जब खाकी के भीतर से उठी संवेदनशीलता की आवाज़: आईजी सीमा धुंडिया और लोकतांत्रिक पुलिसिंग का नया विमर्श- भाग- 2
जंतर-मंतर घटनाक्रम के बाद आईजी सीमा धुंडिया के हस्तक्षेप और 26 सुधारात्मक कदमों ने भारतीय पुलिसिंग, लोकतांत्रिक अधिकारों और संवेदनशील कानून-व्यवस्था पर नई बहस छेड़ दी। यह लेख संस्थागत सुधार, जवाबदेही और नागरिक अधिकारों के व्यापक संदर्भ का विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
लेखिका- निमिषा सिंह
इस निराशा, आक्रोश और लोकतांत्रिक मोहभंग के बीच जो सबसे महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक मोड़ आया, वह खाकी वर्दी के भीतर से उठा एक मजबूत प्रतिरोध था। रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) की महानिरीक्षक सीमा धुंडिया का सख्त हस्तक्षेप केवल एक वरिष्ठ अधिकारी की प्रशासनिक प्रतिक्रिया नहीं था, बल्कि उस सोच को चुनौती भी था जिसने वर्षों से भीड़ नियंत्रण को केवल बल प्रयोग का पर्याय बना दिया है।
जब वायरल वीडियो देशभर में चर्चा का विषय बने और सुरक्षा बलों के कुछ कर्मियों के व्यवहार पर गंभीर सवाल उठे, तब सीमा धुंडिया ने मामले को केवल अनुशासनात्मक उल्लंघन मानकर फाइलों में बंद नहीं किया। उन्होंने मैदान में मौजूद जवानों और उनके कमांडरों की जवाबदेही तय की, बल प्रयोग की समीक्षा कराई और भविष्य के लिए सुधारात्मक दिशा तय करने वाले कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। यह वही क्षण था जब पहली बार लगा कि व्यवस्था के भीतर भी आत्मसुधार की क्षमता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
यदि इस पूरे घटनाक्रम को केवल प्रशासनिक दृष्टि से देखा जाए, तो यह एक विभागीय कार्रवाई भर दिखाई दे सकती है। लेकिन यदि इसे सामाजिक, राजनीतिक और नारीवादी दृष्टिकोण से पढ़ा जाए, तो इसका अर्थ कहीं अधिक व्यापक हो जाता है।
एक नारीवादी चश्मे से देखें, तो सीमा धुंडिया का हस्तक्षेप उस पितृसत्तात्मक सुरक्षा ढांचे के भीतर एक सशक्त स्त्री नेतृत्व का सीधा हस्तक्षेप है। यह उस पारंपरिक पुलिसिंग मॉडल से अलग सोच का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें अक्सर कठोरता को दक्षता और हिंसा को नियंत्रण का सबसे प्रभावी माध्यम मान लिया जाता है।
भारतीय पुलिस व्यवस्था लंबे समय तक एक ऐसे ढाँचे में विकसित हुई है जहाँ "सख्ती" को ही सफलता का पर्याय बना दिया गया। भीड़ को नियंत्रित करना हो तो अधिक बल, विरोध को रोकना हो तो अधिक दबाव, और असहमति को शांत करना हो तो अधिक भय—यही सोच वर्षों से व्यवस्था का हिस्सा रही है। लेकिन सीमा धुंडिया का दृष्टिकोण इस स्थापित मानसिकता से अलग दिखाई देता है।
उनका 'सेंसिटिव पुलिसिंग' (Sensitive Policing) पर जोर केवल एक प्रशासनिक शब्द नहीं है। यह इस मूल विचार को सामने लाता है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने का अर्थ नागरिकों के अधिकारों को कुचलना नहीं है। लोकतंत्र में पुलिस की भूमिका केवल राज्य की शक्ति का प्रदर्शन करना नहीं, बल्कि नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना भी है।
यही कारण है कि उनके द्वारा उठाए गए सुधारात्मक कदमों को केवल विभागीय आदेश मानकर नहीं देखा जाना चाहिए। यह सुरक्षा व्यवस्था के भीतर उस मानवीय दृष्टिकोण की पुनर्स्थापना का प्रयास है, जो मानता है कि भीड़ के सामने खड़ा हर व्यक्ति अपराधी नहीं होता। प्रदर्शनकारी नागरिक हो सकते हैं, छात्र हो सकते हैं, किसान हो सकते हैं, महिलाएं हो सकती हैं, बुजुर्ग हो सकते हैं—और सबसे पहले वे संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का प्रयोग कर रहे नागरिक हैं।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे मार्मिक और दूरगामी पक्ष वह निर्देश है, जिसमें कश्मीर जैसे हाई-कॉन्फ्लिक्ट ज़ोन से आने वाले जवानों को बिना 'डी-सेंसिटाइजेशन' (Desensitisation) प्रशिक्षण के दिल्ली जैसे लोकतांत्रिक विरोध-स्थलों पर तैनात न करने की बात कही गई। यह निर्देश केवल प्रशासनिक पुनर्गठन नहीं है; यह हिंसा की मनोवैज्ञानिक प्रकृति को समझने का प्रयास भी है।
दरअसल, लंबे समय तक संघर्ष वाले क्षेत्रों में कार्य करने वाले सुरक्षा बलों की कार्यशैली स्वाभाविक रूप से अलग परिस्थितियों में विकसित होती है। वहाँ हर भीड़ संभावित खतरे के रूप में देखी जाती है। लेकिन लोकतांत्रिक राजधानी में वही दृष्टिकोण बिना किसी संवेदनशीलता प्रशिक्षण के लागू कर देना नागरिक अधिकारों और सुरक्षा व्यवस्था दोनों के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।
यहीं सीमा धुंडिया का दृष्टिकोण महत्वपूर्ण हो जाता है। उन्होंने यह स्वीकार किया कि दिल्ली जैसे लोकतांत्रिक विरोध-स्थलों के लिए अलग प्रकार की पुलिसिंग आवश्यक है। यह स्वीकार करना अपने आप में उस सोच से अलग है जो हर भीड़ को समान खतरे के रूप में देखती है।
नारीवादी विमर्श भी वर्षों से यही कहता आया है कि हिंसा केवल हथियारों से नहीं, बल्कि संस्थागत संस्कृतियों से भी संचालित होती है। यदि किसी व्यवस्था के भीतर लगातार कठोरता, आक्रामकता और दमन को ही सफलता का पैमाना बना दिया जाए, तो वही संस्कृति धीरे-धीरे हर परिस्थिति में लागू होने लगती है। इसलिए केवल नियम बदल देना पर्याप्त नहीं होता; सोच बदलनी पड़ती है।
यही कारण है कि सीमा धुंडिया का हस्तक्षेप केवल छात्रों के आंदोलन तक सीमित नहीं माना जाना चाहिए। यदि उनके द्वारा सुझाए गए सुधार गंभीरता से लागू किए जाते हैं, तो वे भविष्य के हर जनांदोलन, हर किसान आंदोलन, हर सामाजिक प्रदर्शन और हर लोकतांत्रिक विरोध के लिए एक नई कार्यसंस्कृति की नींव बन सकते हैं।
लेकिन इसी बिंदु पर एक कठिन और आवश्यक प्रश्न भी सामने आता है।
क्या एक ईमानदार और संवेदनशील अधिकारी का हस्तक्षेप उस पूरी व्यवस्था को बदल सकता है जिसकी कार्यप्रणाली दशकों से बल-प्रधान रही है? क्या एक महिला अधिकारी के नेतृत्व में शुरू हुआ यह परिवर्तन संस्थागत सुधार का आधार बनेगा, या फिर इसे केवल एक असाधारण घटना मानकर भुला दिया जाएगा? क्या यह वास्तव में पुलिस सुधार की शुरुआत है, या केवल तत्कालीन परिस्थितियों में व्यवस्था की छवि सुधारने का प्रयास?
इन्हीं प्रश्नों के उत्तर भविष्य तय करेंगे। क्योंकि किसी लोकतंत्र की मजबूती केवल अच्छे नेताओं से नहीं, बल्कि मजबूत और संवेदनशील संस्थाओं से होती है। यदि संस्थाएं सीखना बंद कर दें, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे केवल चुनावों तक सीमित होकर रह जाता है।
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