स्टेन स्वामी कौन थे? 84 साल के पादरी की गिरफ्तारी, 9 महीने की हिरासत और मौत की पूरी कहानी जिसने पूरे देश को झकझोर दिया
फादर स्टेन स्वामी कौन थे? जानिए भिमा कोरेगांव केस, UAPA के तहत गिरफ्तारी, जमानत विवाद, स्ट्रॉ-सिपर मामला, हिरासत में हुई मौत, Arsenal Consulting की डिजिटल फोरेंसिक रिपोर्ट, NIA का पक्ष और पूरे मामले से जुड़े कानूनी व मानवाधिकार विवाद की तथ्य आधारित पूरी कहानी।
By- Ch. Sudhir Taliyan
Father Stan Swamy: आदिवासी अधिकारों से जेल तक, भिमा कोरेगांव केस और हिरासत में मौत की पूरी कहानी **
जब अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक के अनशन के समर्थन में बोलते हुए फादर स्टेन स्वामी का नाम लिया, तो एक बार फिर देश में उस मामले की चर्चा शुरू हो गई जिसने भारत की न्याय व्यवस्था, मानवाधिकार, राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रताओं पर लंबी बहस छेड़ दी थी।
स्वरा भास्कर ने कहा कि स्टेन स्वामी की हिरासत में हुई मृत्यु उन्हें यह याद दिलाती है कि लोकतांत्रिक असहमति रखने वालों के साथ राज्य का व्यवहार किस तरह गंभीर सवाल खड़े कर सकता है। वहीं दूसरी ओर, सरकारी एजेंसियों का लगातार यह कहना रहा है कि स्टेन स्वामी के खिलाफ जांच कानून के दायरे में हुई और उन पर लगाए गए आरोप गंभीर प्रकृति के थे।
यही वजह है कि स्टेन स्वामी का मामला आज भी केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि भारत में राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम नागरिक स्वतंत्रता, UAPA, जमानत के अधिकार, मानवाधिकार और आदिवासी अधिकारों पर चल रही बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
लेकिन आखिर स्टेन स्वामी कौन थे? वे किस तरह आदिवासी क्षेत्रों में काम करने लगे? और कैसे उनका नाम देश के सबसे चर्चित आपराधिक मामलों में शामिल हुआ? आइए पूरी कहानी की शुरुआत से समझते हैं।
कौन थे फादर स्टेन स्वामी?
फादर स्टेन स्वामी का पूरा नाम स्टेनिस्लॉस लूर्दुस्वामी (Stanislaus Lourduswamy) था। उनका जन्म 26 अप्रैल 1937 को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले में हुआ था। वे ईसाई धर्म के जेसुइट (Jesuit) समुदाय से जुड़े पादरी थे।
जेसुइट समुदाय दुनिया भर में शिक्षा, सामाजिक न्याय, अनुसंधान और मानव सेवा के लिए जाना जाता है। इसी विचारधारा से प्रेरित होकर स्टेन स्वामी ने अपना अधिकांश जीवन समाज के उन वर्गों के बीच बिताया जो आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से सबसे अधिक हाशिये पर थे।
करीब पाँच दशक पहले वे झारखंड पहुंचे। उस समय झारखंड अलग राज्य नहीं था बल्कि बिहार का हिस्सा था। बाद में 2000 में झारखंड राज्य बनने के बाद भी उन्होंने अपना अधिकांश समय वहीं बिताया।
उनकी पहचान किसी धार्मिक प्रचारक से अधिक एक सामाजिक कार्यकर्ता, शोधकर्ता और आदिवासी अधिकारों के समर्थक के रूप में बनी।
आदिवासी समाज के बीच उनका काम क्या था?
भारत के आदिवासी इलाकों में खनन, औद्योगिक परियोजनाओं और भूमि अधिग्रहण को लेकर लंबे समय से विवाद रहे हैं। इन परियोजनाओं से कई गांवों के विस्थापन, जंगलों पर अधिकार और पारंपरिक आजीविका प्रभावित होने के आरोप लगते रहे हैं।
स्टेन स्वामी ने इन्हीं मुद्दों पर काम करना शुरू किया।
उनका मानना था कि विकास परियोजनाओं के साथ-साथ स्थानीय समुदायों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा भी उतनी ही आवश्यक है।
वे विशेष रूप से इन विषयों पर सक्रिय रहे—
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जल, जंगल और जमीन पर आदिवासियों के अधिकार
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विस्थापन से प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की मांग
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ग्राम सभाओं की भूमिका को मजबूत करना
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संविधान की पाँचवीं अनुसूची के प्रभावी क्रियान्वयन की वकालत
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पेसा (PESA) कानून के पालन की मांग
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जेलों में बंद आदिवासी युवाओं के मामलों का अध्ययन
उन्होंने कई शोध रिपोर्टें और लेख भी लिखे जिनमें यह प्रश्न उठाया गया कि क्या माओवादी गतिविधियों के संदेह में बड़ी संख्या में आदिवासी युवाओं को पर्याप्त कानूनी सहायता के बिना वर्षों तक जेल में रखा जा रहा है।
उनका तर्क था कि हर आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई और कानूनी प्रक्रिया का अधिकार मिलना चाहिए। दूसरी ओर, सुरक्षा एजेंसियां लगातार यह कहती रही हैं कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में कानून-व्यवस्था बनाए रखने और हिंसक गतिविधियों से निपटने के लिए कठोर कार्रवाई आवश्यक होती है।
संविधान की पाँचवीं अनुसूची और पेसा कानून पर उनका जोर क्यों था?
स्टेन स्वामी का अधिकांश सार्वजनिक कार्य भारत के संविधान में आदिवासी क्षेत्रों के लिए किए गए विशेष प्रावधानों से जुड़ा था।
पाँचवीं अनुसूची क्या है?
भारतीय संविधान की पाँचवीं अनुसूची उन क्षेत्रों के प्रशासन से संबंधित है जहाँ आदिवासी आबादी अधिक है। इसका उद्देश्य अनुसूचित जनजातियों के हितों की रक्षा करना और उनकी पारंपरिक व्यवस्था का सम्मान करना है।
पेसा (PESA) कानून क्या है?
1996 में बना Panchayats (Extension to Scheduled Areas) Act यानी PESA कानून अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को विशेष अधिकार देता है। इसके तहत स्थानीय समुदायों की सहमति और भागीदारी को महत्वपूर्ण माना गया है, विशेषकर प्राकृतिक संसाधनों और भूमि से जुड़े निर्णयों में।
स्टेन स्वामी का कहना था कि इन संवैधानिक प्रावधानों का पूर्ण पालन नहीं हो रहा है और इससे आदिवासी समुदायों के अधिकार प्रभावित होते हैं।
जेलों में बंद आदिवासी युवाओं पर उनका अध्ययन
स्टेन स्वामी ने झारखंड की जेलों में बंद आदिवासी युवाओं पर भी अध्ययन किया।
उन्होंने सार्वजनिक रूप से दावा किया था कि अनेक आदिवासी युवा ऐसे मामलों में वर्षों तक मुकदमे का सामना करते रहे जिनमें सुनवाई धीमी रही या पर्याप्त कानूनी सहायता उपलब्ध नहीं थी।
उन्होंने इस विषय पर रिपोर्टें प्रकाशित कीं और न्यायिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने की मांग की।
हालांकि सरकारी एजेंसियों ने समय-समय पर यह भी कहा कि सुरक्षा संबंधी मामलों में प्रत्येक गिरफ्तारी कानून के अनुसार होती है और अंतिम निर्णय न्यायालय करता है।
भिमा कोरेगांव मामला क्या है?
स्टेन स्वामी का नाम राष्ट्रीय स्तर पर तब चर्चा में आया जब उन्हें भिमा कोरेगांव-एल्गार परिषद मामले में आरोपी बनाया गया।
इस मामले को समझने के लिए इसकी पृष्ठभूमि जानना आवश्यक है।
1 जनवरी 2018 की घटना
महाराष्ट्र के पुणे जिले में स्थित भिमा कोरेगांव ऐतिहासिक महत्व का स्थान है। हर वर्ष 1 जनवरी को बड़ी संख्या में लोग वहाँ एकत्र होकर 1818 के युद्ध की वर्षगांठ मनाते हैं।
1 जनवरी 2018 को भी हजारों लोग वहाँ पहुंचे थे।
इसी दौरान हिंसा भड़क गई, जिसमें एक व्यक्ति की मृत्यु हुई और कई लोग घायल हुए। कई वाहनों तथा सार्वजनिक संपत्ति को भी नुकसान पहुंचा।
इसके बाद महाराष्ट्र पुलिस ने मामले की जांच शुरू की।
एल्गार परिषद कार्यक्रम क्या था?
जांच के दौरान पुलिस ने 31 दिसंबर 2017 को पुणे के शनिवारवाड़ा में आयोजित एल्गार परिषद कार्यक्रम पर ध्यान केंद्रित किया।
यह कार्यक्रम कई सामाजिक संगठनों और पूर्व न्यायाधीशों की पहल पर आयोजित किया गया था। इसमें विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर भाषण और सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ हुई थीं।
जांच एजेंसियों का आरोप था कि इस कार्यक्रम का संबंध प्रतिबंधित संगठन CPI (Maoist) से था।
सरकार और जांच एजेंसियों के अनुसार इस मंच का उपयोग कथित रूप से माओवादी विचारधारा के प्रचार और सरकार विरोधी गतिविधियों के लिए किया गया।
आयोजकों और कई प्रतिभागियों ने इन आरोपों से इनकार किया और कहा कि कार्यक्रम संविधान तथा सामाजिक न्याय के मुद्दों पर आधारित था।
यहीं से यह मामला केवल स्थानीय हिंसा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय स्तर की जांच में बदल गया।
जांच कैसे आगे बढ़ी?
प्रारंभिक जांच महाराष्ट्र पुलिस ने की।
बाद में 2020 में यह मामला राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को सौंप दिया गया।
इसके बाद कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, लेखकों, शिक्षकों, वकीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ जांच आगे बढ़ी।
जांच एजेंसियों ने दावा किया कि कुछ आरोपी प्रतिबंधित माओवादी संगठन से जुड़े हुए थे और देश के खिलाफ व्यापक साजिश का हिस्सा थे।
इन्हीं आरोपियों की सूची में फादर स्टेन स्वामी का नाम भी शामिल किया गया।
स्टेन स्वामी पर क्या आरोप लगाए गए?
NIA ने आरोप लगाया कि स्टेन स्वामी का संबंध प्रतिबंधित CPI (Maoist) संगठन से था।
जांच एजेंसी के अनुसार—
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वे कथित रूप से माओवादी नेटवर्क से जुड़े थे।
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उनके इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से ऐसे दस्तावेज मिले जिन्हें एजेंसी ने माओवादी गतिविधियों से संबंधित बताया।
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उन पर गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA के तहत आरोप लगाए गए।
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एजेंसी का दावा था कि वे सरकार के खिलाफ कथित साजिश से जुड़े लोगों के संपर्क में थे।
स्टेन स्वामी ने अपने जीवनकाल में इन सभी आरोपों से स्पष्ट रूप से इनकार किया।
उन्होंने कहा कि उनका पूरा काम आदिवासी अधिकारों, संविधान और सामाजिक न्याय से जुड़ा रहा है। उनका यह भी कहना था कि उन्हें उनके सामाजिक कार्यों के कारण इस मामले में फंसाया गया है।
यह मामला इतना संवेदनशील क्यों बन गया?
भिमा कोरेगांव जांच शुरू से ही दो अलग-अलग दृष्टिकोणों के बीच चर्चा का विषय रही।
एक ओर जांच एजेंसियां इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन से जुड़ा गंभीर मामला बताती रहीं।
दूसरी ओर, कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, वकीलों और नागरिक समाज के संगठनों ने कहा कि सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष न्यायिक जांच और त्वरित सुनवाई होनी चाहिए।
यही कारण है कि यह मामला केवल एक आपराधिक मुकदमा नहीं रहा, बल्कि भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, असहमति, आतंकवाद-रोधी कानूनों और न्यायिक प्रक्रिया पर व्यापक सार्वजनिक बहस का विषय बन गया।
8 अक्टूबर 2020: जब NIA ने किया गिरफ्तार
8 अक्टूबर 2020 को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की टीम झारखंड की राजधानी रांची स्थित बगैचा (Bagaicha) सामाजिक केंद्र पहुंची। यही वह स्थान था जहाँ स्टेन स्वामी रहते थे और आदिवासी अधिकारों से जुड़े अपने सामाजिक कार्यों का संचालन करते थे।
पूछताछ के बाद NIA ने उन्हें औपचारिक रूप से गिरफ्तार कर लिया और मुंबई ले जाया गया, क्योंकि भिमा कोरेगांव-एल्गार परिषद मामले की सुनवाई वहीं चल रही थी।
उस समय उनकी आयु 83 वर्ष थी।
वे कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे थे, जिनमें प्रमुख थीं—
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पार्किंसन रोग
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सुनने में कठिनाई
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बढ़ती उम्र से जुड़ी शारीरिक कमजोरी
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चलने-फिरने में परेशानी
गिरफ्तारी के समय उनकी उम्र और स्वास्थ्य को लेकर देशभर में चर्चा शुरू हो गई।
गिरफ्तारी से पहले जारी किया गया वीडियो
गिरफ्तार किए जाने से पहले स्टेन स्वामी ने एक वीडियो संदेश रिकॉर्ड किया था, जो बाद में सार्वजनिक हुआ।
इस संदेश में उन्होंने कहा कि उन्होंने कोई गैरकानूनी काम नहीं किया है और उन्हें उनके सामाजिक कार्यों के कारण इस मामले में फंसाया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि वे हिंसा में विश्वास नहीं रखते और उनका पूरा जीवन संविधान तथा आदिवासी समुदायों के अधिकारों के लिए काम करने में बीता है।
दूसरी ओर NIA का कहना था कि गिरफ्तारी उपलब्ध साक्ष्यों और जांच के आधार पर की गई है तथा मामला न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है।
UAPA क्या है और यह इतना चर्चित क्यों है?
स्टेन स्वामी पर गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (Unlawful Activities Prevention Act – UAPA) के तहत आरोप लगाए गए।
यह भारत का प्रमुख आतंकवाद-रोधी कानून है।
इस कानून के अंतर्गत यदि अदालत को प्रथम दृष्टया अभियोजन का मामला सही प्रतीत होता है, तो नियमित जमानत प्राप्त करना सामान्य आपराधिक मामलों की तुलना में कहीं अधिक कठिन हो जाता है।
यही कारण है कि UAPA से जुड़े मामलों में अक्सर लंबी न्यायिक हिरासत देखने को मिलती है, जबकि मुकदमे की सुनवाई कई वर्षों तक चल सकती है।
आलोचकों का तर्क है कि इस कानून की कठोर जमानत व्यवस्था से आरोपित लंबे समय तक जेल में रह सकते हैं, जबकि सरकार का कहना है कि आतंकवाद और संगठित हिंसक गतिविधियों से निपटने के लिए ऐसे कड़े प्रावधान आवश्यक हैं।
तलोजा जेल में भेजे गए
गिरफ्तारी के बाद स्टेन स्वामी को महाराष्ट्र की तलोजा सेंट्रल जेल भेजा गया।
यहीं से उनके स्वास्थ्य को लेकर लगातार खबरें सामने आने लगीं।
पार्किंसन रोग के कारण उनके हाथ लगातार कांपते थे। इस बीमारी में सामान्य दैनिक कार्य भी कठिन हो जाते हैं।
परिवार और वकीलों के अनुसार उन्हें—
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कप पकड़ने में कठिनाई होती थी,
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स्वयं भोजन करने में परेशानी होती थी,
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पानी पीने के लिए विशेष सहायता की आवश्यकता पड़ती थी।
स्ट्रॉ और सिपर विवाद कैसे शुरू हुआ?
स्टेन स्वामी के मामले का सबसे चर्चित पहलू "स्ट्रॉ और सिपर" विवाद बना।
पार्किंसन रोग के कारण वे सामान्य गिलास पकड़कर पानी नहीं पी सकते थे।
इसलिए उन्होंने अदालत के माध्यम से जेल प्रशासन से स्ट्रॉ और सिपर उपलब्ध कराने का अनुरोध किया।
जब यह बात सार्वजनिक हुई कि उन्हें यह सुविधा तुरंत उपलब्ध नहीं कराई गई, तो देशभर में तीखी बहस छिड़ गई।
सोशल मीडिया, मानवाधिकार संगठनों और अनेक सार्वजनिक हस्तियों ने सवाल उठाए कि गंभीर बीमारी से पीड़ित 83 वर्षीय व्यक्ति को बुनियादी चिकित्सकीय सुविधा उपलब्ध कराने में देरी क्यों हुई।
जेल प्रशासन और NIA की ओर से अदालत में कहा गया कि इस विषय पर प्रक्रिया के अनुसार कार्रवाई की जा रही है।
बाद में उन्हें स्ट्रॉ और सिपर उपलब्ध करा दिए गए।
हालांकि तब तक यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर जेलों में बुजुर्ग और बीमार कैदियों की सुविधाओं पर व्यापक चर्चा का विषय बन चुका था।
जमानत की मांग क्यों की गई?
स्टेन स्वामी के वकीलों ने अदालत में कई बार जमानत याचिकाएँ दायर कीं।
उनका कहना था कि—
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उनकी उम्र 84 वर्ष के करीब है।
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वे पार्किंसन रोग से पीड़ित हैं।
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कई अन्य स्वास्थ्य समस्याएँ भी हैं।
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कोविड-19 महामारी के दौरान जेल में रहना उनके लिए अत्यंत जोखिमपूर्ण है।
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जांच पूरी हो चुकी है, इसलिए हिरासत आवश्यक नहीं है।
बचाव पक्ष का यह भी तर्क था कि मानवीय आधार पर उन्हें राहत मिलनी चाहिए।
अदालत ने नियमित जमानत क्यों नहीं दी?
अभियोजन पक्ष ने अदालत में कहा कि मामला अत्यंत गंभीर है और UAPA के तहत लगाए गए आरोपों को देखते हुए नियमित जमानत नहीं दी जा सकती।
अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड और UAPA के कानूनी प्रावधानों पर विचार करते हुए नियमित जमानत देने से इनकार किया।
यह स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है कि अदालत ने उस समय यह नहीं कहा था कि आरोप सिद्ध हो चुके हैं। अदालत केवल जमानत पर निर्णय दे रही थी, न कि मुकदमे के अंतिम परिणाम पर।
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यही अंतर भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता गया
2021 की शुरुआत तक स्टेन स्वामी की तबीयत लगातार खराब होने लगी।
उनके वकीलों ने अदालत को बताया कि—
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उनका वजन कम हो रहा है।
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वे चलने-फिरने में असमर्थ हो रहे हैं।
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कई दैनिक कार्य स्वयं नहीं कर पा रहे हैं।
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उन्हें विशेषज्ञ चिकित्सा की आवश्यकता है।
बचाव पक्ष ने मेडिकल आधार पर जमानत देने की मांग दोहराई।
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अदालत में कहा—"मैं धीरे-धीरे मर रहा हूँ"
मई 2021 की एक सुनवाई के दौरान स्टेन स्वामी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बॉम्बे हाई कोर्ट से कहा—
"मैं धीरे-धीरे मर रहा हूँ।"
उन्होंने अदालत से कहा कि उनका स्वास्थ्य लगातार गिर रहा है और जेल में रहना उनके लिए अत्यंत कठिन होता जा रहा है।
यह बयान पूरे देश में व्यापक रूप से चर्चित हुआ।
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अस्पताल में भर्ती
उनकी बिगड़ती स्थिति को देखते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट ने उन्हें निजी अस्पताल में इलाज कराने की अनुमति दी।
इसके बाद उन्हें मुंबई के होली फैमिली अस्पताल में भर्ती कराया गया।
उपचार के दौरान उनकी स्वास्थ्य स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ।
इसी दौरान वे कोविड-19 से भी संक्रमित पाए गए।
कोविड संक्रमण और पहले से मौजूद गंभीर बीमारियों के कारण उनकी स्थिति और अधिक जटिल हो गई।
5 जुलाई 2021: हिरासत में मृत्यु
5 जुलाई 2021 को बॉम्बे हाई कोर्ट में उनकी मेडिकल बेल याचिका पर सुनवाई चल रही थी।
उसी दौरान अस्पताल की ओर से अदालत को जानकारी दी गई कि स्टेन स्वामी को कार्डियक अरेस्ट आया था।
कुछ समय बाद अस्पताल ने पुष्टि की कि उनका निधन हो गया है।
उस समय वे लगभग नौ महीने से न्यायिक हिरासत में थे।
महत्वपूर्ण बात यह रही कि उनकी मृत्यु तक उनके खिलाफ मुकदमे का ट्रायल पूरा नहीं हुआ था और आरोपों पर अंतिम न्यायिक फैसला नहीं आया था।
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क्या स्टेन स्वामी दोषी साबित हुए थे?
यह इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न है।
तथ्य यह है कि—
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अदालत ने उन्हें कभी दोषी घोषित नहीं किया।
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अदालत ने उन्हें निर्दोष भी घोषित नहीं किया।
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उनकी मृत्यु के बाद उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही समाप्त हो गई।
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इसलिए उनके विरुद्ध लगाए गए आरोपों पर कोई अंतिम न्यायिक निर्णय कभी नहीं आया।
यही कारण है कि उनके मामले का उल्लेख करते समय यह कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा कि वे दोषी सिद्ध हो चुके थे।
साथ ही यह कहना भी सही नहीं होगा कि अदालत ने उन्हें पूरी तरह निर्दोष घोषित कर दिया था।
कानूनी दृष्टि से मामला अंतिम निर्णय तक पहुँचे बिना ही समाप्त हो गया।
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हिरासत में मौत पर क्यों उठे सवाल?
स्टेन स्वामी की मृत्यु के बाद पूरे देश में कई महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए गए—
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क्या अत्यधिक बुजुर्ग आरोपितों के लिए अलग जमानत नीति होनी चाहिए?
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क्या गंभीर बीमारियों से पीड़ित कैदियों को बेहतर चिकित्सकीय सुविधाएँ मिल रही हैं?
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क्या UAPA जैसे कठोर कानूनों में लंबी न्यायिक हिरासत की समीक्षा आवश्यक है?
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क्या जेलों की स्वास्थ्य व्यवस्था पर्याप्त है?
दूसरी ओर सरकार और जांच एजेंसियों का कहना रहा कि पूरी प्रक्रिया कानून के अनुसार चली, मामला न्यायालय के समक्ष था और जांच एजेंसी का कार्य केवल उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर जांच करना था।
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यहीं से यह मामला केवल एक आपराधिक मुकदमा नहीं रहा, बल्कि भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली, मानवाधिकार, राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रताओं के बीच संतुलन पर राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया।
डिजिटल सबूतों पर विवाद: Arsenal Consulting की रिपोर्ट ने क्यों खड़े किए नए सवाल?
फादर स्टेन स्वामी की मृत्यु के बाद भिमा कोरेगांव मामले में एक नया विवाद सामने आया। यह विवाद जांच एजेंसियों के आरोपों से अधिक डिजिटल फोरेंसिक साक्ष्यों को लेकर था।
अमेरिका स्थित डिजिटल फोरेंसिक कंपनी Arsenal Consulting ने भिमा कोरेगांव मामले के कुछ आरोपियों के कंप्यूटरों की स्वतंत्र तकनीकी जांच से संबंधित रिपोर्टें जारी कीं। इन रिपोर्टों में कंपनी ने दावा किया कि कुछ इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में मैलवेयर (Malware) के माध्यम से बाहरी व्यक्ति द्वारा कथित रूप से दस्तावेज डाले गए थे और संबंधित उपयोगकर्ताओं को इसकी जानकारी नहीं थी।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि Arsenal Consulting ने स्टेन स्वामी के कंप्यूटर के संबंध में भी तकनीकी विश्लेषण प्रस्तुत किया। रिपोर्ट में दावा किया गया कि उनके कंप्यूटर तक दूर से अनधिकृत पहुंच बनाई गई थी और उसमें कुछ फाइलें कथित रूप से जोड़ी गई थीं।
बचाव पक्ष का क्या कहना था?
स्टेन स्वामी के वकीलों और अन्य आरोपियों के बचाव पक्ष ने इन रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि जांच एजेंसियों द्वारा जिन इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेजों को महत्वपूर्ण साक्ष्य बताया गया, उनकी विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न उठते हैं।
बचाव पक्ष का तर्क था कि यदि डिजिटल साक्ष्यों से छेड़छाड़ हुई है, तो पूरे मामले की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।
उन्होंने अदालत में भी इस विषय को उठाया और कहा कि आधुनिक साइबर अपराधों के दौर में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की सत्यता की निष्पक्ष जांच अत्यंत आवश्यक है।
https://politicsinsightindia.com/new/norway-press-freedom-pm-media-democracy-satire
NIA का पक्ष क्या है?
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने Arsenal Consulting की रिपोर्ट के निष्कर्षों को स्वीकार नहीं किया।
एजेंसी का कहना रहा कि उसकी जांच कानून के अनुसार की गई है और आरोपपत्र उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर तैयार किया गया है।
NIA का यह भी कहना है कि मामले से जुड़े सभी साक्ष्यों का मूल्यांकन अंततः न्यायालय करेगा। इसलिए किसी निजी फोरेंसिक रिपोर्ट को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता।
यानी इस मुद्दे पर दोनों पक्षों के दावे अलग-अलग हैं और इस संबंध में कोई अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अभी तक सामने नहीं आया है।
क्या अदालत ने डिजिटल साक्ष्यों पर कोई अंतिम फैसला दिया?
नहीं।
यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है जिसे अक्सर सार्वजनिक चर्चा में नजरअंदाज कर दिया जाता है।
अब तक किसी अदालत ने यह अंतिम रूप से घोषित नहीं किया है कि—
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डिजिटल साक्ष्य पूरी तरह फर्जी थे, या
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जांच एजेंसियों के सभी इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य पूरी तरह सही थे।
इसलिए इस विषय पर उपलब्ध दावों और प्रतिदावों को उसी संदर्भ में समझना चाहिए। न्यायिक प्रक्रिया में अंतिम निष्कर्ष अदालत द्वारा साक्ष्यों की जांच के बाद ही निकाला जाता है।
https://politicsinsightindia.com/new/bharat-arthvyavastha-nijikaran-grameen-sankat
मानवाधिकार संगठनों की प्रतिक्रिया
फादर स्टेन स्वामी की मृत्यु के बाद भारत और विदेश के अनेक मानवाधिकार संगठनों ने चिंता व्यक्त की।
इनमें शामिल थे—
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संयुक्त राष्ट्र (UN) के कई स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञ,
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एमनेस्टी इंटरनेशनल,
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इंटरनेशनल कमीशन ऑफ ज्यूरिस्ट्स (ICJ),
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ह्यूमन राइट्स से जुड़े कई भारतीय संगठन,
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अनेक सेवानिवृत्त न्यायाधीश, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता।
इन संगठनों ने मुख्य रूप से तीन मुद्दे उठाए—
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अधिक आयु और गंभीर बीमारी को देखते हुए मानवीय आधार पर जमानत पर विचार होना चाहिए था।
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जेलों में बुजुर्ग और बीमार कैदियों के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने की आवश्यकता है।
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UAPA जैसे कठोर कानूनों के तहत लंबी न्यायिक हिरासत की समीक्षा होनी चाहिए।
यह ध्यान रखना भी आवश्यक है कि ये मानवाधिकार संगठनों के विचार और सिफारिशें थीं; वे किसी न्यायालय का अंतिम निर्णय नहीं थीं।
https://politicsinsightindia.com/new/rahul-gandhi-economic-storm-india-deep-analysis
सरकार और जांच एजेंसियों का पक्ष
सरकार और राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने पूरे मामले में लगातार यह रुख रखा कि—
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गिरफ्तारी विधि सम्मत तरीके से की गई।
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जांच उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर हुई।
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मामला न्यायालय में विचाराधीन था।
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किसी भी आरोपी को दोषी या निर्दोष घोषित करने का अधिकार केवल न्यायालय के अंतिम निर्णय से ही होता है।
सरकार का यह भी कहना रहा है कि भारत को माओवादी हिंसा जैसी गंभीर आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ता है और जांच एजेंसियों को कानून के अनुसार कार्रवाई करनी होती है।
स्वरा भास्कर ने स्टेन स्वामी का जिक्र क्यों किया?
हाल ही में सामाजिक कार्यकर्ता और जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के अनशन के समर्थन में जंतर-मंतर पर आयोजित कार्यक्रम में अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने फादर स्टेन स्वामी का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि जब भी लोकतांत्रिक विरोध, नागरिक अधिकारों और राज्य की कार्रवाई की चर्चा होती है, उन्हें स्टेन स्वामी का मामला याद आता है क्योंकि वे लंबे समय तक न्यायिक हिरासत में रहे और मुकदमे का अंतिम फैसला आने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गई।
स्वरा भास्कर का यह बयान उनका राजनीतिक और नैतिक दृष्टिकोण है। स्वाभाविक रूप से इस विषय पर अलग-अलग राजनीतिक दलों, कानूनी विशेषज्ञों और नागरिक समाज के बीच भिन्न मत मौजूद हैं।
https://politicsinsightindia.com/new/bharat-mein-aarthik-asamanta-gareeb-se-ameer-arthvyavastha
स्टेन स्वामी का मामला आज भी क्यों महत्वपूर्ण माना जाता है?
फादर स्टेन स्वामी का मामला केवल एक व्यक्ति की गिरफ्तारी या मृत्यु तक सीमित नहीं है। यह भारतीय न्याय व्यवस्था से जुड़े कई बड़े प्रश्नों को सामने लाता है—
1. राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम नागरिक स्वतंत्रता
क्या कठोर आतंकवाद-रोधी कानूनों और नागरिक स्वतंत्रताओं के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सकता है?
2. UAPA के तहत जमानत
क्या अत्यधिक बुजुर्ग और गंभीर रूप से बीमार आरोपियों के मामलों में अलग मानदंड होने चाहिए?
3. जेलों की स्वास्थ्य व्यवस्था
क्या भारतीय जेलें गंभीर बीमार कैदियों के उपचार के लिए पर्याप्त रूप से तैयार हैं?
4. डिजिटल साक्ष्यों की विश्वसनीयता
साइबर अपराध और हैकिंग के दौर में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की जांच किस स्तर की होनी चाहिए?
5. मुकदमों में देरी
यदि मुकदमे वर्षों तक चलते हैं, तो लंबी न्यायिक हिरासत से जुड़े मानवीय और कानूनी प्रश्नों का समाधान कैसे किया जाए?
इन्हीं कारणों से कानून के छात्र, मानवाधिकार विशेषज्ञ, न्यायविद और सार्वजनिक नीति के शोधकर्ता आज भी इस मामले का अध्ययन करते हैं।
निष्कर्ष
फादर स्टेन स्वामी का मामला भारत के हाल के वर्षों के सबसे चर्चित और जटिल कानूनी मामलों में से एक है। इसमें एक ओर प्रतिबंधित माओवादी संगठन से कथित संबंधों और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर आरोप थे, तो दूसरी ओर 84 वर्षीय गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति, जमानत, न्यायिक हिरासत और जेल व्यवस्था को लेकर गहरी चिंताएँ भी सामने आईं।
कानूनी दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि स्टेन स्वामी के खिलाफ आरोप कभी न्यायालय में सिद्ध नहीं हुए, क्योंकि मुकदमे का अंतिम निर्णय आने से पहले ही 5 जुलाई 2021 को उनकी मृत्यु हो गई। साथ ही, उन्हें न्यायालय ने निर्दोष भी घोषित नहीं किया था। इसलिए उनके मामले का मूल्यांकन करते समय इन दोनों तथ्यों को साथ रखना आवश्यक है।
आज भी यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा, मानवाधिकार, न्यायिक प्रक्रिया, UAPA, जेल सुधार और डिजिटल साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर होने वाली बहसों में एक महत्वपूर्ण संदर्भ के रूप में सामने आता है। संभव है कि आने वाले वर्षों में भी यह मामला भारतीय न्याय व्यवस्था और नागरिक स्वतंत्रताओं पर होने वाली चर्चाओं का हिस्सा बना
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