“BRICS में भारत का मास्टरस्ट्रोक! अमेरिका के दबाव से बाहर निकलने का खुल रहा बड़ा रास्ता”
BRICS भारत के लिए अमेरिकी दबाव से रणनीतिक आजादी, समानता आधारित व्यापार, BRICS करेंसी-बैंक और छोटे व्यापारियों के लिए नए वैश्विक अवसरों का रास्ता खोल सकता है।
By- Ch. Sudhir Talyan
12 सितम्बर 2026 से दो दिन का भारत की मेजबानी में BRICS शिखर सम्मेलन केवल कूटनीतिक आयोजन नहीं, बल्कि देश की आर्थिक और रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है। यदि भारत BRICS को टकराव के मंच के बजाय समानता, व्यापार, वित्तीय स्वतंत्रता और जनकल्याण के मंच के रूप में आगे बढ़ाता है, तो इसका लाभ किसानों, छोटे व्यापारियों, MSMEs, युवाओं और आम उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है।
दुनिया तेजी से बदल रही है। लंबे समय तक वैश्विक व्यापार, वित्त और तकनीक की दिशा कुछ विकसित शक्तियों के प्रभाव में रही। डॉलर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्त की सबसे महत्वपूर्ण मुद्राओं में बना हुआ है। बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां वैश्विक बाजारों में प्रभाव रखती हैं और विकासशील देशों को कई बार ऐसी आर्थिक परिस्थितियों में निर्णय लेने पड़ते हैं, जहां उनकी अपनी प्राथमिकताओं और बाहरी दबावों के बीच संतुलन बनाना कठिन हो जाता है।
भारत के सामने आज चुनौती केवल आर्थिक विकास की नहीं, बल्कि आर्थिक निर्णय लेने की स्वतंत्रता की भी है।
इसी संदर्भ में BRICS भारत के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर बन सकता है।
BRICS को अमेरिका के खिलाफ नहीं, भारत के हित में इस्तेमाल करने की जरूरत
BRICS को यदि अमेरिका या पश्चिमी देशों के विरोधी संगठन के रूप में देखा जाएगा, तो इसकी संभावनाएं सीमित हो जाएंगी। भारत की विदेश नीति की ताकत हमेशा से यह रही है कि वह अलग-अलग देशों और समूहों के साथ अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर संबंध बनाए रख सकता है।
इसलिए भारत का लक्ष्य किसी एक देश से दूरी बनाना नहीं होना चाहिए। लक्ष्य होना चाहिए कि भारत किसी भी एक देश या आर्थिक शक्ति पर अत्यधिक निर्भर न रहे।
अमेरिका भारत का महत्वपूर्ण व्यापारिक और रणनीतिक साझेदार है। यूरोप भी भारत के लिए बड़ा बाजार है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि भारत के पास विकल्प सीमित हों।
BRICS भारत को विकल्पों का विस्तार करने का अवसर देता है।
यदि भारत रूस से ऊर्जा, चीन से कुछ औद्योगिक inputs, ब्राजील से कृषि सहयोग, खाड़ी देशों से निवेश और अफ्रीकी देशों से नए बाजारों का लाभ ले सकता है तथा साथ ही अमेरिका और यूरोप के साथ भी व्यापार बढ़ा सकता है, तो भारत की bargaining power मजबूत होगी।
स्वतंत्र विदेश नीति का अर्थ किसी से दुश्मनी नहीं, बल्कि हर साझेदारी में समानता है।
समानता के आधार पर समझौते: भारत की नई व्यापार नीति का आधार
BRICS के माध्यम से भारत को एक महत्वपूर्ण सिद्धांत आगे बढ़ाना चाहिए—सभी सदस्य देशों के लिए समान अवसर और समान सम्मान।
बड़े देश छोटे देशों पर अपनी शर्तें न थोपें। व्यापार समझौते केवल बड़ी कंपनियों के हित में न हों। निवेश के नाम पर स्थानीय उद्योग कमजोर न हों। तकनीकी सहयोग में ज्ञान और क्षमता का हस्तांतरण भी हो।
भारत को BRICS में प्रस्ताव रखना चाहिए कि व्यापार समझौतों में तीन स्तरों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए:
पहला—राष्ट्रीय हित।
किसी भी समझौते से भारत की खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और आवश्यक उद्योगों की क्षमता कमजोर नहीं होनी चाहिए।
दूसरा—छोटे कारोबार की सुरक्षा।
बड़े multinational कारोबार को मिलने वाली सुविधाओं के साथ छोटे व्यापारियों, MSMEs और घरेलू उत्पादकों के लिए भी बाजार तक पहुंच सुनिश्चित हो।
तीसरा—तकनीक और निवेश में पारदर्शिता।
विदेशी निवेश केवल बाजार हासिल करने का माध्यम न बने, बल्कि स्थानीय रोजगार, उत्पादन और तकनीकी क्षमता भी बढ़ाए।
यही वह दृष्टिकोण है जो BRICS को केवल बड़े देशों का मंच बनने से रोककर जनता की अर्थव्यवस्था से जोड़ सकता है।
छोटे व्यापारियों के लिए BRICS में बड़ा अवसर
भारत की अर्थव्यवस्था में छोटे व्यापारी, कारीगर, दुकानदार, छोटे निर्माता और MSMEs महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय व्यापार का लाभ अक्सर बड़ी कंपनियों तक सीमित रह जाता है।
BRICS इस स्थिति को बदल सकता है।
भारत को BRICS Small Business Trade Network बनाने का प्रस्ताव रखना चाहिए।
इसके अंतर्गत भारत का छोटा व्यापारी ब्राजील, UAE, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इंडोनेशिया या अन्य सदस्य देशों के खरीदारों से सीधे जुड़ सके।
इसके लिए एक साझा डिजिटल marketplace बनाया जा सकता है।
मान लीजिए उत्तर प्रदेश का कोई छोटा कपड़ा निर्माता अपने उत्पाद को दक्षिण अफ्रीका में बेच सकता है। मुरादाबाद का हस्तशिल्प उत्पादक ब्राजील में ग्राहक खोज सकता है। जयपुर का छोटा आभूषण व्यवसाय UAE के बाजार में पहुंच सकता है। केरल का मसाला व्यापारी मिस्र या इंडोनेशिया के खरीदारों से जुड़ सकता है।
इसके लिए छोटे कारोबारियों को चाहिए:
- सरल export registration
- कम लागत वाला payment system
- सस्ता व्यापार ऋण
- साझा digital marketplace
- भरोसेमंद buyer verification
- सरल customs व्यवस्था
- कम transaction charges
- छोटे निर्यातकों के लिए बीमा
यदि BRICS यह व्यवस्था बनाता है, तो वैश्विक व्यापार का लाभ केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रहेगा।
BRICS मुद्रा: जल्दबाजी नहीं, लेकिन गंभीर प्रगति जरूरी
BRICS की सबसे चर्चित संभावनाओं में एक साझा मुद्रा है।
यह विचार आकर्षक है, लेकिन भारत को इसमें भावनाओं के बजाय आर्थिक वास्तविकताओं के आधार पर आगे बढ़ना चाहिए।
एक साझा मुद्रा के लिए सदस्य देशों को monetary policy, inflation, fiscal discipline, foreign exchange reserves और financial regulation जैसे क्षेत्रों में बहुत गहरा समन्वय करना पड़ेगा।
इसलिए तत्काल एक पूर्ण BRICS currency लागू करना कठिन हो सकता है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि भारत को इस दिशा में काम नहीं करना चाहिए।
पहला कदम हो सकता है—BRICS में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाना।
यदि भारत और कोई दूसरा BRICS देश आपसी व्यापार का एक हिस्सा रुपये और उसकी स्थानीय मुद्रा में कर सकते हैं, तो हर लेनदेन में डॉलर की आवश्यकता कम हो सकती है।
दूसरा कदम—BRICS payment infrastructure।
तीसरा—एक साझा accounting या settlement unit पर अध्ययन।
चौथा—भविष्य में BRICS Reserve या settlement mechanism की संभावना पर काम।
यदि BRICS currency भविष्य में आर्थिक रूप से व्यवहार्य साबित होती है, तो भारत को उसमें अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए।
BRICS Bank को भारत की प्राथमिकता बनना चाहिए
BRICS की सबसे उपयोगी संस्थाओं में New Development Bank यानी BRICS Bank है।
यह संस्था भविष्य में भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण हो सकती है।
भारत को BRICS Bank की lending capacity बढ़ाने और विकासशील देशों के लिए सस्ता वित्त उपलब्ध कराने की दिशा में काम करना चाहिए।
भारत के लिए प्राथमिक क्षेत्र हो सकते हैं:
- ग्रामीण बुनियादी ढांचा
- सिंचाई
- renewable energy
- रेलवे और परिवहन
- affordable housing
- छोटे उद्योग
- कृषि processing
- जल प्रबंधन
- डिजिटल infrastructure
- रोजगार पैदा करने वाली परियोजनाएं
यदि BRICS Bank बड़े infrastructure projects के साथ छोटे और मध्यम कारोबार को भी financing उपलब्ध कराए, तो उसका प्रभाव कहीं अधिक व्यापक होगा।
BRICS Bank का नया मॉडल
भारत को प्रस्ताव रखना चाहिए कि BRICS Bank में एक विशेष Small Enterprise Development Window बनाई जाए।
इससे छोटे उद्योगों को:
सस्ता ऋण + तकनीकी सहायता + export finance + insurance
एक साथ मिल सके।
यह व्यवस्था भारत के छोटे उद्यमियों को वैश्विक बाजार में बड़ी कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने में मदद कर सकती है।
BRICS में कृषि और किसान को केंद्र में लाना जरूरी
भारत की बड़ी आबादी आज भी कृषि और उससे जुड़े रोजगार पर निर्भर है।
इसलिए BRICS की आर्थिक चर्चा केवल GDP और international trade तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
भारत को BRICS Agricultural Cooperation Fund की दिशा में काम करना चाहिए।
इसमें climate-resilient खेती, कम लागत की तकनीक, irrigation, food processing, storage, कृषि अनुसंधान और छोटे किसानों के लिए finance पर सहयोग किया जा सकता है।
BRICS देशों के बीच agricultural technology exchange से किसानों की लागत घटाने और उत्पादन बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
साथ ही खाद्य संकट के समय सदस्य देशों के बीच emergency food cooperation mechanism विकसित किया जा सकता है।
भारत के लिए सबसे बड़ा लाभ: नीति बनाने की स्वतंत्रता
BRICS का वास्तविक लाभ केवल व्यापार बढ़ाने में नहीं है।
इसका बड़ा लाभ यह हो सकता है कि भारत को अंतरराष्ट्रीय आर्थिक निर्णयों में अधिक विकल्प मिलें।
यदि भारत के पास अमेरिका, यूरोप, BRICS और अन्य वैश्विक बाजारों के साथ समानता के आधार पर व्यापार करने की क्षमता होगी, तो किसी एक बाजार या वित्तीय व्यवस्था के दबाव का प्रभाव कम होगा।
यही आर्थिक रणनीतिक स्वायत्तता है।
भारत को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते में उसकी घरेलू अर्थव्यवस्था, रोजगार, किसानों और छोटे कारोबारियों के हित पीछे न छूटें।
BRICS को केवल सरकारों का मंच नहीं बनना चाहिए
BRICS की एक बड़ी कमजोरी यह है कि इसकी गतिविधियां आम जनता तक बहुत कम पहुंचती हैं।
भारत की अध्यक्षता में BRICS को People-to-People BRICS का मजबूत कार्यक्रम शुरू करना चाहिए।
इसके अंतर्गत:
- छोटे व्यापारियों के सम्मेलन
- किसान उत्पादक संगठनों की बैठक
- startup exchanges
- university cooperation
- युवा उद्यमी कार्यक्रम
- महिला उद्यमिता नेटवर्क
- कलाकारों और कारीगरों के व्यापार मेले
आयोजित किए जा सकते हैं।
https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
इससे BRICS केवल राष्ट्राध्यक्षों और मंत्रियों का मंच नहीं रहेगा।
भारत को किन पांच ठोस प्रस्तावों पर जोर देना चाहिए?
पहला—BRICS Local Currency Trade Mechanism:
सदस्य देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार के लिए सुरक्षित और पारदर्शी व्यवस्था।
दूसरा—BRICS Development Bank 2.0:
NDB की पूंजी और lending capacity बढ़ाकर छोटे उद्योग, कृषि और infrastructure को सस्ता finance।
https://politicsinsightindia.com/mmdr-amendment-bill-2026-farmer-land-acquisition-partnership
तीसरा—BRICS Small Business Marketplace:
छोटे व्यापारियों और MSMEs के लिए साझा डिजिटल बाजार।
चौथा—BRICS Settlement Unit:
भविष्य की साझा मुद्रा की दिशा में अध्ययन और चरणबद्ध वित्तीय सहयोग।
पांचवां—BRICS Social Development Fund:
स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, ग्रामीण infrastructure और climate resilience जैसी परियोजनाओं के लिए वित्त।
https://politicsinsightindia.com/police-janta-ki-hai-ya-sarkar-ki-lathicharge-vijay-bayan
क्या BRICS भारत को अमेरिकी दबाव से बाहर निकाल सकता है?
हां, लेकिन इसे सही अर्थों में समझना होगा।
भारत को अमेरिका के खिलाफ कोई नया आर्थिक युद्ध नहीं चाहिए। भारत को चाहिए विकल्पों की स्वतंत्रता।
यदि किसी देश के पास केवल एक बड़ा बाजार है, तो उसकी negotiating power सीमित हो सकती है। यदि उसके पास अनेक बाजार, अनेक वित्तीय स्रोत, अनेक technology partners और अनेक supply chains हों, तो वह अधिक स्वतंत्र निर्णय ले सकता है।
https://politicsinsightindia.com/pradhanmantri-janta-dimaghi-naxal-naraz-foofa-satta-janata-alochna
BRICS भारत को यही अवसर देता है।
इसलिए लक्ष्य होना चाहिए:
अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता से बचाव।
भुगतान के विकल्प बढ़ाना।
वैश्विक व्यवस्था में समान प्रतिनिधित्व।
https://politicsinsightindia.com/gdp-growth-corporate-profit-employment-common-man-india
छोटे कारोबार के लिए समान अवसर।
मजबूत वित्तीय आधार तैयार करना।
निष्कर्ष: BRICS भारत के लिए एक रणनीतिक अवसर है
भारत की BRICS अध्यक्षता को केवल विदेश नीति की उपलब्धि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह भारत के लिए अपनी आर्थिक प्राथमिकताओं को वैश्विक मंच पर रखने का अवसर है।
यदि भारत BRICS में समानता आधारित व्यापार, स्थानीय मुद्रा में भुगतान, मजबूत BRICS Bank, छोटे व्यापारियों के लिए वैश्विक बाजार, कृषि सहयोग और सामाजिक विकास को प्राथमिकता देता है, तो संगठन का लाभ सीधे भारतीय समाज तक पहुंच सकता है।
भारत को किसी शक्ति-गुट का हिस्सा बनने की जरूरत नहीं है। भारत को अपनी शक्ति बढ़ाने वाली बहु-विकल्पीय वैश्विक व्यवस्था बनाने की जरूरत है।
BRICS का सबसे अच्छा भविष्य तब होगा जब वह यह संदेश दे:
दुनिया को एक नए प्रभुत्व की नहीं, बल्कि समान भागीदारी की जरूरत है।
और भारत इस परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
सुझाव स्पष्ट है—BRICS को “कौन किसके खिलाफ है” के मंच से निकालकर “किस तरह सभी को बेहतर अवसर मिल सकते हैं” के मंच में बदलना चाहिए।
https://politicsinsightindia.com/beej-khad-dawa-kisan-hi-jahar-ka-doshi-kyon
यदि भारत ऐसा करने में सफल रहता है, तो BRICS केवल वैश्विक राजनीति में भारत का प्रभाव नहीं बढ़ाएगा, बल्कि व्यापारियों, किसानों, MSMEs, युवाओं और आम नागरिकों के लिए आर्थिक अवसरों का नया रास्ता भी खोल सकता है।
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