पेपर लीक पर चुप्पी, विरोध पर लाठी क्यों? झारखंड से जंतर-मंतर तक युवाओं का बड़ा सवाल
पेपर लीक, भर्ती में गड़बड़ी और परिणाम विवाद के बीच झारखंड से जंतर-मंतर तक छात्र आंदोलनों ने सरकारी जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
पेपर लीक से लेकर लाठीचार्ज तक: क्या सरकारों ने युवाओं के सवालों का जवाब देना छोड़ दिया है?
Writer- Ch. Sudhir taliyan
परीक्षा में गड़बड़ी हो तो जांच, भर्ती में विवाद हो तो समिति, परिणाम पर सवाल हो तो अदालत—लेकिन जब छात्र जवाब मांगने सड़क पर उतरें तो लाठी क्यों? झारखंड से दिल्ली के जंतर-मंतर तक उठता यह सवाल केवल युवाओं का नहीं, भारतीय लोकतंत्र की जवाबदेही का सवाल है।
एक युवा अपनी जिंदगी के सबसे कीमती वर्ष किसी सरकारी नौकरी की तैयारी में लगा देता है। सुबह की नींद छोड़कर किताब खोलता है, दिन-रात पढ़ता है, कोचिंग की फीस भरता है, परिवार से पैसे मांगता है, गांव से शहर आता है और एक उम्मीद को अपने भीतर जिंदा रखता है—एक दिन मेहनत रंग लाएगी।
लेकिन अगर परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र बाहर निकल जाए, भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठें, परिणाम में गड़बड़ी की शिकायत हो या चयन सूची पर संदेह पैदा हो जाए, तो उस युवा के हाथ में सिर्फ एक कागज नहीं छूटता; उसके हाथ से वर्षों की मेहनत, समय और भविष्य का भरोसा फिसल जाता है।
और जब वह पूछता है—"जवाब कौन देगा?"—तो व्यवस्था के पास अक्सर एक लंबी प्रक्रिया होती है।
जांच होगी।
समिति बनेगी।
रिपोर्ट आएगी।
अदालत जाएगी।
फिर सुनवाई होगी।
लेकिन यदि वही युवा सड़क पर बैठ जाए और कहे कि "पहले जवाब दो", तो राज्य की प्रतिक्रिया कई बार अचानक बहुत तेज हो जाती है—बैरिकेड, पुलिस बल, आंसू गैस, वाटर कैनन और लाठी।
यही वह विरोधाभास है जिसने झारखंड के JPSC-JSSC अभ्यर्थियों के आंदोलन से लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर तक एक बड़ा लोकतांत्रिक सवाल खड़ा कर दिया है।
क्या भारतीय राज्य परीक्षा में निष्पक्षता सुनिश्चित करने से ज्यादा तेजी से विरोध को नियंत्रित करने में सक्षम हो गया है?
झारखंड में सड़क पर उतरे छात्र और व्यवस्था के सामने खड़ा सवाल
10 अगस्त 2026 को रांची में JPSC-JSSC अभ्यर्थियों के विधानसभा मार्च के दौरान तनाव बढ़ा। प्रदर्शनकारी भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और विशेष रूप से JSSC-CGL 2024 परीक्षा को लेकर कार्रवाई तथा CBI जांच की मांग कर रहे थे। पुलिस ने बैरिकेड पार करने की कोशिश के बाद लाठी, आंसू गैस और वाटर कैनन का इस्तेमाल किया।
यहां दो पक्षों के दावे हैं।
प्रदर्शनकारी कहते हैं कि उनकी मांगों पर पर्याप्त कार्रवाई नहीं हुई और पुलिस बल का इस्तेमाल किया गया।
पुलिस और प्रशासन का पक्ष है कि बैरिकेड तोड़कर आगे बढ़ने की कोशिश हुई और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए बल का इस्तेमाल करना पड़ा। हालिया रिपोर्टों में पुलिसकर्मियों के घायल होने और CCTV फुटेज के आधार पर घटनाक्रम की जांच की बात भी सामने आई है।
इसलिए बिना स्वतंत्र जांच के यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि पुलिस कार्रवाई पूरी तरह अवैध थी या प्रदर्शनकारी पूरी तरह निर्दोष थे।
लेकिन लोकतंत्र का प्रश्न इससे भी बड़ा है।
आखिर वह स्थिति बनी ही क्यों जिसमें हजारों अभ्यर्थियों को विधानसभा की ओर मार्च करना पड़ा?
उनकी मूल शिकायत क्या थी?
परीक्षा प्रणाली में उनका विश्वास क्यों टूटा?
और यदि सरकार के पास जांच का तंत्र मौजूद था, तो छात्रों को यह विश्वास क्यों नहीं दिलाया जा सका कि उनकी शिकायत निष्पक्ष रूप से सुनी जाएगी?
यही सवाल किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिए असली परीक्षा है।
परीक्षा में गड़बड़ी सिर्फ एक "पेपर लीक" नहीं होती
हम अक्सर पेपर लीक को बहुत संकीर्ण अर्थ में देखते हैं।
प्रश्नपत्र बाहर निकल गया।
कुछ लोगों ने खरीदा।
कुछ लोगों ने बेचा।
पुलिस ने आरोपी पकड़ लिया।
मामला समाप्त।
लेकिन वास्तव में परीक्षा व्यवस्था एक लंबी श्रृंखला है।
प्रश्नपत्र तैयार करने से लेकर उसकी छपाई तक।
छपाई से लेकर सुरक्षित भंडारण तक।
भंडारण से परीक्षा केंद्र तक।
परीक्षा केंद्र से उम्मीदवार तक।
उत्तर पुस्तिका से मूल्यांकन तक।
मूल्यांकन से परिणाम तक।
और परिणाम से नियुक्ति तक।
इस पूरी श्रृंखला में अगर कहीं भ्रष्टाचार, मिलीभगत, गंभीर लापरवाही या तकनीकी हेरफेर होता है, तो समस्या केवल उस व्यक्ति की नहीं है जिसने अंतिम अपराध किया।
समस्या उस पूरी व्यवस्था की है जिसने अपराध को संभव बनाया।
इसलिए असली सवाल होना चाहिए—
पेपर किसने लीक किया?
के साथ-साथ—
पेपर लीक होने दिया किसने?
भारत ने पेपर लीक के खिलाफ कानून बनाया, फिर भी सवाल बाकी क्यों है?
भारत में यह कहना सही नहीं होगा कि परीक्षा में अनुचित साधनों के खिलाफ कोई कानून नहीं है।
केंद्र सरकार ने Public Examinations (Prevention of Unfair Means) Act, 2024 बनाया है। यह कानून सार्वजनिक परीक्षाओं में अनुचित साधनों, साजिश, परीक्षा में व्यवधान, सेवा प्रदाताओं से संबंधित अपराधों और संगठित अपराध जैसी स्थितियों के लिए प्रावधान करता है। कानून में जांच और विशेष फास्ट-ट्रैक व्यवस्था से जुड़े प्रावधान भी हैं।
यानी कानून की किताब में अपराध की पहचान मौजूद है।
लेकिन यहां सवाल कानून की मौजूदगी से आगे जाता है।
क्या कानून यह सुनिश्चित करता है कि किसी बड़ी परीक्षा विफलता की पूरी प्रशासनिक जिम्मेदारी भी तय होगी?
यही अंतर महत्वपूर्ण है।
किसी पेपर लीक में एक व्यक्ति पकड़ा जा सकता है।
लेकिन परीक्षा सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी?
ठेका किसे दिया गया था?
सुरक्षा व्यवस्था की निगरानी किसने की?
शिकायत पहले किसके पास पहुंची?
यदि किसी अधिकारी को खतरे की जानकारी थी तो उसने क्या किया?
किस स्तर पर लापरवाही हुई?
क्या किसी प्रभावशाली व्यक्ति ने हस्तक्षेप किया?
क्या किसी निजी सेवा प्रदाता को अनुचित लाभ मिला?
इन सवालों के जवाब के बिना केवल आरोपी की गिरफ्तारी से व्यवस्था साफ नहीं होती।
असली जरूरत "पेपर लीक कानून" से आगे की है
भारत को केवल ऐसा कानून नहीं चाहिए जो पेपर बेचने वाले को सजा दे।
उसे ऐसा परीक्षा एवं भर्ती जवाबदेही कानून चाहिए जो यह पूछे कि पूरी प्रशासनिक श्रृंखला में जिम्मेदार कौन है।
मान लीजिए किसी परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक हो गया।
एक आरोपी गिरफ्तार हो गया।
अब जांच वहीं समाप्त नहीं होनी चाहिए।
जांच को आगे बढ़ना चाहिए—
प्रश्नपत्र कहां से निकला?
सुरक्षा व्यवस्था में कमजोरी कहां थी?
किस अधिकारी को क्या जिम्मेदारी दी गई थी?
किस एजेंसी को परीक्षा संचालन का काम मिला?
उस एजेंसी की निगरानी किसने की?
किसने सुरक्षा प्रमाणित की?
किसने शिकायतों पर कार्रवाई की या नहीं की?
और यदि किसी स्तर पर जानबूझकर लापरवाही, भ्रष्टाचार या मिलीभगत सिद्ध होती है तो जिम्मेदारी उसी स्तर तक जानी चाहिए।
मंत्री का नाम आ जाए तो क्या वह दोषी हो जाएगा?
नहीं।
यहां लोकतांत्रिक और कानूनी मर्यादा बनाए रखना बेहद जरूरी है।
किसी मंत्री के कार्यकाल में पेपर लीक होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि मंत्री ने पेपर लीक कराया।
किसी आयोग के अध्यक्ष के कार्यकाल में अनियमितता होना अपने आप में अपराध सिद्ध नहीं करता।
आरोप और दोषसिद्धि अलग-अलग चीजें हैं।
लेकिन इसका उल्टा भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
अगर स्वतंत्र जांच से यह साबित हो जाए कि कोई वरिष्ठ अधिकारी या राजनीतिक पदाधिकारी—
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परीक्षा प्रक्रिया में अनुचित हस्तक्षेप कर रहा था,
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किसी निजी एजेंसी को अनुचित लाभ दे रहा था,
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शिकायत दबा रहा था,
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सुरक्षा प्रोटोकॉल की जानबूझकर अनदेखी कर रहा था,
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सबूत मिटाने का प्रयास कर रहा था,
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या भ्रष्टाचार में प्रत्यक्ष रूप से शामिल था,
तो सिर्फ तबादला या इस्तीफा पर्याप्त नहीं होना चाहिए।
पद बड़ा हो सकता है, कानून से बड़ा नहीं।
जंतर-मंतर: लोकतंत्र के सबसे प्रतीकात्मक मंच पर उठता सवाल
दिल्ली का जंतर-मंतर लंबे समय से लोकतांत्रिक विरोध का महत्वपूर्ण स्थल रहा है। 2026 में यहां छात्रों और अन्य प्रदर्शनकारियों से जुड़े विरोध के दौरान पुलिस कार्रवाई पर विवाद इतना बढ़ा कि मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा।
28 जुलाई 2026 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश में जंतर-मंतर और दिल्ली के अन्य स्थानों पर हालिया प्रदर्शनों, जिनमें बड़ी संख्या में छात्र शामिल थे, के दौरान हिंसा और पुलिस कार्रवाई से संबंधित याचिकाओं का उल्लेख है। अदालत ने मामले को आगे सुनवाई के लिए रखा।
इस घटना का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि वहां पुलिस और प्रदर्शनकारियों में टकराव हुआ।
महत्व इसलिए है कि यह वही दिल्ली है जहां संसद, सरकार और देश की सर्वोच्च संस्थाएं मौजूद हैं।
जब नागरिक वहां आकर कहते हैं—
"हमारी बात सुनिए"
तो लोकतंत्र का पहला उत्तर संवाद होना चाहिए।
कानून-व्यवस्था आवश्यक है।
लेकिन कानून-व्यवस्था और नागरिक असहमति एक ही चीज नहीं हैं।
पुलिस का बल प्रयोग कब उचित है?
यहां भी एक संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है।
हर प्रदर्शनकारी सही नहीं हो सकता।
यदि कोई व्यक्ति पुलिस पर हमला करता है, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाता है या प्रतिबंधित क्षेत्र में हिंसक तरीके से घुसने का प्रयास करता है, तो पुलिस के पास कानून लागू करने की शक्ति होनी चाहिए।
लेकिन सवाल है—
बल कितना?
यही proportionality का प्रश्न है।
एक लोकतांत्रिक राज्य को पूछना चाहिए:
क्या बातचीत की कोशिश की गई?
क्या चेतावनी दी गई?
क्या समय दिया गया?
क्या भीड़ को वैकल्पिक मार्ग दिया गया?
क्या केवल हिंसक व्यक्तियों को अलग करने का प्रयास हुआ?
क्या पीछे हट रहे लोगों पर भी बल प्रयोग हुआ?
क्या वीडियो रिकॉर्डिंग सुरक्षित है?
किस अधिकारी ने आदेश दिया?
और कार्रवाई के बाद उसकी स्वतंत्र समीक्षा कौन करेगा?
यही जवाबदेही का ढांचा है।
सबसे बड़ा विरोधाभास: छात्र से तुरंत जवाब, अधिकारी से वर्षों बाद?
एक छात्र अगर परीक्षा में नकल करता है तो उसे तत्काल कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।
लेकिन अगर पूरी परीक्षा व्यवस्था में गंभीर प्रशासनिक विफलता हो जाए तो जांच वर्षों चल सकती है।
एक छात्र की गलती:
तुरंत कार्रवाई।
व्यवस्था की गलती:
जांच समिति।
एक छात्र का अनुशासन:
तुरंत दंड।
अधिकारी की जवाबदेही:
विभागीय प्रक्रिया।
यह असमानता युवाओं के भीतर सबसे खतरनाक भावना पैदा करती है—
"व्यवस्था हमारे लिए अलग है और अपने लिए अलग।"
लोकतंत्र में इससे बड़ा अविश्वास शायद ही कोई हो।
पेपर लीक केवल परीक्षा नहीं चुराता, भरोसा चुराता है
किसी प्रश्नपत्र के लीक होने से सिर्फ एक परीक्षा प्रभावित नहीं होती।
उससे एक पूरी पीढ़ी का भरोसा प्रभावित होता है।
वह युवा जिसने पांच साल पढ़ाई की, वह पूछता है—
क्या मेरी मेहनत की कोई कीमत है?
वह अभिभावक जिसने बेटे या बेटी की कोचिंग के लिए जमीन गिरवी रखी, वह पूछता है—
क्या व्यवस्था ईमानदार है?
वह गांव का युवा जिसने शहर में कमरा लेकर तैयारी की, वह पूछता है—
क्या नौकरी योग्यता से मिलेगी?
और जब इन सवालों का उत्तर नहीं मिलता, तो आंदोलन पैदा होता है।
आंदोलन हमेशा किसी नेता की देन नहीं होता।
कई बार आंदोलन व्यवस्था पर टूटे हुए विश्वास का दूसरा नाम होता है।
इसलिए लाठीचार्ज से आंदोलन खत्म नहीं होता
लाठी शरीर को पीछे धकेल सकती है।
बैरिकेड रास्ता रोक सकता है।
आंसू गैस आंखों में जलन पैदा कर सकती है।
गिरफ्तारी कुछ घंटों या दिनों के लिए आवाज रोक सकती है।
लेकिन जिस सवाल ने आंदोलन पैदा किया है, उसे ये सब खत्म नहीं करते।
अगर प्रश्न है—
पेपर लीक क्यों हुआ?
तो पुलिस कार्रवाई उस प्रश्न का उत्तर नहीं है।
अगर प्रश्न है—
परिणाम में गड़बड़ी क्यों हुई?
तो FIR उस प्रश्न का उत्तर नहीं है।
अगर प्रश्न है—
भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी क्यों नहीं है?
तो बैरिकेड उसका उत्तर नहीं है।
और अगर प्रश्न है—
जिम्मेदार अधिकारी कौन है?
तो लाठीचार्ज उसका उत्तर कभी नहीं हो सकता।
सरकारों के लिए सबसे आसान रास्ता कौन-सा है?
किसी भी प्रशासन के सामने दो रास्ते होते हैं।
पहला—
समस्या का समाधान करो।
दूसरा—
समस्या उठाने वाले को नियंत्रित करो।
पहला रास्ता कठिन है।
उसमें फाइलें खुलेंगी।
जिम्मेदार अधिकारी सामने आएंगे।
गलतियां स्वीकार करनी पड़ेंगी।
कभी-कभी राजनीतिक नुकसान भी उठाना पड़ेगा।
दूसरा रास्ता आसान दिखाई देता है।
बैरिकेड लगाओ।
पुलिस लगाओ।
प्रदर्शन हटाओ।
FIR करो।
स्थिति सामान्य घोषित कर दो।
लेकिन यह केवल दृश्य को सामान्य करता है, समस्या को नहीं।
जवाबदेही कानून कैसा होना चाहिए?
भारत को एक व्यापक "सार्वजनिक परीक्षा एवं भर्ती जवाबदेही कानून" की जरूरत पर गंभीर बहस करनी चाहिए।
इसमें कम-से-कम ये प्रावधान होने चाहिए।
1. हर गंभीर पेपर लीक पर स्वतः स्वतंत्र जांच
छात्रों को FIR कराने के लिए महीनों आंदोलन न करना पड़े।
2. प्रत्येक परीक्षा के लिए जवाबदेह अधिकारी
किसी परीक्षा की जिम्मेदारी केवल एक अमूर्त "आयोग" की न हो।
जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका स्पष्ट हो।
https://politicsinsightindia.com/new/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
3. पूरी chain of command की जांच
पेपर तैयार करने से लेकर परिणाम जारी करने तक।
4. वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका की जांच
लेकिन केवल पद या आरोप के आधार पर नहीं—सबूत और जिम्मेदारी के आधार पर।
5. राजनीतिक हस्तक्षेप की स्वतंत्र जांच
यदि किसी मंत्री या राजनीतिक व्यक्ति पर गंभीर आरोप हो तो जांच राजनीतिक नियंत्रण से मुक्त हो।
6. डिजिटल फोरेंसिक ऑडिट
सर्वर लॉग, CCTV, biometric data, answer sheets और result-generation systems की स्वतंत्र जांच हो।
7. समयबद्ध जांच
अनिश्चितकालीन जांच छात्र के साथ अन्याय है।
8. सार्वजनिक रिपोर्ट
जनता को पता चले कि परीक्षा क्यों विफल हुई और किसकी जिम्मेदारी तय हुई।
9. पीड़ित छात्रों के लिए क्षतिपूर्ति
यदि सरकारी या संस्थागत विफलता से परीक्षा रद्द होती है, तो छात्रों को केवल "दोबारा परीक्षा दे दीजिए" कहना पर्याप्त नहीं।
https://politicsinsightindia.com/new/digital-politics-troll-army-gundagardi-democracy-genz
उनका समय भी नुकसान है।
उनकी उम्र भी नुकसान है।
उनकी आर्थिक लागत भी नुकसान है।
10. पुलिस बल प्रयोग की स्वतंत्र समीक्षा
परीक्षा विवाद पर आंदोलन हो और पुलिस बल इस्तेमाल करे तो उस कार्रवाई की भी स्वतंत्र समीक्षा हो।
https://politicsinsightindia.com/new/gen-alpha-activism-up-school-children-protest-for-fans-water
पुलिस सुधार और परीक्षा सुधार—दोनों एक ही लोकतांत्रिक सवाल हैं
दिलचस्प बात यह है कि भारत में पुलिस जवाबदेही की चर्चा भी नई नहीं है।
2006 के Prakash Singh फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने Police Complaints Authority सहित पुलिस सुधार से जुड़े संस्थागत उपायों की दिशा दी थी। अदालत के आदेश में जिला स्तर पर Police Complaints Authority की व्यवस्था का स्पष्ट उल्लेख है।
लेकिन केवल संस्था बना देना पर्याप्त नहीं।
सवाल है—
क्या वह स्वतंत्र है?
https://politicsinsightindia.com/new/upi-bill-2026-merchant-consumer-government-mdr-analysis
क्या उसके पास जांच की शक्ति है?
क्या उसके पास अपना स्टाफ है?
क्या उसकी सिफारिश बाध्यकारी है?
क्या जनता को रिपोर्ट मिलती है?
यही बात परीक्षा व्यवस्था पर भी लागू होती है।
SIT बना देना जवाबदेही नहीं है।
https://politicsinsightindia.com/new/up-tgt-2022-8-68-lakh-youth-3539-posts-four-year-wait
जांच शुरू कर देना जवाबदेही नहीं है।
गिरफ्तारी हो जाना जवाबदेही नहीं है।
जवाबदेही तब है जब—
घटना → जांच → जिम्मेदारी → कार्रवाई → सार्वजनिक रिपोर्ट → संस्थागत सुधार
की पूरी श्रृंखला पूरी हो।
सरकार को छात्रों से डरना नहीं, उनकी शिकायत से सीखना चाहिए
सरकारें आती-जाती हैं।
मंत्री बदलते हैं।
अधिकारी बदलते हैं।
आयोगों के अध्यक्ष बदलते हैं।
लेकिन युवा पीढ़ी वही रहती है।
आज JPSC-JSSC का छात्र है।
कल कोई UPSC अभ्यर्थी होगा।
किसी दिन SSC का उम्मीदवार होगा।
किसी दिन रेलवे का।
किसी दिन शिक्षक भर्ती का।
किसी दिन पुलिस भर्ती का।
यदि हर पीढ़ी को यही अनुभव होगा कि परीक्षा में गड़बड़ी पर न्याय पाने के लिए सड़क पर उतरना पड़ता है, तो लोकतंत्र के प्रति विश्वास धीरे-धीरे क्षीण होगा।
सबसे जरूरी बात: विरोध लोकतंत्र की बीमारी नहीं, उसका संकेत है
यह मानना कि हर प्रदर्शन सरकार के खिलाफ साजिश है, लोकतांत्रिक दृष्टि से खतरनाक है।
कभी प्रदर्शन राजनीतिक हो सकता है।
कभी किसी दल द्वारा प्रभावित हो सकता है।
कभी उसमें हिंसा भी हो सकती है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उसके भीतर उठाया गया हर सवाल झूठा है।
झारखंड में छात्र आंदोलन को राजनीतिक दलों का समर्थन मिला है—यह भी तथ्य है। BJP ने छात्रों के समर्थन में राज्यव्यापी बंद का आह्वान किया। सरकार ने दूसरी ओर संवाद और राजनीतिकरण के आरोपों की बात कही।
लेकिन राजनीतिक समर्थन मिलने से छात्र की मूल शिकायत अपने आप गलत नहीं हो जाती।
https://politicsinsightindia.com/new/gen-z-rss-mohan-bhagwat-blind-obedience-democracy-analysis
और राजनीतिक समर्थन न मिलने से वह अपने आप सही भी नहीं हो जाती।
मूल शिकायत का फैसला दस्तावेज, जांच और कानून को करना चाहिए—लाठी को नहीं।
क्या सरकारें सचमुच केवल बल प्रयोग पर निर्भर हो गई हैं?
यह कहना कि भारत की सभी सरकारों ने केवल बल प्रयोग को ही अपना मुख्य कार्य बना लिया है, एक व्यापक राजनीतिक निष्कर्ष होगा जिसे हर घटना के आधार पर साबित नहीं किया जा सकता।
झारखंड में सरकार ने जांच, बातचीत और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की बात की है।
केंद्र के पास सार्वजनिक परीक्षाओं में अनुचित साधनों के खिलाफ कानून है।
न्यायपालिका भी कई मामलों में हस्तक्षेप करती है।
इसलिए तस्वीर पूरी तरह काली नहीं है।
लेकिन दूसरी तरफ यह सवाल भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि जब बार-बार युवा सड़क पर आते हैं और पुलिस कार्रवाई विवाद का केंद्र बन जाती है, तो संस्थागत संवाद की क्षमता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
यही वह जगह है जहां लोकतंत्र को आत्ममंथन करना चाहिए।
लाठी से आगे देखना होगा
झारखंड की सड़क पर खड़ा छात्र केवल नौकरी नहीं मांग रहा।
वह कह रहा है—
मेरी मेहनत का सम्मान करो।
जंतर-मंतर पर खड़ा युवा केवल अपनी मांग नहीं दोहरा रहा।
वह कह रहा है—
मेरी आवाज को नागरिक अधिकार समझो।
और सरकार के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है—
क्या नागरिक को न्याय मांगने के लिए सड़क पर आना ही पड़ेगा?
यदि उत्तर "हां" है तो संस्थाएं कमजोर हैं।
यदि उत्तर "नहीं" है तो फिर शिकायतों के लिए ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जाती जहां छात्र सड़क पर आने से पहले ही न्याय पा सके?
निष्कर्ष: युवाओं के हाथ में किताब होनी चाहिए, पत्थर या लाठी नहीं
भारत का सपना युवा भारत का सपना है।
लेकिन युवा भारत को केवल भाषणों में अवसर देकर नहीं बनाया जा सकता।
उसे ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें परीक्षा का प्रश्नपत्र सुरक्षित हो।
भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी हो।
परिणाम विश्वसनीय हो।
शिकायत की स्वतंत्र जांच हो।
दोषी अधिकारी पर कार्रवाई हो।
और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी को दुश्मन नहीं, लोकतांत्रिक नागरिक माना जाए।
सरकार की ताकत यह नहीं कि वह कितनी जल्दी भीड़ को हटा सकती है।
सरकार की असली ताकत यह है कि वह कितनी जल्दी उस कारण को दूर कर सकती है जिसके कारण भीड़ सड़क पर आई।
झारखंड का सवाल यही है।
जंतर-मंतर का सवाल भी यही है।
और देश के लाखों प्रतियोगी छात्रों का सवाल भी यही है।
पेपर लीक होने पर आरोपी पकड़ा जाना जरूरी है—लेकिन व्यवस्था की जिम्मेदारी तय होना उससे भी जरूरी है।
परिणाम में गड़बड़ी होने पर परीक्षा दोबारा कराना जरूरी हो सकता है—लेकिन यह पता लगाना उससे भी जरूरी है कि गड़बड़ी हुई कैसे।
प्रदर्शन में कानून-व्यवस्था बनाए रखना जरूरी है—लेकिन यह भी जरूरी है कि कानून लागू करने वाला तंत्र स्वयं जवाबदेह रहे।
भारत को ऐसे कानून की जरूरत है जो सिर्फ यह न पूछे—
"पेपर किसने लीक किया?"
बल्कि यह भी पूछे—
"ऐसी व्यवस्था किसने बनने दी जिसमें पेपर लीक हो सका?"
और ऐसा लोकतांत्रिक ढांचा चाहिए जो सिर्फ यह न पूछे—
"प्रदर्शनकारी ने बैरिकेड क्यों तोड़ा?"
बल्कि यह भी पूछे—
"वह बैरिकेड तक पहुंचा ही क्यों? उसकी शिकायत कितने दिनों से अनसुनी थी?"
क्योंकि किसी भी लोकतंत्र में लाठी अंतिम उत्तर नहीं हो सकती।
अंतिम उत्तर होना चाहिए—
तथ्य।
जांच।
न्याय।
जवाबदेही।
और सबसे ऊपर—
नागरिक के भविष्य का सम्मान।
अगर भारत की युवा पीढ़ी को यह भरोसा हो जाए कि उसकी मेहनत बिकाऊ प्रश्नपत्र से नहीं हारेगी, उसका परिणाम बंद कमरों में तय नहीं होगा और उसकी आवाज लाठी से नहीं दबाई जाएगी, तभी "युवा भारत" केवल नारा नहीं, वास्तविक लोकतांत्रिक शक्ति बनेगा।
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