चीन ने जीत ली दुनिया, भारत सरकार ने बंगाल का चुनाव, ध्रुवीकरण की राजनीति
भारत आज बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में एक रणनीतिक दुविधा का सामना कर रहा है। चीन तेजी से वैश्विक शक्ति के रूप में उभर रहा है और रूस, अमेरिका तथा पश्चिम एशिया के देशों के साथ अपने संबंध मजबूत कर रहा है, जबकि भारत BRICS और QUAD दोनों मंचों पर होने के बावजूद निर्णायक प्रभाव स्थापित नहीं कर पाया है। रूस का चीन की ओर झुकाव, अमेरिका के साथ असमान व्यापारिक संबंध, ईरान से बढ़ती दूरी और पड़ोसी देशों में घटता प्रभाव भारतीय विदेश नीति की कमजोरियों को उजागर करते हैं। लेख यह तर्क देता है कि भारत की कूटनीति दीर्घकालिक रणनीतिक दृष्टि के बजाय घरेलू राजनीति और छवि निर्माण में अधिक उलझी हुई दिखाई देती है। यदि भारत को भविष्य में वैश्विक शक्ति बनना है, तो उसे केवल नारों से आगे बढ़कर तकनीक, शिक्षा, औद्योगिक विकास, पड़ोसी संबंधों और संस्थागत मजबूती पर गंभीर निवेश करना होगा।
बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में भारत की विदेश नीति: क्या भारत रणनीतिक अवसर खो रहा है?
दुनिया तेजी से बदल रही है। शीत युद्ध के बाद जिस एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था में अमेरिका केंद्र में था, वह अब धीरे-धीरे बहुध्रुवीय शक्ति-संतुलन की ओर बढ़ रही है। चीन, रूस, अमेरिका, यूरोपीय संघ, खाड़ी देश और क्षेत्रीय शक्तियाँ अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र को मजबूत करने में लगी हैं। ऐसे समय में भारत, जो कभी गुटनिरपेक्ष आंदोलन का अग्रणी चेहरा था, आज एक अस्पष्ट और प्रतिक्रियावादी विदेश नीति के साथ दिखाई देता है।
हाल के घटनाक्रमों ने इस चिंता को और गहरा किया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की चीन यात्रा के तुरंत बाद रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का बीजिंग पहुँचना केवल एक राजनयिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह चीन की बढ़ती वैश्विक केंद्रीयता का प्रतीक था। चीन ने दुनिया को संदेश दिया कि वह एक साथ अमेरिका और रूस दोनों के साथ शक्ति-संतुलन साधने की स्थिति में है। दूसरी ओर भारत इस पूरी कूटनीतिक शतरंज में कहीं किनारे खड़ा दिखाई देता है।
भारत की विदेश नीति को लेकर सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या नई दिल्ली के पास कोई दीर्घकालिक रणनीतिक दृष्टि बची है, या पूरी ऊर्जा केवल घरेलू राजनीति, चुनावी ध्रुवीकरण और सत्ता प्रबंधन में खर्च हो रही है?
चीन का उदय और भारत की रणनीतिक असहजता
चीन आज केवल एक आर्थिक शक्ति नहीं है। वह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं, तकनीकी निवेश, बंदरगाहों, दुर्लभ खनिजों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वैश्विक व्यापार नेटवर्क पर पकड़ बना चुका है। बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के जरिए उसने एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में गहरी पैठ बना ली है। पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से लेकर श्रीलंका के हम्बनटोटा तक और अफ्रीका के जिबूती तक चीन की उपस्थिति लगातार बढ़ी है।
इसके विपरीत भारत https://politicsinsightindia.com/new/bharat-arthvyavastha-nijikaran-grameen-sankat अभी भी अपने पड़ोस में प्रभाव बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है। नेपाल, मालदीव, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे देशों में भारत-विरोधी राजनीतिक धाराएँ समय-समय पर मजबूत होती रही हैं। दक्षिण एशिया में भारत का पारंपरिक प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा।
भारत और चीन के संबंधों में तनाव नया नहीं है। 1962 का युद्ध भारतीय रणनीतिक चेतना पर आज भी एक गहरा घाव है। वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर लगातार तनाव, गलवान संघर्ष और अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन के दावे इस बात के संकेत हैं कि बीजिंग भारत को एक सीमित क्षेत्रीय शक्ति से अधिक महत्व देने को तैयार नहीं है।
भारत की चिंता केवल सीमा विवाद तक सीमित नहीं है। चीन की अर्थव्यवस्था भारत से कई गुना बड़ी है। वैश्विक विनिर्माण में उसका दबदबा है। तकनीक, सेमीकंडक्टर, हरित ऊर्जा और बुनियादी ढाँचे में उसका निवेश अभूतपूर्व है। भारत अभी भी बड़े पैमाने पर आयात-निर्भर औद्योगिक संरचना से बाहर नहीं निकल पाया है।
रूस: विश्वसनीय मित्र से चीन का रणनीतिक साझेदार
भारत की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण स्तंभ रूस रहा है। रक्षा क्षेत्र में दशकों से रूस भारत का सबसे बड़ा साझेदार रहा। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भी मॉस्को कई बार भारत के हितों के पक्ष में खड़ा दिखाई दिया। लेकिन यूक्रेन युद्ध के बाद रूस की अंतरराष्ट्रीय स्थिति बदल गई। पश्चिमी प्रतिबंधों ने उसे आर्थिक और तकनीकी रूप से चीन पर अधिक निर्भर बना दिया।
आज रूस और चीन के संबंध पहले से कहीं अधिक मजबूत दिखते हैं। ऊर्जा, सैन्य सहयोग और व्यापार के क्षेत्र में दोनों देशों की निकटता बढ़ी है। पुतिन की हालिया चीन यात्रा इसी वास्तविकता को पुष्ट करती है।
भारत इस बदलाव को देखते हुए भी कोई वैकल्पिक दीर्घकालिक रणनीति विकसित करता नहीं दिखता। रूस के साथ संबंध बनाए रखने और अमेरिका के करीब जाने के बीच भारत लगातार संतुलन साधने की कोशिश करता रहा है, लेकिन यह संतुलन अब कमजोर पड़ता दिखाई देता है।
रूस भारत का मित्र अवश्य है, लेकिन वह अपनी राष्ट्रीय आवश्यकताओं के आधार पर चीन के साथ खड़ा है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति भावनाओं से नहीं, हितों से संचालित होती है। भारत इस कठोर वास्तविकता को स्वीकार करने में अक्सर देर कर देता है।
अमेरिका के साथ संबंध: साझेदारी या असमान निर्भरता?
पिछले एक दशक में भारत-अमेरिका संबंधों को ऐतिहासिक बताया गया। QUAD, इंडो-पैसिफिक रणनीति, रक्षा समझौते और तकनीकी सहयोग को नई दिल्ली ने अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया। लेकिन क्या वास्तव में भारत को वह रणनीतिक लाभ मिला जिसकी उम्मीद की जा रही थी?
अमेरिका भारत को चीन https://politicsinsightindia.com/new/america-china-global-power-conflict-report-hindi के खिलाफ एक संतुलनकारी शक्ति के रूप में देखता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वॉशिंगटन भारत के आर्थिक हितों को प्राथमिकता देगा। अमेरिकी व्यापार नीति हमेशा अमेरिकी हितों से संचालित रही है। टैरिफ विवाद, वीजा प्रतिबंध, तकनीकी नियंत्रण और व्यापारिक दबाव इसके उदाहरण हैं।
हाल के वर्षों में भारत पर लगाए गए अमेरिकी https://politicsinsightindia.com/new/america-china-relations-and-india-analysis शुल्क और व्यापारिक दबाव ने यह स्पष्ट किया कि रणनीतिक साझेदारी के बावजूद आर्थिक संबंधों में बराबरी नहीं है। कई विश्लेषकों का मानना है कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौतों का झुकाव अक्सर अमेरिकी कंपनियों और बाजार हितों की ओर अधिक रहता है।
भारत के किसानों, छोटे व्यापारियों और विनिर्माण क्षेत्र के लिए यह चिंता का विषय है। यदि घरेलू उद्योग पर्याप्त रूप से प्रतिस्पर्धी नहीं बन पाए और बाजार लगातार विदेशी दबाव में खुलते गए, तो दीर्घकाल में भारतीय उत्पादन संरचना कमजोर हो सकती है।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या अमेरिका संकट की स्थिति में भारत के साथ उसी दृढ़ता से खड़ा होगा जैसी अपेक्षा भारत करता है? इतिहास इस पर स्पष्ट उत्तर नहीं देता।
BRICS और QUAD: भारत के लिए सीमित उपलब्धियाँ
भारत ने एक साथ कई मंचों पर सक्रिय रहने की रणनीति अपनाई। BRICS में वह चीन और रूस के साथ बैठता है, जबकि QUAD में अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ। सिद्धांत रूप में यह बहु-संतुलन की नीति हो सकती है, लेकिन व्यवहार में भारत दोनों मंचों से अपेक्षित रणनीतिक लाभ हासिल नहीं कर पाया।
BRICS https://politicsinsightindia.com/new/india-brics-global-power-shift में चीन की आर्थिक शक्ति इतनी विशाल है कि भारत की भूमिका सीमित दिखाई देती है। नई विकास बैंक जैसी संस्थाओं के बावजूद BRICS अभी तक पश्चिमी वित्तीय संस्थानों का प्रभावी विकल्प नहीं बन सका। दूसरी ओर QUAD अभी भी एक पूर्ण सैन्य या आर्थिक गठबंधन नहीं है। उसका ढाँचा अस्पष्ट और सीमित है।
भारत दोनों मंचों पर मौजूद तो है, लेकिन किसी में निर्णायक नेतृत्वकारी स्थिति में नहीं दिखता। यह स्थिति भारत की रणनीतिक अस्पष्टता को भी दर्शाती है।
पड़ोस नीति की चुनौतियाँ
किसी भी उभरती शक्ति की पहली कसौटी उसका पड़ोस होता है। भारत की पड़ोस नीति मिश्रित परिणाम देती है। नेपाल के साथ समय-समय पर तनाव, श्रीलंका में चीन की बढ़ती भूमिका, मालदीव में राजनीतिक उतार-चढ़ाव और बांग्लादेश के साथ जटिल मुद्दे यह संकेत देते हैं कि भारत अपने क्षेत्रीय प्रभाव को स्थिर रूप से बनाए रखने में संघर्ष कर रहा है।
पाकिस्तान के साथ संबंध लंबे समय से तनावपूर्ण हैं, लेकिन अब चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) भारत की रणनीतिक चिंताओं को और बढ़ाता है। चीन केवल पाकिस्तान का सहयोगी नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया में भारत के प्रभाव को संतुलित करने वाला सक्रिय खिलाड़ी बन चुका है।
भारत ने पड़ोसी देशों को अक्सर सुरक्षा दृष्टिकोण से अधिक देखा, जबकि चीन ने निवेश, ऋण, बुनियादी ढाँचे और व्यापार के जरिए अपनी पैठ बनाई। कई देशों के लिए चीन एक त्वरित निवेशक और निर्माण साझेदार के रूप में उभरा, जबकि भारत की परियोजनाएँ अक्सर धीमी गति और नौकरशाही बाधाओं से घिरी रहीं।
ईरान और पश्चिम एशिया: खोते हुए अवसर
ईरान भारत के लिए केवल ऊर्जा स्रोत नहीं था, बल्कि मध्य एशिया तक पहुँच का एक महत्वपूर्ण रणनीतिक द्वार भी था। चाबहार बंदरगाह परियोजना को भारत की बड़ी भू-राजनीतिक उपलब्धि माना गया था। लेकिन अमेरिकी दबाव और प्रतिबंधों के कारण भारत-ईरान संबंधों में ठंडापन आया।
इसी दौरान चीन ने ईरान के साथ दीर्घकालिक आर्थिक और रणनीतिक समझौतों को आगे बढ़ाया। पश्चिम एशिया में भी चीन की भूमिका धीरे-धीरे बढ़ रही है। सऊदी अरब और ईरान के बीच समझौते में बीजिंग की मध्यस्थता इसका बड़ा उदाहरण रही।
भारत पश्चिम एशिया में संतुलन बनाने की कोशिश तो करता है, लेकिन वह निर्णायक रणनीतिक उपस्थिति स्थापित नहीं कर पाया। ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री व्यापार मार्गों के संदर्भ में यह कमजोरी भविष्य में गंभीर प्रभाव डाल सकती है।
घरेलू राजनीति बनाम दीर्घकालिक रणनीति
किसी भी देश की विदेश नीति अंततः उसकी आंतरिक राजनीतिक प्राथमिकताओं से प्रभावित होती है। भारत में पिछले वर्षों में घरेलू राजनीति अत्यधिक चुनाव-केंद्रित और ध्रुवीकरण आधारित होती गई है। मीडिया विमर्श, राजनीतिक ऊर्जा और सरकारी प्रचार का बड़ा हिस्सा घरेलू मुद्दों, धार्मिक ध्रुवीकरण और चुनावी अभियानों में केंद्रित दिखाई देता है।
विदेश नीति को अक्सर जनसभाओं और इवेंट-आधारित कूटनीति तक सीमित कर दिया गया। बड़े-बड़े स्वागत समारोह, व्यक्तिगत नेतृत्व की छवि और सोशल मीडिया प्रचार ने वास्तविक रणनीतिक बहस की जगह ले ली।
दुनिया केवल छवि से प्रभावित नहीं होती। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में आर्थिक शक्ति, तकनीकी क्षमता, सैन्य आत्मनिर्भरता, संस्थागत स्थिरता और दीर्घकालिक रणनीतिक सोच निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
भारत आज भी अनुसंधान एवं विकास पर सीमित खर्च करता है। शिक्षा, स्वास्थ्य और तकनीकी नवाचार में अपेक्षित निवेश नहीं हुआ। विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी लंबे समय से स्थिर है। यदि घरेलू आर्थिक आधार मजबूत नहीं होगा, तो विदेश नीति भी सीमित ही रहेगी।
क्या भारत के पास दीर्घकालिक विजन है?
भारत की सबसे बड़ी समस्या शायद यही है कि उसके पास स्पष्ट दीर्घकालिक भू-राजनीतिक दृष्टि दिखाई नहीं देती। चीन ने दशकों पहले विनिर्माण, निर्यात, तकनीक और बुनियादी ढाँचे पर केंद्रित राष्ट्रीय रणनीति बनाई। अमेरिका अपनी वैश्विक सैन्य और तकनीकी श्रेष्ठता बनाए रखने में लगा है। रूस ऊर्जा और सुरक्षा राजनीति का उपयोग करता है।
भारत अक्सर प्रतिक्रियावादी नजर आता है। वह घटनाओं पर प्रतिक्रिया देता है, लेकिन उन्हें आकार देने की स्थिति में कम दिखाई देता है।
यदि भारत वास्तव में 21वीं सदी की महाशक्ति बनना चाहता है, तो केवल राष्ट्रवादी नारों से काम नहीं चलेगा। उसे शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, औद्योगिक उत्पादन, न्यायिक सुधार, संस्थागत मजबूती और पड़ोसी देशों के साथ भरोसेमंद संबंधों पर गंभीर निवेश करना होगा।
निष्कर्ष
बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था भारत के लिए खतरा भी है और अवसर भी। लेकिन अवसर केवल उन देशों को मिलता है जिनके पास स्पष्ट रणनीतिक दृष्टि, आर्थिक शक्ति और संस्थागत क्षमता होती है।
आज चीन आत्मविश्वास के साथ वैश्विक शक्ति-संतुलन को प्रभावित कर रहा है। रूस अपने हितों के लिए नए गठबंधन बना रहा है। अमेरिका अभी भी तकनीक और वित्तीय शक्ति में अग्रणी है।
भारत के पास जनसंख्या, बाजार, युवा शक्ति और लोकतांत्रिक ढाँचा जैसे बड़े लाभ हैं, लेकिन इन संभावनाओं को वास्तविक शक्ति में बदलने के लिए गंभीर नीतिगत परिवर्तन आवश्यक हैं।
यदि विदेश नीति केवल घरेलू राजनीतिक छवि निर्माण का साधन बनकर रह गई, यदि दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों की जगह अल्पकालिक चुनावी रणनीतियाँ लेती रहीं, और यदि आर्थिक-सामरिक आत्मनिर्भरता पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया, तो भारत वैश्विक शक्ति-संतुलन में एक निर्णायक खिलाड़ी बनने का अवसर खो सकता है।
फिर भी तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। भारत अभी भी अपनी दिशा बदल सकता है। इसके लिए आवश्यकता है — आलोचना सुनने की क्षमता, संस्थागत सुधार, पड़ोस में विश्वास निर्माण, तकनीकी निवेश, और ऐसी विदेश नीति की जो केवल प्रतिक्रियावादी नहीं बल्कि दूरदर्शी हो।
21वीं सदी केवल सैन्य शक्ति से नहीं जीती जाएगी। यह तकनीक, अर्थव्यवस्था, ज्ञान, आपूर्ति श्रृंखला, कूटनीतिक विश्वसनीयता और रणनीतिक धैर्य की सदी होगी। भारत को तय करना होगा कि वह इस नई विश्व व्यवस्था में दर्शक बने रहना चाहता है या वास्तविक शक्ति केंद्र बनना चाहता है।
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