“UN ने पूछा भारत से नफरत का हिसाब, अब असली सवाल—कानून मजबूत है या सत्ता के सामने कमजोर?”

UN की हेट स्पीच और हेट क्राइम पर टिप्पणी से भारत में नई बहस छिड़ी। जानिए UN की आपत्तियां, भारत का जवाब और कानून, लोकतंत्र व राष्ट्रीय हित से जुड़े असली सवाल।

“UN ने पूछा भारत से नफरत का हिसाब, अब असली सवाल—कानून मजबूत है या सत्ता के सामने कमजोर?”

By- Ch. Sudhir Taliyan

भारत को किसी विदेशी प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं, लेकिन अपने भीतर उठते सवालों से आंखें मूंदने की भी आजादी नहीं। लोकतंत्र की असली परीक्षा यह नहीं कि सरकार आलोचना को कितना खारिज कर सकती है, बल्कि यह है कि वह अपने नागरिकों को पहचान से ऊपर उठकर कितना न्याय दे सकती है।

संयुक्त राष्ट्र की नस्लीय भेदभाव उन्मूलन समिति यानी CERD ने भारत को लेकर जो टिप्पणियां की हैं, उन्होंने देश की राजनीति में एक बार फिर ‘हेट स्पीच’, ‘हेट क्राइम’, अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा, दलितों-आदिवासियों की स्थिति, प्रवासियों और शरणार्थियों के अधिकार तथा पुलिस-प्रशासन की जवाबदेही जैसे सवालों को केंद्र में ला दिया है।

भारत सरकार ने समिति की टिप्पणियों को राजनीतिक रूप से प्रेरित और दुर्भावनापूर्ण बताते हुए खारिज किया है। सरकार का तर्क है कि भारत का संविधान सभी नागरिकों को समानता, स्वतंत्रता और धार्मिक अधिकारों की गारंटी देता है तथा देश में भेदभाव और अपराध से निपटने के लिए पर्याप्त कानूनी प्रावधान मौजूद हैं।

यह जवाब भारत के संप्रभु अधिकारों के लिहाज से महत्वपूर्ण है। लेकिन इससे एक असहज सवाल खत्म नहीं होता।

अगर कानून मौजूद हैं, तो क्या वे जमीन पर भी समान ताकत से लागू हो रहे हैं?

यही वह सवाल है जिससे भारत को सबसे ज्यादा गंभीरता से जूझना चाहिए।


UN की रिपोर्ट को न तो फरमान समझें, न कूड़ेदान में फेंकें

सबसे पहले इस विवाद की प्रकृति समझना जरूरी है।

CERD कोई अंतरराष्ट्रीय अदालत नहीं है जिसने भारत के खिलाफ कोई फैसला सुनाया हो। यह उस अंतरराष्ट्रीय संधि के अनुपालन की समीक्षा करने वाली विशेषज्ञ समिति है, जिसका उद्देश्य नस्लीय, जातीय और वंश आधारित भेदभाव से लड़ना है।

इसलिए उसकी टिप्पणियां अदालत के फैसले की तरह बाध्यकारी आदेश नहीं हैं।

भारत को उन्हें स्वीकार करना अनिवार्य नहीं है।

लेकिन यही बात दूसरी दिशा में भी लागू होती है। किसी रिपोर्ट को इसलिए पूरी तरह निरर्थक नहीं बनाया जा सकता कि वह भारत की आलोचना करती है।

भारत एक संप्रभु राष्ट्र है और अपनी नीतियों का निर्धारण स्वयं करेगा। मगर संप्रभुता का अर्थ यह नहीं कि देश अपने नागरिकों की शिकायतों, सामाजिक तनावों और संस्थागत कमजोरियों पर बहस करना बंद कर दे।

राष्ट्रवाद का सबसे स्वस्थ रूप आत्मविश्वास है, आत्ममुग्धता नहीं।

अगर कोई अंतरराष्ट्रीय संस्था भारत पर गलत आरोप लगाती है, तो भारत को आंकड़ों और तथ्यों के साथ जवाब देना चाहिए। लेकिन यदि किसी आरोप में वास्तविक समस्या की छाया दिखाई देती है, तो उसे केवल ‘भारत विरोध’ कहकर दबा देना आत्मविश्वासी राष्ट्र की निशानी नहीं होगी।


हेट स्पीच: शब्द कब अपराध बनते हैं?

CERD ने भारत में हेट स्पीच के लिए एक व्यापक और स्पष्ट कानूनी ढांचे की आवश्यकता पर सवाल उठाया है। समिति के अनुसार भारतीय कानूनों में विभिन्न प्रकार की आपत्तिजनक और उकसाऊ अभिव्यक्तियों से निपटने के प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन नस्लीय और जातीय भेदभाव के संदर्भ में एक समग्र व्यवस्था का अभाव चिंता का विषय है।

यहीं सबसे कठिन संवैधानिक प्रश्न पैदा होता है।

भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मौलिक अधिकार है। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना, राजनीतिक विरोध, धार्मिक विचारों पर बहस, व्यंग्य और असहमति की आवाज को कुचलना किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं हो सकता।

लेकिन क्या किसी समुदाय को लगातार निशाना बनाना, उसे समाज के लिए खतरा बताना, उसके खिलाफ हिंसा के लिए उकसाना और उसकी नागरिक हैसियत पर सामूहिक संदेह पैदा करना भी उसी स्वतंत्रता के भीतर रखा जा सकता है?

नहीं।

लेकिन इसके साथ एक और ‘नहीं’ भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

सरकार को इतनी व्यापक शक्ति भी नहीं दी जा सकती कि वह अपनी आलोचना को ही हेट स्पीच घोषित कर दे।

यही लोकतांत्रिक संतुलन भारत को खुद तय करना होगा।

कानून ऐसा होना चाहिए जो नफरत और हिंसा को रोके, मगर असहमति का गला न घोंटे।


असली बीमारी कानून की कमी से ज्यादा कानून के चयनात्मक इस्तेमाल की है

भारत में कानूनों की कोई कमी नहीं है। समस्या अक्सर कानून की किताब में नहीं, उसके इस्तेमाल में पैदा होती है।

थाने में शिकायत दर्ज कराने से लेकर अदालत में फैसला आने तक एक गरीब और प्रभावशाली व्यक्ति का अनुभव एक जैसा नहीं होता। राजनीतिक संरक्षण, सामाजिक प्रभाव, आर्थिक क्षमता और प्रशासनिक पहुंच कई बार न्याय की गति और दिशा को प्रभावित करते हैं।

यही वह बिंदु है जहां हेट क्राइम का प्रश्न सामान्य अपराध से अलग हो जाता है।

यदि किसी व्यक्ति पर निजी दुश्मनी के कारण हमला होता है, तो वह एक अपराध है।

लेकिन यदि किसी व्यक्ति को उसकी जाति, नस्लीय पहचान, जातीय पृष्ठभूमि या समुदाय के कारण चुना जाता है, तो अपराध के पीछे सामाजिक घृणा की एक अतिरिक्त परत मौजूद है।

उस प्रेरणा की पहचान करना जरूरी है।

क्योंकि यदि पुलिस केवल ‘मारपीट’, ‘हत्या’, ‘दंगा’ या ‘हमला’ लिखकर फाइल बंद कर देती है, तो यह पता लगाना कठिन हो जाता है कि अपराध व्यक्तिगत था या किसी समुदाय को डराने की व्यापक मानसिकता का हिस्सा।

घृणा की प्रेरणा को दर्ज किए बिना घृणा आधारित अपराध का वास्तविक आंकड़ा सामने नहीं आ सकता।


राजनीति में नफरत का इस्तेमाल सबसे खतरनाक मोड़ है

सामान्य नागरिक की भाषा और सत्ता के करीब बैठे व्यक्ति की भाषा में फर्क होता है।

एक आम व्यक्ति की उत्तेजक टिप्पणी कुछ लोगों तक सीमित रह सकती है। लेकिन किसी बड़े राजनीतिक नेता का वक्तव्य लाखों लोगों तक पहुंच सकता है।

जब राजनीतिक मंच पर किसी समुदाय को बार-बार संदेह, खतरे या दुश्मन की भाषा में प्रस्तुत किया जाता है, तो उसका प्रभाव चुनावी भाषण खत्म होने के साथ समाप्त नहीं होता।

वह सामाजिक संबंधों में प्रवेश करता है।

पड़ोस में।

बाजार में।

स्कूल में।

सोशल मीडिया में।

और अंततः कभी-कभी सड़क की हिंसा में।

इसीलिए सार्वजनिक जीवन में शब्दों की जिम्मेदारी सामान्य नागरिक से अधिक होनी चाहिए।

राजनीति लोकतंत्र को दिशा देती है; अगर वही राजनीति समाज में स्थायी शत्रु पैदा करने लगे तो लोकतंत्र की सामाजिक नींव कमजोर होती है।


लेकिन भारत को ‘लेक्चर’ की जरूरत नहीं

यहां भारत का पक्ष भी पूरी मजबूती से सामने रखना होगा।

भारत ने संविधान के माध्यम से समानता और भेदभाव-विरोध का व्यापक ढांचा तैयार किया। अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा मौजूद है। धार्मिक स्वतंत्रता को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। न्यायपालिका, चुनाव आयोग, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और अन्य संस्थाएं भी नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए मौजूद हैं।

भारत की सामाजिक विविधता इतनी विशाल है कि इसे किसी पश्चिमी सामाजिक मॉडल के पैमाने से पूरी तरह नहीं समझा जा सकता।

यहां जाति का प्रश्न है, जो कई बार नस्लीय या धार्मिक पहचान से अलग होकर काम करता है।

यहां भाषा का प्रश्न है।

क्षेत्रीय अस्मिता है।

आदिवासी अधिकार हैं।

सीमा सुरक्षा है।

अवैध प्रवासन है।

आतंकवाद है।

धार्मिक ध्रुवीकरण है।

इन सभी को एक ही ‘हेट स्पीच’ के डिब्बे में डालना भारतीय वास्तविकता को सरल बना देना होगा।

भारत को अपनी समस्याओं का समाधान अपनी संवैधानिक समझ और लोकतांत्रिक अनुभव से करना होगा।


रोहिंग्या और अवैध प्रवासन: मानवाधिकार बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा की झूठी लड़ाई

CERD ने रोहिंग्या, प्रवासियों और शरण मांगने वालों के साथ व्यवहार पर भी चिंता जताई है।

यहां भारत के लिए भावनात्मक नहीं, बल्कि व्यावहारिक दृष्टिकोण आवश्यक है।

भारत को अपनी सीमाओं की रक्षा करने का पूरा अधिकार है।

अवैध घुसपैठ को रोकना सरकार का कर्तव्य है।

राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता।

आतंकवादी नेटवर्क, मानव तस्करी और फर्जी दस्तावेजों के खिलाफ कठोर कार्रवाई जरूरी है।

लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर हर व्यक्ति को अपराधी मान लेना भी उचित नहीं।

सुरक्षा नीति व्यक्ति के कृत्य और प्रमाण पर आधारित होनी चाहिए, उसकी सामूहिक पहचान पर नहीं।

यदि कोई विदेशी नागरिक कानून तोड़ता है तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन किसी पूरे समुदाय को अपराधी मान लेना न सुरक्षा है और न न्याय।

भारत को यह अंतर दुनिया के सामने भी स्पष्ट करना चाहिए और अपने प्रशासनिक तंत्र में भी सुनिश्चित करना चाहिए।


NRC और नागरिकता का प्रश्न

नागरिकता का सवाल भारत के लिए बेहद संवेदनशील है।

किसी देश को यह जानने का अधिकार है कि उसका नागरिक कौन है। सीमा प्रबंधन और नागरिकता सत्यापन संप्रभु राज्य के बुनियादी अधिकार हैं।

लेकिन नागरिकता निर्धारण की प्रक्रिया पारदर्शी, प्रमाण आधारित और अपील की पर्याप्त व्यवस्था वाली होनी चाहिए।

यदि कोई वास्तविक भारतीय नागरिक प्रशासनिक प्रक्रिया की भूल से अपनी नागरिकता साबित करने में असफल रहता है, तो उसके पास न्याय पाने का प्रभावी रास्ता होना चाहिए।

किसी नागरिक को कागजों की कमी के कारण अचानक राज्य की नजर में संदिग्ध बना देना लोकतांत्रिक प्रशासन की विफलता होगी।

इसी संदर्भ में CERD ने असम और कुछ अन्य प्रक्रियाओं से जुड़े भेदभाव के आरोपों पर चिंता व्यक्त की है।

भारत को इन आरोपों को राजनीतिक युद्ध में बदलने के बजाय पारदर्शी आंकड़ों के साथ जवाब देना चाहिए।


दलित और आदिवासी भारत का भूला हुआ प्रश्न

इस पूरी बहस में एक विडंबना यह है कि ‘हेट स्पीच’ का राजनीतिक विमर्श अक्सर धर्म तक सीमित हो जाता है।

जबकि CERD ने दलितों और आदिवासी समुदायों से जुड़े मुद्दों को भी गंभीरता से उठाया है।

भारत में जातिगत भेदभाव कोई आयातित समस्या नहीं है। यह हमारी अपनी सामाजिक संरचना की ऐतिहासिक समस्या है।

संविधान ने इसके खिलाफ क्रांतिकारी हस्तक्षेप किया।

आरक्षण आया।

विशेष कानून बने।

सामाजिक न्याय की संस्थाएं बनीं।

लेकिन कानून बन जाने से समाज बदल नहीं जाता।

आज भी यदि किसी व्यक्ति की जाति उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा, रोजगार, शिक्षा, विवाह, भूमि या सुरक्षा को प्रभावित करती है, तो यह लोकतांत्रिक भारत के लिए गंभीर चुनौती है।

सामाजिक न्याय केवल सरकारी योजना नहीं; यह गणराज्य की नैतिक जिम्मेदारी है।


आंकड़ों के बिना लड़ाई केवल राजनीतिक शोर बन जाएगी

भारत को हेट क्राइम पर बेहतर डेटा की जरूरत है।

कितने मामले दर्ज हुए?

कितने मामलों में जातीय या धार्मिक घृणा प्रेरक तत्व थी?

कितने मामलों में आरोपपत्र दाखिल हुआ?

कितने मामलों में सजा हुई?

कितने मामले झूठे पाए गए?

कितने मामलों में पुलिस ने शिकायत दर्ज करने से इनकार किया?

जब तक इन सवालों के विश्वसनीय आंकड़े उपलब्ध नहीं होंगे, तब तक एक पक्ष कहेगा कि ‘देश में सब ठीक है’ और दूसरा कहेगा कि ‘देश में सब बर्बाद है।’

दोनों राजनीतिक दावे हो सकते हैं।

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सच्चाई आंकड़ों से निकलेगी।

भारत को राष्ट्रीय स्तर पर हेट क्राइम की स्पष्ट श्रेणियां, एकीकृत रिपोर्टिंग और वार्षिक सार्वजनिक आंकड़े विकसित करने पर विचार करना चाहिए।


भारत को किस दिशा में जाना चाहिए?

भारत को CERD की टिप्पणियों का जवाब तीन स्तरों पर देना चाहिए।

पहला—जहां आरोप गलत हैं, वहां ठोस तथ्य रखे जाएं।

दूसरा—जहां प्रशासनिक या कानूनी कमी वास्तविक है, वहां सुधार किया जाए।

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तीसरा—जहां राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न है, वहां भारत अपने संप्रभु अधिकारों की रक्षा दृढ़ता से करे।

लेकिन इन तीनों के ऊपर एक सिद्धांत होना चाहिए—

कानून की समानता।

न आरोपी की जाति देखी जाए।

न पीड़ित का धर्म।

न राजनीतिक झंडा।

न भाषा।

न क्षेत्र।


अंतिम सवाल भारत से है—UN से नहीं

भारत को किसी विदेशी संस्था से लोकतंत्र का प्रमाणपत्र लेने की आवश्यकता नहीं है।

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लेकिन लोकतंत्र का प्रमाणपत्र भारत अपने नागरिकों से रोज लेता है।

जब एक गरीब नागरिक पुलिस थाने जाता है और उसकी शिकायत दर्ज होती है—वह लोकतंत्र है।

जब राजनीतिक रूप से कमजोर व्यक्ति शक्तिशाली आरोपी के खिलाफ न्याय प्राप्त करता है—वह लोकतंत्र है।

जब किसी समुदाय को केवल उसकी पहचान के कारण हिंसा का निशाना नहीं बनाया जाता—वह लोकतंत्र है।

जब सरकार की आलोचना करने वाला नागरिक देशद्रोही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक नागरिक माना जाता है—वह लोकतंत्र है।

और जब किसी व्यक्ति की रक्षा इसलिए की जाती है क्योंकि वह पहले नागरिक है, बाद में किसी जाति, धर्म, भाषा या समुदाय का सदस्य—तब संविधान वास्तव में जमीन पर उतरता है।

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CERD की रिपोर्ट को भारत चाहे तो विदेशी हस्तक्षेप का मुद्दा बनाकर राजनीतिक बहस में समाप्त कर सकता है।

या फिर इसे एक अवसर की तरह देख सकता है।

अवसर—यह साबित करने का कि भारत में न्याय किसी अंतरराष्ट्रीय समिति की सिफारिश से नहीं, भारतीय संविधान की शक्ति से चलता है।

भारत को न किसी विदेशी रिपोर्ट से डरना चाहिए, न अपने भीतर की समस्याओं से।

गलत आरोपों का प्रतिरोध होना चाहिए।

सही आलोचना का परीक्षण होना चाहिए।

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राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा होनी चाहिए।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बची रहनी चाहिए।

और नफरत के नाम पर हिंसा करने वालों के लिए कानून की पकड़ मजबूत होनी चाहिए।

क्योंकि अंततः भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी सरकार नहीं, उसकी सेना नहीं, उसकी अर्थव्यवस्था नहीं—उसका संविधान और उसके नागरिकों का विश्वास है।

अगर यह विश्वास बचा रहा, तो कोई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट भारत को कमजोर नहीं कर सकती।

और अगर यही विश्वास टूट गया, तो दुनिया की कोई भी रिपोर्ट भारत को मजबूत नहीं बना सकती।

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