POSHAN Abhiyaan का सच: हजारों करोड़ खर्च, फिर भी कुपोषण कायम! NFHS, CAG और NITI Aayog के आंकड़े क्या बताते हैं?
POSHAN Abhiyaan पर हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद भारत में कुपोषण, स्टंटिंग और एनीमिया की समस्या क्यों बनी हुई है? NFHS, CAG और NITI Aayog के आंकड़ों के आधार पर विस्तृत विश्लेषण।
Written by- Sudhir Taliyan
Chaudhary- Talan Khap
POSHAN Abhiyaan: क्या हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद भारत कुपोषण की लड़ाई हार रहा है?
सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच का फासला
जब 2018 में POSHAN Abhiyaan लॉन्च किया गया था, तब इसे भारत के इतिहास का सबसे बड़ा पोषण मिशन बताया गया। सरकार ने दावा किया कि यह कार्यक्रम बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं के स्वास्थ्य में क्रांतिकारी बदलाव लाएगा। डिजिटल निगरानी, तकनीक आधारित ट्रैकिंग, जन आंदोलन और बहु-क्षेत्रीय समन्वय के जरिए कुपोषण को जड़ से खत्म करने की बात कही गई।
लेकिन आज, लगभग एक दशक बाद, एक असहज सवाल सामने खड़ा है—क्या वास्तव में भारत कुपोषण के खिलाफ निर्णायक जीत हासिल कर पाया है?
यदि सरकारी विज्ञापनों और राजनीतिक भाषणों को अलग रखकर राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS), नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG), संसदीय दस्तावेजों और विभिन्न मूल्यांकन रिपोर्टों का अध्ययन किया जाए तो तस्वीर उतनी उत्साहजनक नहीं दिखती जितनी प्रचार में दिखाई जाती है।
भारत की पोषण चुनौती: दुनिया की सबसे बड़ी मानवीय समस्या
भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। भारत चंद्रमा तक पहुंच चुका है, डिजिटल भुगतान में विश्व रिकॉर्ड बना चुका है, लेकिन बच्चों के पोषण के मामले में स्थिति अभी भी चिंताजनक बनी हुई है।
NFHS-5 के अनुसार:
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35.5% बच्चे स्टंटिंग (उम्र के अनुसार कम लंबाई) से प्रभावित हैं।
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32.1% बच्चे अंडरवेट हैं।
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19.3% बच्चे वेस्टिंग (लंबाई के अनुसार कम वजन) का शिकार हैं।
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57% महिलाएं एनीमिया से प्रभावित हैं।
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52% से अधिक गर्भवती महिलाएं एनीमिक हैं।
दूसरे शब्दों में, करोड़ों भारतीय बच्चे और महिलाएं आज भी पर्याप्त पोषण से वंचित हैं।
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POSHAN Abhiyaan का वादा क्या था?
योजना के मुख्य लक्ष्य थे:
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स्टंटिंग में कमी
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अंडरवेट बच्चों की संख्या घटाना
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महिलाओं में एनीमिया कम करना
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कम जन्म वजन वाले बच्चों की संख्या घटाना
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आंगनवाड़ी सेवाओं को आधुनिक बनाना
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तकनीक आधारित निगरानी लागू करना
सरकार ने इसे "जन आंदोलन" का रूप देने की बात कही थी।
लेकिन प्रश्न यह है कि क्या परिणाम दावों के अनुरूप रहे?
NFHS-4 बनाम NFHS-5: सुधार हुआ, लेकिन बहुत धीमा
NFHS-4 (2015-16) और NFHS-5 (2019-21) की तुलना करें:
| संकेतक | NFHS-4 | NFHS-5 |
|---|---|---|
| Stunting | 38.4% | 35.5% |
| Underweight | 35.7% | 32.1% |
| Wasting | 21.0% | 19.3% |
यह सुधार है, लेकिन सवाल यह है कि क्या हजारों करोड़ रुपये और मिशन मोड कार्यक्रम के बाद यह सुधार पर्याप्त माना जा सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि सुधार की गति अपेक्षाकृत धीमी रही है।
सबसे बड़ा झटका: महिलाओं में एनीमिया बढ़ गया
POSHAN Abhiyaan का एक प्रमुख लक्ष्य एनीमिया कम करना था।
लेकिन NFHS-5 ने दिखाया:
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महिलाओं में एनीमिया लगभग 57% तक पहुंच गया।
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बच्चों में एनीमिया भी बढ़ा।
यदि पोषण अभियान का उद्देश्य पोषण स्थिति में सुधार था, तो एनीमिया जैसे संकेतकों का बिगड़ना गंभीर समीक्षा की मांग करता है।
राज्यों की तस्वीर: भारत के भीतर दो भारत
कई राज्य लगातार पिछड़ते रहे:
उच्च कुपोषण वाले राज्य
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बिहार
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झारखंड
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उत्तर प्रदेश
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मध्य प्रदेश
इन राज्यों में राष्ट्रीय औसत से अधिक स्टंटिंग और अंडरवेट दरें दर्ज की गईं।
अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन
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केरल
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तमिलनाडु
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सिक्किम
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मिजोरम
यह अंतर बताता है कि केवल केंद्रीय योजना पर्याप्त नहीं होती; राज्य स्तरीय प्रशासनिक क्षमता भी महत्वपूर्ण होती है।
CAG रिपोर्ट ने क्या उजागर किया?
सरकारी दावों से अलग, CAG की विभिन्न ऑडिट रिपोर्टों ने कई गंभीर सवाल उठाए।
मुख्य निष्कर्ष:
1. लाभार्थियों की पहचान में खामियां
कई मामलों में पात्र लाभार्थियों का डेटा अधूरा पाया गया।
2. पोषण सामग्री की आपूर्ति में देरी
जहां समय पर पोषण पहुंचना चाहिए था, वहां वितरण में व्यवस्थित देरी देखी गई।
3. निगरानी प्रणाली की कमजोरी
कई स्थानों पर रिकॉर्ड और वास्तविक स्थिति में अंतर पाया गया।
4. अधूरी डिजिटल रिपोर्टिंग
डिजिटल ट्रैकिंग की बात की गई, लेकिन कई राज्यों में डेटा गुणवत्ता और रिपोर्टिंग से जुड़े प्रश्न सामने आए।
महत्वपूर्ण बात यह है कि CAG ने हर मामले में भ्रष्टाचार सिद्ध नहीं किया, लेकिन प्रशासनिक कमियों और जवाबदेही की कमी को स्पष्ट रूप से दर्ज किया।
क्या हजारों करोड़ रुपये का पूरा उपयोग हुआ?
यहां कहानी और दिलचस्प हो जाती है।
कई वर्षों में राज्यों द्वारा आवंटित धनराशि का पूरा उपयोग नहीं किया गया।
कई स्थानों पर:
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फंड जारी हुए
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खर्च कम हुआ
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परियोजनाएं अधूरी रहीं
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लक्ष्य पूरे नहीं हुए
यानी समस्या केवल धन की कमी नहीं, बल्कि धन के प्रभावी उपयोग की भी रही।
आंगनवाड़ी व्यवस्था: मिशन की सबसे कमजोर कड़ी?
POSHAN Abhiyaan की सफलता काफी हद तक आंगनवाड़ी नेटवर्क पर निर्भर थी।
लेकिन जमीनी स्तर पर लंबे समय से शिकायतें सामने आती रही हैं:
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कर्मचारियों पर अत्यधिक कार्यभार
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सीमित प्रशिक्षण
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खराब बुनियादी ढांचा
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उपकरणों की कमी
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डेटा एंट्री का अतिरिक्त दबाव
जब फ्रंटलाइन कार्यकर्ता ही पर्याप्त संसाधनों से लैस न हों, तो बड़े लक्ष्य हासिल करना कठिन हो जाता है।
डिजिटल इंडिया बनाम पोषण की हकीकत
POSHAN Tracker को पारदर्शिता का बड़ा साधन बताया गया।
लेकिन सवाल यह है:
यदि डिजिटल निगरानी इतनी प्रभावी थी, तो:
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एनीमिया क्यों बढ़ा?
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स्टंटिंग इतनी ऊंची क्यों बनी रही?
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राज्यों के प्रदर्शन में इतना बड़ा अंतर क्यों है?
डिजिटल प्लेटफॉर्म वास्तविक सेवा वितरण का विकल्प नहीं हो सकता।
जवाबदेही का संकट
भारत में बड़ी समस्या केवल योजनाओं की नहीं, बल्कि जवाबदेही की है।
जब कोई योजना अपने घोषित लक्ष्यों से पीछे रह जाती है, तो:
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जिम्मेदारी किसकी तय होती है?
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कौन जवाब देता है?
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कौन समीक्षा करता है?
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कौन सुधार लागू करता है?
इन सवालों के स्पष्ट उत्तर अक्सर दिखाई नहीं देते।
प्रचार बनाम परिणाम
किसी भी लोकतंत्र में विज्ञापन सफलता का प्रमाण नहीं होते।
यदि:
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करोड़ों बच्चे कुपोषित हैं,
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आधी से अधिक महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं,
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और राज्यों के बीच भारी असमानता बनी हुई है,
तो केवल प्रचार अभियानों से वास्तविक समस्याएं नहीं छिपाई जा सकतीं।
क्या समाधान है?
सिर्फ आलोचना पर्याप्त नहीं है।
सुधार के लिए आवश्यक कदम:
1. स्वतंत्र सामाजिक ऑडिट
सभी जिलों में नियमित सार्वजनिक ऑडिट।
2. वास्तविक समय सार्वजनिक डेटा
जिला स्तर तक खुला डैशबोर्ड।
3. संसद में वार्षिक पोषण रिपोर्ट
हर वर्ष अनिवार्य समीक्षा।
4. CAG टिप्पणियों पर कार्रवाई
ऑडिट रिपोर्ट केवल दस्तावेज न बनकर सुधार का आधार बनें।
5. स्थानीय जवाबदेही
जिला प्रशासन और राज्य सरकारों की जिम्मेदारी स्पष्ट हो।
निष्कर्ष: सवाल सरकार से नहीं, व्यवस्था से है
POSHAN Abhiyaan का उद्देश्य सही था। लेकिन किसी भी योजना का मूल्यांकन उसके इरादों से नहीं, परिणामों से किया जाता है।
भारत आज भी दुनिया की सबसे बड़ी पोषण चुनौतियों में से एक का सामना कर रहा है। कुछ संकेतकों में सुधार हुआ है, लेकिन गति अपेक्षित नहीं रही। एनीमिया, स्टंटिंग और अंडरवेट जैसी समस्याएं अब भी करोड़ों परिवारों की वास्तविकता हैं।
इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि सरकार ने कितना पैसा खर्च किया।
असली सवाल यह है:
क्या हर खर्च किया गया रुपया बच्चों और महिलाओं के स्वास्थ्य में वास्तविक सुधार में बदला?
जब तक इस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता, तब तक POSHAN Abhiyaan की सफलता पर बहस जारी रहेगी।
लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी जनता के प्रति जवाबदेह होना है। और बच्चों के पोषण से बड़ा जनहित शायद ही कोई हो।
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