विकास के दावों की खुली पोल: सरकारी फाइलों में दफन महिला रोजगार की हकीकत
जून 2026 की PLFS रिपोर्ट के सरकारी आंकड़े महिलाओं के रोजगार और आर्थिक सशक्तिकरण की वास्तविक स्थिति उजागर करते हैं। यह लेख महिला श्रम भागीदारी, शहरी-ग्रामीण रोजगार, असंगठित क्षेत्र, महिला किसानों के अधिकार और सरकारी नीतियों की चुनौतियों का तथ्यात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
निमिषा सिंह
'नारी शक्ति', 'महिला सशक्तिकरण', और 'विकास'—ये वो गढ़े हुए शब्द हैं जो आज के राजनीतिक विमर्श में सबसे ज्यादा गूंजते हैं। लेकिन जब इन नारों की गूंज शांत होती है और यथार्थ के पन्नों को पलटा जाता है, तो एक बेहद स्याह तस्वीर उभरकर सामने आती है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा जारी जून 2026 के आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) के आंकड़े इसी कड़वे यथार्थ का सरकारी दस्तावेज हैं। यह रिपोर्ट न केवल देश के श्रम बाजार में पसरे सन्नाटे को बयां करती है, बल्कि यह भी साबित करती है कि महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के मोर्चे पर सरकारी नीतियां पूरी तरह से खोखली साबित हुई हैं। सबसे बड़ा सवाल और विडंबना यह है कि यह कोई विपक्षी या बाहरी संस्था का डेटा नहीं है, बल्कि सरकार की अपनी ही एजेंसी का डेटा है। सरकार हकीकत जानती है, आंकड़े उसकी टेबल पर हैं, लेकिन इसके बावजूद वह ऐसी नीतियां क्यों अपना रही है जो आधी आबादी को अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा से बाहर धकेल रही हैं? आंकड़ों की बाजीगरी से अक्सर ठहराव को 'स्थिरता' का नाम देकर एक भ्रामक तस्वीर पेश की जाती है। जून 2026 की PLFS रिपोर्ट के अनुसार, 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों के लिए कुल श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) 54.4% और कामगार जनसंख्या अनुपात (WPR) 51.4% पर अटका हुआ है। कुल बेरोजगारी दर 5.5% पर जस की तस बनी हुई है। एक ऐसे देश में जहां हर महीने लाखों युवा रोजगार की उम्मीद लिए बाजार में कदम रखते हैं, वहां रोजगार के आंकड़ों का 'स्थिर' रहना दरअसल एक भारी गिरावट है। इसका सीधा अर्थ है कि नई आबादी के लिए नए अवसर पैदा ही नहीं हो रहे हैं। और इस ठहराव की सबसे बड़ी कीमत इस देश की महिलाओं को चुकानी पड़ रही है, जिनकी कुल श्रम बल भागीदारी मात्र 32.7% पर सिमटी हुई है। भारत की आबादी का 50% हिस्सा महिलाएं हैं। दशकों के सामाजिक संघर्ष, जागरूकता अभियानों और जमीनी स्तर पर हुए आंदोलनों के बाद, आज एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। बहुत मेहनत से, विशेषकर ग्रामीण और कस्बाई महिलाओं को यह समझाया जा सका है कि दुनिया केवल चूल्हे-चौके की परिधि तक सीमित नहीं है। रसोई के बाहर भी एक अनंत आसमान है, जहां उन्हें उड़ान भरनी है और अपने लिए कुछ करना है। आज की महिला यह समझ चुकी है कि वह उड़ने को तैयार है, लेकिन यह उड़ान केवल इच्छाशक्ति से नहीं भरी जा सकती; इसके लिए आर्थिक पंखों की जरूरत होती है। महिला रोजगार का मुद्दा केवल जीडीपी के आंकड़े बढ़ाने का विषय नहीं है; यह सीधे तौर पर उनके अस्तित्व, सामाजिक सुरक्षा और सम्मान से जुड़ा हुआ अर्थशास्त्र का विषय है। समाज का यह कड़वा और नग्न सच है कि जब तक कोई महिला आर्थिक रूप से दूसरों पर निर्भर रहती है, वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शोषण का शिकार होती रहती है। आर्थिक सुरक्षा ही वह एकमात्र ढाल है जो महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करती है। रोजगार महिलाओं के हाथ में केवल पैसा ही नहीं देता, बल्कि उन्हें परिवार और समाज में निर्णय लेने की क्षमता भी देता है। जब महिला कमाती है, तो वह अपने स्वास्थ्य, अपने बच्चों की शिक्षा और अपने जीवन के फैसलों पर खुद नियंत्रण रखती है। आर्थिक आत्मनिर्भरता के बिना सामाजिक समानता की बात करना बेमानी है। डिजिटल इंडिया और आधुनिकीकरण के इस दौर में, शहरी क्षेत्रों के आंकड़े सबसे ज्यादा डराने वाले हैं। शहरी महिलाओं का LFPR मात्र 24.8% है, जो पिछले साल (जून 2025 में 25.2%) की तुलना में और गिर गया है। क्या शहर की महिलाएं काम नहीं करना चाहतीं? सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है। लड़कियां उच्च शिक्षा हासिल कर रही हैं, लेकिन बाजार में उनके लिए पर्याप्त, सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण रोजगार ही नहीं हैं। शहरी महिलाओं की इस घटती भागीदारी के पीछे एक बड़ा कारण सुरक्षित बुनियादी ढांचे का अभाव है। सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन की कमी, कार्यस्थलों पर क्रेच की सुविधा का न होना, और मातृत्व अवकाश के बाद नौकरी से निकाल दिए जाने का अघोषित डर—ये वो व्यावहारिक कारण हैं जो महिलाओं को घर बैठने पर मजबूर कर रहे हैं। सरकार केवल कागजों पर रोजगार के अवसर दिखाती है, लेकिन महिलाओं के अनुकूल कार्य-वातावरण पैदा करने में उसने आंखें मूंद रखी हैं। जब हम ग्रामीण भारत की ओर देखते हैं, तो महिला श्रम बल भागीदारी जून 2026 में 36.6% नजर आती है, जो पिछले साल के 35.2% से अधिक है। सरकार इसे अपनी उपलब्धि बता सकती है, लेकिन जमीनी हकीकत को समझने वाले लोग जानते हैं कि यह सशक्तिकरण नहीं, बल्कि मजबूरी का रोजगार है। गांव की महिलाएं आर्थिक तंगी के कारण खेतों में पसीना बहाने को विवश हैं। देश का पूरा कृषि क्षेत्र महिलाओं के कंधों पर टिका है, लेकिन सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि व्यवस्था उन्हें 'किसान' मानती ही नहीं है। कृषि नीतियों और अधिकारों की लड़ाई में महिलाएं सबसे हाशिए पर हैं। खेत में दिन-रात काम करने के बावजूद जमीन का मालिकाना हक उनके नाम पर नहीं होता। इस संरचनात्मक अन्याय का परिणाम यह होता है कि उन्हें सरकारी योजनाओं, कृषि ऋण, या न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) जैसी महत्वपूर्ण नीतियों का कोई सीधा लाभ नहीं मिल पाता। MSP की कानूनी गारंटी और कृषि सुधारों की जो लंबी लड़ाई देश में चल रही है, उसमें इस महिला किसान का हक सबसे पहले मारा जाता है, क्योंकि सरकारी कागजों में वह किसान है ही नहीं, वह महज एक खेतिहर मजदूर है। इसके साथ ही, अर्थशास्त्र का वर्तमान मॉडल महिलाओं के उस काम को पूरी तरह से अनदेखा कर देता है, जिसकी कोई कीमत नहीं चुकाई जाती। घर के काम, बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल, पानी लाना, या मवेशी चराना—यह अनपेड केयर इकॉनमी है, जिसे देश की जीडीपी में नहीं गिना जाता। जो महिलाएं घर से बाहर निकलकर काम कर भी रही हैं, उनमें से बहुतायत असंगठित क्षेत्र में हैं—ईंट-भट्ठों पर, निर्माण स्थलों पर, या दूसरों के घरों में काम करने वाली महिलाएं। इनके लिए न नौकरी की गारंटी है, न पेंशन, और न ही कोई स्वास्थ्य बीमा। 'समान काम के लिए समान वेतन' का कानून केवल किताबों की शोभा बढ़ा रहा है; जमीन पर आज भी महिला मजदूरों को पुरुषों की तुलना में कम दिहाड़ी देकर उनका खुला शोषण किया जाता है। अब सवाल उठता है कि जब सरकार के अपने आंकड़े चीख-चीख कर यह सच्चाई बयां कर रहे हैं, तो नीतियां क्यों नहीं बदल रहीं? इसका उत्तर राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्राथमिकताओं में छिपा है। महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाने और एक सुरक्षित रोजगार इकोसिस्टम तैयार करने के लिए संरचनात्मक बदलाव की आवश्यकता होती है। इसमें समय लगता है, भारी बजट का आवंटन करना पड़ता है, और पितृसत्तात्मक ढांचे से टकराना पड़ता है। इसके विपरीत, चुनावों के समय महिलाओं को 'लाभार्थी' बनाकर उन्हें कुछ मुफ्त योजनाओं या नकद हस्तांतरण की आदत डाल देना राजनीतिक रूप से कहीं अधिक आसान और फायदेमंद होता है। सरकार महिलाओं को आत्मनिर्भर, मुखर और सवाल पूछने वाली नागरिक नहीं बनाना चाहती; वह उन्हें केवल वोट बैंक बनाए रखना चाहती है। क्योंकि जो महिला आर्थिक रूप से सशक्त होगी, वह अपने अधिकारों की मांग करेगी। वह केवल नारों से संतुष्ट नहीं होगी, बल्कि नीतियों में अपनी हिस्सेदारी मांगेगी। जून 2026 के PLFS आंकड़े कोई सामान्य सांख्यिकी नहीं हैं; यह आधी आबादी के टूटते पंखों, उनके अदृश्य श्रम और एक संवेदनहीन व्यवस्था की क्रूर दास्तां हैं। भारत की 50% आबादी अब केवल रसोई तक सीमित रहने को तैयार नहीं है। वे समझ चुकी हैं कि उनका सामाजिक सम्मान और शोषण से मुक्ति उनके आर्थिक सशक्तिकरण में ही निहित है। अब समय आ गया है कि खैरात और 'नारी वंदन' जैसे लोकलुभावन नारों से आगे बढ़कर, रोजगार और समान अधिकारों को एक बड़े सामाजिक आंदोलन का रूप दिया जाए। जब तक महिलाओं को गुणवत्तापूर्ण रोजगार, कृषि में मालिकाना हक और असंगठित क्षेत्र में सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलेगी, तब तक किसी भी विकसित भारत का दावा केवल एक क्रूर राजनीतिक जुमला ही बना रहेगा। आसमान खुला है, और आधी आबादी उड़ान भरने को तैयार है—अब जवाबदेही इस व्यवस्था की है कि वह उनके पंखों को मजबूती देती है या उन्हें कतरने का काम जारी रखती है।
https://politicsinsightindia.com/new/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
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