खाड़ी में बढ़ता तनाव: क्या एक और युद्ध की पटकथा लिखी जा रही है?
UAE के Barakah Nuclear Plant पर हुए drone attack और Saudi Arabia द्वारा कई drones intercept करने के दावों ने पूरे Gulf region में तनाव बढ़ा दिया है। UAE और Saudi ने Iran या उसके proxies पर शक जताया है, जबकि Iran ने Gulf देशों को America का साथ न देने की चेतावनी दी है। इसी बीच US administration military options पर चर्चा कर रहा है। लेकिन अभी तक किसी international investigation agency ने किसी को officially जिम्मेदार नहीं ठहराया है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह सिर्फ security threat है या फिर regional politics और strategic pressure बनाने का हिस्सा भी हो सकता है। Editorial में यही सवाल उठाया गया है कि क्या Middle East फिर से fear narrative और geopolitical games की तरफ बढ़ रहा है, जैसा पहले Iraq war समेत कई मामलों में देखा गया था।
पश्चिम एशिया एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है, जहाँ हर ड्रोन हमला, हर सैन्य बयान और हर कूटनीतिक चेतावनी बड़े संघर्ष की प्रस्तावना जैसा लगने लगा है। संयुक्त अरब अमीरात के Barakah Nuclear Power Plant के बाहरी क्षेत्र में ड्रोन हमले और उसके बाद लगी आग ने पूरे क्षेत्र में सुरक्षा और राजनीति दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यूएई और Saudi Arabia ने इस घटनाक्रम के पीछे ईरान या उसके प्रॉक्सी समूहों की ओर इशारा किया है, जबकि Iran ने उल्टा खाड़ी देशों को अमेरिका के साथ खड़े होने के खिलाफ चेतावनी दी है। United States में भी सैन्य विकल्पों पर चर्चा की खबरें सामने आ रही हैं। (Reuters)
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लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह केवल सुरक्षा संकट है, या फिर क्षेत्रीय राजनीति का एक बड़ा खेल भी हो सकता है?
ड्रोन हमला वास्तविक था, यह बात कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों और यूएई के आधिकारिक बयानों से पुष्ट होती है। यूएई के अनुसार तीन ड्रोन उसकी सीमा में दाखिल हुए, जिनमें से दो को इंटरसेप्ट कर लिया गया जबकि तीसरा बाराकाह प्लांट के बाहरी हिस्से में लगे एक इलेक्ट्रिकल जनरेटर से टकराया। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी यानी International Atomic Energy Agency ने कहा कि रेडिएशन स्तर सामान्य रहे और परमाणु सुरक्षा प्रणाली प्रभावित नहीं हुई। (Reuters)
लेकिन अभी तक किसी स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच एजेंसी ने आधिकारिक रूप से यह नहीं कहा है कि हमला किसने किया। यही वह बिंदु है जहाँ से राजनीति शुरू होती है।
इतिहास बताता है कि पश्चिम एशिया में “खतरे” का इस्तेमाल केवल सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि रणनीतिक उद्देश्यों के लिए भी किया जाता रहा है। इराक युद्ध से पहले “Weapons of Mass Destruction” का नैरेटिव बनाया गया था, जो बाद में झूठा साबित हुआ। सीरिया में कई घटनाओं पर आज भी बहस जारी है। खाड़ी क्षेत्र में तेल टैंकरों पर हुए कुछ हमलों को लेकर भी वर्षों तक अलग-अलग दावे सामने आते रहे। इसलिए यदि आज कोई यह सवाल उठाता है कि कहीं मौजूदा घटनाओं का इस्तेमाल व्यापक सैन्य या राजनीतिक समर्थन जुटाने के लिए तो नहीं हो रहा, तो यह सवाल पूरी तरह अनुचित नहीं कहा जा सकता।
यूएई और सऊदी अरब पिछले कुछ वर्षों में क्षेत्रीय शक्ति संतुलन की राजनीति में अधिक सक्रिय हुए हैं। यमन युद्ध, लाल सागर की सुरक्षा, ईरान विरोधी सुरक्षा गठबंधनों और अमेरिका-इजराइल के साथ रणनीतिक सहयोग ने उन्हें सीधे क्षेत्रीय संघर्षों के केंद्र में ला खड़ा किया है। कई विश्लेषकों का मानना है कि खाड़ी देश अब केवल आर्थिक शक्ति नहीं, बल्कि सैन्य और भू-राजनीतिक शक्ति के रूप में भी अपनी भूमिका स्थापित करना चाहते हैं।
ऐसे में अगर किसी सुरक्षा घटना के बाद तुरंत ईरान या उसके प्रॉक्सी समूहों की ओर इशारा किया जाता है, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठेगा कि क्या जांच पूरी होने से पहले राजनीतिक निष्कर्ष निकालना उचित है?
दूसरी ओर, यह भी सच है कि ईरान समर्थित समूहों पर पहले भी खाड़ी क्षेत्र में ड्रोन और मिसाइल हमलों के आरोप लगते रहे हैं। यमन के हूती समूहों द्वारा सऊदी तेल प्रतिष्ठानों पर हमले इसकी मिसाल हैं। अमेरिकी और खाड़ी देशों की खुफिया रिपोर्टें लंबे समय से दावा करती रही हैं कि ईरान अपने प्रॉक्सी नेटवर्क के जरिए क्षेत्रीय दबाव बनाता है। इसलिए ईरान पर संदेह पूरी तरह आधारहीन भी नहीं कहा जा सकता। लेकिन संदेह और प्रमाण — दोनों अलग चीजें हैं।
यही वह महीन रेखा है, जिसे आज की राजनीति धुंधला कर रही है।
अमेरिका की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। रिपोर्टें बताती हैं कि वॉशिंगटन में सैन्य विकल्पों पर चर्चा चल रही है और ईरान पर दबाव बढ़ाया जा रहा है। (New York Post) सवाल यह है कि क्या अमेरिका वास्तव में क्षेत्रीय स्थिरता चाहता है, या वह अपनी रणनीतिक उपस्थिति बनाए रखने के लिए “स्थायी खतरे” की राजनीति को उपयोगी मानता है? पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी दशकों से “सुरक्षा” के नाम पर बनी हुई है। यदि खतरा खत्म हो जाए, तो क्या अमेरिकी प्रभाव भी कमज़ोर पड़ जाएगा? यह प्रश्न अंतरराष्ट्रीय राजनीति के छात्रों और विशेषज्ञों दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।
इसी तरह खाड़ी देशों के लिए भी सुरक्षा संकट कभी-कभी घरेलू और क्षेत्रीय राजनीति को मजबूत करने का माध्यम बन जाता है। बाहरी खतरे का माहौल राष्ट्रीय एकजुटता पैदा करता है, रक्षा खर्च को जायज ठहराता है और पश्चिमी सहयोग को मजबूत करता है। इसलिए जब भी कोई बड़ा हमला होता है, तो उसके सैन्य पहलू के साथ-साथ राजनीतिक लाभ-हानि का विश्लेषण भी जरूरी हो जाता है।
मीडिया की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। कई अंतरराष्ट्रीय चैनल और अखबार बिना स्वतंत्र जांच के तुरंत “ईरान समर्थित हमला” जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने लगते हैं। इससे जनता के मन में पहले ही एक दोषी तय हो जाता है। बाद में यदि सच्चाई कुछ और निकले, तब तक राजनीतिक नैरेटिव अपना काम कर चुका होता है। यही कारण है कि किसी भी संघर्ष क्षेत्र में मीडिया रिपोर्टिंग को आलोचनात्मक नजर से पढ़ना आवश्यक है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चिंताजनक पहलू परमाणु प्रतिष्ठानों की सुरक्षा है। बाराकाह प्लांट अरब दुनिया का पहला सक्रिय परमाणु ऊर्जा संयंत्र है। यदि भविष्य में किसी बड़े हमले में परमाणु ढांचा प्रभावित होता है, तो उसका असर केवल यूएई तक सीमित नहीं रहेगा। पूरा खाड़ी क्षेत्र, समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इसलिए किसी भी पक्ष द्वारा परमाणु ढांचों को राजनीतिक संदेश देने के उपकरण के रूप में इस्तेमाल करना बेहद खतरनाक होगा।
भारत के लिए भी यह संकट केवल दूर की खबर नहीं है। भारत की ऊर्जा सुरक्षा, खाड़ी देशों में काम करने वाले लाखों भारतीय नागरिक और समुद्री व्यापार इस क्षेत्र की स्थिरता पर निर्भर करते हैं। यदि अमेरिका, ईरान और खाड़ी देशों के बीच टकराव बढ़ता है, तो तेल कीमतों से लेकर भारतीय अर्थव्यवस्था तक सब प्रभावित हो सकता है। भारत लंबे समय से संतुलित नीति अपनाने की कोशिश करता रहा है — एक तरफ अमेरिका और खाड़ी देशों से रणनीतिक संबंध, दूसरी तरफ ईरान के साथ ऐतिहासिक और आर्थिक संबंध। लेकिन यदि क्षेत्र दो स्पष्ट खेमों में बंटता है, तो भारत के लिए संतुलन बनाए रखना कठिन हो जाएगा।
इसलिए भारत सहित अंतरराष्ट्रीय समुदाय को जल्दबाजी में किसी पक्ष का समर्थन करने के बजाय स्वतंत्र जांच और कूटनीतिक समाधान पर जोर देना चाहिए। हर ड्रोन हमला युद्ध का औचित्य नहीं बन सकता। हर सुरक्षा घटना को तुरंत “अच्छाई बनाम बुराई” के फ्रेम में डालना भी खतरनाक है।
आज सबसे जरूरी है सवाल पूछना।
क्या जांच पूरी होने से पहले आरोप तय करना उचित है?
क्या सुरक्षा खतरे का इस्तेमाल राजनीतिक समर्थन जुटाने के लिए किया जा रहा है?
क्या पश्चिम एशिया फिर उसी रास्ते पर बढ़ रहा है जहाँ युद्ध पहले तय होता है और सबूत बाद में खोजे जाते हैं?
क्या क्षेत्रीय शक्तियाँ अपने रणनीतिक हितों के लिए भय का माहौल बना रही हैं?
और सबसे महत्वपूर्ण — क्या दुनिया ने इराक युद्ध से कोई सबक सीखा भी है?
इन सवालों के स्पष्ट जवाब शायद अभी किसी के पास नहीं हैं। लेकिन लोकतांत्रिक समाजों में सबसे खतरनाक स्थिति वही होती है, जब सवाल पूछना बंद हो जाए और केवल आधिकारिक नैरेटिव ही “सत्य” घोषित कर दिया जाए।
पश्चिम एशिया पहले ही दशकों के युद्ध, प्रतिबंधों और प्रॉक्सी संघर्षों से थका हुआ है। यदि हर घटना को व्यापक सैन्य टकराव की सीढ़ी बना दिया गया, तो इसका नुकसान केवल ईरान, यूएई या अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक शांति पर पड़ेगा।
इसलिए आज आवश्यकता युद्धोन्माद की नहीं, बल्कि पारदर्शिता, स्वतंत्र जांच और संयम की है। क्योंकि इतिहास गवाह है — कई बार युद्ध गोलियों से नहीं, बल्कि अधूरे तथ्यों और भय के माहौल से शुरू होते हैं।
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