"यमन और वेनेजुएला क्यों टूट गए, लेकिन ईरान और रूस क्यों टिके रहे? भारत ने खेती पर समझौता किया, खतरा सीमा पर नहीं, आर्थिक गुलामी का होगा .

यमन, वेनेजुएला, ईरान और रूस के अनुभवों के आधार पर समझिए कि खाद्य आत्मनिर्भरता किसी भी देश की सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत क्यों मानी जाती है और भारत-अमेरिका ट्रेड डील में कृषि पर बहस क्यों महत्वपूर्ण है।

"यमन और वेनेजुएला क्यों टूट गए, लेकिन ईरान और रूस क्यों टिके रहे? भारत ने खेती पर समझौता किया, खतरा सीमा पर नहीं, आर्थिक गुलामी का होगा .

Writer- Sudhir Taliyan Chaudhary Talan Khap

कृषि पर समझौता या राष्ट्रीय सुरक्षा पर समझौता?

भारत को अमेरिका के साथ किसी भी ट्रेड डील में कृषि और खाद्यान्न क्षेत्र को क्यों नहीं शामिल करना चाहिए?

"किसी राष्ट्र की असली ताकत उसकी सेना, उसकी जीडीपी या उसके विदेशी मुद्रा भंडार से ही नहीं मापी जाती। असली ताकत तब दिखाई देती है जब पूरी दुनिया उसके खिलाफ खड़ी हो जाए और फिर भी उसके नागरिक भूखे न सोएं।"

दुनिया तेजी से बदल रही है। बीसवीं सदी में महाशक्तियां युद्ध जीतने के लिए टैंकों, मिसाइलों और परमाणु हथियारों पर निर्भर थीं। लेकिन इक्कीसवीं सदी का भू-राजनीतिक परिदृश्य अलग है। आज किसी देश को झुकाने के लिए हमेशा युद्ध छेड़ने की आवश्यकता नहीं पड़ती। आर्थिक प्रतिबंध (Economic Sanctions), टैरिफ, बैंकिंग प्रतिबंध, विदेशी निवेश पर रोक, तकनीकी निर्यात नियंत्रण और वैश्विक भुगतान प्रणाली से अलग-थलग करना ऐसे हथियार बन चुके हैं जिनका प्रभाव कई बार पारंपरिक युद्ध से भी अधिक गहरा होता है।

आधुनिक दुनिया में किसी देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर करना, उसकी मुद्रा पर दबाव बनाना, महंगाई बढ़ाना और जनता के भीतर असंतोष पैदा करना अंतरराष्ट्रीय राजनीति का एक स्थापित माध्यम बन चुका है। जब किसी देश के उद्योग रुकने लगते हैं, दवाइयां महंगी हो जाती हैं, ईंधन की कीमतें बढ़ती हैं और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित होती है, तब सरकार पर जनता का दबाव भी बढ़ने लगता है। यही कारण है कि आर्थिक प्रतिबंधों को आज कई शक्तिशाली देश अपनी विदेश नीति के प्रभावी उपकरण के रूप में इस्तेमाल करते हैं।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—क्या कोई देश केवल आर्थिक प्रतिबंधों के कारण पूरी तरह टूट जाता है?

इतिहास का अध्ययन करने पर उत्तर इतना सरल नहीं मिलता।

कई देशों की अर्थव्यवस्था प्रतिबंधों से प्रभावित हुई है, कई देशों में महंगाई बढ़ी है, निवेश घटा है और आर्थिक विकास धीमा पड़ा है। लेकिन यदि इतिहास को ध्यान से देखा जाए तो एक बात स्पष्ट दिखाई देती है—ऐसा कोई स्पष्ट उदाहरण नहीं मिलता जिसमें कृषि और खाद्य उत्पादन में व्यापक रूप से आत्मनिर्भर, मजबूत ग्रामीण अर्थव्यवस्था वाले किसी बड़े देश की व्यवस्था केवल विदेशी प्रतिबंधों के कारण वेनेजुएला या यमन जैसी व्यापक खाद्य तबाही में बदल गई हो।

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यह दावा इस अर्थ में नहीं है कि आत्मनिर्भर देश संकट से पूरी तरह मुक्त रहते हैं। ऐसा बिल्कुल नहीं है। प्रतिबंध किसी भी अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाते हैं। महंगाई बढ़ सकती है, उद्योग प्रभावित हो सकते हैं, विदेशी निवेश कम हो सकता है और लोगों की आय पर असर पड़ सकता है। लेकिन यदि देश अपने नागरिकों के लिए पर्याप्त भोजन स्वयं पैदा करता है, तो संकट की सबसे भयावह स्थिति—भुखमरी—से बचने की संभावना काफी बढ़ जाती है।

यही कारण है कि खाद्य आत्मनिर्भरता केवल कृषि नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय भी है।

भोजन: किसी भी राष्ट्र की अंतिम सुरक्षा रेखा

जब किसी देश पर आर्थिक दबाव डाला जाता है, तब उसका पहला लक्ष्य अक्सर उसकी वित्तीय क्षमता होती है। यदि विदेशी मुद्रा की कमी हो जाए, आयात रुक जाएं और वैश्विक बैंकिंग व्यवस्था तक पहुंच सीमित हो जाए, तो आवश्यक वस्तुओं का संकट पैदा होने लगता है।

लेकिन यदि भोजन के लिए भी वही देश विदेशों पर निर्भर हो, तब स्थिति और गंभीर हो जाती है।

किसी राष्ट्र के नागरिक कुछ समय तक महंगी कारों के बिना रह सकते हैं। वे विदेशी मोबाइल फोन न खरीदें, तब भी जीवन चलता रहता है। लोग कुछ समय तक नई तकनीक या विलासिता की वस्तुओं के बिना भी काम चला लेते हैं। लेकिन भोजन के बिना कोई समाज लंबे समय तक स्थिर नहीं रह सकता।

भूख केवल पेट की समस्या नहीं होती। भूख सामाजिक अस्थिरता पैदा करती है। भूख राजनीतिक असंतोष को बढ़ाती है। भूख अपराध बढ़ा सकती है, पलायन को तेज कर सकती है और अंततः शासन व्यवस्था पर भी प्रश्नचिह्न खड़े कर सकती है।

इसीलिए दुनिया की लगभग हर बड़ी शक्ति अपनी खाद्य सुरक्षा को रणनीतिक विषय मानती है। चाहे वह अमेरिका हो, चीन हो, यूरोपीय देश हों या भारत—सभी कृषि को केवल बाजार का विषय नहीं मानते, बल्कि उसे राष्ट्रीय हित से जोड़कर देखते हैं।

इतिहास हमें क्या सिखाता है?

यदि दुनिया के पिछले कई दशकों के आर्थिक संकटों का विश्लेषण किया जाए, तो एक पैटर्न दिखाई देता है। जिन देशों की खाद्य सुरक्षा आयात पर अत्यधिक निर्भर रही, वे युद्ध, प्रतिबंध, विदेशी मुद्रा संकट या राजनीतिक अस्थिरता के समय अधिक गंभीर खाद्य महंगाई, आवश्यक वस्तुओं की कमी और कुपोषण जैसी समस्याओं का सामना करते रहे हैं।

ऐसे देशों में संकट केवल आर्थिक नहीं रहता, बल्कि मानवीय संकट का रूप भी ले सकता है।

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इसके विपरीत, जिन देशों ने अपनी कृषि क्षमता को बनाए रखा, वहां आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद समाज अपेक्षाकृत अधिक स्थिर बना रहा। इसका कारण सरल है—जब लोगों को भोजन उपलब्ध रहता है, तब वे कठिन आर्थिक परिस्थितियों को भी कुछ हद तक सहन कर लेते हैं। लेकिन जब भोजन ही संकट में पड़ जाए, तब समाज का संतुलन तेजी से बिगड़ने लगता है।

यही वह अंतर है जो कृषि को किसी भी सामान्य व्यापारिक वस्तु से अलग बनाता है।

खाद्य आत्मनिर्भरता का अर्थ क्या है?

कई लोग आत्मनिर्भरता शब्द को गलत समझ लेते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि कोई देश कभी भी खाद्यान्न का आयात या निर्यात न करे।

आत्मनिर्भरता का वास्तविक अर्थ यह है कि यदि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बाधित हो जाए, यदि विदेशी व्यापार अस्थायी रूप से रुक जाए या यदि किसी कारण से अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच सीमित हो जाए, तब भी देश अपने नागरिकों के लिए आवश्यक खाद्यान्न का पर्याप्त उत्पादन कर सके।

दूसरे शब्दों में, आत्मनिर्भरता संकट के समय जीवित रहने की क्षमता है।

यही क्षमता किसी देश को आर्थिक दबावों के सामने अधिक मजबूत बनाती है।

क्या केवल प्रतिबंध ही किसी देश को बर्बाद कर देते हैं?

इस प्रश्न का उत्तर भी संतुलित दृष्टि से देखना चाहिए।

किसी भी देश की आर्थिक तबाही का कारण शायद ही कभी केवल एक कारक होता है। अधिकांश मामलों में राजनीतिक अस्थिरता, युद्ध, भ्रष्टाचार, आर्थिक कुप्रबंधन, विदेशी मुद्रा संकट, कमजोर संस्थाएं और बाहरी दबाव—ये सभी मिलकर संकट को जन्म देते हैं।

इसीलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि किसी भी देश की सभी समस्याओं का कारण केवल विदेशी प्रतिबंध थे।

लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि जब किसी देश की खाद्य व्यवस्था पहले से ही कमजोर हो और वह बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर हो, तब आर्थिक प्रतिबंध या वैश्विक संकट उसके लिए कहीं अधिक विनाशकारी सिद्ध हो सकते हैं।

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यही कारण है कि खाद्य आत्मनिर्भरता किसी देश को पूर्ण सुरक्षा तो नहीं देती, लेकिन उसकी आर्थिक और सामाजिक "लचीलापन" (Resilience) को उल्लेखनीय रूप से बढ़ा देती है। संकट के समय यही लचीलापन सरकार को आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता बनाए रखने, सामाजिक स्थिरता बनाए रखने और जनता के विश्वास को कायम रखने में मदद करता है।

भारत के लिए यह चर्चा क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत आज दुनिया की सबसे बड़ी कृषि अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। करोड़ों किसान केवल अन्न ही नहीं उगाते, बल्कि भारत की खाद्य सुरक्षा की नींव तैयार करते हैं। यह वही देश है जिसने हरित क्रांति के बाद खाद्यान्न उत्पादन में उल्लेखनीय प्रगति की और लंबे समय में खाद्य आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ी उपलब्धियां हासिल कीं।

यही उपलब्धि आज भारत की रणनीतिक ताकत भी है।

लेकिन इसी समय भारत और अमेरिका के बीच संभावित व्यापार समझौतों को लेकर भी चर्चा चलती रहती है। मुक्त व्यापार के समर्थक मानते हैं कि व्यापारिक सहयोग से दोनों देशों को लाभ होगा। यह तर्क कई क्षेत्रों में सही भी हो सकता है।

परंतु प्रश्न यह है कि क्या कृषि और खाद्यान्न को भी उसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए, जिस दृष्टि से मोबाइल फोन, ऑटोमोबाइल, कपड़ा या इलेक्ट्रॉनिक्स को देखा जाता है?

यहीं से बहस शुरू होती है।

कृषि केवल एक आर्थिक गतिविधि नहीं है। यह करोड़ों किसानों की आजीविका, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, सामाजिक स्थिरता और सबसे बढ़कर 140 करोड़ भारतीयों की खाद्य सुरक्षा से जुड़ा विषय है। इसलिए यह आवश्यक है कि किसी भी व्यापार समझौते में कृषि को सामान्य व्यापारिक वस्तु मानने के बजाय राष्ट्रीय रणनीतिक संपत्ति के रूप में देखा जाए।

आखिरकार, किसी भी राष्ट्र की असली स्वतंत्रता केवल उसकी सीमाओं की रक्षा से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों की थाली तक भोजन पहुंचाने की क्षमता से तय होती है.

ईरान, रूस, यमन और वेनेजुएला से भारत क्या सीख सकता है?

जब भी आर्थिक प्रतिबंधों की चर्चा होती है, तो अक्सर यह धारणा बनाई जाती है कि प्रतिबंध किसी भी देश को कुछ वर्षों में घुटनों पर ला सकते हैं। वास्तविकता इससे अधिक जटिल है। प्रतिबंध निश्चित रूप से किसी भी अर्थव्यवस्था पर गंभीर दबाव डालते हैं, लेकिन उनका अंतिम प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि उस देश की आंतरिक आर्थिक संरचना कितनी मजबूत है। विशेष रूप से यह कि क्या वह अपने नागरिकों की सबसे मूलभूत आवश्यकता—भोजन—को स्वयं पूरा कर सकता है या नहीं।

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दुनिया के कई उदाहरण यह संकेत देते हैं कि खाद्य आत्मनिर्भरता किसी देश को आर्थिक संकट से पूरी तरह नहीं बचाती, लेकिन उसे लंबे समय तक टिके रहने की क्षमता अवश्य देती है। वहीं, जिन देशों की खाद्य व्यवस्था आयात पर अत्यधिक निर्भर रही, वे संकट के समय अधिक तेजी से अस्थिर हुए।

ईरान: प्रतिबंधों के बीच भी भोजन की उपलब्धता

ईरान पिछले कई दशकों से अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। बैंकिंग, ऊर्जा, व्यापार और निवेश जैसे अनेक क्षेत्रों पर लगातार दबाव रहा। इसकी वजह से ईरानी अर्थव्यवस्था को महंगाई, मुद्रा अवमूल्यन और निवेश की कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा।

फिर भी एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ईरान ने समय के साथ खाद्य सुरक्षा को अपनी राष्ट्रीय रणनीति का हिस्सा बनाया। विशेष रूप से गेहूं जैसी प्रमुख फसलों में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के प्रयास किए गए। सरकारों ने घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया ताकि अंतरराष्ट्रीय दबावों के बावजूद आम नागरिकों तक भोजन की आपूर्ति बनी रहे।

इसका अर्थ यह नहीं कि ईरान में सब कुछ सामान्य रहा। वहां आर्थिक कठिनाइयाँ रहीं, जीवन-यापन महंगा हुआ और लोगों ने कई चुनौतियों का सामना किया। लेकिन व्यापक अकाल जैसी स्थिति नहीं बनी। यह दिखाता है कि यदि भोजन की व्यवस्था अपेक्षाकृत सुरक्षित हो, तो प्रतिबंधों का सामाजिक प्रभाव कुछ हद तक सीमित किया जा सकता है।

रूस: अनाज की शक्ति ने संकट को सीमित किया

वर्ष 2022 के बाद रूस पर पश्चिमी देशों द्वारा व्यापक आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए। शुरुआत में अनेक अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों ने अनुमान लगाया कि रूसी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में चली जाएगी।

प्रतिबंधों का असर कई क्षेत्रों पर पड़ा भी। विदेशी कंपनियों ने रूस छोड़ा, तकनीकी आयात प्रभावित हुए और वित्तीय व्यवस्था पर दबाव आया। लेकिन जिस क्षेत्र ने रूस को अपेक्षाकृत स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, वह उसका कृषि क्षेत्र था।

रूस दुनिया के सबसे बड़े गेहूं निर्यातकों में से एक है। उसके पास विशाल कृषि उत्पादन क्षमता है। घरेलू बाजार में खाद्यान्न की उपलब्धता बनी रही। प्रारंभिक महंगाई के बाद सरकार और केंद्रीय बैंक ने विभिन्न आर्थिक उपाय किए, जिससे कीमतों पर कुछ हद तक नियंत्रण स्थापित किया गया।

यह कहना सही नहीं होगा कि रूस पर प्रतिबंधों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। प्रभाव पड़ा और कई क्षेत्रों में अभी भी महसूस किया जा रहा है। लेकिन यह भी उतना ही सही है कि अनाज उत्पादन में मजबूती के कारण रूस को व्यापक खाद्य संकट का सामना नहीं करना पड़ा।

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यही कारण है कि किसी भी देश की रणनीतिक क्षमता का मूल्यांकन केवल उसके उद्योग या सेना से नहीं, बल्कि उसकी कृषि शक्ति से भी किया जाना चाहिए।

यमन: जब भोजन बाहर से आता हो

अब यमन की ओर देखते हैं।

यमन का संकट केवल आर्थिक प्रतिबंधों का परिणाम नहीं है। वहां लंबे समय से गृहयुद्ध, राजनीतिक अस्थिरता, बुनियादी ढांचे का विनाश और मानवीय संकट मौजूद है। लेकिन इस पूरे संकट में एक बात स्पष्ट दिखाई देती है—देश की खाद्य व्यवस्था आयात पर अत्यधिक निर्भर रही।

जब युद्ध के कारण बंदरगाह प्रभावित हुए, आपूर्ति श्रृंखला टूटी और अर्थव्यवस्था कमजोर हुई, तब खाद्यान्न की उपलब्धता भी गंभीर रूप से प्रभावित हुई। लाखों लोग खाद्य असुरक्षा की स्थिति में पहुंच गए।

यमन का अनुभव यह सिखाता है कि यदि कोई देश अपनी आबादी को भोजन उपलब्ध कराने के लिए मुख्य रूप से बाहरी दुनिया पर निर्भर हो, तो किसी भी बड़े संकट में उसकी स्थिति बेहद कमजोर हो सकती है।

वेनेजुएला: कई कारणों से पैदा हुआ संकट

वेनेजुएला का उदाहरण भी अक्सर चर्चा में आता है। लेकिन इसे समझने के लिए संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है।

वेनेजुएला की आर्थिक समस्याएं केवल प्रतिबंधों की वजह से नहीं थीं। तेल पर अत्यधिक निर्भर अर्थव्यवस्था, आर्थिक कुप्रबंधन, मुद्रा संकट, उत्पादन में गिरावट और बाद में लगाए गए अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध—इन सभी कारकों ने मिलकर संकट को गहरा किया।

जब विदेशी मुद्रा की कमी हुई, तब आवश्यक वस्तुओं का आयात प्रभावित हुआ। खाद्य उपलब्धता पर असर पड़ा, महंगाई नियंत्रण से बाहर गई और बड़ी संख्या में लोगों ने देश छोड़ दिया।

यह उदाहरण बताता है कि यदि किसी देश की अर्थव्यवस्था पहले से असंतुलित हो और खाद्य सुरक्षा मजबूत न हो, तो बाहरी दबाव संकट को कई गुना बढ़ा सकते हैं।

इन चार उदाहरणों से भारत क्या सीखे?

ईरान, रूस, यमन और वेनेजुएला—इन चारों देशों की परिस्थितियां अलग-अलग हैं। इनके राजनीतिक ढांचे अलग हैं, अर्थव्यवस्थाएं अलग हैं और संकटों के कारण भी अलग हैं।

फिर भी इन सभी से एक साझा संदेश निकलता है—

जिस देश की खाद्य सुरक्षा मजबूत होती है, वह लंबे संकट में भी अपेक्षाकृत अधिक स्थिर रह सकता है। और जो देश भोजन के लिए अत्यधिक आयात पर निर्भर होता है, उसकी कमजोरियां संकट के समय तेजी से सामने आ सकती हैं।

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यही कारण है कि कृषि को केवल आर्थिक गतिविधि मानना एक बड़ी भूल हो सकती है।

आर्थिक प्रतिबंध: आधुनिक दुनिया का नया हथियार

आज अमेरिका वैश्विक अर्थव्यवस्था में अत्यंत प्रभावशाली स्थान रखता है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार का बड़ा हिस्सा डॉलर में होता है। वैश्विक बैंकिंग और भुगतान प्रणाली में भी अमेरिकी प्रभाव महत्वपूर्ण है।

इसी कारण अमेरिका के पास आर्थिक प्रतिबंध लगाने की व्यापक क्षमता है। उसने अलग-अलग समय पर ईरान, रूस, क्यूबा, उत्तर कोरिया और अन्य देशों पर विभिन्न प्रकार के आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं। इसके अलावा टैरिफ, निर्यात नियंत्रण और वित्तीय प्रतिबंध भी अमेरिकी विदेश नीति के प्रमुख उपकरण रहे हैं।

समर्थकों का कहना है कि ये प्रतिबंध अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए लगाए जाते हैं। वहीं आलोचकों का तर्क है कि इनका बोझ कई बार आम नागरिकों पर भी पड़ता है और इससे महंगाई तथा आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।

दोनों दृष्टिकोणों पर बहस हो सकती है, लेकिन एक बात निर्विवाद है—आर्थिक प्रतिबंध आज अंतरराष्ट्रीय राजनीति का वास्तविक और प्रभावशाली साधन बन चुके हैं।

यदि भविष्य में भारत पर दबाव बना तो?

यह प्रश्न काल्पनिक अवश्य है, लेकिन नीति-निर्माण हमेशा संभावित जोखिमों को ध्यान में रखकर किया जाता है।

आज भारत और अमेरिका के संबंध सामान्यतः सकारात्मक हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार, रक्षा, प्रौद्योगिकी और निवेश के क्षेत्र में सहयोग बढ़ रहा है।

लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति स्थायी मित्रता पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों पर चलती है। आज जो देश सहयोगी है, वह भविष्य में किसी मुद्दे पर असहमति भी रख सकता है। इसलिए किसी भी राष्ट्र की नीति केवल वर्तमान परिस्थितियों के आधार पर नहीं बनाई जाती, बल्कि भविष्य की अनिश्चितताओं को ध्यान में रखकर बनाई जाती है।

यदि किसी भी कारण से भविष्य में भारत पर बाहरी आर्थिक दबाव बढ़े, तो सबसे बड़ा प्रश्न यह होगा कि क्या भारत अपने नागरिकों की खाद्य सुरक्षा को पूरी तरह स्वयं संभाल सकता है?

आज इसका उत्तर काफी हद तक हाँ है—और यही भारत की सबसे बड़ी ताकत है।

यही कारण है कि भारत को अपनी इस ताकत को कमजोर करने के बजाय और मजबूत करना चाहिए।

कृषि केवल किसानों की आय का विषय नहीं है। यह भारत की सामरिक क्षमता, सामाजिक स्थिरता और आर्थिक स्वतंत्रता का भी आधार है।

अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न पर आते हैं—यदि भारत और अमेरिका के बीच व्यापक व्यापार समझौता (Trade Deal) होता है, तो क्या कृषि और खाद्यान्न क्षेत्र को भी उसी तरह शामिल किया जाना चाहिए, जैसे अन्य औद्योगिक क्षेत्रों को?

मेरी राय में इसका उत्तर बहुत सावधानी के साथ "नहीं" होना चाहिए।

यह किसी देश का विरोध करने का प्रश्न नहीं है। यह अमेरिका बनाम भारत की बहस भी नहीं है। यह उस सिद्धांत का प्रश्न है कि क्या किसी भी राष्ट्र को अपनी खाद्य सुरक्षा को सामान्य व्यापारिक वस्तु की तरह देखना चाहिए।

दुनिया के लगभग सभी बड़े देश इस प्रश्न का उत्तर "नहीं" देते हैं।

कृषि कोई सामान्य व्यापारिक उत्पाद नहीं है

मोबाइल फोन विदेश से आए या देश में बनें, इससे राष्ट्रीय अस्तित्व पर तत्काल खतरा नहीं आता। कारें आयात हों या घरेलू कंपनियां बनाएं, उससे भी समाज की मूल संरचना नहीं बदलती।

लेकिन यदि किसी दिन किसी देश के पास अपने नागरिकों को खिलाने के लिए पर्याप्त अनाज न बचे, तब यह केवल आर्थिक संकट नहीं रहेगा। यह राष्ट्रीय संकट बन जाएगा।

इसीलिए कृषि को रक्षा, ऊर्जा और जल सुरक्षा की तरह एक रणनीतिक क्षेत्र माना जाना चाहिए।

भारत जैसे देश में यह बात और भी अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां करोड़ों लोगों की आजीविका सीधे खेती से जुड़ी है। कृषि केवल उत्पादन का माध्यम नहीं है; यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था का इंजन है। गांवों की दुकानों से लेकर छोटे उद्योगों, परिवहन, कृषि उपकरण, डेयरी और स्थानीय बाजारों तक, सबकी आर्थिक धड़कन खेती से जुड़ी हुई है।

यदि यह आधार कमजोर होता है, तो उसका प्रभाव केवल किसानों तक सीमित नहीं रहेगा। पूरे ग्रामीण भारत पर इसका असर पड़ेगा।

मुक्त व्यापार के समर्थकों की बात भी समझनी होगी

किसी भी गंभीर बहस में केवल एक पक्ष नहीं होता।

मुक्त व्यापार के समर्थक कहते हैं कि प्रतिस्पर्धा बढ़ने से उपभोक्ताओं को सस्ते उत्पाद मिलते हैं, नई तकनीक आती है, उत्पादकता बढ़ती है और अर्थव्यवस्था अधिक कुशल बनती है।

इन तर्कों में काफी दम है।

भारत ने कई क्षेत्रों में वैश्विक प्रतिस्पर्धा अपनाकर उल्लेखनीय सफलता भी प्राप्त की है। सूचना प्रौद्योगिकी, फार्मास्यूटिकल्स, ऑटोमोबाइल, मोबाइल निर्माण और सेवा क्षेत्र इसके उदाहरण हैं।

लेकिन प्रश्न यह है कि क्या वही मॉडल बिना किसी संशोधन के कृषि पर भी लागू किया जा सकता है?

यहीं पर मतभेद शुरू होता है।

कृषि में प्रतिस्पर्धा केवल लागत की नहीं होती। यहां मौसम, जल संसाधन, सरकारी सहायता, बीमा, भूमि का आकार, किसानों की आय और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा जैसे अनेक तत्व जुड़े होते हैं।

यदि दो देशों के किसानों को समान परिस्थितियां ही उपलब्ध न हों, तो केवल "मुक्त प्रतिस्पर्धा" की बात व्यवहारिक नहीं रह जाती।

विकसित देश स्वयं क्या करते हैं?

यह एक दिलचस्प तथ्य है कि जो देश मुक्त व्यापार की सबसे अधिक वकालत करते हैं, वे भी अपनी कृषि को पूरी तरह बाजार के भरोसे नहीं छोड़ते।

दुनिया के अनेक विकसित देश अपने किसानों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सहायता देते हैं। कहीं मूल्य समर्थन है, कहीं बीमा सहायता है, कहीं निर्यात प्रोत्साहन है और कहीं कृषि अनुसंधान में भारी सार्वजनिक निवेश किया जाता है।

अर्थात कृषि को लेकर लगभग हर देश विशेष नीति अपनाता है।

यदि विकसित अर्थव्यवस्थाएं भी अपनी खाद्य सुरक्षा को रणनीतिक मानती हैं, तो भारत के लिए ऐसा करना कोई असामान्य बात नहीं होनी चाहिए।

भारत की सबसे बड़ी ताकत—उसका किसान

भारत की खाद्य आत्मनिर्भरता किसी संयोग का परिणाम नहीं है।

हरित क्रांति से पहले भारत खाद्यान्न की कमी से जूझता था। कई बार विदेशी सहायता पर निर्भर रहना पड़ता था। लेकिन वैज्ञानिकों, किसानों, सिंचाई परियोजनाओं, सार्वजनिक निवेश और नीति सुधारों ने धीरे-धीरे देश को आत्मनिर्भर बनाया।

आज भारत विश्व के सबसे बड़े खाद्यान्न उत्पादकों में शामिल है।

यह उपलब्धि केवल कृषि उत्पादन की नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मविश्वास की कहानी भी है।

जब दुनिया महामारी से जूझ रही थी, तब भी भारत ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से करोड़ों लोगों तक खाद्यान्न पहुंचाया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि मजबूत कृषि व्यवस्था संकट के समय कितनी महत्वपूर्ण होती है।

व्यापार होना चाहिए, लेकिन विवेक के साथ

यह कहना उचित नहीं होगा कि भारत को वैश्विक व्यापार से दूरी बना लेनी चाहिए।

भारत को व्यापार करना चाहिए।

भारत को निवेश आकर्षित करना चाहिए।

भारत को निर्यात बढ़ाना चाहिए।

भारत को तकनीक अपनानी चाहिए।

भारत को अमेरिका सहित सभी देशों के साथ मजबूत आर्थिक संबंध विकसित करने चाहिए।

लेकिन हर व्यापार समझौते में यह भी तय होना चाहिए कि कौन-से क्षेत्र रणनीतिक हैं और किन क्षेत्रों में अतिरिक्त सावधानी आवश्यक है।

यदि रक्षा उत्पादन को पूरी तरह बाहरी निर्भरता पर नहीं छोड़ा जा सकता, यदि ऊर्जा सुरक्षा को केवल बाजार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता, तो खाद्य सुरक्षा को भी पूरी तरह वैश्विक बाजार पर छोड़ना दूरदर्शिता नहीं होगी।

अमेरिका अपने हित देखेगा, भारत को अपने हित देखने होंगे

यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति का मूल सिद्धांत है कि हर देश सबसे पहले अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करता है।

अमेरिका भी यही करता है।

यूरोप भी यही करता है।

चीन भी यही करता है।

रूस भी यही करता है।

तो भारत को भी वही करना चाहिए।

किसी भी व्यापार समझौते में अमेरिका स्वाभाविक रूप से अपने किसानों, अपने उद्योगों और अपने आर्थिक हितों को ध्यान में रखेगा। इसमें कोई असामान्य बात नहीं है।

ठीक उसी प्रकार भारत सरकार का पहला दायित्व भारतीय किसानों, भारतीय उपभोक्ताओं और भारत की खाद्य सुरक्षा की रक्षा करना होना चाहिए।

यह भावनात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक सोच है।

आने वाले समय की सबसे बड़ी चुनौती

जलवायु परिवर्तन, पानी की कमी, वैश्विक संघर्ष, समुद्री व्यापार मार्गों पर तनाव, महामारी और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा—ये सभी संकेत देते हैं कि आने वाले दशकों में खाद्य सुरक्षा का महत्व और बढ़ने वाला है।

संभव है कि भविष्य के युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि आपूर्ति श्रृंखलाओं, ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और खाद्यान्न के नियंत्रण पर भी लड़े जाएं।

ऐसे समय में वह देश सबसे मजबूत होगा, जो अपने नागरिकों को भोजन उपलब्ध कराने में आत्मनिर्भर होगा।

निष्कर्ष: भारत को क्या करना चाहिए?

मेरी राय में भारत को अमेरिका सहित सभी देशों के साथ व्यापारिक संबंध मजबूत करने चाहिए, लेकिन कृषि और खाद्यान्न जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए।

यह किसी देश के खिलाफ खड़ा होने की नीति नहीं होगी।

यह भारत के पक्ष में खड़ा होने की नीति होगी।

यह संरक्षणवाद नहीं, बल्कि रणनीतिक आत्मनिर्भरता होगी।

भारत की कृषि केवल किसानों की रोज़ी-रोटी का विषय नहीं है। यह 140 करोड़ लोगों की खाद्य सुरक्षा का आधार है। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। यह सामाजिक स्थिरता की गारंटी है। और यदि इतिहास से कोई सबसे बड़ा सबक मिलता है, तो वह यही है कि जो राष्ट्र अपनी थाली की रक्षा नहीं कर सकता, वह लंबे समय तक अपनी आर्थिक स्वतंत्रता की भी रक्षा नहीं कर सकता।

आर्थिक प्रतिबंध किसी भी देश को कठिनाइयों में डाल सकते हैं। टैरिफ व्यापार को प्रभावित कर सकते हैं। डॉलर आधारित वैश्विक व्यवस्था दबाव का माध्यम बन सकती है। लेकिन यदि किसी राष्ट्र के खेत हरे हैं, उसके गोदाम भरे हैं और उसकी जनता को भोजन उपलब्ध है, तो वह कठिन से कठिन दौर में भी अधिक मजबूती से खड़ा रह सकता है।

इसलिए भारत की भविष्य की व्यापार नीति का मूल सिद्धांत केवल "अधिक व्यापार" नहीं, बल्कि "सुरक्षित व्यापार" होना चाहिए।

व्यापार बढ़े, निवेश आए, उद्योग आगे बढ़ें—लेकिन भारत की खाद्य सुरक्षा, उसके किसान और उसकी कृषि व्यवस्था किसी भी समझौते की कीमत न बनें।

क्योंकि अंततः किसी भी राष्ट्र की असली ताकत उसके शेयर बाज़ार से नहीं, बल्कि उसके खेतों से तय होती है। जिस दिन कोई देश अपनी मिट्टी, अपने किसान और अपनी अन्न-व्यवस्था को केवल बाज़ार की वस्तु मानने लगता है, उसी दिन वह अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा दांव पर लगा देता है।

भारत को यह भूल नहीं करनी चाहिए।

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