क्या भारत की विदेश नीति वास्तव में स्वतंत्र है या केवल स्वतंत्र दिखने की कोशिश?
क्या भारत की विदेश नीति वास्तव में स्वतंत्र है? रूस, ईरान, अमेरिका, चाबहार परियोजना, इजराइल और व्यापार समझौतों के संदर्भ में गहन विश्लेषण।
क्या भारत की विदेश नीति वास्तव में स्वतंत्र है या केवल स्वतंत्र दिखने की कोशिश?
Writer- Sudhir Taliyan
Chaudhary - Talan Khap
भारत की विदेश नीति को लंबे समय से "रणनीतिक स्वायत्तता" (Strategic Autonomy) के सिद्धांत पर आधारित बताया जाता रहा है। स्वतंत्रता के बाद से भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन से लेकर बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था तक, स्वयं को किसी एक शक्ति-गुट के अधीन न रखने की नीति अपनाने का दावा किया है। वर्तमान समय में भी भारत सरकार बार-बार कहती है कि उसकी विदेश नीति पूरी तरह स्वतंत्र है और वह अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर निर्णय लेती है।
लेकिन क्या केवल यह कह देना पर्याप्त है कि भारत की विदेश नीति स्वतंत्र है? या फिर इसकी वास्तविक परीक्षा उन निर्णयों में होती है जो भारत अंतरराष्ट्रीय दबाव, आर्थिक हितों और भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बीच लेता है?
यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि हाल के वर्षों में भारत की विदेश नीति के कई ऐसे निर्णय सामने आए हैं जिन पर यह आरोप लगा कि वे राष्ट्रीय हितों से अधिक पश्चिमी दबावों या अमेरिकी रणनीतिक प्राथमिकताओं से प्रभावित दिखाई देते हैं। इस संदर्भ में रूस, ईरान, चीन, अमेरिका और इजराइल से जुड़े मुद्दों का गंभीर विश्लेषण आवश्यक है।
स्वतंत्र विदेश नीति का वास्तविक अर्थ
किसी भी देश की विदेश नीति तब स्वतंत्र मानी जाती है जब वह अपने दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों के आधार पर निर्णय ले, चाहे वे निर्णय विश्व की महाशक्तियों को पसंद आएं या नहीं।
स्वतंत्र विदेश नीति का अर्थ यह नहीं है कि कोई देश अमेरिका, रूस या चीन का विरोध ही करता रहे। बल्कि इसका अर्थ है कि किसी भी शक्ति केंद्र के दबाव से मुक्त होकर अपने आर्थिक, सामरिक और राजनीतिक हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देना।
भारत की विदेश नीति की सफलता का मूल्यांकन इसी कसौटी पर होना चाहिए।
रूस के साथ संबंध: क्या दबाव के बावजूद भारत स्वतंत्र रहा?
रूस और भारत के संबंध दशकों पुराने हैं। शीत युद्ध के दौरान जब अधिकांश पश्चिमी देश पाकिस्तान के साथ खड़े थे, तब सोवियत संघ भारत का प्रमुख रणनीतिक साझेदार था।
रूस आज भी भारत के रक्षा क्षेत्र का महत्वपूर्ण सहयोगी है। भारत की सेना के पास बड़ी मात्रा में रूसी मूल के हथियार मौजूद हैं।
यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और यूरोप ने रूस पर व्यापक प्रतिबंध लगाए। पश्चिमी देशों की अपेक्षा थी कि भारत भी रूस से दूरी बनाएगा।
भारत ने रूस से रियायती दरों पर तेल खरीदना जारी रखा। इस निर्णय से भारत को अरबों डॉलर की बचत हुई। यह निर्णय वास्तव में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का उदाहरण माना जा सकता है।
हालांकि आलोचकों का तर्क है कि यदि भारत वास्तव में पूरी तरह स्वतंत्र होता तो रूस के साथ आर्थिक और तकनीकी सहयोग को और अधिक व्यापक रूप से बढ़ाता। रूस-भारत व्यापार क्षमता अभी भी अपनी संभावनाओं से काफी कम है।
ईरान नीति: सबसे बड़ा प्रश्न
यदि भारत की विदेश नीति पर सबसे अधिक सवाल किसी एक मुद्दे पर उठते हैं तो वह ईरान है।
ईरान भारत के लिए केवल एक तेल आपूर्तिकर्ता नहीं था। वह मध्य एशिया तक पहुंच का महत्वपूर्ण द्वार भी था।
एक समय भारत ईरान से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता था। लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद भारत ने ईरान से तेल आयात लगभग समाप्त कर दिया।
आलोचक पूछते हैं कि यदि भारत वास्तव में स्वतंत्र विदेश नीति अपनाता है तो उसने अपने ऊर्जा हितों को अमेरिकी प्रतिबंधों के आगे क्यों झुका दिया?
चीन ने अमेरिकी दबाव के बावजूद ईरान के साथ अपने संबंध बनाए रखे। रूस ने भी ऐसा ही किया।
भारत का तेल आयात बंद करना आज भी विदेश नीति के आलोचकों के लिए एक प्रमुख उदाहरण है कि कैसे भारत ने अपने आर्थिक हितों पर अमेरिकी दबाव को प्राथमिकता दी।
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चाबहार परियोजना: खोया हुआ अवसर?
ईरान में स्थित चाबहार बंदरगाह भारत की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक परियोजनाओं में से एक मानी जाती थी।
इस परियोजना का उद्देश्य पाकिस्तान को बायपास करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच बनाना था।
हालांकि परियोजना की गति कई वर्षों तक बेहद धीमी रही।
इस दौरान चीन ने पाकिस्तान में ग्वादर बंदरगाह और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के माध्यम से अपनी स्थिति मजबूत कर ली।
भारत समर्थक विश्लेषकों का तर्क है कि चाबहार परियोजना अभी भी जीवित है और भारत वहां निवेश कर रहा है।
लेकिन आलोचकों का कहना है कि यदि भारत ने शुरुआती वर्षों में अधिक दृढ़ता दिखाई होती तो आज मध्य एशिया में उसकी रणनीतिक स्थिति कहीं अधिक मजबूत हो सकती थी।
अमेरिका की ओर बढ़ता झुकाव
पिछले एक दशक में भारत और अमेरिका के संबंध अभूतपूर्व रूप से मजबूत हुए हैं।
रक्षा समझौते, तकनीकी सहयोग, क्वाड समूह में भागीदारी और इंडो-पैसिफिक रणनीति में बढ़ती भूमिका इसके उदाहरण हैं।
सरकार का तर्क है कि चीन की बढ़ती आक्रामकता को देखते हुए अमेरिका के साथ सहयोग भारत की आवश्यकता है।
लेकिन आलोचकों का प्रश्न अलग है।
क्या यह सहयोग रणनीतिक साझेदारी है या धीरे-धीरे रणनीतिक निर्भरता में बदल रहा है?
क्या भारत भविष्य में ऐसे निर्णय लेने की स्थिति में रहेगा जो अमेरिकी हितों के विरुद्ध हों?
यही वह प्रश्न है जिसका उत्तर आने वाले वर्षों में मिलेगा।
चीन चुनौती और अमेरिकी साझेदारी
भारत के सामने सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती चीन है।
गलवान संघर्ष के बाद भारत में चीन के प्रति अविश्वास बढ़ा।
इस परिस्थिति में अमेरिका के साथ सहयोग बढ़ाना स्वाभाविक था।
लेकिन विदेश नीति विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि किसी एक शक्ति पर अत्यधिक निर्भरता दीर्घकालिक जोखिम पैदा कर सकती है।
भारत यदि वास्तव में बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का समर्थक है तो उसे अमेरिका, रूस, यूरोप, ईरान, खाड़ी देशों और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने होंगे।
इजराइल के प्रति बढ़ता झुकाव
भारत और इजराइल के संबंध पिछले तीन दशकों में तेजी से मजबूत हुए हैं।
रक्षा, कृषि और तकनीक के क्षेत्रों में इजराइल भारत का महत्वपूर्ण सहयोगी है।
लेकिन आलोचक कहते हैं कि भारत की पारंपरिक फिलिस्तीन समर्थक नीति धीरे-धीरे कमजोर हुई है।
भारत सरकार का दावा है कि वह इजराइल और फिलिस्तीन दोनों के साथ संबंध बनाए हुए है।
फिर भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की कुछ स्थितियों को देखकर यह धारणा मजबूत हुई है कि नई दिल्ली का झुकाव पहले की तुलना में इजराइल की ओर अधिक है।
व्यापार समझौते और घरेलू चिंताएं
भारत जिन व्यापार समझौतों पर बातचीत कर रहा है, उन्हें लेकर किसानों, छोटे व्यापारियों और घरेलू उद्योगों के बीच चिंताएं मौजूद हैं।
आलोचकों का कहना है कि अत्यधिक बाजार खोलने से विदेशी कंपनियों को लाभ मिल सकता है जबकि भारतीय छोटे उत्पादक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ सकते हैं।
"मेक इन इंडिया" का लक्ष्य तभी सफल होगा जब भारत अपनी उत्पादन क्षमता, अनुसंधान क्षमता और तकनीकी नवाचार को मजबूत करे।
केवल विदेशी निवेश आकर्षित करना पर्याप्त नहीं होगा।
क्या भारत की रणनीतिक स्वायत्तता कमजोर हुई है?
यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि भारत ने पूरी तरह अपनी स्वतंत्र विदेश नीति खो दी है।
रूस से तेल खरीदना, यूक्रेन युद्ध पर संतुलित रुख रखना और पश्चिमी प्रतिबंधों में शामिल न होना इसके विपरीत उदाहरण हैं।
लेकिन यह कहना भी कठिन है कि भारत हर मुद्दे पर पूरी तरह स्वतंत्र निर्णय ले रहा है।
ईरान नीति, चाबहार की धीमी प्रगति और पश्चिमी देशों के साथ बढ़ती सामरिक निकटता ऐसे प्रश्न हैं जिन पर गंभीर चर्चा की आवश्यकता है।
निष्कर्ष
विदेश नीति की वास्तविक परीक्षा भाषणों में नहीं बल्कि निर्णयों में होती है।
यदि भारत वास्तव में एक उभरती हुई वैश्विक शक्ति बनना चाहता है तो उसे केवल अमेरिका या किसी अन्य महाशक्ति के साथ निकटता बढ़ाने से आगे सोचना होगा।
भारत को ऐसी विदेश नीति की आवश्यकता है जो ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक विकास, तकनीकी आत्मनिर्भरता, क्षेत्रीय प्रभाव और राष्ट्रीय संप्रभुता को केंद्र में रखे।
रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ केवल यह कहना नहीं कि भारत स्वतंत्र है। इसका अर्थ है ऐसे निर्णय लेना जो दुनिया की किसी भी महाशक्ति को असहज कर सकते हों, यदि वे भारत के हित में हों।
आने वाले वर्षों में भारत की विदेश नीति का मूल्यांकन इसी आधार पर होगा कि उसने वैश्विक शक्ति संघर्षों के बीच अपने राष्ट्रीय हितों को कितनी दृढ़ता और निरंतरता से प्राथमिकता दी।
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