"मॉस्को से उठी नई विश्व व्यवस्था की आवाज़: 100+ देशों के बीच ग्लोबल साउथ ने दुनिया को दिया बड़ा संदेश"

क्या दुनिया नई विश्व व्यवस्था की ओर बढ़ रही है? मॉस्को सुरक्षा फोरम में ग्लोबल साउथ के नेताओं ने वैश्विक सुरक्षा और शासन पर दिए बड़े संकेत।

"मॉस्को से उठी नई विश्व व्यवस्था की आवाज़: 100+ देशों के बीच ग्लोबल साउथ ने दुनिया को दिया बड़ा संदेश"

Sudhir Taliyan

Chaudhary- Talan Khap

सामूहिक सुरक्षा, साझा जिम्मेदारी और नए विश्व व्यवस्था की ओर बढ़ता ग्लोबल साउथ

दुनिया ऐसे दौर से गुजर रही है जहां युद्ध, आतंकवाद, साइबर हमले, आर्थिक प्रतिबंध, ऊर्जा संकट और भू-राजनीतिक संघर्ष लगातार बढ़ रहे हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में तनाव, इंडो-पैसिफिक प्रतिस्पर्धा और वैश्विक आर्थिक अस्थिरता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल सैन्य ताकत से सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती। इसी पृष्ठभूमि में मॉस्को में आयोजित "इंटरनेशनल मीटिंग ऑफ हाई रिप्रेजेंटेटिव्स फॉर सिक्योरिटी इश्यूज़" और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मंच ने पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया। इस मंच पर एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और मध्य पूर्व सहित ग्लोबल साउथ के देशों के सुरक्षा प्रमुखों और प्रतिनिधियों ने एक नई विश्व व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दिया।

इस सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण संदेश था—"सामूहिक सुरक्षा, साझा जिम्मेदारी और सहयोग आधारित वैश्विक शासन"। सम्मेलन में भाग लेने वाले कई देशों ने कहा कि वर्तमान वैश्विक संस्थाएं बदलती दुनिया की वास्तविकताओं को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करतीं और विकासशील देशों की आवाज़ को अधिक महत्व मिलना चाहिए।

क्यों महत्वपूर्ण था मॉस्को का यह मंच?

रूस के सुरक्षा परिषद सचिव सर्गेई शोइगू की अध्यक्षता में आयोजित इस बैठक में 100 से अधिक देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। कई रिपोर्टों के अनुसार 120 से अधिक देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों की भागीदारी दर्ज की गई। सम्मेलन का केंद्रीय विषय था—बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के दौर में अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौतियां और अवसर।

रूस लंबे समय से यह तर्क देता रहा है कि शीत युद्ध के बाद विकसित हुई एकध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था अब बदल रही है। मॉस्को मंच में शामिल अनेक देशों ने भी इस बात पर सहमति जताई कि वैश्विक शक्ति संतुलन अब पश्चिमी देशों तक सीमित नहीं रहा और एशिया, अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिका की भूमिका लगातार बढ़ रही है।

ग्लोबल साउथ की बढ़ती ताकत

पिछले एक दशक में "ग्लोबल साउथ" शब्द केवल भौगोलिक पहचान नहीं बल्कि राजनीतिक और आर्थिक शक्ति का प्रतीक बन गया है। भारत, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कई अफ्रीकी देश अब वैश्विक निर्णयों में अधिक भूमिका की मांग कर रहे हैं।

मॉस्को सम्मेलन में प्रतिनिधियों ने कहा कि दुनिया की अधिकांश आबादी, प्राकृतिक संसाधन और भविष्य की आर्थिक वृद्धि ग्लोबल साउथ में केंद्रित है। ऐसे में सुरक्षा संबंधी निर्णयों में भी उनकी भागीदारी बढ़नी चाहिए। सम्मेलन में बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था, समान सम्मान और संप्रभुता के सिद्धांतों पर आधारित सहयोग को मजबूत करने की बात कही गई।

वैश्विक शासन पर क्या कहा गया?

सम्मेलन में कई वक्ताओं ने संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका मानना था कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी संरचनाएं आज की दुनिया की वास्तविकताओं को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करतीं।

प्रतिनिधियों ने कहा कि जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, साइबर अपराध, खाद्य संकट और महामारी जैसी चुनौतियों का समाधान किसी एक देश द्वारा नहीं किया जा सकता। इसके लिए वैश्विक शासन की ऐसी प्रणाली चाहिए जिसमें सभी देशों की आवाज़ को महत्व मिले।

यह विचार विशेष रूप से अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के देशों द्वारा समर्थन प्राप्त करता दिखाई दिया, जो लंबे समय से वैश्विक संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व की मांग करते रहे हैं।

आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता की मांग

सम्मेलन के दौरान आतंकवाद सबसे प्रमुख विषयों में से एक रहा। भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने स्पष्ट कहा कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में दोहरे मानदंड नहीं होने चाहिए। उन्होंने जिम्मेदार देशों से आतंकवाद के समर्थन और विरोध के बीच स्पष्ट विकल्प चुनने का आग्रह किया।

डोभाल का संदेश केवल भारत की सुरक्षा चिंताओं तक सीमित नहीं था, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर आतंकवाद के खिलाफ एक समान और निष्पक्ष दृष्टिकोण की मांग भी था। विशेषज्ञों का मानना है कि आतंकवाद, कट्टरपंथ और सीमा पार हिंसा आज भी कई देशों की स्थिरता के लिए गंभीर खतरा बने हुए हैं।

साइबर सुरक्षा और नई तकनीकी चुनौतियां

सम्मेलन में साइबर सुरक्षा को भविष्य की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बताया गया। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), क्वांटम कंप्यूटिंग, डेटा नियंत्रण और डिजिटल निगरानी जैसे विषयों पर भी चर्चा हुई।

प्रतिनिधियों ने चिंता जताई कि डिजिटल युग में साइबर हमले केवल सरकारी संस्थानों तक सीमित नहीं रहे बल्कि बैंकिंग, ऊर्जा, स्वास्थ्य और संचार नेटवर्क को भी प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करना आवश्यक है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में साइबर सुरक्षा पारंपरिक सैन्य सुरक्षा जितनी ही महत्वपूर्ण हो जाएगी।

रूस का संदेश और उसकी रणनीति

रूस ने इस मंच को केवल सुरक्षा सम्मेलन के रूप में नहीं बल्कि एक व्यापक कूटनीतिक पहल के रूप में भी इस्तेमाल किया। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अपने संदेश में सुरक्षा व्यवस्था को "समान और अविभाज्य" बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। रूस का तर्क है कि वैश्विक सुरक्षा किसी एक क्षेत्र या समूह तक सीमित नहीं हो सकती।

विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने भी बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की अवधारणा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में संतुलन और पारस्परिक सम्मान आवश्यक है।

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हालांकि पश्चिमी देशों के कई विश्लेषक रूस की इन पहलों को उसकी व्यापक भू-राजनीतिक रणनीति का हिस्सा मानते हैं। इसलिए इस मंच को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-अलग दृष्टिकोण भी मौजूद हैं।

BRICS और नई वैश्विक संरचना

सम्मेलन में BRICS देशों और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की भूमिका पर भी विशेष चर्चा हुई। BRICS का विस्तार होने के बाद यह समूह वैश्विक अर्थव्यवस्था और राजनीति में अधिक प्रभावशाली बन गया है।

कई प्रतिनिधियों ने कहा कि भविष्य की वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था में BRICS, शंघाई सहयोग संगठन और अन्य क्षेत्रीय मंचों की भूमिका बढ़ सकती है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि मौजूदा वैश्विक संस्थाएं समाप्त हो जाएंगी, बल्कि यह कि निर्णय लेने की प्रक्रिया अधिक बहुध्रुवीय और सहभागी हो सकती है।

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ग्लोबल साउथ की मुख्य मांगें

मॉस्को सम्मेलन में उभरकर सामने आई प्रमुख मांगों में शामिल थीं:

  • वैश्विक शासन संस्थाओं में सुधार

  • विकासशील देशों का अधिक प्रतिनिधित्व

  • आतंकवाद के खिलाफ समान नीति

  • साइबर सुरक्षा सहयोग

  • आर्थिक प्रतिबंधों के राजनीतिक उपयोग में कमी

  • खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा पर वैश्विक सहयोग

  • नई तकनीकों के लिए साझा नियम

इन मुद्दों ने यह स्पष्ट किया कि ग्लोबल साउथ अब केवल विकास सहायता प्राप्त करने वाला समूह नहीं बल्कि वैश्विक एजेंडा निर्धारित करने वाला महत्वपूर्ण खिलाड़ी बनना चाहता है।

दुनिया पर संभावित प्रभाव

यदि मॉस्को मंच में उठाए गए विचारों को व्यापक समर्थन मिलता है तो आने वाले वर्षों में अंतरराष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव देखे जा सकते हैं।

पहला, वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में विकासशील देशों की भूमिका बढ़ सकती है।

दूसरा, सुरक्षा संबंधी मुद्दों पर क्षेत्रीय संगठनों का प्रभाव बढ़ सकता है।

तीसरा, बहुध्रुवीय व्यवस्था की दिशा में वैश्विक शक्ति संतुलन और अधिक स्पष्ट हो सकता है।

चौथा, आतंकवाद और साइबर अपराध जैसे मुद्दों पर नए सहयोगी ढांचे विकसित हो सकते हैं।

हालांकि इन संभावनाओं के सामने कई चुनौतियां भी हैं। विभिन्न देशों के हित हमेशा समान नहीं होते और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा सहयोग की राह में बाधा बन सकती है।

क्या वास्तव में बदल रही है दुनिया?

विशेषज्ञों का मानना है कि दुनिया पहले ही एक बड़े परिवर्तन के दौर में प्रवेश कर चुकी है। अमेरिका, चीन, रूस, भारत, यूरोपीय संघ और क्षेत्रीय शक्तियों के बीच नया संतुलन बन रहा है।

मॉस्को का यह सम्मेलन उसी परिवर्तन का एक प्रतीक माना जा सकता है। यहां यह संदेश स्पष्ट रूप से उभरा कि सुरक्षा केवल सैन्य शक्ति का प्रश्न नहीं बल्कि आर्थिक विकास, तकनीकी सहयोग, राजनीतिक विश्वास और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी का भी विषय है।

भविष्य की दिशा

आने वाले दशक में वैश्विक सुरक्षा का स्वरूप काफी अलग हो सकता है। जलवायु परिवर्तन, जल संकट, साइबर युद्ध, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और ऊर्जा प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियां नई सुरक्षा सोच की मांग करेंगी।

मॉस्को मंच में ग्लोबल साउथ की ओर से दिया गया संदेश यही था कि भविष्य की दुनिया में सुरक्षा का अर्थ केवल सीमाओं की रक्षा नहीं बल्कि साझा विकास, सहयोग और सामूहिक जिम्मेदारी भी होगा।

निष्कर्ष

मॉस्को में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मंच ने यह संकेत दिया है कि दुनिया तेजी से बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। ग्लोबल साउथ के देशों ने सामूहिक सुरक्षा, वैश्विक शासन में सुधार और समान भागीदारी की मांग को मजबूती से रखा। आतंकवाद, साइबर सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और तकनीकी सहयोग जैसे मुद्दों पर साझा दृष्टिकोण विकसित करने की कोशिश इस सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि रही।

भले ही इस मंच के सभी प्रस्ताव तुरंत लागू न हों, लेकिन इतना स्पष्ट है कि वैश्विक राजनीति में ग्लोबल साउथ की आवाज़ पहले से कहीं अधिक मजबूत हो चुकी है। आने वाले वर्षों में यही आवाज़ अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक शासन की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

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