लाहौर में पुराने नामों की वापसी: क्या पाकिस्तान सचमुच मजहबी कट्टरता छोड़ रहा हैं या यह केवल प्रतीकात्मक राजनीति है या मजबूरी ?
लाहौर में 1947 से पहले प्रचलित कई ऐतिहासिक नामों को वापस लाने की पहल ने पाकिस्तान की राजनीति और समाज में नई बहस छेड़ दी है। मरियम नवाज़ सरकार द्वारा शुरू किए गए “लाहौर अथॉरिटी फॉर हेरिटेज रिवाइवल” अभियान के तहत कृष्णनगर, धरमपुरा और जैन मंदिर चौक जैसे पुराने नामों की वापसी को सांस्कृतिक विरासत बचाने की कोशिश बताया जा रहा है। हालांकि आलोचकों का कहना है कि पाकिस्तान में अभी भी कट्टरपंथ, अल्पसंख्यकों की असुरक्षा और आतंकवाद जैसे गंभीर मुद्दे मौजूद हैं, इसलिए केवल नाम बदलने से देश की छवि या सोच पूरी तरह नहीं बदलती। विश्लेषकों के अनुसार यह कदम आंशिक सांस्कृतिक सुधार, अंतरराष्ट्रीय इमेज बिल्डिंग और राजनीतिक रणनीति—तीनों का मिश्रण हो सकता है।
पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में 2025-26 के दौरान शुरू हुए “लाहौर अथॉरिटी फॉर हेरिटेज रिवाइवल (LAHR)” अभियान ने पूरे दक्षिण एशिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इस पहल के तहत लाहौर की कई सड़कों, गलियों, चौकों और इलाकों के उन पुराने नामों को वापस लाने की चर्चा हुई है जो 1947 के विभाजन से पहले प्रचलित थे। इस प्रक्रिया में इस्लामपुरा को फिर से कृष्णनगर, सुन्नत नगर को संतनगर, मुस्तफाबाद को धरमपुरा और बाबरी मस्जिद चौक को जैन मंदिर चौक कहे जाने जैसी खबरें सामने आईं।
इस अभियान का नेतृत्व पंजाब की मुख्यमंत्री मरियम नवाज़ और पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ से जुड़ा बताया गया है। पाकिस्तान सरकार का दावा है कि यह कदम लाहौर की “ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान” को पुनर्जीवित करने के लिए उठाया गया है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान वास्तव में अपने अतीत और अपनी बहुधार्मिक विरासत को स्वीकार करने की दिशा में बढ़ रहा है, या यह केवल एक सीमित सांस्कृतिक परियोजना है जिसका वास्तविक सामाजिक और राजनीतिक बदलाव से बहुत कम संबंध है?
लाहौर की बदली हुई पहचान
विभाजन से पहले लाहौर केवल मुस्लिम संस्कृति का केंद्र नहीं था। यह हिंदू, सिख, जैन और मुस्लिम समुदायों का साझा शहर था। कृष्णनगर, धरमपुरा, जैन मंदिर रोड, राम गली और लक्ष्मी चौक जैसे नाम उसी बहुधार्मिक इतिहास की पहचान थे। 1947 के बाद पाकिस्तान ने अपनी राष्ट्रीय पहचान को अधिक इस्लामी स्वरूप देना शुरू किया। इसी दौर में कई इलाकों के नाम बदले गए और पुराने सांस्कृतिक संकेत धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन से हटाए गए।
इतिहासकारों का मानना है कि यह केवल नाम बदलने का मामला नहीं था, बल्कि पाकिस्तान की नई वैचारिक दिशा का हिस्सा था। देश की राजनीति में इस्लामी पहचान को राष्ट्रवाद से जोड़ा गया और सार्वजनिक स्थानों पर भी उसका प्रभाव दिखाई दिया।
अब लगभग आठ दशक बाद उन्हीं नामों को वापस लाने की कोशिश ने नई बहस छेड़ दी है। पाकिस्तान के कुछ बुद्धिजीवी और इतिहासकार इसे सांस्कृतिक सुधार मान रहे हैं, जबकि आलोचकों का कहना है कि यह केवल “सॉफ्ट इमेज बिल्डिंग” है।
क्या पाकिस्तान की विचारधारा बदल रही है?
इस प्रश्न का उत्तर सरल नहीं है। एक ओर पाकिस्तान में ऐसे वर्ग मौजूद हैं जो मानते हैं कि देश की पहचान केवल धार्मिक आधार पर नहीं होनी चाहिए। वे लाहौर, पेशावर और कराची जैसे शहरों की बहुसांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना चाहते हैं। लाहौर हेरिटेज अभियान को इसी सोच का एक हिस्सा माना जा सकता है।
लेकिन दूसरी ओर पाकिस्तान की वास्तविक राजनीतिक और सामाजिक स्थिति अभी भी कई गंभीर सवाल खड़े करती है।
पाकिस्तान का संविधान इस्लाम को राज्य धर्म घोषित करता है। देश की राजनीति, शिक्षा व्यवस्था और कई सरकारी संस्थाओं में धार्मिक पहचान का प्रभाव गहरा है। अल्पसंख्यकों के अधिकारों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की लगातार आलोचना होती रही है।
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मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्टों में हिंदू, सिख, ईसाई और अहमदिया समुदायों के खिलाफ भेदभाव, जबरन धर्म परिवर्तन, मंदिरों पर हमले और धार्मिक असहिष्णुता की घटनाओं का उल्लेख मिलता रहा है। सिंध और दक्षिणी पंजाब के कई क्षेत्रों से नाबालिग हिंदू लड़कियों के कथित अपहरण और जबरन निकाह के मामले भी समय-समय पर चर्चा में रहे हैं।
ऐसे में केवल पुराने नाम वापस लाना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि पाकिस्तान की वैचारिक दिशा पूरी तरह बदल रही है।
हिंदू आबादी में गिरावट और असुरक्षा की भावना
विभाजन के समय वर्तमान पाकिस्तान क्षेत्र में हिंदू और सिख आबादी काफी अधिक थी। विभाजन के बाद बड़े पैमाने पर पलायन हुआ। इसके बाद भी दशकों में हिंदू आबादी का प्रतिशत लगातार कम होता गया।
हालांकि पाकिस्तान में आज भी लाखों हिंदू रहते हैं, विशेषकर सिंध प्रांत में, लेकिन उनके बीच असुरक्षा की भावना की चर्चा अक्सर होती रहती है। धार्मिक तनाव, सामाजिक भेदभाव और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की कमी जैसे मुद्दे लंबे समय से उठते रहे हैं।
यह भी सच है कि पाकिस्तान में कई ऐसे नागरिक, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं जो अल्पसंख्यकों के अधिकारों के समर्थन में आवाज उठाते हैं। लेकिन कट्टरपंथी संगठनों का प्रभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। यही कारण है कि आलोचक पूछते हैं कि यदि पाकिस्तान वास्तव में बहुधार्मिक पहचान को स्वीकार करना चाहता है, तो क्या वह केवल नाम बदलने से आगे बढ़कर संस्थागत सुधार भी करेगा?
आतंकवाद और पड़ोसी देशों के साथ संबंध
भारत समेत कई देशों ने लंबे समय से पाकिस्तान पर आतंकवादी संगठनों को संरक्षण देने के आरोप लगाए हैं। मुंबई 26/11 हमला, पठानकोट हमला और सीमा पार आतंकवाद के मुद्दे भारत-पाकिस्तान संबंधों में लगातार तनाव का कारण रहे हैं।
पाकिस्तान ने कई बार इन आरोपों से इनकार किया है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसे आतंकी नेटवर्क और चरमपंथी संगठनों को लेकर दबाव का सामना करना पड़ा है। फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) की निगरानी सूची में पाकिस्तान का शामिल होना भी इसी व्यापक चिंता का हिस्सा था।
इसी कारण भारत में बहुत से लोग पाकिस्तान के किसी भी सांस्कृतिक अभियान को संदेह की नजर से देखते हैं। उनका मानना है कि जब तक आतंकवाद और कट्टरपंथ पर ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक केवल सांस्कृतिक प्रतीकों के आधार पर बदलाव का दावा अधूरा रहेगा।
क्या यह केवल इमेज मेकओवर है?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इस अभियान के पीछे कई संभावित कारण हो सकते हैं:
1. अंतरराष्ट्रीय छवि सुधारने की कोशिश
पाकिस्तान लंबे समय से आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और कट्टरपंथ की छवि से जूझ रहा है। ऐसे समय में बहुसांस्कृतिक विरासत को सामने लाना उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि सुधारने का प्रयास भी हो सकता है।
2. पर्यटन और निवेश
लाहौर दक्षिण एशिया के सबसे ऐतिहासिक शहरों में से एक है। मुगल स्थापत्य, सिख इतिहास और औपनिवेशिक इमारतें पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। पुराने नामों और विरासत स्थलों को पुनर्जीवित करना पर्यटन को बढ़ावा देने की रणनीति भी हो सकती है।
3. घरेलू राजनीति
मरियम नवाज़ और नवाज़ शरीफ की राजनीति अक्सर “विकास” और “सांस्कृतिक पहचान” के मुद्दों पर केंद्रित रही है। हेरिटेज अभियान को पंजाब में राजनीतिक समर्थन मजबूत करने के प्रयास के रूप में भी देखा जा रहा है।
लेकिन असली परीक्षा क्या होगी?
यदि पाकिस्तान वास्तव में अपनी बहुलतावादी विरासत को स्वीकार करना चाहता है, तो केवल सड़कों और मोहल्लों के नाम बदलना पर्याप्त नहीं होगा। वास्तविक बदलाव के लिए कुछ बड़े कदम आवश्यक होंगे:
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अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना
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जबरन धर्म परिवर्तन के मामलों पर सख्त कार्रवाई
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स्कूलों में संतुलित इतिहास शिक्षा
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मंदिरों, गुरुद्वारों और चर्चों की सुरक्षा
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कट्टरपंथी संगठनों पर प्रभावी नियंत्रण
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पड़ोसी देशों के साथ हिंसा और आतंकवाद से दूरी
इन क्षेत्रों में ठोस सुधार के बिना केवल प्रतीकात्मक बदलावों से पाकिस्तान की छवि पूरी तरह नहीं बदल सकती।
भारत के लिए इसका क्या अर्थ है?
भारत में इस घटनाक्रम को मिश्रित प्रतिक्रिया मिली है। कुछ लोग इसे सकारात्मक सांस्कृतिक संकेत मानते हैं कि पाकिस्तान अपने इतिहास के दबे हुए हिस्सों को स्वीकार करने की कोशिश कर रहा है। वहीं कई लोग इसे सतही कदम बताते हैं और याद दिलाते हैं कि भारत-पाक संबंधों की वास्तविक समस्या आतंकवाद, सीमा पार हिंसा और कट्टरपंथ है।
भारत में यह भावना भी मजबूत है कि पाकिस्तान में हिंदू और अन्य अल्पसंख्यक समुदाय अभी भी पूर्ण सुरक्षा और समानता का अनुभव नहीं करते। इसलिए केवल पुराने नाम वापस आने से भारतीय समाज का बड़ा वर्ग तुरंत भरोसा करने के लिए तैयार नहीं दिखाई देता।
निष्कर्ष
लाहौर में पुराने नामों की वापसी निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और ऐतिहासिक घटना है। यह इस बात का संकेत है कि पाकिस्तान के भीतर कुछ वर्ग अपने शहरों की बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक विरासत को मिटाना नहीं चाहते।
लेकिन यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगी कि पाकिस्तान अपनी मूल वैचारिक दिशा से पूरी तरह बदल रहा है। देश में कट्टरपंथ, अल्पसंख्यक अधिकारों की चुनौतियाँ और आतंकवाद से जुड़े प्रश्न अभी भी मौजूद हैं।
इसलिए वर्तमान स्थिति को दो अतियों में देखने के बजाय संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है। यह पहल एक प्रतीकात्मक शुरुआत हो सकती है, लेकिन वास्तविक परिवर्तन का आकलन पाकिस्तान के सामाजिक व्यवहार, कानून व्यवस्था, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और क्षेत्रीय नीतियों के आधार पर ही किया जाएगा।
यदि भविष्य में पाकिस्तान केवल नाम ही नहीं बल्कि सोच, नीतियों और व्यवहार में भी बहुलतावाद को अपनाता है, तभी यह कहा जा सकेगा कि वह वास्तव में बदल रहा है। अभी के लिए, लाहौर की यह पहल इतिहास की ओर लौटने का एक दिलचस्प लेकिन सीमित संकेत भर दिखाई देती है।
2025 में “लाहौर अथॉरिटी फॉर हेरिटेज रिवाइवल” की स्थापना मरियम नवाज़ और नवाज़ शरीफ की देखरेख में की गई थी। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों में लाहौर की ऐतिहासिक पहचान बहाल करने और कुछ पुराने नामों की वापसी की चर्चा हुई है।
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