शंख, सनातन और सियासत: बदरीनाथ में परंपरा बनाम मंत्री के बयान से क्यों मचा बवाल?
बदरीनाथ धाम में शंख न बजाने की परंपरा और धर्मस्व मंत्री सतपाल महाराज के शंख को लेकर दिए बयान पर विवाद बढ़ गया है। धर्माचार्यों और तीर्थ पुरोहितों ने बयान पर आपत्ति जताई है। आखिर बदरीनाथ में शंख ध्वनि क्यों वर्जित मानी जाती है और मंदिर में दक्षिणावर्त शंख का क्या महत्व है? जानिए धार्मिक परंपरा, मान्यताओं और सियासत से जुड़े पूरे विवाद की कहानी।
शंख, सनातन और सियासत
डॉ बृजेश सती
बदरीनाथ में सांस्कृतिक प्रस्तुति और डीजे पर उठे सवाल अभी थमे नहीं थे, कि उत्तराखंड सरकार में धर्मस्य मंत्री के शंख दिए बयान ने बवाल मचा दिया है। शंख पर सनातनियों के विरोध के बाद इस पर सियासत भी तेज हो गई है। मंत्री के बयान से सरकार और संगठन के लिए असहज स्थिति बन गई है। बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष ने मंत्री को धर्म का ज्ञाता बताकर मामले से पल्ला झाड़ दिया। उधर विपक्षी दल कांग्रेस के साथ ही अन्य सियासी पार्टियां भी हमलावर हैं।
बदरीनाथ के अराइवल प्लाजा में कल्चरल फेस्टिवल के दौरान सांस्कृतिक प्रस्तुतियों को लेकर शुरू हुए विवाद पर अब नया रंग चढ़ गया है। धर्मस्व मंत्री के शंख पर दिये बयान के बाद वो धर्माचार्यों और तीर्थ पुरोहितों के निशाने पर आ गए हैं। दरअसल सूबे के धार्मिक मामलों के मंत्री सतपाल महाराज ने बदरीनाथ मंदिर में शंख न बजाए जाने की वजह शंख का जानवर की हड्डी से बना होना बताया। कहा इसीलिए बदरीनाथ मंदिर में शंख का उपयोग पूजा में भी नहीं किया जाता है। हालांकि बदरीनाथ मंदिर में न केवल दक्षिणावर्त शंख को गर्भगृह में रखा जाता है, बल्कि भगवान का महाअभिषेक, अभिषेक पूजा में प्रयोग किया जाता है।
शास्त्रों और श्रुति परंपरा में शंख न बजाने का कारण
बदरीनाथ धाम में शंख न बजाने का कारण, भगवान बदरी विशाल की तपस्या से जुड़ा है। वो लोक कल्याण के लिए साक्षात विराजमान हैं। शास्त्रों में वर्णन है कि योद्यापि चास्त ऋषिवर्य निषेविताङ्ररध्रि:। भगवान आज बदरीपुरी में साक्षात विराजमान हैं। ऐसे में शंख वादन का महत्व नही रह जाता।
बदरीनाथ धाम से जुड़ा एक और प्रसंग है। प्राचीन समय में दम्बोद्भव नाम का एक असुर राज रहता था।
वह अमर होना चाहता था। उसने सूर्य को प्रसन्न करने के लिए कठिन तपस्या की। सूर्य ने प्रसन्न होकर उसे एक हजार दिव्य और जादुई कवच प्रदान किए।
वरदान के अनुसार, उस कवच को वही नष्ट कर सकता था जो लगातार एक हजार वर्षों तक तपस्या करे और फिर 1000 वर्षों तक उससे युद्ध करे। इन कवच के कारण उसका नाम सहस्त्र कवच पड़ गया।
सहस्त्र कवच के बध के लिए नर नारायण ने कठोर तप किया। ऐसा कहा जाता है कि सहस्त्र कवच को मारने वाला, एक दिन में केवल एक ही कवच काट सकता था। इसलिए नर और नारायण ने 999 दिन तक 999 कवच काटे। हज़ारहवां कवच, सूर्य के कहने पर नहीं काटा और उसने कर्ण के रूप में जन्म लिया।
भगवान बदरी विशाल सतयुग से साधनरत हैं। इसलिए उनकी साधना में कोई व्यवधान ना हो, इसलिए बदरी पुरी में शंख ध्वनि वर्जित है।
एक अन्य कथा शंखचूड़ बध से संबंधित है। जिसमें भगवान ने देखा कि तुलसी तपस्या में लीन हैं, तो शंख बजाना उचित नहीं है। इसलिए विजय पर शंखनाद नहीं किया।
भगवान शिव के श्राप का कारण
बदरीनाथ के पूर्व धर्माधिकारी जगदंबा प्रसाद सती ने बदरीनाथ धाम में शंख न बजने के पीछे का कारण भगवान शिव के श्राप को बताया। कहा, यह तीर्थ शिव का निवास स्थान था। भगवान नारायण को यह तपस्या के लिए उचित लगा तो लीला रचकर यह स्थान ले लिया। भगवान शिव यहां से केदारनाथ चले गए। वो बताते हैं कि जाने से पहले श्राप दिया कि इस भूमि में उनका प्रिय शंख नहीं बजेगा। इसलिए धाम में शंख ध्वनि वर्जित है। हालांकि, मंदिर में सुबह दक्षिणावर्त शंख में रखे जल से अभिषेक पूजा होती है।
बदरीनाथ मंदिर के पूर्व धर्माधिकारी भुवन उनियाल बताते हैं कि यहां नारायण साक्षात विराजमान हैं। ऐसे में शंख बजाकर उनका आवाहन नहीं किया जा सकता। भगवान की तपस्या में विघ्न न पड़े। इसलिए शंख नहीं बजता है।
चारधाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत के अध्यक्ष सुरेश सेमवाल ने कहा कि महाराज का शंख पर दिया बयान निंदनीय है। शंख के जानवरों की हड्डी से बने होने के बयान से करोड़ों हिंदुओं की भावना आहत हुई है।
शंख की जैविक उत्पत्ति
शंख प्राकृतिक रूप से समुद्र में रहने वाले मोलस्क नामक जीव का बाहरी खोल होता है। जीव अपने शरीर से कैल्शियम कार्बोनेट और अन्य जैविक पदार्थ मिलकर खोल बनाता है। शंख की परतें जीव के बढ़ने के साथ धीरे-धीरे जुड़ती जाती हैं।
जानकारों के मुताबिक शंख कैल्शियम कार्बोनेट का खोल है। जबकि दक्षिणावर्ती शंख, वह शंख है, जिसकी घुमावदार संरचना सामान्य शंखों की तुलना में विपरीत दिशा में होती है। यह बजाया नहीं जाता है।
बदरीनाथ मंदिर के गर्भ ग्रह में रहता है शंख
दक्षिणावर्त पवित्र शंख है। इसका मुख खुला या घुमावदार होता है और दाईं ओर (दक्षिण) ओर होता है।
सामान्य शंखों (वामावर्ती) बाईं ओर खुलता है, जबकि दक्षिणावर्ती शंख मुख दाईं ओर खुलता है।
इसको बजाया नहीं जाता है। इसे केवल घर, मंदिर आदि पूजा स्थल में रखा जाता है।
बदरीनाथ की गर्भ गृह में दक्षिणावर्त शंख ही रखा जाता है। इसका उपयोग दैनिक महा अभिषेक पूजा में किया जाता है।
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बदरीनाथ मंदिर के पूर्व रावल बदरी प्रसाद नंबूदरी ने बताया कि मंदिर के गर्भ गृह में दक्षिणावर्त शंख रहता है। इसका प्रयोग प्रतिदिन भगवान बदरी विशाल के महा अभिषेक और अभिषेक पूजा में किया जाता है।
शंख जानवर की हड्डी से बना होता है
प्रदेश के धर्मस्य एवं पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने पिछले दिनों मीडिया कर्मियों से बातचीत में कहा कि बदरीनाथ मंदिर में शंख का प्रयोग नहीं किया जाता, क्योंकि यह जानवरों की हड्डी से बना होता है। इसलिए इसको पूजा में भी उपयोग नहीं किया जाता। उन्होंने बदरी पुरी में अन्यत्र शंख बजाए जाने की बात कही। मंत्री के बयान पर धार्मिक मामलों के जानकार, उत्तराखंड चार धाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत, ब्रह्म कपाल तीर्थ पुरोहित पंचायत समिति, बदरीनाथ धाम, बद्रीश पंडा पंचायत समिति, बदरी नाथ मंदिर के पूर्व धर्माधिकारियों ने कड़ा एतराज जताया है।
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