बच्चे कचरे के बीच, सरकार विकास के विज्ञापनों में—यह कैसा भारत?
सरकारी स्कूलों की बदहाली, जर्जर भवन, शिक्षकों की कमी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव पर तीखा सवाल। क्या गरीब बच्चों का भविष्य सरकारी लापरवाही की कीमत चुकाता रहेगा?
स्कूल ठीक करो: गरीब बच्चों की शिक्षा से खिलवाड़ आखिर कब तक?
By- Ch. Sudhir Taliyan
— एक सवाल जो हर सरकार, हर जनप्रतिनिधि और हर संवेदनशील नागरिक से पूछा जाना चाहिए
सोशल मीडिया पर जब कोकोच जनता पार्टी के “स्कूल ठीक करो अभियान” के तहत देश के अलग-अलग हिस्सों से सरकारी विद्यालयों की तस्वीरें और वीडियो सामने आते हैं, तो उन्हें देखकर मन केवल दुखी नहीं होता—मन में एक असहज सवाल भी उठता है।
क्या भारत के गरीब बच्चों के लिए शिक्षा का मतलब केवल एक जर्जर इमारत, कुछ टूटी कुर्सियां, शिक्षक की कमी और सरकारी कागजों में दर्ज योजनाएं रह गया है?
देश में विकास के बड़े-बड़े दावे होते हैं। एक्सप्रेसवे बन रहे हैं, विशाल इमारतें बन रही हैं, तकनीक की बातें हो रही हैं, भारत को विश्व की बड़ी आर्थिक शक्ति बनाने के सपने दिखाए जा रहे हैं। लेकिन उसी देश में कहीं बच्चे जर्जर भवन में बैठकर पढ़ने की कोशिश कर रहे हैं, कहीं कक्षा के आसपास कचरे का ढेर है, कहीं पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं, कहीं किताबें समय पर नहीं पहुंचतीं और कहीं बच्चों को मिलने वाला भोजन भी पोषण के बजाय केवल एक सरकारी औपचारिकता बनकर रह जाता है।
तब सवाल उठता है—
जिस बच्चे को हम देश का भविष्य कहते हैं, उसके वर्तमान के साथ ऐसा व्यवहार क्यों?
क्या गरीब होना शिक्षा में भी अपराध है?
एक क्षण के लिए कल्पना कीजिए।
अगर यही बच्चे किसी प्रभावशाली और संपन्न परिवार से आते होते, क्या उनके स्कूल की हालत ऐसी होती?
क्या उनके माता-पिता अपने बच्चों को ऐसे भवन में भेजना स्वीकार करते?
क्या वे कचरे के बीच बैठकर पढ़ते?
क्या उनके स्कूल में शिक्षकों की भारी कमी होती?
क्या उनके बच्चों के लिए किताबें, प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, खेल का मैदान और सुरक्षित वातावरण उपलब्ध नहीं कराया जाता?
शायद नहीं।
यही बात इस पूरे प्रश्न को और गंभीर बना देती है।
समस्या केवल स्कूल की दीवारों की नहीं है। समस्या उस मानसिकता की है जिसमें समाज के गरीब बच्चे के लिए कम गुणवत्ता वाली शिक्षा को सामान्य मान लिया जाता है।
मानो गरीब का बच्चा गरीब है तो उसे कम सुविधाएं मिलना स्वाभाविक है।
मानो उसके सपनों की कीमत कम है।
मानो डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, शिक्षक, अधिकारी या उद्यमी बनने का अधिकार केवल उन बच्चों का है जिनके माता-पिता निजी स्कूल की महंगी फीस भर सकते हैं।
यह सोच लोकतंत्र की आत्मा के विरुद्ध है।
शिक्षा गरीब के लिए केवल सुविधा नहीं, मुक्ति का रास्ता है
जिस परिवार के पास बड़ी जमीन नहीं है, कारोबार नहीं है, संपत्ति नहीं है, राजनीतिक पहुंच नहीं है और विरासत में मिलने वाली आर्थिक ताकत नहीं है—उस परिवार के बच्चे के पास आगे बढ़ने का सबसे बड़ा साधन क्या है?
शिक्षा।
शिक्षा उसे अपनी परिस्थितियों से बाहर निकलने का अवसर देती है।
शिक्षा उसे सवाल पूछना सिखाती है।
शिक्षा उसे अपने अधिकार समझने की क्षमता देती है।
शिक्षा उसे बेहतर रोजगार पाने का अवसर देती है।
शिक्षा उसे सामाजिक सम्मान दिला सकती है।
और सबसे महत्वपूर्ण—शिक्षा उसे यह विश्वास देती है कि उसका जन्म उसकी नियति तय नहीं करता।
लेकिन यदि सरकारी विद्यालय ही कमजोर कर दिए जाएं, यदि गरीब परिवार के बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध न हो, तो उसके सामने विकल्प क्या बचता है?
वह वही काम करेगा जो उसके परिवार की पिछली पीढ़ियां करती आई हैं।
एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक गरीबी का हस्तांतरण होता रहेगा।
गरीबी केवल आय की कमी नहीं होती। जब अवसरों की कमी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती है, तब गरीबी एक सामाजिक संरचना बन जाती है।
क्या यह किसी “Hidden Agenda” का हिस्सा है?
यह सवाल असहज है, लेकिन इसे पूछना जरूरी है।
क्या सरकारी शिक्षा व्यवस्था की लगातार उपेक्षा केवल प्रशासनिक अक्षमता है?
या इसके पीछे कोई बड़ा आर्थिक-सामाजिक ढांचा काम कर रहा है?
सुनियोजित षड्यंत्र का आरोप लगाना उचित नहीं होगा। लेकिन नीतियों के परिणामों पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है।
यदि सरकारी स्कूल लगातार कमजोर होते जाएं और दूसरी तरफ निजी शिक्षा तेजी से फैलती जाए, तो इसका सीधा असर किस पर पड़ेगा?
उस परिवार पर जिसके पास निजी स्कूल की फीस भरने की क्षमता है—वह अपने बच्चे को दूसरा विकल्प दे सकता है।
लेकिन जिस मजदूर, खेतिहर परिवार, छोटे दुकानदार, घरेलू कामगार या आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के पास यह क्षमता नहीं है, उसके बच्चे के पास विकल्प सीमित होते जाते हैं।
इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “षड्यंत्र है या नहीं?”
पहला सवाल होना चाहिए—
सरकारी शिक्षा व्यवस्था कमजोर होने से लाभ किसे मिल रहा है और नुकसान किसे हो रहा है?
यही सवाल लोकतांत्रिक जांच का आधार बनना चाहिए।
आर्थिक गुलामी से भी खतरनाक है अवसरों की गुलामी
किसी व्यक्ति को आर्थिक रूप से कमजोर रखना गंभीर समस्या है, लेकिन उससे भी खतरनाक है उसके लिए आगे बढ़ने के रास्ते बंद कर देना।
अगर किसी बच्चे के पास अच्छी शिक्षा नहीं है, कौशल नहीं है, गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य नहीं है और रोजगार के अवसर नहीं हैं, तो वह अपनी जिंदगी की शुरुआत ही असमान परिस्थितियों से करता है।
फिर हम उससे कहते हैं—
“मेहनत करो और आगे बढ़ो।”
लेकिन सवाल है—
आगे बढ़ने की सीढ़ी कहां है?
जिस बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिली, उसे केवल मेहनत का उपदेश देना व्यवस्था की जिम्मेदारी से बचना है।
लोकतंत्र केवल वोट डालने का अधिकार नहीं है।
लोकतंत्र का अर्थ यह भी है कि समाज का गरीब बच्चा भी अपनी क्षमता विकसित करने के वास्तविक अवसर प्राप्त करे।
जर्जर स्कूल केवल भवन की समस्या नहीं है
एक टूटी हुई दीवार सिर्फ एक टूटी हुई दीवार नहीं होती।
एक शिक्षक की कमी सिर्फ एक खाली पद नहीं होती।
एक बिना किताब का बच्चा सिर्फ एक विद्यार्थी नहीं होता।
कचरे के बीच बैठी कक्षा केवल गंदगी नहीं होती।
इन सबका संयुक्त प्रभाव बच्चे के आत्मविश्वास, सीखने की क्षमता और भविष्य पर पड़ता है।
बच्चा अपने आसपास की व्यवस्था से एक संदेश ग्रहण करता है।
यदि उसे रोज दिखाई देता है कि उसकी कक्षा टूटी हुई है, उसके स्कूल में सुविधाएं नहीं हैं और उसकी शिक्षा को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा, तो उसके भीतर यह भावना पैदा हो सकती है कि “शायद मैं इतना महत्वपूर्ण नहीं हूं।”
यही सबसे खतरनाक परिणाम है।
गरीबी केवल जेब में नहीं होती।
कभी-कभी व्यवस्था बच्चे के भीतर अपने भविष्य के प्रति गरीबी पैदा कर देती है।
पोषण के नाम पर औपचारिकता क्यों?
विद्यालय केवल किताब पढ़ने की जगह नहीं है।
बच्चे का शरीर और मस्तिष्क दोनों विकसित होते हैं। भूखा या कुपोषित बच्चा कितनी अच्छी तरह पढ़ पाएगा, यह किसी विशेषज्ञ से पूछने की जरूरत नहीं।
मध्याह्न भोजन और पोषण योजनाओं का उद्देश्य केवल बच्चों को खाना उपलब्ध कराना नहीं होना चाहिए।
उद्देश्य होना चाहिए—
स्वस्थ शरीर, स्वस्थ मस्तिष्क और बेहतर सीखने की क्षमता।
यदि कहीं भोजन की गुणवत्ता खराब है, मात्रा अपर्याप्त है या व्यवस्था भ्रष्टाचार और लापरवाही की शिकार है, तो यह केवल प्रशासनिक कमी नहीं है।
यह बच्चे के भविष्य के साथ अन्याय है।
शिक्षक नहीं होंगे तो स्मार्ट क्लास भी बेकार है
आज शिक्षा के क्षेत्र में डिजिटल क्रांति की खूब बातें होती हैं।
स्मार्ट क्लास।
टैबलेट।
डिजिटल बोर्ड।
ऑनलाइन शिक्षा।
एआई।
लेकिन एक सवाल पूछना जरूरी है—
जिस स्कूल में पर्याप्त शिक्षक ही नहीं हैं, वहां तकनीक किस समस्या का समाधान करेगी?
तकनीक शिक्षक का विकल्प नहीं है।
एक अच्छा शिक्षक बच्चे की कमजोरी पहचानता है, उसके सवाल सुनता है, उसे प्रोत्साहित करता है और उसके भीतर सीखने की इच्छा पैदा करता है।
इसलिए शिक्षा सुधार का पहला सिद्धांत होना चाहिए—
पहले पर्याप्त और योग्य शिक्षक, फिर तकनीक।
गरीब बच्चे को “समान अवसर” चाहिए, केवल “समान नारा” नहीं
हम अक्सर कहते हैं कि भारत में सभी नागरिक बराबर हैं।
कानून की नजर में समानता लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है।
लेकिन वास्तविक जीवन में अवसर बराबर नहीं हैं।
एक बच्चे के पास निजी स्कूल, कोचिंग, इंटरनेट, निजी ट्यूटर, किताबों का बड़ा संग्रह और शिक्षित परिवार है।
दूसरा बच्चा ऐसे परिवार से आता है जहां माता-पिता स्वयं मुश्किल से पढ़े हैं और घर चलाने के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं।
अगर दोनों को केवल परीक्षा की मेज पर बैठाकर कहा जाए कि—
“अब दोनों बराबर हैं, मेहनत करके आगे बढ़ो।”
तो यह समानता नहीं है।
यह असमान परिस्थितियों को नजरअंदाज करना है।
वास्तविक समानता का अर्थ है—
जिसके पास कम है, उसे इतना मजबूत सार्वजनिक समर्थन देना कि वह अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ सके।
सरकारों से कुछ सीधे सवाल
अब सवाल केवल केंद्र या राज्य सरकार से नहीं है।
सवाल हर उस सरकार से है जो सत्ता में रही है और रहेगी।
पहला सवाल: सरकारी स्कूलों के बुनियादी ढांचे की राष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्र ऑडिट क्यों नहीं?
दूसरा सवाल: प्रत्येक विद्यालय में स्वीकृत और वास्तविक शिक्षक पदों की सार्वजनिक जानकारी क्यों नहीं?
तीसरा सवाल: हर स्कूल के लिए न्यूनतम बुनियादी सुविधाओं का कानूनी मानक क्यों नहीं?
चौथा सवाल: स्कूलों के रखरखाव के बजट और उसके वास्तविक खर्च की सार्वजनिक निगरानी क्यों नहीं?
पांचवां सवाल: बच्चों को मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता की स्वतंत्र सामाजिक जांच क्यों नहीं?
छठा सवाल: जिन स्कूलों की हालत खराब है, उनके लिए समयबद्ध सुधार योजना क्यों नहीं?
सातवां सवाल: सांसद, विधायक और स्थानीय जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्र के सरकारी विद्यालयों की स्थिति के लिए सार्वजनिक रूप से जवाबदेह क्यों न हों?
और सबसे बड़ा सवाल—
यदि सरकारें देश के भविष्य के लिए पर्याप्त धन, प्रशासनिक क्षमता और राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं जुटा सकतीं, तो फिर विकास का दावा किस आधार पर किया जा रहा है?
यह केवल शिक्षा का मुद्दा नहीं—राष्ट्र निर्माण का प्रश्न है
जिस देश में करोड़ों बच्चे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित रहेंगे, वहां आर्थिक असमानता बढ़ेगी।
जिस देश में आर्थिक असमानता बढ़ेगी, वहां सामाजिक तनाव बढ़ेगा।
जहां सामाजिक अवसर जन्म और संपत्ति से तय होने लगेंगे, वहां लोकतंत्र की गुणवत्ता कमजोर होगी।
और जहां गरीब व्यक्ति को अपने जीवन को बदलने का अवसर नहीं मिलेगा, वहां लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति विश्वास भी धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकता है।
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इसलिए सरकारी स्कूलों को बचाना किसी एक राजनीतिक दल का मुद्दा नहीं होना चाहिए।
यह राष्ट्र के सामाजिक भविष्य का मुद्दा है।
समाजद्रोह शब्द कठोर है, लेकिन सवाल उससे भी कठोर हैं
सरकारों की हर गलती को “समाजद्रोह” कहना उचित नहीं होगा।
लेकिन जब किसी व्यवस्था में लंबे समय तक करोड़ों बच्चों के बुनियादी शैक्षिक अधिकारों की उपेक्षा होती है और सरकारें जानते हुए भी सुधार नहीं करतीं, तो उस व्यवस्था की नैतिक जवाबदेही पर सवाल उठाना बिल्कुल जायज है।
देशभक्ति केवल सीमा पर खड़े सैनिक के सम्मान में नारे लगाने का नाम नहीं है।
देशभक्ति यह भी है कि देश के सबसे गरीब बच्चे को सबसे अच्छी शिक्षा देने की कोशिश की जाए।
देशभक्ति यह भी है कि किसी किसान, मजदूर या गरीब परिवार का बच्चा डॉक्टर, वैज्ञानिक, शिक्षक, अधिकारी, कलाकार या उद्यमी बनने का सपना देख सके।
देशभक्ति यह भी है कि किसी बच्चे को केवल इसलिए कम अवसर न मिलें क्योंकि उसके माता-पिता गरीब हैं।
“स्कूल ठीक करो” केवल अभियान नहीं, चेतावनी बनना चाहिए
आज जरूरत है कि “स्कूल ठीक करो अभियान” केवल सोशल मीडिया पर तस्वीरें दिखाने तक सीमित न रहे।
हर जिले में सरकारी स्कूलों का सामाजिक ऑडिट हो।
हर स्कूल की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक हो।
जहां शिक्षक नहीं हैं, वहां पद भरे जाएं।
जहां भवन जर्जर हैं, वहां समयबद्ध निर्माण हो।
जहां शौचालय नहीं हैं, वहां तुरंत व्यवस्था हो।
जहां पुस्तकालय नहीं हैं, वहां पुस्तकालय बने।
जहां खेल का मैदान नहीं है, वहां बच्चों के लिए खेल की व्यवस्था हो।
जहां भोजन की गुणवत्ता खराब है, वहां जिम्मेदारी तय हो।
और सबसे महत्वपूर्ण—
गरीब बच्चे को यह महसूस कराया जाए कि वह देश पर बोझ नहीं, देश की सबसे बड़ी पूंजी है।
अंत में एक सवाल
किसी राष्ट्र की असली तस्वीर उसके चमकते शहरों, ऊंची इमारतों और बड़े आर्थिक आंकड़ों से नहीं बनती।
उसकी असली तस्वीर उस स्कूल में दिखाई देती है जहां गरीब का बच्चा बैठा है।
अगर वहां टूटी छत है—तो देश की विकास नीति में कहीं दरार है।
अगर वहां शिक्षक नहीं है—तो व्यवस्था में कमी है।
अगर वहां किताब नहीं है—तो प्राथमिकताओं पर सवाल है।
अगर बच्चा कचरे के बीच पढ़ रहा है—तो हमारी सामूहिक संवेदनशीलता पर सवाल है।
और अगर यह सब देखकर भी सत्ता और समाज चुप हैं, तो समस्या केवल स्कूल की नहीं है।
समस्या हमारी लोकतांत्रिक चेतना की है।
गरीब बच्चे से उसका भविष्य मत छीनिए।
उसे दया नहीं चाहिए।
उसे खैरात नहीं चाहिए।
उसे केवल वह अवसर चाहिए जो लोकतंत्र ने हर नागरिक को देने का वादा किया है।
क्योंकि जिस दिन शिक्षा अमीर की सुविधा और गरीब की मजबूरी बन गई, उस दिन लोकतंत्र कागज पर तो बचा रहेगा, लेकिन उसके भीतर की समानता मरने लगेगी।
इसलिए सवाल सीधा है—
स्कूल कब ठीक होंगे?
और उससे भी बड़ा सवाल—
क्या हम तब तक इंतजार करेंगे, जब तक एक और पूरी पीढ़ी अवसरों से वंचित होकर बड़ी नहीं हो जाती?
“स्कूल ठीक करो” केवल नारा नहीं होना चाहिए।
यह सरकारों की जवाबदेही का राष्ट्रीय जन-अभियान बनना चाहिए।
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