NEET Protest में पुलिस का ‘दमन’! सुप्रीम कोर्ट ने पूछा—वर्दी के पीछे छिपे सच का हिसाब कौन देगा?
NEET प्रदर्शन में पुलिस पर हिंसा और महिला प्रदर्शनकारियों से कथित यौन दुर्व्यवहार के आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप ने पुलिस जवाबदेही, नागरिकों के विरोध के अधिकार और स्वतंत्र जांच पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
By- Ch. Sudhir Taliyan
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती ने उठाया बड़ा सवाल—प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग की सीमा कौन तय करेगा, और पुलिस के खिलाफ शिकायत करने वाले नागरिकों को न्याय कौन देगा?
लोकतंत्र की असली परीक्षा संसद के भीतर नहीं, अक्सर सड़क पर होती है। संसद में सरकार के पास बहुमत होता है, विपक्ष के पास आवाज होती है और व्यवस्था के पास नियम-कायदे। लेकिन सड़क पर उतरता नागरिक सत्ता को एक असुविधाजनक सवाल देता है—“क्या मेरी बात सुनी जा रही है?”
यही कारण है कि लोकतंत्र में प्रदर्शन कोई अपराध नहीं है। असहमति कोई देशद्रोह नहीं है। सरकार की आलोचना कोई कानून-व्यवस्था का संकट अपने आप नहीं बन जाती।
लेकिन जब नागरिक प्रदर्शन करने सड़क पर उतरता है और उसके सामने पुलिस की लाठी, आंसू गैस, पेलेट, इलेक्ट्रिक बैटन या अत्यधिक बल खड़ा कर दिया जाता है, तब सवाल केवल कानून-व्यवस्था का नहीं रहता। सवाल यह बन जाता है कि राज्य अपने नागरिक के साथ किस सीमा तक बल प्रयोग कर सकता है?
NEET से जुड़े प्रदर्शन में कथित पुलिस ज्यादती और महिला प्रदर्शनकारियों के साथ कथित यौन दुर्व्यवहार के आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप इसी बड़े संवैधानिक प्रश्न को सामने लाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की स्वतंत्र जांच के लिए High-Powered Enquiry Committee बनाई है और महिला प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित sexual assault, molestation और harassment के आरोपों को प्राथमिकता से देखने को कहा है। यह सामान्य न्यायिक टिप्पणी नहीं है। यह उस व्यवस्था पर गंभीर सवाल है जिसमें शिकायतकर्ता को उसी पुलिस तंत्र के सामने न्याय मांगना पड़ सकता है जिस पर वह अत्याचार का आरोप लगा रहा है।
प्रदर्शनकारी अपराधी नहीं होते
भारत का संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने और अपनी बात रखने का अधिकार देता है। इसका मतलब यह नहीं कि प्रदर्शनकारियों को कानून तोड़ने की छूट है। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, हिंसा करना या पुलिस पर हमला करना किसी भी लोकतांत्रिक अधिकार का हिस्सा नहीं है।
लेकिन इसका उल्टा भी उतना ही सच है।
पुलिस को कानून-व्यवस्था बनाए रखने की शक्ति मिली है, नागरिकों को डराने की शक्ति नहीं।
पुलिस का काम भीड़ को सजा देना नहीं है। उसका काम कानून लागू करना है।
यदि कुछ प्रदर्शनकारी हिंसा करते हैं तो कानून उन व्यक्तियों की पहचान करके उनके खिलाफ कार्रवाई की अनुमति देता है। लेकिन कुछ लोगों की कथित हिंसा का जवाब पूरी भीड़ पर अंधाधुंध बल प्रयोग से देना लोकतांत्रिक पुलिसिंग की अवधारणा के विपरीत है।
यहीं से proportionality का सवाल पैदा होता है।
क्या जितना बल लगाया गया, वह वास्तव में आवश्यक था?
क्या प्रदर्शनकारियों को पर्याप्त चेतावनी दी गई?
क्या महिलाओं और बच्चों के लिए अलग सुरक्षा व्यवस्था थी?
क्या घायल प्रदर्शनकारियों को तत्काल चिकित्सा सहायता दी गई?
क्या पुलिसकर्मियों की पहचान स्पष्ट थी?
क्या plain-clothes personnel को इस्तेमाल करने की आवश्यकता थी?
क्या हर बल प्रयोग का रिकॉर्ड मौजूद है?
और सबसे महत्वपूर्ण—
बल प्रयोग का आदेश किसने दिया?
यही वे प्रश्न हैं जिनकी जांच अब स्वतंत्र समिति को करनी है।
पुलिस की वर्दी कानून से ऊपर नहीं है
भारत में पुलिस को असाधारण शक्तियां दी गई हैं। पुलिस किसी व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकती है, भीड़ को नियंत्रित कर सकती है, रास्ता खाली करा सकती है और गंभीर परिस्थितियों में बल का इस्तेमाल कर सकती है।
लेकिन कोई भी शक्ति असीमित नहीं होती।
वर्दी संविधान से बड़ी नहीं है।
पुलिस अधिकारी कानून के सेवक हैं, कानून के मालिक नहीं।
अगर किसी नागरिक को पुलिस की कार्रवाई से चोट लगती है तो सवाल उठना चाहिए कि वह चोट किस परिस्थिति में लगी। यदि किसी महिला के साथ पुलिस कार्रवाई के दौरान यौन हिंसा या अपमान का आरोप है तो उसे “भीड़ नियंत्रण” के नाम पर सामान्य घटना मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
वर्दी किसी अपराध को वैध नहीं बनाती।
यदि कोई सामान्य नागरिक किसी महिला के साथ molestation करता है तो उसे अपराध माना जाएगा। वही आरोप यदि किसी पुलिसकर्मी पर लगे तो उसकी गंभीरता कम नहीं हो सकती—बल्कि राज्य की शक्ति के कारण उसकी जवाबदेही और अधिक कठोर होनी चाहिए।
महिला प्रदर्शनकारियों की शिकायतें सबसे संवेदनशील सवाल
इस पूरे मामले का सबसे गंभीर पहलू महिलाओं से जुड़े आरोप हैं।
महिला प्रदर्शनकारी यदि यह कहती है कि पुलिस कार्रवाई के दौरान उसके साथ यौन दुर्व्यवहार, छेड़छाड़ या sexual assault हुआ, तो पहला सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “वह प्रदर्शन में क्यों गई थी?”
पहला सवाल होना चाहिए:
उसके साथ क्या हुआ?
और दूसरा:
किसने किया?
और तीसरा:
क्या स्वतंत्र रूप से जांच हुई?
यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने महिला प्रदर्शनकारियों से जुड़े allegations को अलग महत्व दिया है।
ऐसे मामलों में शिकायतकर्ता की पहचान, गरिमा और सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि पीड़िता को यह डर हो कि शिकायत करने के बाद उसी पुलिस तंत्र से उसे प्रताड़ना झेलनी पड़ेगी, तो न्याय की पूरी प्रक्रिया कमजोर हो जाती है।
इसीलिए स्वतंत्र शिकायत तंत्र की मांग महत्वपूर्ण है।
महिला प्रदर्शनकारियों को ऐसा रास्ता मिलना चाहिए जहां वे बिना भय के अपनी शिकायत दर्ज करा सकें, evidence दे सकें और आवश्यकता होने पर अपनी पहचान की सुरक्षा पा सकें।
असली सवाल: आदेश किसने दिया?
हर बड़े पुलिस ऑपरेशन के पीछे एक chain of command होती है।
किस क्षेत्र में कितनी पुलिस लगानी है।
किस तरह की barricading होगी।
किस समय भीड़ को हटाया जाएगा।
किस अधिकारी की अनुमति से बल प्रयोग होगा।
किस प्रकार के हथियार या उपकरण इस्तेमाल किए जाएंगे।
किस स्थिति में tear gas, baton या अन्य साधनों का उपयोग किया जाएगा।
यदि बल प्रयोग गंभीर रूप से विवादित हो जाए तो केवल मैदान में मौजूद एक पुलिसकर्मी को दोषी ठहराना पर्याप्त नहीं होना चाहिए।
जांच को ऊपर तक जाना चाहिए।
आदेश किसने दिया?
आदेश किस आधार पर दिया?
क्या लिखित निर्देश थे?
क्या स्थिति का वास्तविक आकलन किया गया था?
क्या कम बल से स्थिति नियंत्रित की जा सकती थी?
यदि किसी अधिकारी ने गलत आदेश दिया तो उसकी जवाबदेही होनी चाहिए।
CCTV और body cameras सिर्फ तकनीक नहीं, जवाबदेही का औजार हैं
आज पुलिस कार्रवाई के अधिकांश महत्वपूर्ण क्षणों को रिकॉर्ड किया जा सकता है।
CCTV कैमरे हैं।
Drone footage हो सकता है।
Mobile phone videos हैं।
Body cameras हो सकते हैं।
Wireless communication logs हैं।
PCR records हैं।
इन सबके बावजूद यदि किसी घटना के बाद “किसने क्या किया” का जवाब नहीं मिलता, तो यह तकनीकी कमी से ज्यादा संस्थागत समस्या बन जाती है।
इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने उपलब्ध डिजिटल और वीडियो evidence को सुरक्षित रखने और जांच में उपलब्ध कराने पर जोर दिया है।
क्योंकि वीडियो बहुत कुछ बता सकता है।
किसने पहले हमला किया?
किसने आदेश दिया?
किसने barricade तोड़ी?
पुलिस किस दिशा से आगे बढ़ी?
कितनी चेतावनी दी गई?
कितने समय बाद बल प्रयोग हुआ?
महिलाएं कहां थीं?
किस अधिकारी ने किस व्यक्ति के साथ क्या किया?
ऐसे सवालों का जवाब अनुमान से नहीं, evidence से मिलना चाहिए।
पुलिस के खिलाफ शिकायत करने में सबसे बड़ी समस्या
भारत में आम नागरिक के लिए पुलिस के खिलाफ शिकायत करना आसान नहीं है।
एक व्यक्ति को थाने जाना पड़ता है।
वहीं उसे पुलिस अधिकारी मिलते हैं।
वहीं उससे सवाल होते हैं।
वहीं उसका बयान लिया जाता है।
और यदि शिकायत पुलिसकर्मी के खिलाफ हो तो मनोवैज्ञानिक दबाव और बढ़ सकता है।
पीड़ित व्यक्ति सोच सकता है:
“अगर मैंने शिकायत की तो क्या मेरे खिलाफ भी कोई मामला बना दिया जाएगा?”
“क्या मुझे गिरफ्तार कर लिया जाएगा?”
“क्या पुलिस मेरे परिवार को परेशान करेगी?”
“क्या मेरे बयान को कमजोर करने की कोशिश होगी?”
महिला के मामले में सामाजिक दबाव और बढ़ सकता है।
इसलिए पुलिस के खिलाफ शिकायत के लिए independent complaint mechanism लोकतंत्र की जरूरत है।
क्या पुलिस से अनुमति लेकर ही लोकतंत्र चलेगा?
यह इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक और संवैधानिक प्रश्न है।
भारत में प्रदर्शन के लिए reasonable regulation हो सकता है। स्थान, समय, यातायात, सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के लिए नियम बनाए जा सकते हैं।
https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
लेकिन अगर व्यवस्था ऐसी बन जाए कि नागरिक को अपनी असहमति व्यक्त करने के लिए पहले उस संस्था की अनुमति लेनी पड़े जिसके खिलाफ वह प्रदर्शन कर रहा है, तो लोकतंत्र का मूल अर्थ कमजोर पड़ जाता है।
सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने के लिए सरकार की अनुमति क्यों आवश्यक हो?
और उससे भी बड़ा प्रश्न—
यदि अनुमति न मिले तो नागरिक का संवैधानिक अधिकार समाप्त हो जाता है क्या?
उत्तर स्पष्ट होना चाहिए:
नहीं।
प्रशासन protest को regulate कर सकता है।
लेकिन protest को मनमाने ढंग से criminalize नहीं कर सकता।
“कानून-व्यवस्था” हर कार्रवाई का सार्वभौमिक बहाना नहीं हो सकता
भारत में “law and order” एक ऐसा वाक्य बन गया है जिसे कई बार प्रशासनिक कार्रवाई के औचित्य के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
लेकिन कानून-व्यवस्था का अर्थ यह नहीं कि नागरिक के सभी अधिकार स्थगित हो जाएं।
यदि 100 लोग शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे हैं और 5 लोग हिंसा करते हैं तो पुलिस की चुनौती उन 5 लोगों की पहचान करना है।
पूरी भीड़ को अपराधी मान लेना आसान रास्ता है।
लेकिन लोकतांत्रिक पुलिसिंग आसान रास्ते की मांग नहीं करती।
वह सटीक कार्रवाई की मांग करती है।
एक जिम्मेदार पुलिस बल का लक्ष्य होना चाहिए:
कम से कम बल, अधिकतम नियंत्रण और स्पष्ट जवाबदेही।
स्वतंत्र जांच क्यों जरूरी है?
पुलिस की अपनी जांच की सबसे बड़ी कमजोरी perception है।
यदि पुलिस पर आरोप है और जांच भी वही पुलिस करे तो पीड़ित पक्ष का विश्वास कमजोर हो सकता है।
भले ही जांच निष्पक्ष क्यों न हो, उसकी institutional credibility पर सवाल उठ सकता है।
इसीलिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा retired judges और अनुभवी पूर्व अधिकारियों की High-Powered Enquiry Committee बनाना महत्वपूर्ण है।
यह केवल NEET protest की जांच नहीं है।
यह एक institutional experiment भी है:
क्या राज्य के खिलाफ राज्य की शक्ति के इस्तेमाल की स्वतंत्र जांच संभव है?
अगर समिति निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से काम करती है तो इससे भविष्य में police accountability की व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।
लोकतंत्र में पुलिस की भूमिका बदलनी होगी
पुराने दौर की policing का एक हिस्सा यह सोच रहा है कि भीड़ को नियंत्रित करना ही सफलता है।
आधुनिक लोकतांत्रिक policing को इससे आगे जाना होगा।
सफल पुलिसिंग का अर्थ होना चाहिए:
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नागरिकों के अधिकारों का सम्मान;
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बल का न्यूनतम इस्तेमाल;
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पारदर्शिता;
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वीडियो रिकॉर्डिंग;
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महिला प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा;
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स्पष्ट command structure;
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स्वतंत्र शिकायत व्यवस्था;
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जवाबदेही;
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और गलत कार्रवाई पर दंड।
पुलिस का चेहरा नागरिक के लिए भय का नहीं, सुरक्षा का होना चाहिए।
निष्कर्ष: वर्दी की शक्ति नहीं, संविधान की शक्ति सर्वोच्च है
NEET प्रदर्शन विवाद हमें एक असहज लेकिन जरूरी सवाल के सामने खड़ा करता है।
हम किस तरह का लोकतंत्र चाहते हैं?
ऐसा लोकतंत्र जिसमें नागरिक केवल चुनाव के दिन महत्वपूर्ण हो?
या ऐसा लोकतंत्र जिसमें चुनाव के बीच भी नागरिक सरकार से सवाल पूछ सके?
यदि शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतंत्र की सांस है, तो पुलिस उस सांस को नियंत्रित करने वाली संस्था नहीं हो सकती। उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि असहमति हिंसा में न बदले—लेकिन असहमति को ही हिंसा मान लेना लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।
महिला प्रदर्शनकारियों के खिलाफ sexual assault और molestation के आरोपों की गंभीरता इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि यहां आरोप केवल किसी व्यक्ति पर नहीं, राज्य की coercive machinery पर हैं।
यदि आरोप झूठे हैं, तो स्वतंत्र जांच उन्हें झूठा साबित करे।
यदि आरोप सही हैं, तो दोषियों को बचाया नहीं जाना चाहिए।
और यदि command level पर गलत निर्णय हुआ है, तो जिम्मेदारी ऊपर तक जानी चाहिए।
लोकतंत्र में पुलिस को शक्तिशाली होना चाहिए—लेकिन जवाबदेह शक्ति के रूप में।
क्योंकि संविधान ने पुलिस को नागरिकों पर शासन करने के लिए नहीं, नागरिकों की रक्षा करने के लिए शक्ति दी है।
वर्दी कानून लागू कर सकती है; कानून से ऊपर नहीं हो सकती।
और जब किसी नागरिक का सवाल हो—
“मेरे साथ क्या हुआ?”
तो लोकतांत्रिक राज्य का पहला उत्तर होना चाहिए—
“हम इसकी निष्पक्ष जांच करेंगे।”
यही इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है।
NEET प्रदर्शन की घटनाओं का अंतिम सच जांच और न्यायिक प्रक्रिया से सामने आएगा। लेकिन एक बात अभी से स्पष्ट है: किसी भी लोकतंत्र में पुलिस की जवाबदेही कोई कृपा नहीं, संवैधानिक आवश्यकता है।
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