जंतर-मंतर का 'एग्जाम': युवाओं का अनशन, सत्ता का घमंड, सहयोगियों का 'टेंशन' और कांग्रेस का कन्फ्यूजन

जंतर-मंतर पर 19 दिनों से जारी छात्र आंदोलन ने राष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। सोनम वांगचुक के अनशन, पेपर लीक विवाद, विपक्षी दलों की सक्रियता, कांग्रेस की रणनीति और युवाओं के भविष्य से जुड़े सवालों का विस्तृत विश्लेषण इस विशेष रिपोर्ट में पढ़ें।

जंतर-मंतर का 'एग्जाम': युवाओं का अनशन, सत्ता का घमंड, सहयोगियों का 'टेंशन' और कांग्रेस का कन्फ्यूजन

19 दिनों से जारी अनशन ने खड़ा किया बड़ा सवाल: क्या युवाओं के मुद्दे पर भी राजनीति हावी है?

लेखिका- Nimisha Singh

नई दिल्ली।

दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर देश की राजनीति का सबसे गर्म केंद्र बन चुका है। इस बार मुद्दा केवल परीक्षा में धांधली, पेपर लीक या भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता का नहीं है, बल्कि यह आंदोलन विपक्षी राजनीति की आंतरिक खींचतान, नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा और युवाओं की वास्तविक आकांक्षाओं के बीच चल रहे संघर्ष का भी प्रतीक बन गया है।

एक तरफ लद्दाख के प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक छात्रों के साथ लगातार 19 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे हैं। दूसरी ओर विपक्षी गठबंधन (I.N.D.I.A.) के भीतर यह बहस तेज हो गई है कि देशभर के युवाओं के इस आंदोलन का राजनीतिक चेहरा आखिर कौन बनेगा।

जंतर-मंतर पर बैठे युवाओं का संदेश स्पष्ट है—"राजनीति बाद में, पहले शिक्षा व्यवस्था को बचाइए।" लेकिन राजनीतिक दलों की गतिविधियां यह संकेत देती हैं कि हर दल इस आंदोलन को अपने-अपने राजनीतिक चश्मे से देख रहा है।


एक व्यंग्य से शुरू हुआ आंदोलन, जिसने राजनीति की जमीन हिला दी

इस आंदोलन की सबसे दिलचस्प बात इसकी शुरुआत है।

जिस अभियान की शुरुआत 'कॉकरोच जनता पार्टी (CJP)' नाम के एक व्यंग्यात्मक सोशल मीडिया हैंडल से हुई थी, वही आज देश के सबसे बड़े छात्र आंदोलनों में बदल चुका है।

सोशल मीडिया पर शुरू हुआ यह अभियान धीरे-धीरे हजारों छात्रों, अभिभावकों और युवाओं का आंदोलन बन गया।

आंदोलनकारियों की प्रमुख मांगें हैं—

  • शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा।

  • पेपर लीक मामलों की निष्पक्ष जांच।

  • परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार।

  • भर्ती परीक्षाओं की विश्वसनीयता बहाल करना।

  • युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ रोकना।

देश के अलग-अलग राज्यों से आए छात्र जंतर-मंतर पर डटे हुए हैं।

भूख हड़ताल के कारण कई आंदोलनकारियों की तबीयत लगातार बिगड़ रही है।

AISA (ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन) के तीन कार्यकर्ताओं को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा, जिससे आंदोलन की गंभीरता और बढ़ गई।


सोनम वांगचुक बने आंदोलन का नैतिक चेहरा

सोनम वांगचुक लंबे समय से शिक्षा सुधार, पर्यावरण संरक्षण और हिमालयी क्षेत्रों के विकास से जुड़े रहे हैं।

उनकी उपस्थिति ने इस आंदोलन को केवल छात्र आंदोलन नहीं रहने दिया, बल्कि इसे एक नैतिक लड़ाई का स्वरूप दे दिया।

यही कारण है कि अनेक सामाजिक संगठनों के साथ-साथ विपक्षी दलों के नेता भी लगातार जंतर-मंतर पहुंच रहे हैं।


विपक्षी नेताओं की बढ़ती आवाजाही

जंतर-मंतर पर लगातार विभिन्न विपक्षी दलों के नेताओं का आना-जाना जारी है।

इनमें प्रमुख रूप से—

  • वामपंथी दल

  • तृणमूल कांग्रेस

  • समाजवादी पार्टी

के नेता लगातार आंदोलनकारियों से मुलाकात कर रहे हैं।

तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने सोशल मीडिया मंच X पर भावुक अपील करते हुए लिखा—

"सोनम सर, आपके उपवास ने न्याय की इस लड़ाई में देश के युवाओं को एकजुट कर दिया है। सरकार को भले ही किसी की जान की परवाह न हो, लेकिन आपका जीवन हमारे लिए कीमती है। कृपया अनशन खत्म करें और इस लड़ाई को दूसरे तरीकों से जारी रखें।"

यह संदेश केवल संवेदना नहीं था, बल्कि यह इस आंदोलन के प्रति राजनीतिक समर्थन का भी सार्वजनिक संकेत था।


सहयोगी दलों की खुली सलाह: राहुल गांधी को भी जाना चाहिए

जैसे-जैसे आंदोलन मजबूत होता गया, विपक्षी गठबंधन के भीतर भी दबाव बढ़ने लगा।

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने सार्वजनिक रूप से कहा—

"मैं तो जाऊंगा ही। राहुल गांधी जी को भी जाना चाहिए। उन सभी लोगों को वहां जाना चाहिए जिन्हें देश के युवाओं पर भरोसा है।"

यह बयान सामान्य राजनीतिक टिप्पणी नहीं था।

इसे कांग्रेस के लिए एक सार्वजनिक संदेश माना गया कि यदि वह युवाओं के मुद्दे पर नेतृत्व करना चाहती है तो उसे आंदोलन से दूरी नहीं रखनी चाहिए।


कांग्रेस की चुप्पी क्यों चर्चा का विषय बनी?

दिलचस्प बात यह है कि पूरे आंदोलन के दौरान कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व अपेक्षाकृत शांत दिखाई दिया।

सिर्फ कांग्रेस सांसद बलवंत वानखेड़े के जंतर-मंतर जाने की खबर सामने आई।

इसके अतिरिक्त पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इस आंदोलन से दूरी बनाए हुए दिखाई दिया।

कांग्रेस का पूरा फोकस राहुल गांधी द्वारा शुरू किए गए राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम "छात्रों की गूंज" पर केंद्रित रहा।

यही दूरी अब राजनीतिक बहस का सबसे बड़ा विषय बन चुकी है।


आखिर कांग्रेस क्यों सतर्क है?

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार कांग्रेस के भीतर इस आंदोलन को लेकर गहरा मंथन चल रहा है।

बताया जा रहा है कि पार्टी की झिझक के पीछे कई कारण हैं।

1. 2011 के अन्ना आंदोलन की याद

कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं को 2011 का इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन याद आ रहा है।

तब सोशल मीडिया के माध्यम से शुरू हुआ आंदोलन धीरे-धीरे राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बन गया था।

जनलोकपाल आंदोलन ने यूपीए सरकार को भारी राजनीतिक नुकसान पहुंचाया था।

कांग्रेस नहीं चाहती कि वैसा ही कोई नया जनआंदोलन फिर किसी दूसरी राजनीतिक शक्ति को लाभ पहुंचा दे।


2. AAP कनेक्शन को लेकर संदेह

संयोग यह भी है कि गुजरात कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष जिग्नेश मेवानी और CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके दोनों अपने शुरुआती राजनीतिक दौर में आम आदमी पार्टी से जुड़े रहे हैं।

कांग्रेस के भीतर कुछ नेताओं को लगता है कि इस आंदोलन में आम आदमी पार्टी की सक्रियता अधिक दिखाई दे रही है।

इसी कारण पार्टी का शीर्ष नेतृत्व पूरी तरह खुलकर सामने आने से बच रहा है।


3. राहुल गांधी के अभियान पर असर का डर

कांग्रेस का मानना है कि राहुल गांधी पिछले कई महीनों से परीक्षा घोटालों और शिक्षा सुधार को लेकर अलग अभियान चला रहे हैं।

यदि पूरा राजनीतिक विमर्श CJP के नेतृत्व वाले आंदोलन के इर्द-गिर्द केंद्रित हो जाता है तो राहुल गांधी की पहल पीछे छूट सकती है।

राजनीतिक दृष्टि से यह कांग्रेस के लिए चुनौती बन सकती है।


4. व्यापक शिक्षा सुधार बनाम पेपर लीक

कांग्रेस के कुछ नेताओं का तर्क है कि यह आंदोलन मुख्यतः पेपर लीक, मेरिट और परीक्षा संबंधी अनियमितताओं पर केंद्रित है।

जबकि राहुल गांधी शिक्षा व्यवस्था में व्यापक संरचनात्मक बदलाव की बात कर रहे हैं।

यानी दोनों के एजेंडे में समानता होने के बावजूद प्राथमिकताओं में अंतर दिखाई देता है।


इसी बीच अरविंद केजरीवाल की एंट्री

जब विपक्ष के भीतर यह बहस चल रही थी, उसी दौरान आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भी जंतर-मंतर जाने की घोषणा कर दी।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि युवाओं के मुद्दे पर कोई भी राजनीतिक दल पीछे नहीं रहना चाहता।

ऐसे में जंतर-मंतर अब केवल छात्र आंदोलन का मंच नहीं, बल्कि विपक्षी राजनीति का शक्ति प्रदर्शन भी बनता जा रहा है।


सोशल मीडिया पर कांग्रेस की घेराबंदी

जैसे-जैसे कांग्रेस की दूरी चर्चा का विषय बनी, सोशल मीडिया पर पार्टी की आलोचना शुरू हो गई।

कई यूजर्स ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि वह युवाओं के मुद्दे पर चयनात्मक राजनीति कर रही है।

इसके बाद गुजरात कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष जिग्नेश मेवानी ने विस्तृत बयान जारी किया।

उन्होंने कहा—

"जब सोनम वांगचुक जी जैसा व्यक्ति, जो वास्तविक शैक्षिक नवाचार के लिए जाना जाता है, लाखों बच्चों का भविष्य बर्बाद करने वाली अनियमितताओं के खिलाफ भूख हड़ताल पर बैठता है, तो यह निश्चित ही चिंताजनक है। कांग्रेस उनके साथ खड़ी है। लेकिन यह कहना गलत है कि हमने इसे नजरअंदाज किया। कांग्रेस के किसी नेता ने कभी इन युवाओं पर उंगली नहीं उठाई कि वे हमारे छात्र संगठनों (NSUI और IYC) के प्रदर्शनों का समर्थन क्यों नहीं कर रहे। यह दुख को तमाशा बनाए बिना एक निरंतर एकजुटता है। कांग्रेस भाजपा की तरह नहीं है और न ही चुनावों में आम आदमी पार्टी की तरह चयनात्मक रुख अपनाती है। हम सबके अधिकारों के लिए लड़ते हैं।"

https://politicsinsightindia.com/new/india-us-trade-deal-farmers-warning

यह बयान कांग्रेस की आधिकारिक सोच को स्पष्ट करने का प्रयास माना गया।


CJP का पलटवार

उधर CJP के प्रवक्ता सौरव दास ने राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को भेजे गए पत्रों की सूची सार्वजनिक कर दी।

उन्होंने लिखा—

"कई नेता जंतर-मंतर आए। कई नेताओं ने चर्चा के लिए बुलाया। लेकिन हमें अभी भी कई बड़े नेताओं के जवाब का इंतजार है। हम एक बार फिर अपील करते हैं कि राजनीति को एक तरफ रखकर युवाओं की आवाज में अपनी आवाज मिलाएं।"

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इस बयान ने सोशल मीडिया पर नई बहस छेड़ दी।


यह आंदोलन केवल पेपर लीक का नहीं

यदि पूरे आंदोलन को व्यापक संदर्भ में देखा जाए तो यह केवल परीक्षा घोटालों का विरोध नहीं है।

यह उन करोड़ों युवाओं की निराशा का प्रतीक है जो वर्षों की तैयारी के बाद भी—

जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं।

हर रद्द हुई परीक्षा केवल एक प्रश्नपत्र नहीं, बल्कि लाखों परिवारों की उम्मीदों पर भी असर डालती है।


राजनीति बनाम युवाओं की अपेक्षाएं

भारतीय लोकतंत्र में बड़े जनआंदोलनों के साथ राजनीति का जुड़ना नई बात नहीं है।

लेकिन आज का युवा केवल राजनीतिक बयान नहीं चाहता।

वह चाहता है—

यही कारण है कि जंतर-मंतर का यह आंदोलन केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रहा।

इसकी चर्चा सोशल मीडिया से लेकर विश्वविद्यालय परिसरों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे लाखों विद्यार्थियों के बीच हो रही है।


विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती

इस पूरे घटनाक्रम ने विपक्ष के सामने एक कठिन सवाल खड़ा कर दिया है।

क्या विपक्ष युवाओं के मुद्दे पर साझा रणनीति बना पाएगा?

या फिर हर दल अपना अलग राजनीतिक मंच तैयार करता रहेगा?

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यदि विपक्ष इस आंदोलन को नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा में बदल देता है तो इसका सबसे बड़ा नुकसान उसी युवा वर्ग को होगा जिसके नाम पर यह आंदोलन चल रहा है।


सरकार के सामने भी कम चुनौती नहीं

दूसरी ओर केंद्र सरकार पर भी लगातार दबाव बढ़ रहा है।

यदि छात्रों की स्वास्थ्य स्थिति लगातार बिगड़ती है तो यह केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि मानवीय मुद्दा भी बन जाएगा।

सरकार के सामने दोहरी चुनौती है—


जंतर-मंतर का असली इम्तिहान

केंद्रीय शिक्षा मंत्री इस्तीफा देंगे या नहीं, शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार कब होंगे और आंदोलन किस दिशा में जाएगा—इन सवालों का जवाब आने वाला समय देगा।

लेकिन एक बात अभी से स्पष्ट दिखाई देती है।

जंतर-मंतर पर चल रहा यह आंदोलन केवल सरकार का इम्तिहान नहीं ले रहा।

यह विपक्ष की एकजुटता, राजनीतिक दलों की प्राथमिकताओं, सोशल मीडिया की ताकत और लोकतंत्र में युवाओं की भूमिका—सभी का एक साथ परीक्षण कर रहा है।

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आज जंतर-मंतर पर बैठे छात्र केवल किसी एक दल का समर्थन नहीं मांग रहे।

उनकी मांग कहीं अधिक सरल और लोकतांत्रिक है—

"राजनीति छोड़िए, युवाओं की सुनिए।"

यदि यह संदेश राजनीतिक दलों तक ईमानदारी से पहुंचता है, तो संभव है कि यह आंदोलन केवल एक विरोध प्रदर्शन बनकर न रह जाए, बल्कि भारत की शिक्षा व्यवस्था में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो।


निष्कर्ष

जंतर-मंतर की तपती सड़क पर बैठा हर छात्र केवल अपना भविष्य नहीं, बल्कि देश की शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता का सवाल उठा रहा है। विपक्षी दलों के बीच नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा, कांग्रेस की रणनीतिक दूरी, सहयोगी दलों का दबाव, आम आदमी पार्टी की सक्रियता और सोशल मीडिया पर चल रही बहसें इस आंदोलन को और अधिक राजनीतिक बना रही हैं। लेकिन इन सबके बीच सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि लाखों युवाओं की चिंता आज भी वही है—क्या मेहनत का सम्मान होगा? क्या परीक्षाएं निष्पक्ष होंगी? क्या व्यवस्था पर भरोसा लौटेगा?

यही वह प्रश्न हैं जिनका उत्तर केवल राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि ठोस नीतिगत सुधारों, पारदर्शी परीक्षा प्रणाली और जवाबदेही से मिलेगा। फिलहाल जंतर-मंतर पर बैठे युवाओं की आवाज देशभर में गूंज रही है, यही कारण है कि इस आंदोलन ने जंतर-मंतर की तपिश के बीच विपक्षी एकजुटता का एक नया 'इम्तिहान' जरूर ले लिया है। अब देखना यह होगा कि क्या राहुल गांधी अपने सहयोगियों और सोशल मीडिया के इस चौतरफा दबाव के आगे झुककर जंतर-मंतर के तंबू का रुख करते हैं, या फिर अपनी 'छात्रों की गूंज' के सहारे इस सियासी पिच पर अकेले ही बैटिंग करना पसंद करते हैं। देश के युवा एक ही आगाह है —

"युवाओं के भविष्य को राजनीति का मैदान मत बनाइए, उसे राष्ट्र निर्माण का आधार बनाइए।"

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