"क्या RSS संविधान से ऊपर है? जब सरकार दोस्ती निभाने लगे और संविधान पीछे छूट जाए, क्या कानून सबके लिए बराबर है?

प्रियंक खरगे द्वारा RSS को लेकर उठाए गए सवालों ने भारत में संविधान, कानून के समक्ष समानता और संगठनात्मक जवाबदेही पर नई बहस छेड़ दी है। क्या किसी प्रभावशाली संगठन के लिए अलग नियम हो सकते हैं? इस विस्तृत विश्लेषण में जानिए लोकतंत्र, कानून और निष्पक्ष शासन से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न।

"क्या RSS संविधान से ऊपर है? जब सरकार दोस्ती निभाने लगे और संविधान पीछे छूट जाए, क्या कानून सबके लिए बराबर है?

Writer- Sudhir Taliyan

Chaudhary- Talan Khap

क्या कोई संगठन संविधान से बड़ा हो सकता है? RSS विवाद, प्रियंक खरगे के सवाल और लोकतंत्र की असली परीक्षा

भारत में राजनीति अक्सर मुद्दों से ज्यादा प्रतिक्रियाओं के कारण चर्चा में आती है। हाल के दिनों में कांग्रेस नेता प्रियंक खरगे द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को लेकर उठाए गए सवालों ने एक बार फिर देश में संविधान, संगठनात्मक जवाबदेही और सत्ता-संगठन संबंधों पर बहस छेड़ दी है। लेकिन इस बहस का सबसे दिलचस्प और चिंताजनक पहलू यह नहीं है कि सवाल क्या पूछा गया, बल्कि यह है कि सवाल पूछे जाने पर प्रतिक्रिया कैसी आई।

लोकतंत्र में किसी भी संस्था, संगठन, राजनीतिक दल, यूनियन, ट्रस्ट, एनजीओ या सामाजिक समूह पर प्रश्न उठाना सामान्य प्रक्रिया है। लोकतंत्र का अर्थ ही है कि सत्ता, प्रभाव और संस्थाओं से जवाब मांगा जा सके। यदि किसी संगठन के बारे में यह पूछा जाए कि उसका कानूनी ढांचा क्या है, उसका पंजीकरण किस स्वरूप में है, उसकी जवाबदेही कैसे तय होती है और उसके वित्तीय तथा प्रशासनिक संचालन की प्रकृति क्या है, तो इसे राष्ट्रविरोधी या असाधारण अपराध नहीं माना जा सकता।

यही कारण है कि प्रियंक खरगे द्वारा उठाए गए सवालों पर जितनी तीखी राजनीतिक प्रतिक्रिया आई, उसने मूल प्रश्न से भी बड़ा सवाल पैदा कर दिया है—क्या भारत में कुछ संगठन ऐसे हैं जिनके बारे में सवाल पूछना भी राजनीतिक अपराध माना जाने लगा है?

सवाल RSS का नहीं, सिद्धांत का है

यह लेख RSS के पक्ष या विपक्ष में नहीं है। सवाल किसी एक संगठन का नहीं बल्कि उस सिद्धांत का है जिस पर लोकतंत्र खड़ा होता है।

देश में हजारों संगठन हैं। मजदूर यूनियनें हैं, छात्र संगठन हैं, किसान संगठन हैं, धार्मिक ट्रस्ट हैं, सामाजिक संस्थाएं हैं और लाखों एनजीओ हैं। इनमें से अधिकांश को विभिन्न कानूनी व्यवस्थाओं के तहत पंजीकरण कराना पड़ता है। उन्हें वित्तीय रिकॉर्ड रखने होते हैं, आय-व्यय का हिसाब देना होता है, प्रशासनिक नियमों का पालन करना पड़ता है और कई मामलों में सरकारी जांच का सामना भी करना पड़ता है।

जब कोई छोटा संगठन किसी तकनीकी कमी के कारण नोटिस प्राप्त कर सकता है, जब किसी एनजीओ के खिलाफ जांच बैठ सकती है, जब किसी यूनियन को नियमों का पालन न करने पर कानूनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है, तब यह सवाल स्वाभाविक है कि देश के सबसे प्रभावशाली संगठनों में से एक RSS की स्थिति क्या है?

यह सवाल पूछना लोकतंत्र का हिस्सा है, हमला नहीं।

संविधान का मूल सिद्धांत: समानता

भारत का संविधान किसी व्यक्ति, दल या संगठन के लिए अलग-अलग नियमों की कल्पना नहीं करता। संविधान का मूल दर्शन है—कानून के सामने समानता।

यदि कोई सामान्य नागरिक कानून का पालन करने के लिए बाध्य है, तो प्रभावशाली व्यक्ति भी बाध्य है।

यदि कोई छोटा संगठन जवाबदेह है, तो बड़ा संगठन भी जवाबदेह होना चाहिए।

यदि कोई विरोधी विचारधारा वाला समूह नियमों के दायरे में रहकर काम करने के लिए बाध्य है, तो सत्तापक्ष के निकट माने जाने वाले संगठनों पर भी वही मानक लागू होने चाहिए।

लोकतंत्र में यही निष्पक्षता विश्वास पैदा करती है।

लेकिन जब जनता को यह आभास होने लगे कि कुछ संस्थाओं के लिए अलग नियम हैं और कुछ के लिए अलग, तब समस्या केवल राजनीति की नहीं रहती; वह लोकतांत्रिक विश्वास का संकट बन जाती है।

असली चिंता: सवालों का जवाब नहीं, सवाल पूछने वालों पर हमला

किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में विवाद का समाधान तथ्यों से होता है।

यदि कोई संगठन कानूनी रूप से पूरी तरह सही स्थिति में है तो सबसे आसान जवाब दस्तावेज, कानून और तथ्य होते हैं।

लेकिन जब जवाब की जगह धमकियां, राजनीतिक बयानबाजी, व्यक्तिगत हमले और भावनात्मक शोर आने लगे, तब संदेह और गहरा होता है।

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जनता यह सोचने लगती है कि यदि सब कुछ स्पष्ट है तो इतनी बेचैनी क्यों?

यदि सवाल गलत है तो उसे तथ्य से खारिज कीजिए।

यदि आरोप निराधार हैं तो दस्तावेज सामने रखिए।

यदि भ्रम है तो स्पष्टीकरण दीजिए।

लेकिन लोकतंत्र में सवाल पूछने वाले को दुश्मन घोषित करना कभी समाधान नहीं रहा।

सत्ता और संगठन के रिश्तों पर सवाल क्यों जरूरी हैं?

इतिहास बताता है कि लोकतंत्र तब कमजोर होता है जब सत्ता और प्रभावशाली गैर-सरकारी संस्थाओं के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है।

यह बात केवल भारत पर लागू नहीं होती। दुनिया के अनेक देशों में यह देखा गया है कि जब कोई संगठन राजनीतिक शक्ति के अत्यधिक निकट पहुंच जाता है, तब उसकी जवाबदेही पर प्रश्न उठना स्वाभाविक हो जाता है।

यही लोकतांत्रिक जांच का सिद्धांत है।

किसी संगठन का बड़ा होना, लोकप्रिय होना या ऐतिहासिक होना उसे सवालों से मुक्त नहीं कर देता।

वास्तव में जितना बड़ा प्रभाव, उतनी बड़ी जवाबदेही होनी चाहिए।

लोकतंत्र में पवित्र गाय जैसी कोई संस्था नहीं हो सकती

लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यही है कि यहां कोई भी संस्था आलोचना से ऊपर नहीं होती।

संसद की आलोचना हो सकती है।

सरकार की आलोचना हो सकती है।

न्यायपालिका के फैसलों पर अकादमिक चर्चा हो सकती है।

राजनीतिक दलों पर सवाल उठ सकते हैं।

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तो फिर किसी सामाजिक या वैचारिक संगठन को आलोचना से परे क्यों माना जाए?

यदि कोई संगठन वास्तव में लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास करता है तो उसे सवालों से डरने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।

आलोचना लोकतंत्र की दुश्मन नहीं होती।

अंधभक्ति होती है।

जनता का बढ़ता हुआ असंतोष

आज आम नागरिक के सामने रोजमर्रा की समस्याएं हैं—महंगाई, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि संकट और आर्थिक अनिश्चितता।

ऐसे समय में जब मंत्री, सांसद और बड़े नेता एक-दूसरे को धमकियां देते दिखाई देते हैं, तब जनता का ध्यान मूल मुद्दों से भटक जाता है।

और उससे भी अधिक खतरनाक बात यह है कि जनता यह महसूस करने लगती है कि उसकी समस्याओं से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ विशेष संगठनों की प्रतिष्ठा है।

यह धारणा लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं है।

सरकार का प्राथमिक दायित्व किसी संगठन की छवि बचाना नहीं बल्कि नागरिकों का विश्वास बनाए रखना है।

सरकार मालिक नहीं, संरक्षक होती है

लोकतंत्र में सरकार जनता की मालिक नहीं होती।

वह जनता द्वारा नियुक्त एक अस्थायी संरक्षक होती है।

सरकारें आती हैं और चली जाती हैं।

राजनीतिक दल बदलते रहते हैं।

नेता बदलते रहते हैं।

लेकिन संविधान स्थायी रहता है।

इसीलिए किसी भी सरकार की पहली जिम्मेदारी संविधान के प्रति होती है, किसी संगठन, विचारधारा या राजनीतिक मित्रता के प्रति नहीं।

जब जनता को लगे कि सरकार निष्पक्ष रेफरी के बजाय किसी विशेष पक्ष की समर्थक बन रही है, तब लोकतांत्रिक विश्वास कमजोर पड़ने लगता है।

खतरनाक मिसालें कैसे बनती हैं

लोकतंत्र एक दिन में कमजोर नहीं होता।

वह धीरे-धीरे कमजोर होता है।

जब एक संस्था को विशेष छूट मिलती है।

जब एक समूह के लिए अलग नियम बन जाते हैं।

जब प्रभाव के आधार पर जवाबदेही तय होने लगती है।

जब आलोचना को देशद्रोह या शत्रुता की तरह प्रस्तुत किया जाने लगता है।

यही वे छोटे-छोटे कदम होते हैं जो भविष्य में बड़ी समस्याओं की नींव रखते हैं।

आज यदि किसी एक संगठन के लिए अलग मानक स्वीकार कर लिए जाएं, तो कल कोई दूसरा संगठन भी वही विशेषाधिकार मांग सकता है।

फिर सरकार किस नैतिक आधार पर उसे मना करेगी?

कानून की ताकत उसकी निष्पक्षता में होती है।

चयनात्मक उपयोग में नहीं।

लोकतंत्र में मित्रता नहीं, नियम सर्वोपरि होने चाहिए

राजनीति में वैचारिक निकटता कोई अपराध नहीं है।

संगठनों और राजनीतिक दलों के बीच संवाद भी असामान्य नहीं है।

लेकिन जब नियमों की व्याख्या मित्रता के आधार पर होने लगे, तब समस्या शुरू होती है।

लोकतंत्र का असली परीक्षण वहीं होता है जहां अपने और पराए के बीच भी समान कानून लागू किया जाए।

निष्पक्षता वही है जो मित्र और विरोधी दोनों के लिए एक जैसी हो।

निष्कर्ष: सवालों से डरना नहीं चाहिए

प्रियंक खरगे का सवाल सही है या गलत, इसका फैसला तथ्यों और कानून के आधार पर होना चाहिए।

लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत में किसी भी संगठन के बारे में प्रश्न पूछने का अधिकार सुरक्षित है?

यदि उत्तर "हां" है, तो बहस होनी चाहिए, दस्तावेज सामने आने चाहिए, तथ्य रखे जाने चाहिए और जनता को निर्णय लेने देना चाहिए।

यदि उत्तर "नहीं" है, तो समस्या केवल एक संगठन की नहीं, बल्कि लोकतंत्र की है।

किसी भी लोकतांत्रिक गणराज्य में कोई संगठन संविधान से बड़ा नहीं हो सकता।

कोई विचारधारा कानून से ऊपर नहीं हो सकती।

कोई मित्रता जवाबदेही की जगह नहीं ले सकती।

और कोई भी संस्था इतनी पवित्र नहीं हो सकती कि उससे सवाल पूछना ही अपराध बन जाए।

लोकतंत्र की असली ताकत जयकारों में नहीं, सवालों में छिपी होती है।

जो व्यवस्था सवालों से डरने लगे, उसे अपनी शक्ति पर नहीं बल्कि अपनी कमजोरी पर विचार करना चाहिए।

क्योंकि अंततः भारत किसी संगठन का नहीं, संविधान का गणराज्य है।

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