यूरोप के हथियार दशकों से भारत के खिलाफ इस्तेमाल हुए"— जयशंकर के इस बयान ने क्यों मचा दी वैश्विक बहस?

यूरोप के हथियार दशकों से भारत के खिलाफ इस्तेमाल हुए"— जयशंकर के इस बयान ने क्यों मचा दी वैश्विक बहस?

यूरोप के हथियार दशकों से भारत के खिलाफ इस्तेमाल हुए"— जयशंकर के इस बयान ने क्यों मचा दी वैश्विक बहस?

एस. जयशंकर का फिनलैंड बयान: क्या भारत अब अपनी शर्तों पर दुनिया से बात कर रहा है?

प्रस्तावना

Writer -Sudhir Taliyan 

Chaudhary - Talan Khap 

हाल ही में फिनलैंड में एक कार्यक्रम के दौरान भारत के विदेश मंत्री S. Jaishankar ने यूरोप, रूस और भारत की विदेश नीति को लेकर ऐसी टिप्पणियाँ कीं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय राजनीति के कई महत्वपूर्ण प्रश्नों को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया। जयशंकर ने कहा कि यूरोप में बने हथियार दशकों से भारत के खिलाफ इस्तेमाल होते रहे हैं, जबकि भारत ने कभी यूरोप को नुकसान नहीं पहुँचाया। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि रूस से सस्ता तेल खरीदना भारत की मजबूरी नहीं बल्कि राष्ट्रीय हितों और ऊर्जा सुरक्षा के अनुरूप लिया गया एक तार्किक निर्णय था।

यह बयान ऐसे समय आया है जब रूस-यूक्रेन युद्ध को कई वर्ष बीत चुके हैं, वैश्विक शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है और भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं तथा कूटनीतिक शक्तियों में अपनी जगह मजबूत कर रहा है। जयशंकर की टिप्पणी को केवल एक राजनीतिक बयान के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह भारत की बदलती विदेश नीति, राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने वाली सोच और पश्चिमी देशों के साथ उसके नए रिश्तों का संकेत भी है।

इस पूरे प्रकरण को समझने के लिए आवश्यक है कि हम भारत-यूरोप संबंधों, रूस के साथ भारत की साझेदारी, ऊर्जा सुरक्षा की आवश्यकता और बदलती वैश्विक राजनीति के व्यापक संदर्भ को समझें।

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भारत और यूरोप: सहयोग और मतभेदों का इतिहास

भारत और यूरोप के संबंध लंबे समय से व्यापार, तकनीक, शिक्षा और निवेश के क्षेत्र में मजबूत रहे हैं। यूरोपीय संघ भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में से एक है। जलवायु परिवर्तन, समुद्री सुरक्षा, तकनीकी सहयोग और वैश्विक शासन जैसे विषयों पर भी दोनों पक्षों के बीच संवाद चलता रहा है।

इसके बावजूद कई ऐसे मुद्दे रहे हैं जहां भारत और यूरोप के दृष्टिकोण अलग रहे हैं।

शीत युद्ध के दौरान अधिकांश पश्चिमी देशों ने पाकिस्तान को रणनीतिक सहयोगी के रूप में देखा। अमेरिका और कुछ यूरोपीय देशों ने पाकिस्तान को सैन्य सहायता, हथियार और प्रशिक्षण उपलब्ध कराया। इन हथियारों का उपयोग कई बार भारत के विरुद्ध सैन्य संतुलन बनाने के लिए किया गया।

भारत की दृष्टि से यह एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य है। भारत को अक्सर यह महसूस हुआ कि उसकी सुरक्षा चिंताओं को पश्चिमी देशों ने उतनी गंभीरता से नहीं लिया जितना कि अपने सामरिक हितों को।

जब जयशंकर कहते हैं कि यूरोप के हथियार भारत के खिलाफ इस्तेमाल हुए हैं, तो उनका आशय इसी ऐतिहासिक अनुभव से है। यह कथन एक प्रकार से यूरोप को यह याद दिलाने का प्रयास भी था कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नैतिकता की बातें करने वाले देशों ने भी हमेशा आदर्शवादी नीतियों का पालन नहीं किया है।

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रूस-यूक्रेन युद्ध और भारत पर पश्चिमी दबाव

फरवरी 2022 में रूस द्वारा यूक्रेन में सैन्य अभियान शुरू करने के बाद दुनिया दो बड़े खेमों में बंटती हुई दिखाई दी। अमेरिका, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और उनके सहयोगियों ने रूस पर व्यापक आर्थिक प्रतिबंध लगाए।

इन देशों की अपेक्षा थी कि भारत भी रूस की आलोचना करे और उससे आर्थिक दूरी बनाए। लेकिन भारत ने अपेक्षाकृत संतुलित रुख अपनाया।

भारत ने संयुक्त राष्ट्र में कई मौकों पर संयमित भाषा का उपयोग किया। उसने युद्ध समाप्त करने, संवाद और कूटनीति का समर्थन किया, लेकिन रूस के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को पूरी तरह समाप्त नहीं किया।

पश्चिमी देशों के कुछ नेताओं और मीडिया संस्थानों ने भारत की आलोचना भी की। उनका तर्क था कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को रूस के खिलाफ अधिक स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए।

भारत का जवाब सीधा था—विदेश नीति का निर्धारण राष्ट्रीय हितों के आधार पर होगा, न कि बाहरी दबावों के आधार पर।

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रूस से तेल खरीदना: आर्थिक आवश्यकता या रणनीतिक अवसर?

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है। उसकी ऊर्जा आवश्यकताएँ विशाल हैं और वह अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है।

यदि तेल की कीमतों में अचानक वृद्धि होती है तो उसका सीधा प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। पेट्रोल और डीजल महंगे होते हैं, परिवहन लागत बढ़ती है, खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ते हैं और महंगाई का दबाव बढ़ जाता है।

रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद जब कई देशों ने रूसी तेल खरीदना कम किया, तब रूस ने अपने तेल पर भारी छूट देना शुरू किया। भारत ने इस अवसर का उपयोग किया और बड़े पैमाने पर रूसी तेल खरीदना शुरू किया।

इस निर्णय के पीछे कई कारण थे:

1. ऊर्जा सुरक्षा

किसी भी देश के लिए ऊर्जा सुरक्षा राष्ट्रीय सुरक्षा का ही एक हिस्सा है। यदि ऊर्जा आपूर्ति बाधित होती है तो आर्थिक गतिविधियाँ प्रभावित हो सकती हैं।

2. महंगाई नियंत्रण

सस्ते तेल ने भारत को घरेलू महंगाई को नियंत्रित रखने में मदद की। यह विशेष रूप से निम्न और मध्यम आय वर्ग के लिए महत्वपूर्ण था।

3. विदेशी मुद्रा की बचत

कम कीमत पर तेल खरीदने से आयात बिल पर दबाव कम हुआ और विदेशी मुद्रा भंडार पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा।

4. आर्थिक प्रतिस्पर्धा

भारतीय रिफाइनरियों को सस्ता कच्चा तेल मिला, जिससे पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात में प्रतिस्पर्धात्मक लाभ प्राप्त हुआ।

जयशंकर का तर्क था कि यदि भारत के पास सस्ता और कानूनी रूप से उपलब्ध तेल खरीदने का अवसर है, तो उसे छोड़ना अपने नागरिकों के हितों के खिलाफ होगा।

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क्या यूरोप की आलोचना पूरी तरह उचित थी?

भारत का एक महत्वपूर्ण तर्क यह रहा है कि यूरोप ने स्वयं भी लंबे समय तक रूसी ऊर्जा पर निर्भरता बनाए रखी थी।

रूस-यूक्रेन युद्ध से पहले यूरोप के कई देश रूसी गैस और तेल के बड़े आयातक थे। वर्षों तक उन्होंने अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस पर निर्भर रहना स्वीकार किया।

भारत का प्रश्न यह था कि जब यूरोप अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता दे सकता है, तो भारत ऐसा क्यों नहीं कर सकता?

यह तर्क पश्चिमी आलोचनाओं के खिलाफ भारत की सबसे मजबूत कूटनीतिक प्रतिक्रियाओं में से एक माना गया।

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भारत की विदेश नीति में आया बड़ा परिवर्तन

जयशंकर का बयान वास्तव में भारत की विदेश नीति में आए व्यापक बदलाव को दर्शाता है।

स्वतंत्रता के शुरुआती दशकों में भारत की विदेश नीति गुटनिरपेक्षता, नैतिक नेतृत्व और वैश्विक न्याय जैसे सिद्धांतों पर आधारित थी। हालांकि राष्ट्रीय हित हमेशा महत्वपूर्ण रहे, लेकिन सार्वजनिक विमर्श में नैतिकता का स्थान अधिक था।

आज की विदेश नीति अधिक व्यावहारिक दिखाई देती है।

राष्ट्रीय हित सर्वोपरि

अब भारत खुले तौर पर कहता है कि उसके निर्णय भारतीय नागरिकों के हितों के आधार पर लिए जाएंगे।

रणनीतिक स्वायत्तता

भारत किसी एक शक्ति केंद्र पर निर्भर नहीं रहना चाहता। वह अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया और पश्चिम एशिया के देशों के साथ समानांतर संबंध बनाए रखना चाहता है।

बहुध्रुवीय विश्व की स्वीकृति

भारत मानता है कि भविष्य की दुनिया केवल अमेरिका या चीन के इर्द-गिर्द नहीं घूमेगी। कई क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियाँ मिलकर नई व्यवस्था का निर्माण करेंगी।

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रूस के साथ संबंध क्यों महत्वपूर्ण हैं?

रूस दशकों से भारत का महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार रहा है।

भारत की रक्षा प्रणाली का एक बड़ा हिस्सा रूसी मूल के उपकरणों पर आधारित है। लड़ाकू विमान, पनडुब्बियाँ, मिसाइल प्रणालियाँ और अन्य सैन्य उपकरणों में रूस की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।

इसके अलावा:

परमाणु ऊर्जा सहयोग

अंतरिक्ष कार्यक्रम

रक्षा अनुसंधान

ऊर्जा क्षेत्र

में भी दोनों देशों के बीच घनिष्ठ संबंध हैं।

भारत के लिए रूस केवल तेल का स्रोत नहीं है, बल्कि एक दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदार भी है।

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चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं

हालांकि भारत की नीति को व्यापक समर्थन मिला है, लेकिन इसके सामने कुछ चुनौतियाँ भी हैं।

रूस-चीन निकटता

हाल के वर्षों में रूस और चीन के बीच संबंध अधिक मजबूत हुए हैं। यह भारत के लिए चिंता का विषय हो सकता है क्योंकि चीन भारत का प्रमुख रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी है।

पश्चिमी देशों के साथ संतुलन

भारत को अमेरिका और यूरोप के साथ अपने संबंध भी मजबूत रखने हैं। इसलिए उसे संतुलित कूटनीति अपनानी पड़ती है।

ऊर्जा परिवर्तन

भविष्य में नवीकरणीय ऊर्जा के बढ़ते महत्व के कारण तेल आधारित रणनीतियों में बदलाव आ सकता है।

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यूरोप के लिए संदेश

जयशंकर के बयान का एक महत्वपूर्ण संदेश यूरोप के लिए भी था।

भारत अब केवल एक विकासशील देश के रूप में नहीं देखा जाना चाहता। वह दुनिया की सबसे बड़ी आबादी, प्रमुख अर्थव्यवस्था और उभरती हुई वैश्विक शक्ति है।

भारत चाहता है कि:

उसकी सुरक्षा चिंताओं को गंभीरता से लिया जाए।

उसके राष्ट्रीय हितों का सम्मान किया जाए।

वैश्विक मुद्दों पर उसे बराबरी का भागीदार माना जाए।

पश्चिमी देश दोहरे मानदंडों से बचें।

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बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की भूमिका

आज दुनिया एक संक्रमण काल से गुजर रही है।

अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। यूरोप अपनी सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है। रूस पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। मध्य पूर्व नए गठबंधनों का निर्माण कर रहा है।

ऐसी स्थिति में भारत स्वयं को एक स्वतंत्र और निर्णायक शक्ति के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रहा है।

भारत न तो पूरी तरह पश्चिमी खेमे में शामिल होना चाहता है और न ही किसी अन्य शक्ति केंद्र का अनुयायी बनना चाहता है।

यह नीति भारत को अधिक लचीलापन देती है, लेकिन इसके लिए अत्यंत कुशल कूटनीति की आवश्यकता भी होती है।

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निष्कर्ष

फिनलैंड में एस. जयशंकर का बयान केवल रूस से तेल खरीदने का बचाव नहीं था। यह भारत की नई विदेश नीति का घोषणापत्र जैसा प्रतीत होता है, जिसमें राष्ट्रीय हित, ऊर्जा सुरक्षा, रणनीतिक स्वायत्तता और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को प्राथमिकता दी गई है।

यूरोप के हथियारों, रूस से तेल खरीद और पश्चिमी आलोचनाओं पर की गई उनकी टिप्पणियाँ इस बात का संकेत हैं कि भारत अब वैश्विक मंच पर अधिक आत्मविश्वास के साथ अपनी बात रख रहा है। वह न तो बाहरी दबाव में निर्णय लेना चाहता है और न ही अपनी विकासात्मक आवश्यकताओं की उपेक्षा करना चाहता है।

आने वाले वर्षों में भारत की विदेश नीति की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह रूस, अमेरिका, यूरोप और अन्य वैश्विक शक्तियों के साथ अपने संबंधों में कितना प्रभावी संतुलन बनाए रख पाता है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि आज का भारत अपने राष्ट्रीय हितों को लेकर पहले की तुलना में कहीं अधिक मुखर, आत्मविश्वासी और व्यावहारिक दिखाई देता है। यही संदेश जयशंकर के फिनलैंड बयान से सबसे स्पष्ट रूप में उभरकर सामने आता है।

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