क्या भाजपा का झंडा राष्ट्रवाद का प्रमाणपत्र है? कर्नाटक हाईकोर्ट की टिप्पणी पर उठे न्यायपालिका की निष्पक्षता के सवाल

कर्नाटक हाईकोर्ट की भाजपा रैली में 'पाकिस्तान जिंदाबाद' का नारा असंभव बताने वाली टिप्पणी ने न्यायपालिका की निष्पक्षता, राजनीतिक पहचान और संविधान के अनुच्छेद 14 पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

क्या भाजपा का झंडा राष्ट्रवाद का प्रमाणपत्र है? कर्नाटक हाईकोर्ट की टिप्पणी पर उठे न्यायपालिका की निष्पक्षता के सवाल

क्या अब अदालतें पार्टी देखकर तय करेंगी कौन राष्ट्रवादी है? 

By- Chaudhary Sudhir Talyan

भाजपा की रैली में 'पाकिस्तान जिंदाबाद' का नारा लगना असंभव! कर्नाटक हाईकोर्ट की यह टिप्पणी केवल एक मुकदमे को रद्द करने तक सीमित नहीं है। सवाल यह है कि क्या अब राजनीतिक दलों की पहचान के आधार पर अदालतें तय करेंगी कि कौन देशभक्त है और कौन देशविरोधी?

भारतीय लोकतंत्र में संविधान सर्वोच्च है। अदालतों की जिम्मेदारी संविधान की रक्षा करना, नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा करना और कानून के सामने सभी को समान मानना है। न्यायपालिका की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके फैसलों में राजनीतिक पहचान, विचारधारा, सत्ता और संगठन का कोई प्रभाव दिखाई न दे। लेकिन जब किसी न्यायिक आदेश में राजनीतिक दल की पहचान को किसी कथित घटना की संभावना या असंभावना का आधार बनाया जाता है, तो स्वाभाविक रूप से गंभीर संवैधानिक प्रश्न पैदा होते हैं।

कर्नाटक हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति वी. श्रीशानंद की हालिया टिप्पणी ने इसी बहस को जन्म दिया है।

28 अक्टूबर 2026 को डी.एस. रवि कुमार बनाम कर्नाटक राज्य मामले में सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी द्वारा आयोजित प्रदर्शन में प्रदर्शनकारियों द्वारा 'पाकिस्तान जिंदाबाद' का नारा लगाया जाना अत्यंत असंभव है।

सवाल यह नहीं है कि आरोपी को राहत क्यों मिली। न्यायालय को अधिकार है कि वह साक्ष्यों और कानून के आधार पर किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही रद्द करे। असली सवाल न्यायाधीश की उस टिप्पणी का है जिसमें एक राजनीतिक दल की पहचान को कथित आचरण की संभाव्यता का आधार बनाया गया।

क्या अब अदालतों में न्याय का मूल्यांकन राजनीतिक दलों के चरित्र प्रमाणपत्र से होगा? क्या किसी पार्टी का झंडा किसी व्यक्ति की राष्ट्रभक्ति का प्रमाण बन जाएगा? और क्या न्यायपालिका यह तय करने लगेगी कि किस राजनीतिक संगठन का समर्थक क्या कर सकता है और क्या नहीं?

1. भाजपा की रैली में ऐसा होना असंभव! लेकिन किस आधार पर?

मामला दिसंबर 2022 में कर्नाटक के मांड्या में आयोजित भाजपा समर्थकों के एक प्रदर्शन से जुड़ा है। शिकायतकर्ता कन्नंबाड़ी कुमार ने आरोप लगाया था कि प्रदर्शन के दौरान 'पाकिस्तान जिंदाबाद' का नारा लगाया गया। इस संबंध में पुलिस ने 2024 में IPC की धारा 153B और 505(1)(b) के तहत मामला दर्ज किया।

आरोपी की ओर से अदालत में दलील दी गई कि प्रदर्शन के दौरान नारेबाजी के उत्साह में 'पाकिस्तान मुर्दाबाद' की जगह गलती से 'पाकिस्तान जिंदाबाद' शब्द निकल गया था। राज्य सरकार ने इसका विरोध करते हुए कहा कि उपलब्ध वीडियो में कथित नारा स्पष्ट सुनाई देता है और जांच जारी रहनी चाहिए।

लेकिन न्यायालय ने टिप्पणी की कि भाजपा द्वारा आयोजित प्रदर्शन में इस तरह का नारा लगना अत्यंत असंभव है।

यहीं से न्यायिक तर्क पर सवाल उठता है।

क्या किसी राजनीतिक दल की विचारधारा उसके प्रत्येक समर्थक के व्यक्तिगत आचरण की गारंटी हो सकती है? क्या किसी संगठन का सदस्य होने मात्र से व्यक्ति के कथित व्यवहार की संभावना समाप्त हो जाती है?

राजनीतिक दलों में लाखों कार्यकर्ता और समर्थक होते हैं। उनके व्यक्तिगत आचरण की जिम्मेदारी संबंधित व्यक्ति की होती है। कोई भी संगठन अपने प्रत्येक सदस्य के व्यवहार की पूर्ण गारंटी नहीं दे सकता।

यदि भाजपा की रैली में ऐसा होना असंभव माना जा सकता है, तो क्या यही कसौटी कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी या किसी अन्य संगठन के लिए भी लागू होगी?

न्यायपालिका को किसी राजनीतिक दल की छवि के आधार पर नहीं, बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों और कानून के आधार पर निष्कर्ष निकालना चाहिए।

2. क्या राजनीतिक दल अब राष्ट्रवाद के प्रमाणपत्र जारी करेंगे?

भारत में राष्ट्रवाद किसी राजनीतिक पार्टी की निजी संपत्ति नहीं है। संविधान के प्रति निष्ठा किसी दल की सदस्यता से पैदा नहीं होती। देशभक्ति किसी चुनावी घोषणा पत्र, पार्टी कार्यालय या राजनीतिक नारे से प्रमाणित नहीं होती।

इस देश का किसान, मजदूर, पत्रकार, विद्यार्थी, कर्मचारी, आंदोलनकारी और आम नागरिक भी उतना ही राष्ट्र का हिस्सा है जितना किसी राजनीतिक दल का कार्यकर्ता।

लोकतंत्र में राजनीतिक दलों को सरकार बनाने का अधिकार मिलता है, राष्ट्रवाद की एकाधिकार वाली परिभाषा बनाने का नहीं।

न्यायपालिका का दायित्व तो इससे भी अधिक गंभीर है। उसे राजनीतिक विचारधाराओं से ऊपर रहकर नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करनी होती है।

यदि किसी विपक्षी दल के प्रदर्शन में कोई विवादास्पद नारा लगने का आरोप सामने आए, तो क्या अदालत यह मान सकती है कि उस दल की विचारधारा ऐसी है, इसलिए आरोप सही होगा?

और यदि सत्तारूढ़ दल के किसी समर्थक पर ऐसा आरोप लगे, तो क्या संगठन की राजनीतिक पहचान के आधार पर उसे असंभव मान लिया जाएगा?

न्याय का सिद्धांत यह नहीं हो सकता कि राजनीतिक पहचान के आधार पर आरोप की विश्वसनीयता बदल जाए।

3. न्यायाधीश की टिप्पणी ने निष्पक्षता की बहस क्यों पैदा की?

न्यायाधीश का पद केवल कानूनी अधिकार का पद नहीं है, बल्कि सार्वजनिक विश्वास की जिम्मेदारी भी है।

अदालत का प्रत्येक निर्णय नागरिकों को यह भरोसा दिलाना चाहिए कि न्यायिक प्रक्रिया में सभी व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार होगा।

न्यायिक टिप्पणी में जब किसी विशेष राजनीतिक दल का उल्लेख करके यह कहा जाता है कि उसके प्रदर्शन में कोई विशेष आचरण होना अत्यंत असंभव है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि इस निष्कर्ष का वस्तुनिष्ठ आधार क्या है?

राजनीतिक दलों की विचारधारा और उनके समर्थकों के व्यक्तिगत व्यवहार में अंतर होता है। इस अंतर को नजरअंदाज करके किसी राजनीतिक संगठन की सामूहिक छवि को न्यायिक अनुमान का आधार बनाना भविष्य के मामलों में गलत मिसाल पैदा कर सकता है।

न्यायाधीशों को राजनीतिक दलों के चरित्र प्रमाणपत्र जारी करने की आवश्यकता नहीं है। उनकी जिम्मेदारी कानून के प्रावधानों की व्याख्या करना और साक्ष्यों के आधार पर न्याय करना है।

न्यायपालिका की निष्पक्षता केवल वास्तविक पक्षपात से मुक्त होने में नहीं, बल्कि उसके निर्णयों में निष्पक्षता का विश्वास दिखाई देने में भी निहित है।

4. मुकदमा रद्द करने के कानूनी आधार और राजनीतिक टिप्पणी में अंतर समझना जरूरी

इस मामले में हाईकोर्ट के पास आपराधिक कार्यवाही रद्द करने के कुछ स्वतंत्र कानूनी आधार भी थे।

घटना दिसंबर 2022 की थी, जबकि शिकायत लगभग दो साल बाद वीडियो के आधार पर दर्ज कराई गई। अदालत ने जांच एजेंसी की कमियों को भी रेखांकित किया। जांच में प्रदर्शनकारियों की पहचान और कथित नारे के कारण पैदा हुई सामाजिक अशांति के संबंध में पर्याप्त जानकारी सामने नहीं आई थी।

इसके अतिरिक्त, IPC की धारा 153B के आवश्यक तत्व आकर्षित नहीं होने की बात कही गई।

IPC की धारा 505(1)(b) के तहत अभियोजन के लिए CrPC की धारा 196 के अंतर्गत आवश्यक पूर्व मंजूरी भी प्राप्त नहीं की गई थी।

इन कानूनी आधारों पर अदालत का हस्तक्षेप अलग विषय है। किसी व्यक्ति के खिलाफ अपर्याप्त साक्ष्य होने या आवश्यक कानूनी प्रक्रिया का पालन न होने पर कार्यवाही रद्द करना न्यायिक अधिकार का हिस्सा है।

लेकिन प्रश्न यह है कि जब मुकदमा रद्द करने के लिए कानूनी आधार मौजूद थे, तब किसी राजनीतिक दल की पहचान को कथित नारे की असंभाव्यता का आधार बनाने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई?

न्यायिक निर्णय का आधार कानून होना चाहिए, राजनीतिक संगठन की प्रतिष्ठा नहीं।

5. क्या विपक्षी दलों के लिए न्याय की कसौटी अलग होगी?

यह मामला एक बड़ा काल्पनिक लेकिन जरूरी संवैधानिक प्रश्न खड़ा करता है।

मान लीजिए किसी विपक्षी राजनीतिक दल की रैली में ऐसा ही विवादास्पद नारा लगाने का आरोप सामने आता है। आरोपी कहता है कि उससे गलती हुई। वीडियो की प्रामाणिकता पर सवाल उठते हैं। शिकायत दो साल बाद दर्ज होती है और पुलिस की जांच में भी गंभीर कमियां रहती हैं।

क्या उस मामले में भी अदालत यही कहेगी कि संबंधित राजनीतिक दल के प्रदर्शन में ऐसा नारा लगना असंभव है?

या राजनीतिक संगठन की पहचान बदलने से न्यायिक अनुमान भी बदल जाएगा?

यह सवाल किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में नहीं है। यह कानून की समानता का सवाल है।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 सभी व्यक्तियों को कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण की गारंटी देता है।

इसका अर्थ है कि नागरिकों के अधिकार और कानूनी जवाबदेही राजनीतिक पहचान के आधार पर निर्धारित नहीं किए जा सकते।

यदि न्यायिक तर्क में राजनीतिक पहचान को विशेष महत्व मिलता दिखाई देगा, तो आम नागरिक के मन में न्याय की समानता को लेकर संदेह पैदा होना स्वाभाविक है।

6. न्यायपालिका को राजनीतिक धारणाओं से ऊपर रहना होगा

भारत में न्यायपालिका के सामने पहले से ही एक बड़ी जिम्मेदारी है। नागरिकों को यह विश्वास होना चाहिए कि सरकार की आलोचना करने वाला व्यक्ति हो या सरकार का समर्थन करने वाला, दोनों को समान न्याय मिलेगा।

किसान आंदोलन हो, बेरोजगार युवाओं का प्रदर्शन हो, पत्रकारों की अभिव्यक्ति हो या किसी राजनीतिक दल की रैली—कानून का एक ही सिद्धांत लागू होना चाहिए।

यदि किसी नागरिक के खिलाफ राष्ट्रविरोधी गतिविधि का आरोप है, तो उसकी जांच साक्ष्यों के आधार पर होनी चाहिए। लेकिन केवल राजनीतिक विचारधारा, संगठन या विरोध के आधार पर किसी को दोषी या निर्दोष मान लेना न्यायिक प्रक्रिया की मूल भावना के अनुरूप नहीं होगा।

न्यायाधीशों के शब्द केवल आदेश की भाषा नहीं होते। वे न्यायपालिका की संस्थागत विश्वसनीयता को भी प्रभावित करते हैं।

इसलिए राजनीतिक दलों से संबंधित मामलों में न्यायिक टिप्पणियों का विशेष रूप से संतुलित और साक्ष्य आधारित होना आवश्यक है।

निष्कर्ष: अदालतों में पार्टी नहीं, संविधान सर्वोच्च होना चाहिए!

कर्नाटक हाईकोर्ट का यह मामला केवल एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमे के खारिज होने की खबर नहीं है। इसने भारतीय न्याय व्यवस्था के सामने एक महत्वपूर्ण बहस रख दी है।

आरोपी को कानूनी राहत मिलना एक बात है, लेकिन किसी राजनीतिक दल की पहचान के आधार पर उसके समर्थकों के कथित व्यवहार को असंभव बताना दूसरी बात है।

न्यायपालिका को यह अधिकार है कि वह सरकार के फैसलों की समीक्षा करे, पुलिस की जांच पर सवाल उठाए और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करे। लेकिन उसकी सबसे बड़ी शक्ति उसकी निष्पक्षता है।

क्या अब अदालतें राजनीतिक दलों के हिसाब से तय करेंगी कि कौन राष्ट्रवादी है? क्या किसी पार्टी का सदस्य होना देशभक्ति का प्रमाणपत्र बन जाएगा? क्या विपक्षी दलों के समर्थकों के लिए न्यायिक अनुमान की कसौटी अलग होगी?

इन सवालों का उत्तर न्यायपालिका की संस्थागत निष्पक्षता और संवैधानिक मूल्यों में ही मिलना चाहिए।

भारत का संविधान किसी राजनीतिक दल को राष्ट्रवाद का ठेकेदार नहीं बनाता। न ही वह न्यायपालिका को राजनीतिक दलों की विचारधारा के आधार पर नागरिकों के आचरण का पूर्वानुमान लगाने की जिम्मेदारी देता है।

अदालत का काम यह तय करना है कि कानून क्या कहता है, साक्ष्य क्या साबित करते हैं और संविधान किसकी रक्षा करता है।

न्याय की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति किसी पार्टी की राजनीतिक प्रतिष्ठा का संरक्षक नहीं, संविधान और नागरिक अधिकारों का संरक्षक होता है।

लोकतंत्र में न्यायपालिका की विश्वसनीयता तभी बनी रह सकती है जब देश के नागरिकों को यह भरोसा हो कि अदालत में किसी व्यक्ति की पहचान उसके राजनीतिक झंडे से नहीं, बल्कि कानून और साक्ष्यों से तय होगी।

क्योंकि जिस दिन नागरिकों को यह संदेह होने लगे कि न्याय की कसौटी राजनीतिक पहचान के अनुसार बदल सकती है, उस दिन केवल किसी एक फैसले पर नहीं, बल्कि पूरी न्यायिक व्यवस्था में सार्वजनिक विश्वास पर बहस शुरू हो जाएगी।

संदर्भ एवं स्रोत (References)

  1. LiveLaw: Unlikely That BJP Protesters Would Raise “Pakistan Zindabad” Slogan: Karnataka High Court Quashes Case — 4 November 2026.
    LiveLaw की मूल रिपोर्ट

  2. Bar & Bench: Unlikely that 'Pakistan Zindabad' slogan will be raised at BJP rally: Karnataka HC quashes case against participant.
    Bar & Bench की रिपोर्ट

  3. Scroll.in: Karnataka HC quashes case against man who shouted ‘Pakistan Zindabad’ at BJP rally ‘by mistake’.
    Scroll.in की रिपोर्ट

  4. Moneycontrol: Karnataka High Court quashes case against BJP member over 'Pakistan Zindabad' slogan.
    Moneycontrol की रिपोर्ट

  5. Bar & Bench Hindi: कर्नाटक हाईकोर्ट की टिप्पणी और मामले का हिंदी विवरण।
    हिंदी रिपोर्ट पढ़ें

  6. मूल न्यायिक निर्णय: D.S. Ravi Kumar v. State of Karnataka & Anr., W.P. No. 20693 of 2024 (GM-RES), निर्णय दिनांक 28 अक्टूबर 2026, कर्नाटक हाईकोर्ट।
    निर्णय एवं कानूनी विवरण पढ़ें

संवैधानिक एवं कानूनी संदर्भ

  1. भारतीय संविधान — अनुच्छेद 14: कानून के समक्ष समानता।

  2. भारतीय संविधान — अनुच्छेद 19(1)(a): अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।

  3. भारतीय संविधान — अनुच्छेद 19(1)(b): शांतिपूर्ण सभा का अधिकार।

  4. भारतीय दंड संहिता — धारा 153B और 505(1)(b)।

  5. दंड प्रक्रिया संहिता — धारा 196: अभियोजन के लिए आवश्यक पूर्व स्वीकृति।

अस्वीकरण (Disclaimer): यह लेख कर्नाटक हाईकोर्ट की सार्वजनिक रूप से उपलब्ध न्यायिक टिप्पणी एवं मीडिया रिपोर्टों के आधार पर तैयार किया गया एक स्वतंत्र संपादकीय और विचारात्मक विश्लेषण है। इसमें व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। लेख का उद्देश्य न्यायपालिका, किसी न्यायाधीश या राजनीतिक दल की व्यक्तिगत छवि को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि न्यायिक निष्पक्षता, संवैधानिक समानता और लोकतांत्रिक जवाबदेही पर स्वस्थ सार्वजनिक बहस को प्रोत्साहित करना है। तथ्यों और कानूनी निष्कर्षों के लिए मूल न्यायिक आदेश को प्राथमिक स्रोत माना जाए।

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