पुणे में आदिवासी छात्रों का अनिश्चितकालीन अनशन: 12,500 भर्तियों से PESA तक, सरकार के सामने लंबित मांगों का बड़ा सवाल
पुणे में आदिवासी छात्रों का अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल आंदोलन कई लंबित मांगों को लेकर तेज हो गया है। 12,500 आदिवासी पदों की भर्ती, PESA का प्रभावी क्रियान्वयन, छात्रावासों की सुरक्षा, गढ़चिरौली में छात्राओं की मौत, छात्रवृत्ति और जनजाति वैधता जैसे मुद्दों पर सरकार से जवाबदेही और समयबद्ध कार्रवाई की मांग की जा रही है।
By- Sudhir Taliyan
पुणे, 18 अगस्त। महाराष्ट्र में आदिवासी छात्रों का असंतोष अब सड़क पर उतर आया है। पुणे के मांजरी स्थित आदिवासी छात्रावास में छात्रों ने 13 अगस्त से अपनी विभिन्न लंबित मांगों को लेकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि लंबे समय से आदिवासी विद्यार्थियों, युवाओं और समुदाय से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दे सरकारी स्तर पर लंबित हैं, लेकिन बार-बार ज्ञापन और बातचीत के बावजूद निर्णायक कार्रवाई नहीं हुई।
आंदोलनकारियों की मांगों में आदिवासी छात्रावासों की सुरक्षा और सुविधाओं से लेकर सरकारी नौकरियों में लंबित भर्ती, PESA के प्रावधानों का पालन, जाति-जनजाति वैधता प्रमाणपत्र से जुड़े निर्णय और आदिवासी आवासीय विद्यालयों में विद्यार्थियों की सुरक्षा जैसे मुद्दे शामिल हैं।
5 अगस्त के सरकारी आदेश से शुरू हुआ विवाद
आंदोलन का तत्काल कारण महाराष्ट्र सरकार के आदिवासी विकास विभाग द्वारा 5 अगस्त को जारी किया गया सरकारी निर्णय बताया जा रहा है। छात्रों ने इस आदेश में छात्रावासों में रहने वाले विद्यार्थियों पर विरोध-प्रदर्शन और संगठनात्मक गतिविधियों से जुड़े प्रतिबंधों का विरोध किया।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, आदेश के एक प्रावधान में छात्रों को छात्रावास संबंधी शिकायतों को निर्धारित प्रशासनिक माध्यम से उठाने की व्यवस्था के साथ-साथ विरोध, भूख हड़ताल, मार्च और मीडिया के माध्यम से शिकायत करने जैसी गतिविधियों से रोकने वाले प्रावधान शामिल थे।
छात्र संगठनों ने इसे विद्यार्थियों की लोकतांत्रिक आवाज को सीमित करने वाला कदम बताया और आदेश वापस लेने की मांग की।
हालांकि बाद में सरकार ने 14 अगस्त को संशोधित आदेश जारी कर विवादित प्रावधानों को हटा दिया तथा छात्रावास में प्रवेश की अधिकतम आयु 26 वर्ष से बढ़ाकर 30 वर्ष कर दी। इसके बावजूद छात्रों ने आंदोलन समाप्त नहीं किया, क्योंकि उनके अनुसार विवाद केवल छात्रावास नियमों तक सीमित नहीं है। अन्य लंबित मांगों पर भी ठोस निर्णय जरूरी है।
गढ़चिरौली में तीन आदिवासी छात्राओं की मौत ने बढ़ाई चिंता
आंदोलन की सबसे गंभीर पृष्ठभूमि गढ़चिरौली के एक आदिवासी आवासीय विद्यालय में हुई सर्पदंश की घटना है।
10 अगस्त की रिपोर्टों के अनुसार, गढ़चिरौली के जपटलाई गांव स्थित एक सहायता प्राप्त आदिवासी आवासीय विद्यालय के छात्रावास में रात के समय एक जहरीले सांप ने सो रही छह छात्राओं को डस लिया। इनमें 8, 12 और 14 वर्ष की तीन छात्राओं की मौत हो गई, जबकि तीन अन्य छात्राओं का इलाज किया गया। जिला प्रशासन ने घटना की जांच के आदेश दिए थे।
जिला कलेक्टर अविश्यंत पांडा ने कहा था कि जांच में यह देखा जाएगा कि छात्राओं के आवास में पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद थे या नहीं और विद्यालय प्रबंधन ने निर्धारित सुरक्षा नियमों का पालन किया था या नहीं। प्रशासन ने यह भी कहा था कि यदि लापरवाही या सुरक्षा संबंधी कमी सामने आती है तो जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई की जाएगी।
इसी घटना को लेकर आंदोलनकारी छात्र मृत छात्राओं के परिवारों को प्रति परिवार एक करोड़ रुपये मुआवजा देने तथा जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।
छात्र संगठनों ने भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए आदिवासी आवासीय विद्यालयों में विद्यार्थियों की सुरक्षा की व्यापक समीक्षा और बीमा सुरक्षा की भी मांग उठाई है।
12,500 आदिवासी पदों की भर्ती का मुद्दा फिर सामने
आंदोलन की एक प्रमुख मांग महाराष्ट्र में आदिवासियों के लिए आरक्षित 12,500 पदों की भर्ती से संबंधित है।
यह मुद्दा नया नहीं है। अगस्त 2024 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग ने आदिवासियों के लिए आरक्षित 12,500 पदों को भरने की प्रक्रिया तत्काल शुरू करने के निर्देश दिए थे। रिपोर्ट में कहा गया था कि इन पदों की भर्ती लंबे समय से लंबित थी और आदिवासी संगठनों तथा जनप्रतिनिधियों द्वारा लगातार इसका मुद्दा उठाया जा रहा था।
आंदोलनकारी अब इस प्रक्रिया को तेजी से पूरा करने की मांग कर रहे हैं।
उनका तर्क है कि जब सरकारी विभागों में आदिवासियों के लिए निर्धारित पद खाली पड़े हैं, तब आदिवासी युवाओं को रोजगार के अवसरों से वंचित रखना सामाजिक न्याय की भावना के विपरीत है।
इस मुद्दे पर सरकार को केवल भर्ती की घोषणा करने के बजाय यह स्पष्ट करना होगा कि कितने पद वास्तव में खाली हैं, किन विभागों में हैं, कितने पदों के लिए विज्ञापन जारी हो चुका है और चयन प्रक्रिया पूरी करने की समयसीमा क्या है।
PESA के क्रियान्वयन की मांग
आंदोलन में PESA—Panchayats (Extension to Scheduled Areas) Act, 1996 का मुद्दा भी प्रमुख है।
PESA अनुसूचित क्षेत्रों में ग्रामसभा की भूमिका और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण कानून है। केंद्र सरकार के अनुसार महाराष्ट्र PESA लागू करने वाले दस राज्यों में शामिल है।
केंद्र के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में सभी दस PESA राज्यों में राज्य, जिला, ब्लॉक और ग्राम पंचायत स्तर पर PESA के क्रियान्वयन के लिए समर्पित कर्मचारियों की नियुक्ति की गई और 12,500 से अधिक कर्मचारी जमीनी स्तर पर इसके कार्यान्वयन से जुड़े हैं।
महाराष्ट्र के आदिवासी छात्र और संगठन हालांकि यह सवाल उठा रहे हैं कि कानून और सरकारी व्यवस्था होने के बावजूद अनुसूचित क्षेत्रों में उसके प्रावधानों का वास्तविक पालन किस सीमा तक हो रहा है।
विशेष रूप से सरकारी भर्ती में PESA से जुड़े प्रावधानों के प्रभावी पालन और PESA कर्मचारियों की सेवा से संबंधित मामलों को लेकर छात्रों ने सरकार से स्पष्ट नीति की मांग की है।
छात्रावासों की सुविधाओं पर भी सवाल
महाराष्ट्र सरकार की आदिवासी विकास विभाग की आधिकारिक जानकारी के अनुसार आदिवासी विद्यार्थियों के लिए सरकारी छात्रावासों में मुफ्त प्रवेश उपलब्ध है। छात्रावास में जगह नहीं मिलने वाले उच्च शिक्षा के ST विद्यार्थियों के लिए भोजन, आवास, निर्वाह और शैक्षणिक सामग्री जैसी जरूरतों के लिए आर्थिक सहायता की व्यवस्था भी सरकारी सेवाओं में शामिल है।
आदिवासी विकास विभाग की योजनाओं में आश्रमशालाओं के विद्यार्थियों को भोजन, आवास, गणवेश, पाठ्यपुस्तक, कॉपियां और लेखन सामग्री जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने का भी प्रावधान है।
लेकिन छात्रों का सवाल योजनाओं के अस्तित्व से ज्यादा उनके जमीनी क्रियान्वयन को लेकर है।
मई 2026 में नागपुर में भी आदिवासी छात्रों ने छात्रवृत्ति, लंबित भुगतान, छात्रावास की सुविधाओं, कंप्यूटर, इंटरनेट, पुस्तकालय, अध्ययन केंद्र और लंबित भर्ती जैसे मुद्दों को लेकर प्रदर्शन किया था। उस आंदोलन में 12,500 विशेष आदिवासी पदों और PESA भर्ती को जल्द पूरा करने की मांग भी उठाई गई थी।
इससे संकेत मिलता है कि पुणे का आंदोलन अलग-थलग घटना नहीं है, बल्कि महाराष्ट्र के विभिन्न हिस्सों में आदिवासी विद्यार्थियों की ओर से उठाई जा रही समान शिकायतों की व्यापक पृष्ठभूमि है।
बंजारा अध्ययन समिति को लेकर भी विरोध
आंदोलनकारी बंजारा समुदाय से संबंधित अध्ययन समिति के सरकारी निर्णय का भी विरोध कर रहे हैं।
यह मुद्दा महाराष्ट्र में अनुसूचित जनजाति की सूची और आरक्षण को लेकर चल रही व्यापक बहस से जुड़ा है। इससे पहले भी आदिवासी संगठनों ने अन्य समुदायों को ST श्रेणी में शामिल करने की मांगों का विरोध करते हुए कहा है कि इससे मौजूदा आदिवासी समुदायों के लिए उपलब्ध आरक्षण और अवसरों पर दबाव बढ़ सकता है।
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हालांकि यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी समुदाय को अनुसूचित जनजाति की संवैधानिक सूची में शामिल करने का अंतिम निर्णय केवल राज्य सरकार के किसी अध्ययन आदेश से नहीं हो जाता। यह संविधान के अनुच्छेद 342 से जुड़ा विषय है और इसमें संसद की संवैधानिक भूमिका होती है।
जाति और जनजाति वैधता प्रमाणपत्र का विवाद
आंदोलन में रक्त-संबंध के आधार पर जाति/जनजाति वैधता प्रमाणपत्र से संबंधित सरकारी निर्णयों को वापस लेने की मांग भी शामिल है।
यह विषय महाराष्ट्र में पहले से कानूनी विवादों का हिस्सा रहा है। अदालतों ने विभिन्न मामलों में यह विचार किया है कि किसी निकट रक्त संबंधी को विधिवत जांच के बाद जारी वैधता प्रमाणपत्र का परिवार के दूसरे सदस्य के दावे पर क्या प्रभाव होना चाहिए।
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इसलिए सरकार के सामने चुनौती केवल प्रशासनिक नहीं है। उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रमाणपत्र प्रक्रिया एक ओर फर्जी दावों को रोकने में सक्षम हो और दूसरी ओर वास्तविक आदिवासी परिवारों को अनावश्यक प्रशासनिक बाधाओं का सामना न करना पड़े।
सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती
मांजरी में जारी भूख हड़ताल ने महाराष्ट्र सरकार के सामने दोहरी चुनौती खड़ी कर दी है।
पहली चुनौती तत्काल मानवीय है। अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल में बैठे छात्रों के स्वास्थ्य की निगरानी करना और बातचीत के जरिए गतिरोध समाप्त करना जरूरी है।
दूसरी चुनौती नीतिगत है। छात्रों की मांगों को केवल आश्वासन देकर टालने के बजाय सरकार को प्रत्येक मांग पर स्पष्ट स्थिति बतानी होगी।
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विशेष रूप से तीन मुद्दों पर समयबद्ध जवाब जरूरी है—
पहला, आदिवासी आवासीय विद्यालयों और छात्रावासों में सुरक्षा का स्वतंत्र ऑडिट।
दूसरा, 12,500 लंबित आदिवासी पदों की भर्ती के लिए स्पष्ट समयसीमा।
तीसरा, PESA के प्रावधानों और आदिवासी युवाओं के अधिकारों के क्रियान्वयन की समीक्षा।
केवल आदेश वापस लेना पर्याप्त नहीं
5 अगस्त के विवादित छात्रावास आदेश में संशोधन कर सरकार ने तत्काल विवाद का एक हिस्सा जरूर शांत किया, लेकिन आंदोलन के बने रहने से स्पष्ट है कि समस्या केवल एक सरकारी आदेश की नहीं है।
महाराष्ट्र के आदिवासी विद्यार्थियों का आंदोलन अब शिक्षा, सुरक्षा, रोजगार, संवैधानिक अधिकार और प्रशासनिक जवाबदेही के व्यापक प्रश्न उठा रहा है।
सरकार के लिए सबसे बेहतर रास्ता टकराव नहीं बल्कि खुली, समयबद्ध और लिखित बातचीत है। प्रत्येक मांग पर सरकार की स्थिति सार्वजनिक हो, जिम्मेदार विभाग और अधिकारी तय हों तथा लागू किए जाने वाले निर्णयों की समयसीमा घोषित की जाए।
आदिवासी विद्यार्थियों के लिए छात्रावास केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि उनके उच्च शिक्षा और सामाजिक-आर्थिक उन्नति का माध्यम है। यदि वही छात्रावास असुरक्षा, प्रशासनिक प्रतिबंधों या लंबित सुविधाओं का प्रतीक बन जाएं, तो यह केवल छात्र कल्याण विभाग की समस्या नहीं रह जाती—यह राज्य की सामाजिक न्याय नीति की परीक्षा बन जाती है।
पुणे का यह अनशन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके पीछे केवल कुछ छात्रों की शिकायत नहीं, बल्कि रोजगार, शिक्षा, सुरक्षा और अधिकारों से जुड़े कई वर्षों से लंबित सवाल एक साथ खड़े हैं। अब नजर सरकार पर है कि वह इस असंतोष को प्रशासनिक फाइलों में दबाती है या संवाद और ठोस कार्रवाई के जरिए इसका स्थायी समाधान खोजती है।
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