जनसंख्या पर यू-टर्न: जब एक देश में दो नीतियाँ चल रही हों
भारत में जनसंख्या को लेकर नई बहस छिड़ गई है। एक तरफ दशकों तक सरकारों ने “छोटा परिवार” का प्रचार किया, वहीं अब आंध्र प्रदेश जैसे राज्य जनसंख्या बढ़ाने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन देने की बात कर रहे हैं। मुख्यमंत्री N. Chandrababu Naidu की घोषणा ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या 1952 से अब तक जनसंख्या नियंत्रण पर खर्च हुए लाखों करोड़ रुपये और सरकारी प्रयास व्यर्थ चले गए। दक्षिण भारत के कई राज्य गिरती जन्म दर और भविष्य में लोकसभा सीटों में संभावित कमी को लेकर चिंतित हैं, जबकि उत्तर भारत के कई राज्यों में अब भी बढ़ती आबादी बड़ी चुनौती मानी जा रही है। केंद्र सरकार फिलहाल संतुलित रुख अपनाए हुए है, लेकिन राज्यों की अलग-अलग नीतियों ने राष्ट्रीय स्तर पर भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है। लेख में यह विश्लेषण किया गया है कि असली मुद्दा केवल आबादी बढ़ाना या घटाना नहीं, बल्कि शिक्षित, कुशल और उत्पादक मानव संसाधन तैयार करना है।
भारत इस समय जनसंख्या को लेकर एक विचित्र दौर से गुजर रहा है। एक ओर दशकों तक सरकारें और विशेषज्ञ जनता को समझाते रहे कि “छोटा परिवार ही सुखी परिवार” है, वहीं अब कुछ राज्य सरकारें अधिक बच्चे पैदा करने पर नकद प्रोत्साहन देने लगी हैं। सबसे बड़ा उदाहरण है आंध्र प्रदेश, जहाँ मुख्यमंत्री N. Chandrababu Naidu ने तीसरे और चौथे बच्चे पर आर्थिक सहायता देने की घोषणा की है। (The Pioneer)
यह केवल एक राज्य की नीति नहीं, बल्कि भारत की जनसंख्या बहस में ऐतिहासिक मोड़ है। क्योंकि जिस देश ने 1952 में दुनिया का पहला सरकारी परिवार नियोजन कार्यक्रम शुरू किया था, उसी देश में अब कुछ सरकारें जनसंख्या बढ़ाने की अपील कर रही हैं। जनता का भ्रम स्वाभाविक है। आखिर सच क्या है? अधिक जनसंख्या समस्या है या समाधान? और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न — यदि अब आबादी बढ़ाना आवश्यक बताया जा रहा है, तो क्या पिछले 70 वर्षों में जनसंख्या नियंत्रण पर खर्च हुए लाखों करोड़ रुपये, सरकारी अभियान और मानव संसाधन व्यर्थ चले गए?
यह बहस इसलिए और गंभीर हो जाती है क्योंकि भारत में अब “एक राष्ट्र, एक जनसंख्या नीति” जैसी स्थिति नहीं बची है। कुछ राज्य आबादी घटने से डर रहे हैं, जबकि कुछ अब भी बढ़ती आबादी को संकट मानते हैं। यानी देश के भीतर ही दो अलग-अलग जनसांख्यिकीय भारत बन चुके हैं।
दक्षिण भारत के राज्य — विशेषकर आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल — तेजी से गिरती जन्म दर को लेकर चिंतित हैं। आंध्र प्रदेश में कुल प्रजनन दर (TFR) लगभग 1.5 तक पहुँचने की बात कही जा रही है, जबकि आबादी को स्थिर बनाए रखने के लिए 2.1 का स्तर आवश्यक माना जाता है। (The Pioneer)
यही कारण है कि आंध्र प्रदेश सरकार अब तीसरे बच्चे पर ₹25,000 से लेकर ₹30,000 तक की सहायता, चौथे बच्चे पर अतिरिक्त प्रोत्साहन, पोषण सहायता और शिक्षा समर्थन जैसी योजनाएँ ला रही है। (The Pioneer)
दिलचस्प बात यह है कि यही N. Chandrababu Naidu कभी परिवार नियोजन के समर्थक माने जाते थे। अब उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि “पहले मैं कहता था एक बच्चा आदर्श है, दो ठीक हैं और तीन नहीं होने चाहिए; अब मैं कहता हूँ एक पर्याप्त नहीं, दो अच्छे हैं और तीन उससे भी बेहतर।” (The Pioneer)
यह बदलाव अचानक नहीं आया। इसके पीछे राजनीति, अर्थव्यवस्था और संघीय ढाँचे की चिंता जुड़ी हुई है।
दक्षिण भारतीय राज्यों की सबसे बड़ी चिंता केवल बुजुर्ग आबादी नहीं है, बल्कि भविष्य में लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण भी है। भारत में सीटों का निर्धारण जनसंख्या के आधार पर होता है। दक्षिण भारत के राज्यों ने दशकों तक जनसंख्या नियंत्रण अभियान सफलतापूर्वक लागू किए, जिसके कारण उनकी आबादी वृद्धि धीमी हो गई। दूसरी ओर उत्तर भारत के कई राज्यों में आबादी तेजी से बढ़ती रही। अब दक्षिणी राज्यों को डर है कि भविष्य में यदि जनसंख्या के आधार पर सीटें बढ़ाई गईं, तो उनकी राजनीतिक शक्ति कम हो सकती है।
यानी विडंबना यह है कि जिन्होंने केंद्र की नीति मानकर जनसंख्या नियंत्रित की, वे अब राजनीतिक नुकसान की आशंका महसूस कर रहे हैं।
यहाँ केंद्र और राज्यों के बीच दृष्टिकोण का अंतर साफ दिखाई देता है।
केंद्र सरकार आधिकारिक रूप से अभी भी “जनसंख्या संतुलन” की बात करती है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर जनसंख्या बढ़ाने का कोई अभियान नहीं चला रही। दूसरी ओर कुछ भाजपा शासित राज्य और कुछ क्षेत्रीय दल अब अधिक बच्चों को प्रोत्साहित करने की दिशा में सोच रहे हैं। कुछ राज्यों में पहले दो-बच्चे नीति लागू करने की चर्चा थी, जबकि अब दक्षिण भारत में उलटी चिंता सामने आ रही है।
इस पूरे परिदृश्य में राजनीतिक समीकरण भी महत्वपूर्ण हैं। N. Chandrababu Naidu की पार्टी तेलुगु देशम पार्टी केंद्र की एनडीए सरकार की सहयोगी है। (Wikipedia) इसलिए उनकी जनसंख्या नीति केवल राज्य स्तर की प्रशासनिक घोषणा नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे राष्ट्रीय बहस को प्रभावित करने वाली राजनीतिक पहल के रूप में देखा जा रहा है। अभी केंद्र सरकार ने खुलकर इस नीति का विरोध नहीं किया है। यह भी महत्वपूर्ण संकेत है कि राष्ट्रीय राजनीति में जनसंख्या बहस का स्वर बदल रहा है।
लेकिन यहाँ सबसे असहज प्रश्न आर्थिक है।
1952 से लेकर आज तक भारत ने परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रमों पर भारी धनराशि खर्च की। स्वास्थ्य मंत्रालय, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, नसबंदी अभियान, गर्भनिरोधक वितरण, जागरूकता विज्ञापन, ग्रामीण स्वास्थ्य नेटवर्क, आशा कार्यकर्ता व्यवस्था और विभिन्न प्रोत्साहन योजनाओं पर लगातार हजारों करोड़ रुपये खर्च हुए। यदि सात दशकों का संयुक्त सरकारी व्यय, प्रशासनिक ढाँचा, विदेशी सहायता कार्यक्रम, राज्य योजनाएँ और मानव संसाधन जोड़े जाएँ, तो यह राशि लाखों करोड़ रुपये के बराबर बैठती है।
केवल पैसे की बात नहीं है। करोड़ों घंटे सरकारी कर्मचारियों, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और प्रशासनिक मशीनरी ने इसी लक्ष्य पर लगाए। स्कूलों से लेकर टीवी विज्ञापनों तक “छोटा परिवार” को आदर्श बताया गया। कई जगह सामाजिक दबाव तक बनाया गया। आपातकाल के दौरान जबरन नसबंदी भारतीय लोकतंत्र के सबसे विवादास्पद अध्यायों में गिनी जाती है।
अब जब सरकारें स्वयं अधिक बच्चे पैदा करने की बात कर रही हैं, तो जनता पूछ रही है — क्या पिछली पूरी नीति गलत थी?
इस प्रश्न का उत्तर सीधा “हाँ” या “नहीं” में नहीं है।
1970 और 1980 के दशक का भारत आज के भारत से बिल्कुल अलग था। तब देश गरीब था, खाद्यान्न संकट था, स्वास्थ्य व्यवस्था कमजोर थी और रोजगार सीमित थे। उस समय अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि वास्तव में आर्थिक दबाव बढ़ा रही थी। इसलिए जनसंख्या नियंत्रण नीति उस दौर में तर्कसंगत मानी गई।
लेकिन समस्या यह हुई कि भारत ने जनसंख्या नियंत्रण को ही विकास का पर्याय बना दिया। असली आवश्यकता थी — शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल और रोजगार निर्माण। जनसंख्या घटाने पर जोर तो दिया गया, लेकिन मानव संसाधन की गुणवत्ता सुधारने पर अपेक्षित निवेश नहीं हुआ।
आज भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी है, फिर भी बेरोजगारी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। इसका अर्थ यह है कि केवल आबादी की संख्या से विकास नहीं आता। यदि युवाओं को कौशल और अवसर न मिलें, तो बड़ी जनसंख्या बोझ बन सकती है।
दूसरी ओर अत्यधिक कम जन्म दर भी खतरा पैदा करती है। जापान, दक्षिण कोरिया और चीन इसका उदाहरण हैं। चीन ने दशकों तक “वन चाइल्ड पॉलिसी” लागू की। शुरुआत में इससे आर्थिक लाभ मिला, लेकिन अब वहाँ बुजुर्ग आबादी तेजी से बढ़ रही है और युवा कार्यबल घट रहा है। इसलिए चीन अब लोगों को अधिक बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहन दे रहा है।
भारत के कुछ राज्य इसी भविष्य से डर रहे हैं।
लेकिन यहाँ सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि जिन राज्यों ने केंद्र की सलाह मानकर जनसंख्या नियंत्रित की, वे अब राजनीतिक और आर्थिक नुकसान की आशंका महसूस कर रहे हैं; जबकि जिन राज्यों में आबादी तेजी से बढ़ी, उनकी संसद में भविष्य की हिस्सेदारी बढ़ सकती है। यही कारण है कि दक्षिण भारत में यह भावना बढ़ रही है कि उन्होंने “राष्ट्रीय हित” में जो किया, उसका राजनीतिक नुकसान उन्हें नहीं होना चाहिए।
यह बहस आने वाले वर्षों में और तेज होगी।
भारत अब जनसंख्या नीति के ऐसे मोड़ पर है जहाँ “कम आबादी” और “अधिक आबादी” दोनों को एक साथ चुनौती माना जा रहा है। उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में संसाधनों पर दबाव और बेरोजगारी चिंता है, जबकि दक्षिण भारत में वृद्ध होती आबादी और घटता कार्यबल चिंता बन रहा है।
इसलिए समाधान किसी एक नारे में नहीं है।
न “हम दो हमारे दो” अकेला समाधान था, और न “ज्यादा बच्चे पैदा करो” विकास की गारंटी है। असली प्रश्न यह है कि भारत किस प्रकार की आबादी चाहता है — शिक्षित, स्वस्थ, कुशल और उत्पादक, या केवल संख्या आधारित राजनीति?
यदि सरकारें केवल जनसंख्या संख्या को राजनीतिक शक्ति और सीटों के चश्मे से देखेंगी, तो देश भ्रमित रहेगा। लेकिन यदि नीति का केंद्र मानव संसाधन की गुणवत्ता बने, तो जनसंख्या भारत की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि केंद्र और राज्य मिलकर स्पष्ट राष्ट्रीय जनसंख्या दृष्टि तैयार करें। क्योंकि अभी स्थिति यह बन गई है कि देश का एक हिस्सा कह रहा है “कम बच्चे पैदा करो”, दूसरा कह रहा है “ज्यादा बच्चे पैदा करो”, और जनता पूछ रही है — आखिर सही कौन है?
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