पी कई बार विरोध को जन्म देती है।
यदि स्कूल में शिकायत निवारण की मजबूत व्यवस्था हो, छात्र प्रतिनिधियों से नियमित संवाद हो, जिला अधिकारी स्तर पर शिक्षा संबंधी शिकायतों की निगरानी हो और समयबद्ध कार्रवाई दिखाई दे, तो शायद बच्चों को सड़क तक आने की आवश्यकता न पड़े।
अब सरकार को क्या करना चाहिए?
लखनऊ की घटना के बाद उत्तर प्रदेश सरकार को प्रतीकात्मक कार्रवाई से आगे बढ़कर कम-से-कम ये कदम उठाने चाहिए:
पहला, संबंधित विद्यालय की विषयवार शिक्षक स्थिति सार्वजनिक की जाए।
दूसरा, छात्रों द्वारा लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र प्रशासनिक जांच हो।
तीसरा, जिन विषयों में शिक्षक नहीं हैं वहां तत्काल वैकल्पिक शिक्षण व्यवस्था की जाए।
चौथा, विद्यालय की परीक्षा परिणाम और पाठ्यक्रम प्रगति का ऑडिट कराया जाए।
पांचवां, प्रदेश के सभी सर्वोदय विद्यालयों में शिक्षक रिक्तियों का विशेष ऑडिट कराया जाए।
छठा, शिक्षक भर्ती की समयसीमा सार्वजनिक की जाए।
सातवां, शिक्षक नियुक्ति के साथ-साथ ग्रामीण और वंचित क्षेत्रों में शिक्षकों की वास्तविक उपस्थिति सुनिश्चित की जाए।
आठवां, स्कूल स्तर पर छात्र शिकायत निवारण प्रणाली को प्रभावी बनाया जाए।
और सबसे महत्वपूर्ण—
नौवां, मुख्यमंत्री कार्यालय और समाज कल्याण विभाग को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि गरीब बच्चों की शिक्षा का सवाल केवल तब न सुना जाए जब वे सड़क पर उतरें।
निष्कर्ष: सरकार की नीयत का प्रमाण कक्षा में मिलेगा
उत्तर प्रदेश सरकार पर यह आरोप लगाना कि वह जानबूझकर गरीब बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं देना चाहती, उपलब्ध तथ्यों से सीधे साबित नहीं होता। सरकार शिक्षक भर्ती की तैयारी कर रही है और शिक्षा व्यवस्था में नियुक्तियों तथा पुनर्नियोजन की प्रक्रियाएं चल रही हैं।
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लेकिन इससे सरकार आलोचना से मुक्त नहीं हो जाती।
क्योंकि लोकतंत्र में सरकार का मूल्यांकन उसके इरादों से कम और उसके परिणामों से अधिक होता है।
यदि गरीब बच्चे शिक्षक के लिए सड़क पर उतर रहे हैं, तो सरकार को आईना देखना चाहिए।
यदि 60,000 शिक्षक पदों की जरूरत सामने आती है, तो सरकार को पूछना चाहिए कि रिक्तियां इतनी बड़ी क्यों हुईं।
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यदि शिक्षक तैनाती को लेकर अदालतों तक विवाद पहुंचता है, तो प्रशासन को अपने डेटा और नीतियों की समीक्षा करनी चाहिए।
यदि सर्वोदय विद्यालय के बच्चे शिक्षक मांग रहे हैं, तो यह विशेष रूप से गंभीर चेतावनी है।
और यदि किसी मंत्री को जाम में फंसने के बाद बच्चों की समस्या सुननी पड़ती है, तो अगला सवाल यह होना चाहिए कि क्या व्यवस्था इतनी संवेदनशील नहीं हो सकती कि मंत्री के पहुंचने से पहले ही बच्चों की आवाज सुनी जाए?
उत्तर प्रदेश को केवल बड़े-बड़े शिक्षा बजट, भर्ती घोषणाओं और सरकारी उपलब्धियों के आंकड़ों से आगे बढ़ना होगा।
सरकार को हर सरकारी स्कूल की उस कक्षा में जाना होगा जहां एक बच्चा ब्लैकबोर्ड की ओर देख रहा है और शिक्षक का इंतजार कर रहा है।
वह बच्चा किसी राजनीतिक दल का मतदाता नहीं है।
वह अभी सिर्फ एक विद्यार्थी है।
उसकी सबसे बड़ी मांग भी बहुत साधारण है—
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उसे पढ़ाने वाला शिक्षक चाहिए।
और यह मांग किसी सरकार की कृपा नहीं, बच्चे के भविष्य का अधिकार है।
इसलिए लखनऊ की सड़क पर बैठे छात्रों से पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने सड़क क्यों रोकी।
लेकिन उससे पहले उत्तर प्रदेश सरकार से पूछा जाना चाहिए—
क्या ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनाना आपकी जिम्मेदारी नहीं है, जिसमें किसी गरीब बच्चे को अपनी पढ़ाई के लिए सड़क पर उतरने की जरूरत ही न पड़े?
यही असली सवाल है।
और इसका जवाब प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं, उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों की कक्षाओं में दिखाई देना चाहिए।
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