ग्रोथ के लिए किसानों की कुर्बानी? विकसित भारत के नाम पर किसका खेल चल रहा है?
"क्या 8% आर्थिक विकास की कीमत छोटे किसानों और बेरोजगार युवाओं को चुकानी पड़ेगी? जानिए भारत के विकास मॉडल, आर्थिक सुधारों, रोजगार संकट, कृषि और बढ़ती असमानता पर आधारित यह गहन विश्लेषण, जो कुछ असहज लेकिन जरूरी सवाल उठाता है।"
written by- Sudhir Taliyan
Chaudhary- Talan Khap
हाल ही में अर्थशास्त्री Surjit Bhalla का एक इंटरव्यू चर्चा में रहा, जिसमें उन्होंने कहा कि भारत 8 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि हासिल कर सकता है यदि सरकार कुछ बड़े आर्थिक सुधार लागू करे। उन्होंने विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए पूंजीगत लाभ कर (Capital Gains Tax) में राहत, निवेशकों के लिए कर ढांचे को आसान बनाने और नीतिगत अनिश्चितताओं को समाप्त करने की बात कही। उन्होंने यह भी कहा कि कृषि क्षेत्र में सुधार और व्यापारिक उदारीकरण की दिशा में आगे बढ़ना आवश्यक है।
सवाल यह नहीं है कि भारत 8 प्रतिशत विकास दर हासिल कर सकता है या नहीं। सवाल यह है कि यह विकास किसके लिए होगा और उसकी कीमत कौन चुकाएगा?
भारत का विकास मॉडल
भारत में पिछले तीन दशकों से आर्थिक सुधारों को विकास का सबसे बड़ा मंत्र बताया जाता रहा है। हर बार कहा गया कि निजी निवेश बढ़ेगा, उद्योग आएंगे, रोजगार पैदा होंगे और समृद्धि नीचे तक पहुंचेगी। लेकिन आज जब हम जमीन पर खड़े होकर वास्तविकता देखते हैं तो तस्वीर कहीं अधिक जटिल दिखाई देती है।
देश में करोड़ों युवा रोजगार की तलाश में हैं। लाखों शिक्षित युवा प्रतियोगी परीक्षाओं के पीछे वर्षों बिता रहे हैं। सरकारी नौकरियों की संख्या घटती जा रही है और निजी क्षेत्र स्थायी रोजगार देने से बच रहा है। ऐसे समय में यदि विकास का पूरा मॉडल केवल निवेशकों को कर राहत देने और बड़े कॉरपोरेट हितों के अनुसार नीतियां बनाने तक सीमित हो जाए, तो जनता के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है।
भारत की अर्थव्यवस्था आज दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में गिनी जाती है। लेकिन क्या इसी अनुपात में लोगों का जीवन बेहतर हुआ है?
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि देश की बड़ी आबादी अभी भी कम आय, असुरक्षित रोजगार और सामाजिक सुरक्षा की कमी से जूझ रही है। रोजगार की गुणवत्ता आज भी भारत की सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार बड़ी संख्या में लोग स्वरोजगार या बिना वेतन वाले पारिवारिक काम में लगे हुए हैं।
यानी केवल यह कहना कि GDP बढ़ रही है, पर्याप्त नहीं है। यदि विकास का लाभ सीमित वर्ग तक सिमट जाए तो वह सामाजिक असमानता को और बढ़ा सकता है।
कृषि: समस्या नहीं, करोड़ों लोगों की जीवनरेखा
आर्थिक सुधारों की बहस में अक्सर कृषि को एक "अक्षम क्षेत्र" के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। तर्क दिया जाता है कि कृषि में बहुत अधिक लोग लगे हुए हैं जबकि उसका GDP में योगदान कम है। यह तथ्य आंशिक रूप से सही है कि कृषि का GDP में योगदान लगभग 16-18 प्रतिशत के आसपास है जबकि रोजगार में उसका हिस्सा 40 प्रतिशत से अधिक है।
लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकाल लेना कि छोटे किसान विकास में बाधा हैं, खतरनाक सरलीकरण होगा।
भारत में अधिकांश किसान छोटे और सीमांत किसान हैं। इनके पास दो हेक्टेयर से कम जमीन है। ये केवल उत्पादन नहीं करते, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को जीवित रखते हैं। कृषि केवल आर्थिक गतिविधि नहीं है; यह सामाजिक सुरक्षा का सबसे बड़ा अनौपचारिक तंत्र भी है।
https://politicsinsightindia.com/new/rahul-gandhi-economic-storm-india-deep-analysis
जब उद्योग रोजगार देने में विफल रहता है, तब गांव और खेती ही करोड़ों लोगों को जीवित रखती है।
कोविड महामारी के दौरान हमने देखा कि जब शहरों की अर्थव्यवस्था ठहर गई, तब लाखों प्रवासी मजदूर गांवों की ओर लौटे। उस समय कृषि क्षेत्र ने ही देश को बड़े सामाजिक विस्फोट से बचाया।
इसलिए जब कोई अर्थशास्त्री कृषि सुधारों की बात करता है, तो यह पूछना जरूरी है कि उन सुधारों का स्वरूप क्या होगा?
क्या सुधार का मतलब किसानों को मजबूत बनाना है?
या सुधार का मतलब कृषि बाजारों को बड़ी कंपनियों के लिए खोलना है?
इन दोनों बातों में बहुत बड़ा अंतर है।
रोजगार का संकट: सबसे बड़ा अनुत्तरित प्रश्न
भारत में आर्थिक नीति पर चर्चा करते समय सबसे बड़ा प्रश्न रोजगार का होना चाहिए।
यदि सरकार कहती है कि बड़े निवेश आएंगे और विकास तेज होगा, तो जनता को यह जानने का अधिकार है कि इससे कितने रोजगार पैदा होंगे।
पिछले वर्षों में देश में कई बड़े कॉरपोरेट समूहों को कर रियायतें, भूमि, उत्पादन प्रोत्साहन (PLI) और अन्य सुविधाएं दी गईं। सरकार का तर्क था कि इससे रोजगार पैदा होंगे।
लेकिन क्या रोजगार उसी गति से बढ़े?
यह प्रश्न आज भी खुला हुआ है।
आधुनिक उद्योग अधिकतर पूंजी-प्रधान होते जा रहे हैं। यानी वे मशीनों और तकनीक पर अधिक निर्भर हैं, मानव श्रम पर कम।
ऐसे में केवल निवेश बढ़ जाने से रोजगार अपने आप नहीं बढ़ता।
भारत की वास्तविक चुनौती रोजगारविहीन विकास (Jobless Growth) की है।
यदि GDP बढ़े लेकिन रोजगार न बढ़े, तो विकास का लाभ समाज के सीमित वर्ग तक सिमट सकता है।
यही कारण है कि आम नागरिक के लिए विकास का सबसे महत्वपूर्ण पैमाना शेयर बाजार नहीं बल्कि नौकरी है।
क्या कर रियायतें ही विकास का रास्ता हैं?
अर्थशास्त्री अक्सर तर्क देते हैं कि निवेश आकर्षित करने के लिए कर कम करने होंगे।
इस तर्क में कुछ सच्चाई है। निवेशक नीतिगत स्थिरता चाहते हैं। उदाहरण के लिए, भारत में पिछली सरकारों द्वारा लागू किए गए रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना हुई थी और बाद में सरकार ने उसे वापस भी लिया।
लेकिन सवाल यह है कि क्या हर समस्या का समाधान करों में कटौती है?
यदि पूंजीगत लाभ कर समाप्त कर दिया जाए, तो उससे सबसे अधिक लाभ किसे मिलेगा?
एक छोटे किसान को?
एक बेरोजगार युवक को?
या बड़े वित्तीय निवेशकों को?
सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि कर रियायतों से होने वाले संभावित लाभ और राजस्व हानि का सामाजिक संतुलन क्या होगा।
क्योंकि सरकार का राजस्व ही शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई, ग्रामीण विकास और सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों को चलाता है।
यदि कर कम किए जाते हैं तो उस कमी की भरपाई कैसे होगी?
यह प्रश्न लोकतंत्र में पूछा जाना चाहिए।
विकास बनाम कल्याण: एक झूठा द्वंद्व
आज की आर्थिक बहस का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि विकास और जनकल्याण को एक-दूसरे के विरोधी रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
मानो यदि किसान की सुरक्षा की बात की जाए तो विकास रुक जाएगा।
यदि मजदूरों के अधिकारों की बात की जाए तो निवेश भाग जाएगा।
यदि सामाजिक कल्याण पर खर्च किया जाए तो अर्थव्यवस्था कमजोर हो जाएगी।
यह तर्क दुनिया के कई देशों में गलत साबित हुआ है।
यूरोप के कई देशों ने मजबूत सामाजिक सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और श्रमिक अधिकारों के साथ उच्च आर्थिक विकास हासिल किया।
जापान, दक्षिण कोरिया और चीन ने भी केवल बाजार आधारित मॉडल से नहीं, बल्कि सक्रिय सरकारी हस्तक्षेप और रोजगार सृजन के माध्यम से विकास किया।
भारत में भी विकास का रास्ता जनता को कमजोर करके नहीं, बल्कि जनता को मजबूत करके निकलेगा।
किसान विरोध या नीति विरोध?
जब किसान किसी नीति का विरोध करते हैं तो अक्सर उन्हें विकास विरोधी बताने की कोशिश की जाती है।
लेकिन लोकतंत्र में विरोध कोई अपराध नहीं है।
किसान पूछते हैं कि यदि कृषि बाजार पूरी तरह निजी कंपनियों के हाथ में चला गया तो उनकी सौदेबाजी की शक्ति क्या होगी?
यदि न्यूनतम समर्थन मूल्य कमजोर हुआ तो उनकी आय की सुरक्षा कैसे होगी?
यदि छोटे किसानों की जमीन आर्थिक दबाव में बिकने लगी तो उनका भविष्य क्या होगा?
https://politicsinsightindia.com/new/bharat-karz-jal-banking-system-economic-analysis
इन सवालों का जवाब देना सरकार की जिम्मेदारी है।
लोकतंत्र में जनता प्रश्न पूछेगी ही।
और सरकार का दायित्व उत्तर देना है, उपेक्षा करना नहीं।
असमानता का बढ़ता संकट
भारत में संपत्ति और आय की असमानता लगातार बहस का विषय रही है।
एक ओर अरबपतियों की संपत्ति तेजी से बढ़ती दिखाई देती है, दूसरी ओर बड़ी आबादी अभी भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रही है।
यह कहना गलत होगा कि केवल अमीरों की समृद्धि अपने आप गरीबों तक पहुंच जाएगी।
यदि ऐसा होता तो दशकों के आर्थिक उदारीकरण के बाद आज भारत में रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य के प्रश्न इतने गंभीर न होते।
आर्थिक विकास का वास्तविक अर्थ तब है जब आम नागरिक का जीवन बेहतर हो।
जब किसान आत्मविश्वास से खेती कर सके।
जब युवा को सम्मानजनक नौकरी मिले।
जब मजदूर का वेतन उसकी जरूरतें पूरी कर सके।
जब शिक्षा और स्वास्थ्य अमीर-गरीब के बीच खाई न बनें।
सरकार का धर्म क्या है?
लोकतंत्र में सरकार का पहला दायित्व जनता के प्रति होता है।
व्यापार महत्वपूर्ण है।
निवेश महत्वपूर्ण है।
उद्योग महत्वपूर्ण है।
लेकिन इन सबका उद्देश्य जनता का जीवन बेहतर बनाना होना चाहिए।
यदि आर्थिक नीतियों का केंद्र केवल निवेशकों का विश्वास बन जाए और नागरिकों का विश्वास कमजोर पड़ने लगे, तो यह लोकतांत्रिक संतुलन के लिए खतरे की घंटी है।
भारत को विकास चाहिए, लेकिन ऐसा विकास जो रोजगार पैदा करे।
ऐसा विकास जो किसानों को खत्म न करे बल्कि उन्हें मजबूत बनाए।
ऐसा विकास जो गांवों को उजाड़कर नहीं बल्कि उन्हें समृद्ध बनाकर आगे बढ़े।
ऐसा विकास जो कुछ कॉरपोरेट घरानों की संपत्ति बढ़ाने तक सीमित न रहे बल्कि करोड़ों नागरिकों के जीवन स्तर को ऊपर उठाए।
निष्कर्ष
8 प्रतिशत आर्थिक वृद्धि एक आकर्षक लक्ष्य हो सकता है। लेकिन किसी भी विकास दर का मूल्यांकन केवल आंकड़ों से नहीं किया जाना चाहिए।
सवाल यह है कि उस विकास का लाभ किसे मिलेगा?
क्या वह बेरोजगार युवाओं तक पहुंचेगा?
क्या वह छोटे किसानों तक पहुंचेगा?
क्या वह ग्रामीण भारत को मजबूत करेगा?
या वह केवल शेयर बाजार और बड़े निवेशकों के आंकड़ों तक सीमित रहेगा?
भारत का भविष्य केवल GDP की रफ्तार से तय नहीं होगा। भारत का भविष्य इस बात से तय होगा कि विकास की प्रक्रिया में सबसे कमजोर नागरिक की जगह कहाँ है।
यदि आर्थिक सुधार जनता को सशक्त बनाते हैं, तो उनका स्वागत होना चाहिए।
लेकिन यदि सुधारों का अर्थ जनता की सुरक्षा कमजोर करना, किसानों को हाशिये पर धकेलना और रोजगार के प्रश्न को नजरअंदाज करना है, तो उन पर सवाल उठाना केवल अधिकार नहीं बल्कि लोकतांत्रिक कर्तव्य है।
क्योंकि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक ताकत उसके अरबपतियों में नहीं, उसकी जनता में होती है।
Get every story on your phone
Join our channel and never miss an update.
What's Your Reaction?