“क्या ‘कानून का राज’ धीरे-धीरे ‘पुलिस राज’ में बदल रहा है? भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल”
नए आपराधिक कानूनों के बाद भारत में पुलिस शक्तियों, हिरासत में मौतों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों पर बढ़ती चिंताओं की तथ्यात्मक और तीखी पड़ताल।
पुलिस शक्ति, हिरासत और लोकतंत्र के बीच बढ़ता संकट
By- Chaudhary Sudhir Talyan
भारत में तीन नए आपराधिक कानून—भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA)—1 जुलाई 2024 से लागू हुए। सरकार ने इन्हें औपनिवेशिक कानूनों से मुक्ति, आधुनिक न्याय व्यवस्था और तेज न्याय की दिशा में बड़ा सुधार बताया है। गृह मंत्रालय के अनुसार इन कानूनों का उद्देश्य न्याय प्रणाली को आधुनिक बनाना और नागरिकों को शीघ्र न्याय उपलब्ध कराना है। (Ministry of Home Affairs)
लेकिन किसी कानून की असली परीक्षा उसके नाम, भाषा या सरकारी दावों से नहीं होती। उसकी परीक्षा तब होती है जब पुलिस के हाथ में शक्ति हो और सामने एक साधारण नागरिक हो; जब सरकार के सामने आलोचक हो; जब प्रदर्शनकारी सड़क पर हो; जब पत्रकार सत्ता से सवाल पूछ रहा हो; और जब हिरासत में बंद व्यक्ति राज्य की पूरी ताकत के सामने अकेला हो।
यहीं से नए आपराधिक कानूनों को लेकर सबसे गंभीर लोकतांत्रिक सवाल खड़े होते हैं।
Human Rights Watch की World Report 2025 ने नए कानूनों के संदर्भ में पुलिस शक्तियों के विस्तार को लेकर चिंता व्यक्त की थी। संस्था ने कहा कि इन बदलावों से अभिव्यक्ति, संगठन, शांतिपूर्ण सभा और निष्पक्ष सुनवाई जैसे अधिकारों पर असर पड़ने की आशंका है। (Human Rights Watch)
2026 की रिपोर्ट में तस्वीर और कठोर दिखाई देती है। Human Rights Watch ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि 2025 के पहले आठ महीनों में पुलिस हिरासत में 113 मौतें, न्यायिक हिरासत में 1,535 मौतें और 132 कथित गैर-न्यायिक हत्याएं दर्ज की गईं। ये आंकड़े अपने आप में किसी भी लोकतांत्रिक शासन के लिए असहज सवाल खड़े करने के लिए पर्याप्त हैं। (Human Rights Watch)
सवाल कानून की जरूरत का नहीं, शक्ति के इस्तेमाल का है
भारत को आधुनिक आपराधिक कानूनों की जरूरत थी। पुरानी औपनिवेशिक व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता से शायद ही कोई गंभीर व्यक्ति इनकार करेगा। डिजिटल अपराध, संगठित अपराध, साइबर अपराध, फोरेंसिक जांच और बदलती सामाजिक परिस्थितियों के लिए कानूनों को आधुनिक बनाना आवश्यक है।
लेकिन आधुनिक कानून का अर्थ अधिक पुलिस शक्ति नहीं, बल्कि अधिक जवाबदेह पुलिस शक्ति होना चाहिए।
BNSS की एक महत्वपूर्ण बहस पुलिस हिरासत से जुड़ी है। PRS Legislative Research के विश्लेषण के अनुसार BNSS पुलिस को कुल 15 दिन तक की हिरासत की अनुमति देता है, लेकिन इसे 60 या 90 दिन की वैधानिक हिरासत अवधि के शुरुआती 40 या 60 दिनों के भीतर अलग-अलग हिस्सों में इस्तेमाल किया जा सकता है। PRS ने आशंका जताई कि इससे पुलिस हिरासत की अवधि गिरफ्तारी के तत्काल बाद के शुरुआती चरण तक सीमित रहने की पारंपरिक व्यवस्था बदलती है और दुरुपयोग की संभावना पैदा हो सकती है। (PRS Legislative Research)
यह कोई तकनीकी कानूनी बहस भर नहीं है।
हिरासत में राज्य के पास व्यक्ति से कहीं अधिक शक्ति होती है।
व्यक्ति की स्वतंत्रता पुलिस के आदेश, जांच की दिशा और मजिस्ट्रेट के निर्णय पर निर्भर हो जाती है। ऐसी स्थिति में हर अतिरिक्त पुलिस शक्ति के साथ उतनी ही मजबूत निगरानी, रिकॉर्डिंग, न्यायिक समीक्षा और जवाबदेही की व्यवस्था होनी चाहिए।
वरना कानून अपराधी से लड़ने का हथियार कम और नागरिक पर नियंत्रण का औजार अधिक दिखाई देने लगता है।
हिरासत में मौत लोकतंत्र की सबसे भयावह परीक्षा है
113 पुलिस हिरासत मौतें और 1,535 न्यायिक हिरासत मौतें—इन आंकड़ों को केवल प्रशासनिक सांख्यिकी मानकर आगे बढ़ जाना खतरनाक होगा। (Human Rights Watch)
हर हिरासत में मौत के पीछे अलग परिस्थिति हो सकती है। हर मौत को पुलिस अपराध कहना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा। लेकिन यही कारण है कि स्वतंत्र और अनिवार्य जांच और भी जरूरी हो जाती है।
प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि “पुलिस पर आरोप क्यों लगाया जा रहा है?”
प्रश्न यह होना चाहिए कि जिस व्यक्ति की स्वतंत्रता राज्य ने छीनी, उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी?
अगर कोई नागरिक पुलिस हिरासत में है तो उसकी सुरक्षा भी राज्य की जिम्मेदारी है। यदि उसकी मृत्यु होती है तो जांच केवल विभागीय औपचारिकता नहीं हो सकती। जांच ऐसी होनी चाहिए जिस पर पीड़ित परिवार, समाज और न्यायपालिका भरोसा कर सके।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग स्वयं हिरासत में मौत, पुलिस कार्रवाई और अन्य मामलों के लिए अलग दिशानिर्देश रखता है। (NHRC)
फिर भी सवाल बना रहता है—दिशानिर्देश कितने हैं, और उनके पालन की जवाबदेही कितनी है?
‘देशहित’ की परिभाषा इतनी चौड़ी नहीं हो सकती कि असहमति उसमें अपराध बन जाए
लोकतंत्र में सरकार की आलोचना देशद्रोह नहीं होती।
प्रश्न पूछना राष्ट्र-विरोध नहीं होता।
सड़क पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना लोकतंत्र-विरोध नहीं होता।
पत्रकार का सत्ता से जवाब मांगना अपराध नहीं होना चाहिए।
यही वह क्षेत्र है जहां नए आपराधिक कानूनों को लेकर सबसे तीखी बहस है।
सरकार ने पुराने राजद्रोह कानून को हटाने को महत्वपूर्ण सुधार के रूप में प्रस्तुत किया। लेकिन Human Rights Watch और अन्य आलोचकों ने नए कानून में भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्यों से संबंधित प्रावधान को लेकर चिंता जताई है और इसे पुराने राजद्रोह प्रावधान की संभावित पुनरावृत्ति के रूप में देखा है। (Human Rights Watch)
कानून की भाषा जितनी व्यापक होगी, उसके दुरुपयोग की संभावना उतनी ही गंभीर होगी।
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपराध की परिभाषा स्पष्ट होनी चाहिए। “खतरा”, “असहमति”, “विरोध”, “उकसावा” और “राष्ट्रीय हित” जैसे शब्दों का इस्तेमाल यदि अस्पष्ट तरीके से किया जाए तो अंततः निर्णय कानून से ज्यादा सत्ता की व्याख्या पर निर्भर हो सकता है।
और यही लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है।
पत्रकार और नागरिक समाज लोकतंत्र के दुश्मन नहीं हैं
Human Rights Watch की 2025 रिपोर्ट ने पत्रकारों, किसान नेताओं और विरोध प्रदर्शनों से जुड़े लोगों के सोशल मीडिया खातों को ब्लॉक किए जाने की घटनाओं का उल्लेख किया था। (Human Rights Watch)
2026 की रिपोर्ट में भी मीडिया और ऑनलाइन अभिव्यक्ति को लेकर गंभीर चिंताएं दर्ज की गईं। रिपोर्ट के अनुसार आपराधिक मुकदमों तथा सामग्री हटाने और सोशल मीडिया खातों को निलंबित करने के आदेशों के माध्यम से अभिव्यक्ति पर दबाव की घटनाएं सामने आईं। (Human Rights Watch)
यहां लोकतंत्र की बुनियादी कसौटी समझनी होगी।
सरकार को आलोचना से सुरक्षा नहीं चाहिए; सरकार को आलोचना सुनने की क्षमता चाहिए।
यदि पत्रकार हर खबर से पहले यह सोचने लगे कि कहीं उसके खिलाफ मुकदमा न हो जाए, यदि सामाजिक कार्यकर्ता हर बयान से पहले पुलिस कार्रवाई की आशंका में हो, यदि नागरिक हर पोस्ट लिखने से पहले कानून की अस्पष्ट धाराओं से डरे—तो संविधान में स्वतंत्रता का अधिकार कागज पर बच सकता है, व्यवहार में नहीं।
पुलिस राज्य और कानून के शासन में फर्क
एक मजबूत पुलिस व्यवस्था लोकतंत्र की जरूरत है।
लेकिन मजबूत पुलिस और बेलगाम पुलिस में जमीन-आसमान का अंतर है।
कानून का शासन पुलिस को शक्ति देता है; पुलिस राज्य पुलिस को सर्वोच्चता देता है।
भारत का संविधान नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा देता है। गिरफ्तारी और हिरासत पर भी संवैधानिक सुरक्षा मौजूद है। BNSS भी 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की संवैधानिक व्यवस्था को बनाए रखता है। (PRS Legislative Research)
लेकिन कानून में अधिकार लिख देना पर्याप्त नहीं है।
अधिकार तभी वास्तविक होते हैं जब पुलिस उन्हें माने, प्रशासन उन्हें लागू करे और अदालतें उनके उल्लंघन पर प्रभावी राहत दें।
इसीलिए नई आपराधिक व्यवस्था के साथ पुलिस सुधार, स्वतंत्र जांच तंत्र, हिरासत की अनिवार्य वीडियो रिकॉर्डिंग, वकील तक वास्तविक पहुंच, मेडिकल जांच, हिरासत में मृत्यु की स्वतंत्र जांच और अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही को समान प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल: नागरिक किसके सामने सुरक्षित है?
Human Rights Watch की रिपोर्टें अंतिम न्यायिक निर्णय नहीं हैं। उनकी प्रत्येक टिप्पणी को स्वतः अंतिम सत्य मानना भी उचित नहीं होगा। लेकिन अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था द्वारा दर्ज चिंताओं को केवल “भारत-विरोधी” कहकर खारिज कर देना भी लोकतांत्रिक जवाब नहीं है।
सरकार को आंकड़ों और घटनाओं का जवाब पारदर्शिता से देना चाहिए।
यदि हिरासत में मौत हुई है—जांच सार्वजनिक हो।
यदि पुलिस पर यातना का आरोप है—स्वतंत्र जांच हो।
यदि पत्रकार गिरफ्तार हुआ है—कानूनी आधार स्पष्ट हो।
यदि सोशल मीडिया खाता बंद हुआ है—कारण बताया जाए।
यदि किसी प्रदर्शनकारी पर गंभीर आपराधिक धारा लगी है—अदालत में उसका परीक्षण हो।
और यदि पुलिस अधिकारी ने कानून का दुरुपयोग किया है—तो वर्दी उसे कानून से ऊपर की ढाल न दे।
लोकतंत्र की रक्षा केवल संसद में कानून बनाकर नहीं होगी
भारत का लोकतंत्र केवल चुनावों का नाम नहीं है।
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लोकतंत्र का अर्थ है—सरकार को चुनौती देने का अधिकार, पुलिस से सवाल पूछने का अधिकार, शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार, स्वतंत्र पत्रकारिता का अधिकार, संगठन बनाने का अधिकार और निष्पक्ष न्याय पाने का अधिकार।
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नए आपराधिक कानूनों की सफलता इस बात से नहीं मापी जाएगी कि कितने अपराधियों को गिरफ्तार किया गया।
सफलता का असली पैमाना यह होगा कि कितने निर्दोष नागरिकों को राज्य की शक्ति से सुरक्षित रखा गया।
अपराध के खिलाफ कठोर राज्य जरूरी है।
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लेकिन नागरिक अधिकारों के खिलाफ कठोर राज्य लोकतंत्र के लिए खतरा है।
आज भारत को इसी महीन रेखा की रक्षा करनी है।
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पुलिस शक्तिशाली हो—लेकिन कानून से बंधी हो।
सरकार मजबूत हो—लेकिन संविधान से बंधी हो।
अदालतें स्वतंत्र हों—लेकिन नागरिक तक पहुंच योग्य हों।
और नागरिक स्वतंत्र हो—क्योंकि यही लोकतंत्र का अंतिम उद्देश्य है।
अगर कानून अपराधी को रोकने के बजाय असहमति को डराने लगे, अगर हिरासत सुरक्षा के बजाय भय का पर्याय बन जाए और अगर पुलिस जवाबदेही के बजाय अंतिम सत्ता समझने लगे, तो समस्या केवल किसी एक कानून में नहीं रहती।
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तब सवाल कानून का नहीं, लोकतंत्र की आत्मा का होता है।
और उस सवाल से किसी भी सरकार को बचना नहीं चाहिए।
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Disclaimer:
यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रिपोर्टों, आधिकारिक दस्तावेजों और विभिन्न स्रोतों पर आधारित संपादकीय विश्लेषण है। इसमें व्यक्त विचार लेखक के हैं और इन्हें कानूनी सलाह या किसी व्यक्ति/संस्था के विरुद्ध अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए।
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