आरक्षण हटाओ की गूँज के बीच मेरिट का सबसे बड़ा झूठ! आरक्षित सीटो पर अनारक्षितो का कब्ज़ा, IIT-IIM के बंद दरवाजों का चौंकाने वाला सच,

देश में 'मेरिट' बनाम आरक्षण की बहस के बीच यह लेख IIT, IIM और अन्य शीर्ष संस्थानों में फैकल्टी भर्ती, 'Not Found Suitable' (NFS), बैकलॉग पदों और प्रतिनिधित्व से जुड़े सवालों की पड़ताल करता है। क्या मेरिट का दावा और वास्तविक आंकड़े एक-दूसरे से मेल खाते हैं? पढ़िए विस्तृत विश्लेषण।

आरक्षण हटाओ की गूँज के बीच मेरिट का सबसे बड़ा झूठ! आरक्षित सीटो पर अनारक्षितो का कब्ज़ा, IIT-IIM के बंद दरवाजों का चौंकाने वाला सच,

लेखिका- निमिषा सिंह

इन दिनों देश की सड़कों और सोशल मीडिया के पन्नों पर एक नया शोर बहुत तेजी से गूंज रहा है— 'आरक्षण हटाओ आंदोलन'। बैनर लिए युवाओं की भीड़ और इंटरनेट पर वायरल होते अनगिनत संदेश एक ही बात चीख-चीख कर कह रहे हैं कि आरक्षण ने देश की 'मेरिट' (मेधा) की हत्या कर दी है। कहा जा रहा है कि अगर देश को बचाना है, तो इस व्यवस्था को खत्म करना होगा। लेकिन जब हम इस आंदोलन के शोर से दूर, सत्ता और शिक्षा के शीर्ष गलियारों में पसरे सन्नाटे को सुनते हैं, तो एक बहुत ही भयानक और क्रूर सच्चाई सामने आती है।

 पॉलिटिक्स इनसाइट इंडिया के इस पेज के माध्यम से आज यह पूछना बेहद जरूरी है कि आखिर यह आंदोलन किस आरक्षण को हटाने की मांग कर रहा है? अगर वाकई आरक्षित वर्ग सारा हक ले उड़ रहा है, तो फिर देश की नीतियां गढ़ने वाले, हमारी पीढ़ियों का भविष्य तय करने वाले शीर्ष संस्थानों में इतना भयानक सन्नाटा क्यों है?

 जब हम इस सन्नाटे को चीरकर भीतर झांकते हैं, तो हमें वहां कोई 'मेरिट' का बोर्ड टंगा नहीं मिलता, बल्कि वहां मिलता है एक 'शून्य'। यह शून्य कोई गणित का आंकड़ा भर नहीं है। यह शून्य उन करोड़ों आंखों का छला जाना है, जो संविधान से उम्मीद लगाए बैठी थीं।

 इस शून्य की जड़ों को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। 1990 के दशक में जब मंडल आयोग की सिफारिशें लागू हुईं, तब पहली बार देश की सड़कों पर 'मेरिट' के नाम पर आग लगाई गई थी। उसी दौर में यह नैरेटिव गढ़ा गया कि 'आरक्षण पाने वाला हर व्यक्ति अयोग्य है, और सामान्य वर्ग मेरिट का इकलौता मालिक है।' आज 35 साल बाद, वह नैरेटिव व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी और मीम्स के जरिए और भी जहरीला हो चुका है। सामाजिक पूंजी अंग्रेजी माध्यम की महंगी शिक्षा, और पीढ़ीगत संपत्ति से हासिल किए गए विशेषाधिकार को बड़ी चालाकी से 'मेरिट' का नाम दे दिया गया है।

जरा इस विडंबना को समझिए। जो लोग 'आरक्षण हटाओ' का नारा बुलंद कर रहे हैं, वे इस बात पर आंखें मूंद लेते हैं कि आईआईटी कानपुर में प्रोफेसर के 257 पदों में से 254 पर सिर्फ अनारक्षित वर्ग का कब्जा है। अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के प्रोफेसरों की संख्या वहां 'शून्य' है। आईआईटी मद्रास से लेकर दिल्ली तक, और आईआईएम इंदौर तक हर जगह यही तिलिस्म पसरा है। देश के इन शीर्ष संस्थानों में 90 प्रतिशत से अधिक पदों पर एक ही पृष्ठभूमि के मठाधीश बैठे हैं। तो फिर मेरिट खतरे में कहां है? जहां फैसले लिए जाते हैं, जहां नीतियां बनती हैं, वहां तो 98 प्रतिशत से ज्यादा पदों पर वही लोग बैठे हैं जो खुद को मेरिट का इकलौता वारिस मानते हैं। जब चयन समितियों और बोर्ड रूम में यह एकाधिकार कायम किया जा रहा होता है, तब कोई हैशटैग ट्रेंड नहीं करता। तब किसी प्राइम टाइम टीवी डिबेट में युवाओं को नहीं लड़ाया जाता।

 तर्क दिया जाता है कि 'योग्य उम्मीदवार' नहीं मिलते। यह सदी का सबसे क्रूर और खोखला मजाक है। अगर योग्य उम्मीदवार नहीं हैं, तो असिस्टेंट प्रोफेसर (एंट्री लेवल) के पदों पर वे कैसे पहुंच रहे हैं? आईआईटी कानपुर में ही 17 एससी और 4 एसटी असिस्टेंट प्रोफेसर मौजूद हैं। तो फिर प्रोफेसर की कुर्सी तक पहुंचते-पहुंचते वे हवा में कैसे विलुप्त हो जाते हैं? सच्चाई यह है कि योग्यता की कोई कमी नहीं है, बल्कि उस 'छलनी' में खोट है जो जानबूझकर ऐसे बुनी गई है कि कोई भी वंचित वर्ग का व्यक्ति सत्ता और नीति-निर्माण के केंद्र तक न पहुंच सके।

 यहां एक और बड़ा घोटाला पूरी शांति से चल रहा है, जिसे देश से छिपाया जाता है— बैकलॉग पदों का खेल। जब किसी संस्थान में आरक्षित वर्ग की कोई सीट खाली होती है, तो उसे महीनों या सालों तक यह कहकर खाली रखा जाता है कि 'योग्य उम्मीदवार नहीं मिले'। जब ये बैकलॉग पद पहाड़ जितने बड़े हो जाते हैं, तब संस्थान के मठाधीश 'संस्थान का काम बाधित हो रहा है' का तर्क देकर उन पदों पर 'एड-हॉक' (अस्थायी) या 'गेस्ट फैकल्टी' की भर्ती कर लेते हैं। और ये गेस्ट फैकल्टी कौन होते हैं? ये उन्हीं मठाधीशों के सगे-संबंधी, उनके चहेते छात्र या उनकी ही जाति-बिरादरी के लोग होते हैं। यानी जो सीट संवैधानिक रूप से एक दलित, आदिवासी या पिछड़े का अधिकार थी, उसे पिछले दरवाजे से एक खास वर्ग ने हथिया लिया।

 भर्ती के निचले स्तर पर एक खाली थाली के लिए दो बेरोजगार युवाओं को आपस में लड़ा दिया जाता है, और वहीं से 'आरक्षण हटाओ' जैसे आंदोलनों की आग भड़काई जाती है। लेकिन असली थाली, जिसमें मलाई है, वह तो बिना किसी शोर-शराबे के पहले ही बांटी जा चुकी है।

 दरअसल, 'आरक्षण हटाओ' का यह मौजूदा आंदोलन समानता की मांग नहीं है; यह एक गहराता हुआ डर है। यह डर है उस 'पावर शेयरिंग' (सत्ता की साझेदारी) का, जो धीमी गति से ही सही, लेकिन अब निचले तबके से उठकर ऊपर की ओर आ रही है। व्यवस्था को अयोग्यता से कोई नफरत नहीं है। उसे असल नफरत वंचितों के उस आत्मविश्वास से है जो अब संस्थानों के बंद दरवाजे खटखटा रहा है।

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 और जब इन बंद दरवाजों को खटखटाया जाता है, तो भीतर बैठे लोग 'फ्लेक्सिबल कैडर' का बहाना बनाकर 'नॉट फाउंड सूटेबल' (NFS - योग्य नहीं पाए गए) का ठप्पा लगा देते हैं। आईआईटी (IIT) बॉम्बे के आंकड़े गवाही देते हैं कि पिछले 8 सालों में 5 विभागों में एक भी एसटी (ST) उम्मीदवार को पीएचडी (PhD) में दाखिला नहीं मिला, जबकि योग्य आवेदन आते रहे। यह कोई योग्यता की कमी की कहानी नहीं है। यह उस चयन प्रक्रिया की कहानी है जो जानबूझकर निचली सीढ़ी (पीएचडी) पर ही दरवाजे बंद कर देती है, ताकि कोई वंचित प्रोफेसर बनने की कतार में ही न खड़ा हो सके।

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 अब सोचिए, अगर इतनी मोटी और क्रूर दीवारों को फांदकर, तमाम सामाजिक और आर्थिक बाधाओं को तोड़कर, कोई दलित या आदिवासी छात्र इन संस्थानों (IIT, IIM, मेडिकल कॉलेजों) में पहुंच भी जाता है, तो उसके साथ क्या होता है? वहां उसे 'मेरिट' का ताना देकर इस कदर मानसिक रूप से तोड़ा जाता है कि उसकी हिम्मत जवाब दे जाती है। रोहित वेमुला, डॉ. पायल तड़वी और दर्शन सोलंकी कोई साधारण आत्महत्याएं नहीं थीं; ये इस व्यवस्था द्वारा की गई संस्थागत हत्याएं थीं। उनसे उनका नाम नहीं, उनका रैंक पूछा जाता है। उन्हें अहसास कराया जाता है कि वे उस जगह के लायक नहीं हैं। व्यवस्था पहले तो उन्हें घुसने नहीं देती, और अगर वे घुस जाएं, तो उन्हें जिंदा नहीं छोड़ना चाहती।

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 यह सन्नाटा और यह एकाधिकार सिर्फ नौकरियों तक सीमित नहीं है, यह देश की प्रगति को रोक रहा है। सोचिए, जब देश के सबसे बड़े शोध संस्थानों में 98 प्रतिशत लोग एक ही संभ्रांत पृष्ठभूमि से आएंगे, तो वे शोध किस विषय पर करेंगे? क्या वे सिर पर मैला ढोने की प्रथा को खत्म करने वाली मशीन बनाने पर शोध करेंगे? क्या वे आदिवासियों में फैलने वाली सिकल सेल एनीमिया बीमारी पर शोध करेंगे? क्या वे किसानों की जमीन और एमएसपी (MSP) के संकट पर नीतियां बनाएंगे? नहीं। ज्ञान के उत्पादन पर जब एक ही वर्ग का कब्जा होता है, तो नीतियां और शोध 85 प्रतिशत आबादी की जमीनी सच्चाई से पूरी तरह कट जाते हैं। देश इसलिए पिछड़ता है क्योंकि मेरिट के नाम पर हमने देश के बहुसंख्यक मस्तिष्क को सोचने और गढ़ने की प्रक्रिया से बाहर कर दिया है

 यह सन्नाटा और यह एकाधिकार अब सिर्फ देश की सीमाओं तक सीमित नहीं है। जनवरी 2025 में अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक जर्नल 'नेचर' (Nature) ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसने दुनिया के सामने इस व्यवस्था को बेनकाब कर दिया। रिपोर्ट बताती है कि देश के टॉप 5 IITs में 98 प्रतिशत फैकल्टी एक ही पृष्ठभूमि (अपर कास्ट) से आती है। दुनिया देख रही है कि भारत के नीति-निर्माण और शोध के केंद्रों में किस तरह एक खास वर्ग ने अपना एकाधिकार जमा रखा है।

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 इसलिए, जो युवा आज सड़कों पर 'आरक्षण हटाओ' के बैनर लिए खड़े हैं, उन्हें यह समझना होगा कि उनकी लड़ाई उन लोगों से नहीं है जो निचले स्तर की नौकरियों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जब तक हम निचले स्तर की भर्तियों में उलझकर सड़कों पर एक-दूसरे से लड़ते रहेंगे, तब तक शीर्ष पर बैठी यह मोनोपोली हमारा तमाशा देखती रहेगी। एक जागरूक समाज के तौर पर यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम इस भ्रमजाल को तोड़ें। सड़कों पर भिड़ने के बजाय, मात्र ₹10 की फीस में 'आरटीआई ऑनलाइन पोर्टल' पर जाइए और इन केंद्रीय संस्थानों से फैकल्टी रोस्टर की जानकारी मांगिए। मठाधीशों से सवाल पूछिए। सिस्टम तभी डरता है जब नागरिक सवाल पूछना बंद नहीं करते, क्योंकि जिस दिन समाज सवाल पूछना बंद कर देता है, उसी दिन व्यवस्था उसे नागरिक से घटाकर महज एक 'ग्राहक' बना देती है।

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