"चुनाव अब EVM से पहले मोबाइल में जीते जाते हैं: भारत में सोशल मीडिया, फेक न्यूज और नैरेटिव की पूरी कहानी"

भारत में सोशल मीडिया चुनावों को कैसे प्रभावित कर रहा है? जानिए फेक न्यूज, भ्रामक जानकारी, IT सेल, PR कंपनियों, डिजिटल प्रचार और चुनावी नैरेटिव निर्माण की पूरी पड़ताल इस विस्तृत विश्लेषण में।

"चुनाव अब EVM से पहले मोबाइल में जीते जाते हैं: भारत में सोशल मीडिया, फेक न्यूज और नैरेटिव की पूरी कहानी"

By- Sudhir Taliyan

Chaudhary- Talan Khap

भारत में सोशल मीडिया चुनावों को कैसे प्रभावित कर रहा है: लोकतंत्र का नया रणक्षेत्र

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। पिछले एक दशक में चुनावी राजनीति का सबसे बड़ा बदलाव यह रहा है कि चुनावी मैदान केवल रैलियों, अखबारों और टीवी चैनलों तक सीमित नहीं रहा। अब चुनाव का एक बड़ा हिस्सा मोबाइल स्क्रीन पर लड़ा जाता है। फेसबुक, एक्स (ट्विटर), यूट्यूब, इंस्टाग्राम और विशेष रूप से व्हाट्सऐप ने राजनीतिक संवाद का स्वरूप बदल दिया है।

सोशल मीडिया ने एक ओर लोकतंत्र को अधिक सहभागी बनाया है, वहीं दूसरी ओर यह भ्रामक सूचनाओं, फर्जी खबरों, डिजिटल प्रचार और जनमत-निर्माण का शक्तिशाली माध्यम भी बन गया है। आज कोई भी राजनीतिक दल, नेता या संगठन सोशल मीडिया के बिना चुनाव जीतने की कल्पना नहीं कर सकता।

सोशल मीडिया क्यों बन गया है चुनावों का सबसे प्रभावशाली हथियार?

भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 90 करोड़ से अधिक हो चुकी है। स्मार्टफोन की पहुंच गांवों तक फैल गई है। ऐसे में राजनीतिक दलों के लिए मतदाताओं तक सीधा पहुंचना पहले से कहीं आसान हो गया है।

पहले राजनीतिक संदेश टीवी चैनलों या अखबारों के माध्यम से जनता तक पहुंचते थे। अब दल सीधे मतदाता के मोबाइल फोन तक पहुंच रहे हैं। इससे पारंपरिक मीडिया की "गेटकीपिंग" भूमिका कमजोर हुई है और राजनीतिक दलों को अपने संदेश पर अधिक नियंत्रण मिला है। शोधों में भी यह पाया गया है कि सोशल मीडिया ने चुनावी संचार की पूरी संरचना बदल दी है और राजनीतिक दलों को सीधे मतदाताओं तक पहुंचने का अवसर दिया है। (SSRN)

नैरेटिव सेट करने का सबसे बड़ा मंच

आधुनिक राजनीति में अक्सर तथ्य से अधिक महत्वपूर्ण "नैरेटिव" बन जाता है।

नैरेटिव का अर्थ है किसी घटना या मुद्दे को इस प्रकार प्रस्तुत करना कि जनता उसे एक विशेष दृष्टिकोण से देखने लगे। सोशल मीडिया इस काम के लिए अत्यंत प्रभावी माध्यम बन चुका है।

उदाहरण के लिए:

  • बेरोजगारी को राष्ट्रीय संकट के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।

  • वही मुद्दा विपक्ष की विफलता या वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों का परिणाम भी बताया जा सकता है।

  • किसी सरकारी योजना को ऐतिहासिक उपलब्धि या चुनावी प्रचार दोनों रूपों में प्रस्तुत किया जा सकता है।

सोशल मीडिया एल्गोरिदम उन सामग्रियों को अधिक फैलाते हैं जो भावनात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न करती हैं। परिणामस्वरूप तर्कपूर्ण बहस की बजाय भावनात्मक और ध्रुवीकृत सामग्री अधिक वायरल होती है।

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व्हाट्सऐप: चुनावी प्रचार का अदृश्य नेटवर्क

भारत में चुनावी प्रभाव के मामले में व्हाट्सऐप की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है।

हजारों स्थानीय समूहों में राजनीतिक संदेश, वीडियो, पोस्टर, ऑडियो क्लिप और कथित समाचार तेजी से फैलते हैं। चूंकि व्हाट्सऐप एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड है, इसलिए यह जानना कठिन होता है कि कोई संदेश कहां से शुरू हुआ और कितने लोगों तक पहुंचा।

2019 के भारतीय चुनावों पर हुए एक अध्ययन में पाया गया कि व्हाट्सऐप चुनावी सूचना और गलत सूचना दोनों के प्रसार का प्रमुख माध्यम बन गया था। (arXiv)

भ्रामक जानकारी और फेक न्यूज का खतरा

सोशल मीडिया का सबसे विवादास्पद पहलू फर्जी खबरों और दुष्प्रचार का प्रसार है।

चुनाव के दौरान अक्सर ऐसे संदेश फैलते हैं जो:

  • किसी नेता के बयान को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करते हैं।

  • फर्जी आंकड़े दिखाते हैं।

  • पुरानी तस्वीरों को नई घटना बताकर साझा करते हैं।

  • सांप्रदायिक या जातीय तनाव बढ़ाने का प्रयास करते हैं।

  • मतदान प्रक्रिया को लेकर भ्रम फैलाते हैं।

भारत निर्वाचन आयोग को चुनावों के दौरान लगातार ऐसी गलत सूचनाओं का खंडन करना पड़ता है। आयोग की "Myth vs Reality" पहल में अनेक फर्जी दावों का पर्दाफाश किया गया है, जिनमें ईवीएम, मतदान प्रतिशत और चुनाव प्रक्रिया से संबंधित भ्रामक सूचनाएं शामिल थीं। (Election Commission of India)

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डीपफेक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का नया खतरा

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) ने चुनावी दुष्प्रचार को और अधिक जटिल बना दिया है।

अब किसी नेता की आवाज या चेहरा इस्तेमाल करके ऐसा वीडियो बनाया जा सकता है जिसमें वह ऐसी बातें करता दिखाई दे जो उसने कभी कही ही नहीं।

2024 के आम चुनावों के दौरान निर्वाचन आयोग ने राजनीतिक दलों को विशेष रूप से चेतावनी दी थी कि वे डीपफेक और गलत सूचना का उपयोग न करें तथा ऐसी सामग्री को तुरंत हटाएं। (The Indian Express)

2026 में भी आयोग ने एआई-जनित राजनीतिक सामग्री की निगरानी को और सख्त किया तथा हजारों संदिग्ध पोस्टों पर कार्रवाई की। (NKTV)

राजनीतिक दलों की डिजिटल सेनाएं

आज लगभग सभी बड़े राजनीतिक दलों के पास संगठित आईटी सेल, डिजिटल वार रूम और सोशल मीडिया टीमें मौजूद हैं।

इनकी जिम्मेदारियां होती हैं:

  • ट्रेंड चलाना

  • हैशटैग अभियान बनाना

  • विपक्षी दलों की आलोचना करना

  • समर्थकों को सामग्री उपलब्ध कराना

  • वायरल वीडियो तैयार करना

  • चुनावी संदेशों को लक्षित समूहों तक पहुंचाना

कई शोधों में यह संकेत मिला है कि समन्वित डिजिटल अभियान विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं द्वारा व्यापक रूप से इस्तेमाल किए जाते हैं और ये अभियान कई भाषाओं में एक ही संदेश को अलग-अलग रूपों में फैलाते हैं। (arXiv)

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पीआर कंपनियों और डेटा एनालिटिक्स फर्मों की भूमिका

चुनावी राजनीति अब केवल नेताओं और कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं रही।

बड़ी राजनीतिक पार्टियां अक्सर:

  • जनमत सर्वेक्षण एजेंसियों

  • डिजिटल मार्केटिंग कंपनियों

  • डेटा एनालिटिक्स फर्मों

  • राजनीतिक परामर्शदाताओं

  • जनसंपर्क (PR) एजेंसियों

की सेवाएं लेती हैं।

इन कंपनियों का काम होता है:

  • मतदाताओं की प्राथमिकताओं का अध्ययन

  • क्षेत्रवार मुद्दों की पहचान

  • लक्षित प्रचार रणनीति बनाना

  • सोशल मीडिया विज्ञापन तैयार करना

  • ऑनलाइन छवि प्रबंधन करना

डेटा आधारित प्रचार के कारण अलग-अलग वर्गों को अलग-अलग संदेश भेजे जाते हैं। युवा मतदाताओं को रोजगार, किसानों को कृषि, महिलाओं को कल्याणकारी योजनाओं और शहरी वर्ग को विकास संबंधी सामग्री दिखाई जाती है।

क्या सोशल मीडिया वास्तव में वोट बदलता है?

यह प्रश्न अभी भी शोध का विषय है।

सोशल मीडिया हमेशा सीधे वोट नहीं बदलता, लेकिन यह कई महत्वपूर्ण चीजों को प्रभावित करता है:

  1. कौन सा मुद्दा चर्चा में रहेगा।

  2. जनता किन विषयों पर बात करेगी।

  3. मतदाताओं की भावनाएं किस दिशा में जाएंगी।

  4. समर्थकों का उत्साह कितना बढ़ेगा।

  5. विरोधियों के प्रति धारणा कैसी बनेगी।

राजनीतिक वैज्ञानिक इसे "एजेंडा सेटिंग" प्रभाव कहते हैं। यानी सोशल मीडिया लोगों को क्या सोचना है यह नहीं बताता, लेकिन किस विषय पर सोचना है यह अवश्य प्रभावित करता है।

बॉट्स और कृत्रिम ट्रेंड

सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाला हर ट्रेंड वास्तविक जनमत का प्रतिनिधित्व नहीं करता।

कई बार:

  • स्वचालित बॉट अकाउंट

  • नकली प्रोफाइल

  • संगठित ट्रोल नेटवर्क

  • समन्वित प्रचार समूह

किसी विषय को कृत्रिम रूप से लोकप्रिय बना देते हैं।

अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि एआई-संचालित बॉट नेटवर्क भविष्य में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं और भारत सहित कई देशों में इनके संकेत देखे गए हैं। (The Guardian)

सोशल मीडिया और राजनीतिक ध्रुवीकरण

सोशल मीडिया का एक बड़ा प्रभाव राजनीतिक ध्रुवीकरण भी है।

एल्गोरिदम आमतौर पर उपयोगकर्ता को वही सामग्री अधिक दिखाते हैं जिससे वह पहले सहमत रहा हो।

परिणामस्वरूप:

  • अलग-अलग विचारधाराओं के लोग अलग सूचना संसार में रहने लगते हैं।

  • विरोधी विचारों के प्रति असहिष्णुता बढ़ सकती है।

  • तथ्यात्मक चर्चा की जगह भावनात्मक प्रतिक्रियाएं बढ़ सकती हैं।

यह स्थिति लोकतांत्रिक संवाद के लिए चुनौती बनती जा रही है।

चुनाव आयोग और नियमन की चुनौती

भारत निर्वाचन आयोग सोशल मीडिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए लगातार दिशा-निर्देश जारी कर रहा है।

हाल के वर्षों में आयोग ने:

  • डीपफेक पर प्रतिबंध संबंधी निर्देश जारी किए।

  • भ्रामक सामग्री हटाने के लिए समय सीमा तय की।

  • चुनावी प्रचार में एआई सामग्री को लेबल करने की व्यवस्था लागू की।

  • हजारों संदिग्ध पोस्टों पर कार्रवाई की। (NKTV)

फिर भी चुनौतियां बनी हुई हैं क्योंकि सोशल मीडिया की गति पारंपरिक नियामक प्रक्रियाओं से कहीं अधिक तेज है।

सकारात्मक पक्ष भी कम नहीं

सोशल मीडिया को केवल नकारात्मक दृष्टि से नहीं देखा जा सकता।

इसके कई लोकतांत्रिक लाभ भी हैं:

  • छोटे दलों को भी मंच मिलता है।

  • नागरिक सीधे नेताओं से संवाद कर सकते हैं।

  • स्थानीय मुद्दे राष्ट्रीय चर्चा का हिस्सा बन सकते हैं।

  • चुनावी भागीदारी बढ़ती है।

  • सूचना तक पहुंच आसान होती है।

  • युवा राजनीति में अधिक सक्रिय होते हैं।

इसने राजनीतिक संवाद को अधिक खुला और सहभागी बनाया है।

निष्कर्ष

भारत में सोशल मीडिया अब केवल संचार का माध्यम नहीं बल्कि चुनावी राजनीति का केंद्रीय मंच बन चुका है। यह जनमत निर्माण, नैरेटिव सेटिंग, राजनीतिक प्रचार और मतदाता लामबंदी का सबसे प्रभावशाली उपकरण बन गया है। लेकिन इसके साथ ही फेक न्यूज, डीपफेक, संगठित दुष्प्रचार, ट्रोल नेटवर्क और डेटा-आधारित मनोवैज्ञानिक प्रचार जैसी गंभीर चुनौतियां भी सामने आई हैं।

बड़ी राजनीतिक पार्टियां, आईटी सेल, पीआर एजेंसियां और डिजिटल रणनीतिकार मिलकर ऑनलाइन जनमत को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। दूसरी ओर निर्वाचन आयोग, तथ्य-जांच संस्थाएं और नागरिक समाज इस प्रभाव को संतुलित करने का प्रयास कर रहे हैं।

लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि नागरिक किसी भी वायरल संदेश को आंख बंद करके स्वीकार न करें। डिजिटल युग में जागरूक मतदाता ही लोकतंत्र की सबसे मजबूत रक्षा है। सोशल मीडिया लोकतंत्र को मजबूत भी कर सकता है और कमजोर भी; यह इस बात पर निर्भर करता है कि इसका उपयोग सूचना के लिए किया जाता है या दुष्प्रचार के लिए।

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