मेरिट बारिश में भीग रही है, सत्ता अब भी सूखी है: जेपीएससी विवाद ने भर्ती व्यवस्था की विश्वसनीयता पर खड़े किए सबसे कठिन सवाल
झारखंड में जेपीएससी विवाद, सीआईडी की छापेमारी और बारिश के बीच जारी छात्र आंदोलन ने भर्ती व्यवस्था की पारदर्शिता, मेरिट और समान अवसर पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह लेख केवल एक परीक्षा नहीं, बल्कि लोकतंत्र, युवाओं के विश्वास और संस्थागत सुधार की आवश्यकता पर गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
जेपीएससी विवाद, सीआईडी की छापेमारी और सड़कों पर डटे छात्रों ने भर्ती व्यवस्था की विश्वसनीयता पर खड़े किए सबसे कठिन सवाल
कुमार कृष्णन
"समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।"
— रामधारी सिंह 'दिनकर'
लोकतंत्र की सबसे कठिन परीक्षा संसद में नहीं, बल्कि परीक्षा कक्ष में होती है। संसद कानून बना सकती है, सरकारें योजनाएँ घोषित कर सकती हैं और अदालतें न्याय कर सकती हैं, लेकिन किसी भी लोकतंत्र की असली विश्वसनीयता उस क्षण तय होती है, जब लाखों युवाओं में से कोई एक अभ्यर्थी उत्तरपुस्तिका जमा करते समय यह विश्वास लेकर बाहर निकलता है कि उसका भविष्य केवल उसकी मेहनत और योग्यता से तय होगा। संविधान का सबसे बड़ा नैतिक वादा भी यही है—समान अवसर। यदि इसी वादे पर संदेह गहराने लगे, तो संकट केवल एक परीक्षा का नहीं रहता; तब लोकतंत्र की आत्मा कटघरे में खड़ी दिखाई देती है।
आज झारखंड ठीक इसी मोड़ पर खड़ा है।
राजधानी रांची की सड़कों पर लगातार बारिश हो रही है, लेकिन बारिश छात्रों के हौसले को भिगो नहीं सकी है। हजारों प्रतियोगी छात्र कई दिनों से खुले आसमान के नीचे डटे हुए हैं। भीगे कपड़ों में, हाथों में संविधान की प्रतियां, तिरंगा और तख्तियां लिए वे किसी राजनीतिक सत्ता परिवर्तन की मांग नहीं कर रहे, बल्कि व्यवस्था से केवल इतना पूछ रहे हैं कि क्या उनकी वर्षों की मेहनत का मूल्य अब भी बचा हुआ है? क्या प्रतियोगी परीक्षा अब भी प्रतिभा का उत्सव है या संदेह का मैदान बन चुकी है?
इधर झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) परीक्षा में कथित अनियमितताओं की जांच कर रही अपराध अनुसंधान विभाग (सीआईडी) ने रांची, बोकारो, पलामू सहित कई जिलों में एक साथ व्यापक छापेमारी की है। निजी कोचिंग संस्थानों, पूर्व अधिकारियों से जुड़े परिसरों और संदिग्ध व्यक्तियों के ठिकानों पर घंटों तलाशी ली गई। दस्तावेज जब्त किए गए, डिजिटल साक्ष्य खंगाले गए और कई लोगों से पूछताछ की गई। जांच एजेंसी का कहना है कि वह केवल परीक्षा प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि उससे जुड़े पूरे नेटवर्क की परतें खोलने का प्रयास कर रही है। यह कार्रवाई इस बात का संकेत है कि मामला केवल छात्रों के आरोपों तक सीमित नहीं है, बल्कि जांच एजेंसियों की नजर में भी गंभीर है।
यही कारण है कि झारखंड का आंदोलन अब केवल जेपीएससी का आंदोलन नहीं रह गया है। यह पूरे देश की भर्ती प्रणाली की विश्वसनीयता पर उठे उस प्रश्न का प्रतीक बन चुका है, जिसका उत्तर केवल झारखंड सरकार ही नहीं, बल्कि सभी राज्यों और केंद्र सरकार को भी देना होगा।
दरअसल, यह आंदोलन किसी एक दिन में पैदा नहीं हुआ। इसकी पृष्ठभूमि वर्षों से तैयार हो रही थी। पिछले कुछ वर्षों में देश के अलग-अलग राज्यों में प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर लगातार विवाद सामने आए। कहीं प्रश्नपत्र लीक हुए, कहीं परीक्षाएँ रद्द करनी पड़ीं, कहीं परिणाम अदालतों में चुनौती बने और कहीं जांच एजेंसियों को हस्तक्षेप करना पड़ा। झारखंड भी इस संकट से अछूता नहीं रहा। जेपीएससी, जेएसएससी-सीजीएल, उत्पाद सिपाही भर्ती, जैक बोर्ड परीक्षा और अन्य परीक्षाओं को लेकर समय-समय पर गंभीर सवाल उठते रहे हैं।
हर बार सरकारों ने जांच का आश्वासन दिया। कुछ गिरफ्तारियाँ हुईं, कुछ समितियाँ बनीं और फिर मामला धीरे-धीरे सार्वजनिक विमर्श से ओझल होता गया। लेकिन छात्रों के भीतर जमा होता अविश्वास समाप्त नहीं हुआ। हर नई परीक्षा के साथ यह संदेह और गहरा होता गया कि कहीं फिर वही कहानी न दोहराई जाए।
यही कारण है कि इस बार आंदोलन का स्वर अलग है। छात्र केवल किसी एक परीक्षा को रद्द कराने या किसी अधिकारी को हटाने की मांग नहीं कर रहे। उनकी मांग है कि पूरी भर्ती प्रणाली को पारदर्शी, जवाबदेह और विश्वसनीय बनाया जाए। वे नौकरी नहीं, न्याय मांग रहे हैं; नियुक्ति नहीं, निष्पक्षता मांग रहे हैं; परिणाम नहीं, विश्वास मांग रहे हैं।
झारखंड के इस आंदोलन की एक और विशेषता है जिसने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया है। लगातार हो रही बारिश के बावजूद आंदोलनकारी अपने स्थान से हटने को तैयार नहीं हैं। कई छात्र बेहद साधारण भोजन पर आंदोलन चला रहे हैं। अनेक छात्र संगठनों ने सीमित संसाधनों में सामुदायिक व्यवस्था बनाई है। यह दृश्य केवल विरोध का नहीं, बल्कि उस पीढ़ी के धैर्य और दृढ़ता का प्रतीक है, जिसने अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगा दिए हैं।
लोकतंत्र में किसी भी आंदोलन की वास्तविक शक्ति उसकी संख्या में नहीं, बल्कि उसके नैतिक आधार में होती है। झारखंड के छात्रों का आंदोलन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह किसी विशेष राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष का आंदोलन नहीं है। यह संविधान के उस मूल सिद्धांत की रक्षा का आंदोलन है, जो हर नागरिक को समान अवसर का अधिकार देता है।
यहीं से सरकार की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है। लोकतांत्रिक शासन में विरोध को केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न मान लेना सबसे बड़ी भूल होती है। जब हजारों छात्र सड़कों पर उतरते हैं, तब यह मान लेना चाहिए कि व्यवस्था के भीतर कहीं न कहीं ऐसा अविश्वास पैदा हुआ है जिसे केवल बयान जारी करके दूर नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र में भरोसा आदेश से नहीं, पारदर्शिता से लौटता है।
झारखंड का छात्र आंदोलन इसलिए अलग है क्योंकि इसकी बुनियाद केवल भावनाओं पर नहीं, बल्कि लगातार सामने आती घटनाओं पर टिकी है। एक ओर हजारों छात्र बारिश में भीगते हुए सड़कों पर डटे हैं, दूसरी ओर अपराध अनुसंधान विभाग (सीआईडी) राज्य के अलग-अलग जिलों में लगातार छापेमारी कर रही है। रांची, बोकारो और पलामू में हुई कार्रवाई, दस्तावेजों की जब्ती, डिजिटल साक्ष्यों की पड़ताल और संदिग्ध लोगों से पूछताछ यह संकेत देती है कि जांच अब सतही नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क तक पहुँचने की कोशिश कर रही है। यदि जांच एजेंसी को परीक्षा माफिया से मिले इनपुट के आधार पर कई स्थानों पर कार्रवाई करनी पड़ रही है, तो यह स्वयं इस बात का संकेत है कि छात्रों के संदेह को केवल अफवाह कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष सीआईडी की कार्रवाई नहीं, बल्कि छात्रों का अनुशासन है। आंदोलन स्थल पर टंगा एक बोर्ड सबका ध्यान खींचता है। उस पर बड़े अक्षरों में लिखा है—" कोड आफ कंडक्ट"। निर्देश साफ हैं—मंच से कोई राजनीतिक, धार्मिक या जातिगत भाषण नहीं होगा; केवल आंदोलन के मूल उद्देश्य पर बात होगी; किसी व्यक्ति को मंच से आरोपित नहीं किया जाएगा; अपशब्दों का प्रयोग नहीं होगा। यह कोई साधारण सूचना नहीं है। यह बताती है कि आंदोलनकारी अपनी लड़ाई को राजनीतिक टकराव नहीं, बल्कि व्यवस्था सुधार के अभियान के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं। आज के दौर में जब अधिकांश आंदोलन कुछ ही घंटों में राजनीतिक रंग ले लेते हैं, तब छात्रों का यह आत्मानुशासन उल्लेखनीय है।
बारिश लगातार हो रही है, लेकिन धरना स्थल खाली नहीं हुआ। अनेक छात्र सीमित संसाधनों में सादा भोजन कर आंदोलन चला रहे हैं। कई छात्र संगठनों ने सामूहिक व्यवस्था बनाई है। यह दृश्य इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल विरोध नहीं, बल्कि धैर्य, अनुशासन और लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता का भी प्रमाण है। जब कोई आंदोलन कठिन परिस्थितियों में भी संयम बनाए रखता है, तब उसकी नैतिक शक्ति और बढ़ जाती है।
छात्रों की मांगें भी किसी विशेष वर्ग को लाभ पहुँचाने वाली नहीं हैं। वे चाहते हैं कि भर्ती परीक्षाओं का निश्चित कैलेंडर हो, प्रश्नपत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, उत्तर कुंजी और मेरिट सूची पूरी पारदर्शिता से सार्वजनिक की जाए, कथित अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच हो और दोषियों पर समयबद्ध कार्रवाई की जाए। आधुनिक लोकतंत्र में ये असाधारण मांगें नहीं, बल्कि सुशासन की न्यूनतम शर्तें हैं।
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इस आंदोलन का एक राजनीतिक पक्ष भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भारतीय जनता पार्टी ने छात्रों के आंदोलन का समर्थन करते हुए झारखंड सरकार को कठघरे में खड़ा किया है और परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के लिए मुख्यमंत्री से जवाब मांगा है। दूसरी ओर, सत्तारूढ़ पक्ष जांच प्रक्रिया का हवाला दे रहा है। लेकिन राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोप से अलग सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या कोई भी दल सत्ता में आने के बाद भर्ती व्यवस्था को स्थायी रूप से पारदर्शी बना पाया है? दुर्भाग्य यह है कि पेपर लीक और भर्ती विवाद अब किसी एक राज्य या एक दल तक सीमित नहीं रहे। अलग-अलग समय पर अलग-अलग राज्यों में ऐसी घटनाएं सामने आती रही हैं। इसलिए इस मुद्दे का समाधान राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि संस्थागत सुधार से ही संभव है।
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यह भी उल्लेखनीय है कि देश में जहाँ कुछ छात्र आंदोलनों को व्यापक राजनीतिक समर्थन मिला, वहीं झारखंड के आंदोलन को वैसी राष्ट्रीय राजनीतिक एकजुटता नहीं दिखाई दी। इससे छात्रों के बीच यह प्रश्न भी उठ रहा है कि क्या युवाओं के मुद्दों पर राजनीतिक दलों का समर्थन भी सत्ता और विपक्ष की सुविधा के अनुसार बदल जाता है? यदि परीक्षा में अनियमितता कहीं भी हो, तो उसका विरोध समान नैतिकता के साथ होना चाहिए। युवाओं का भविष्य किसी दल का नहीं, पूरे देश का प्रश्न है।
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दरअसल, सरकारी नौकरी भारत के करोड़ों युवाओं के लिए केवल रोजगार नहीं है। यह सामाजिक सम्मान, आर्थिक सुरक्षा और परिवार की दशकों पुरानी आकांक्षाओं का आधार है। एक किसान, मजदूर, रिक्शाचालक या छोटे दुकानदार का परिवार वर्षों तक अपनी बचत इसलिए खर्च करता है कि उसका बेटा या बेटी प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से सम्मानजनक जीवन पा सके। यदि वही परिवार यह महसूस करने लगे कि मेहनत से अधिक किसी अदृश्य तंत्र की भूमिका निर्णायक हो सकती है, तो लोकतंत्र के प्रति उसका विश्वास कमजोर होना स्वाभाविक है।
झारखंड का यह संघर्ष केवल जेपीएससी या जेएसएससी का संघर्ष नहीं है। यह उस मूल प्रश्न का संघर्ष है कि क्या भारत की सार्वजनिक भर्ती व्यवस्था आज भी प्रतिभा, पारदर्शिता और समान अवसर के संवैधानिक आदर्शों पर खरी उतर रही है? यदि इसका उत्तर स्पष्ट नहीं है, तो सुधार केवल झारखंड की जरूरत नहीं, बल्कि पूरे देश की आवश्यकता है।
किसी भी आंदोलन की वास्तविक शक्ति उसकी भीड़ में नहीं, बल्कि उसके पीछे खड़े नैतिक प्रश्नों में होती है। झारखंड के छात्रों का आंदोलन भी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल कुछ परीक्षाओं को रद्द कराने या कुछ अधिकारियों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है। यह उस मूल विश्वास को पुनर्स्थापित करने का आंदोलन है, जिस पर भारतीय लोकतंत्र की पूरी भर्ती व्यवस्था टिकी हुई है—समान अवसर का विश्वास।
झारखंड सरकार के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती धरना समाप्त कराना नहीं, बल्कि भरोसा लौटाना है। लाठीचार्ज, मुकदमे, धारा 144 या प्रशासनिक आदेश किसी प्रदर्शन को कुछ समय के लिए रोक सकते हैं, लेकिन वे उस संदेह को समाप्त नहीं कर सकते, जो लाखों युवाओं के मन में घर कर चुका है। लोकतंत्र में व्यवस्था की ताकत विरोध को दबाने में नहीं, बल्कि विरोध के कारणों को दूर करने में होती है।
सीआईडी की सक्रियता यह संकेत देती है कि सरकार ने मामले की गंभीरता को स्वीकार किया है। लेकिन जांच तभी सार्थक मानी जाएगी, जब वह निष्पक्ष, समयबद्ध और पूरी तरह पारदर्शी हो। यदि जांच केवल कुछ व्यक्तियों तक सीमित रह गई और भर्ती प्रणाली की संस्थागत कमियों को अनदेखा कर दिया गया, तो अगली परीक्षा के साथ यही संकट फिर लौट आएगा। इसलिए यह समय केवल दोषी खोजने का नहीं, बल्कि व्यवस्था बदलने का है।
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झारखंड को ऐसी भर्ती प्रणाली विकसित करनी होगी, जिस पर प्रश्न उठाने की आवश्यकता ही न पड़े। इसके लिए वार्षिक परीक्षा कैलेंडर का कठोर पालन, समयबद्ध नियुक्तियाँ, उत्तर कुंजी और मेरिट सूची का पूर्ण प्रकटीकरण, प्रश्नपत्रों की डिजिटल सुरक्षा, स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट, साइबर फॉरेंसिक जांच की संस्थागत व्यवस्था और प्रभावी शिकायत निवारण प्रणाली को कानूनी आधार देना होगा। आज पारदर्शिता कोई आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि सुशासन की पहली शर्त है।
इस पूरे घटनाक्रम का राजनीतिक पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। सत्ता इसे विपक्ष की राजनीति बता रही है और विपक्ष इसे सरकार की विफलता। लेकिन इतिहास गवाह है कि छात्र आंदोलनों की ऊर्जा कभी किसी राजनीतिक दल की स्थायी संपत्ति नहीं बनी। 1974 के छात्र आंदोलन से लेकर आज तक हर आंदोलन ने अंततः उसी राजनीतिक नेतृत्व को स्वीकार किया, जिसने उसकी मूल पीड़ा को समझा। इसलिए इस आंदोलन को केवल चुनावी चश्मे से देखना उसकी गंभीरता का अपमान होगा।
एक और प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि परीक्षा में अनियमितता केंद्र में हो तो एक तरह की राजनीति होती है और यदि वही आरोप किसी राज्य में हों तो दूसरी तरह की प्रतिक्रिया दिखाई देती है। यह दोहरा मापदंड युवाओं का विश्वास और कमजोर करता है। शिक्षा, रोजगार और मेरिट जैसे प्रश्न सत्ता और विपक्ष के नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रश्न होने चाहिए। जिस मुद्दे पर दिल्ली में आवाज उठती है, उसी मुद्दे पर रांची, पटना, भोपाल या जयपुर में भी उतनी ही संवेदनशीलता दिखाई देनी चाहिए।
झारखंड के आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत उसका अनुशासन है। आंदोलन स्थल पर लगी लिखित आचार संहिता—राजनीतिक, धार्मिक और जातीय भाषणों से दूरी, व्यक्तिगत आरोपों से परहेज़ और शालीन भाषा के प्रयोग का आग्रह—यह बताता है कि छात्र व्यवस्था से लड़ना चाहते हैं, समाज को बाँटना नहीं। लोकतंत्र में ऐसी परिपक्वता दुर्लभ है और यही इस आंदोलन की नैतिक शक्ति भी है।
आख़िरकार, यह लड़ाई केवल जेपीएससी की नहीं है। यह उस किसान की लड़ाई है जिसने अपनी जमीन गिरवी रखकर बेटे को कोचिंग भेजा। यह उस मजदूर की बेटी की लड़ाई है, जिसने लालटेन की रोशनी में पढ़ाई कर प्रतियोगिता का सपना देखा। यह उस माँ की लड़ाई है, जिसने अपने गहने बेचकर बच्चे की फीस भरी। यदि ऐसे परिवारों को यह महसूस होने लगे कि मेहनत से अधिक प्रभाव, योग्यता से अधिक नेटवर्क और ईमानदारी से अधिक जोड़-तोड़ निर्णायक है, तो लोकतंत्र की सबसे बड़ी पराजय वहीं से शुरू होती है।
झारखंड आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। एक रास्ता वही पुराना है—आरोप, प्रत्यारोप, जांच, कुछ गिरफ्तारियाँ और फिर समय के साथ सब कुछ भुला देना। दूसरा रास्ता कठिन है—निष्पक्ष जांच, दोषियों पर कठोर कार्रवाई, संस्थागत सुधार और ऐसी पारदर्शी व्यवस्था का निर्माण, जिस पर अगली पीढ़ी बिना किसी संदेह के भरोसा कर सके।
क्योंकि किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी संपत्ति उसके खनिज, उद्योग या राजस्व नहीं होते। उसकी सबसे बड़ी पूंजी उसके युवाओं का विश्वास होता है। और जिस दिन हजारों छात्र बारिश में भीगते हुए भी यह कहने पर मजबूर हो जाएँ कि उन्हें अपनी मेहनत से पहले व्यवस्था की ईमानदारी का प्रमाण चाहिए, उस दिन समझ लेना चाहिए कि संकट केवल एक परीक्षा का नहीं, बल्कि शासन की विश्वसनीयता का है।
मेरिट जब सड़क पर उतर आए, तब केवल अभ्यर्थी नहीं लड़ रहे होते—तब लोकतंत्र अपने सबसे महत्वपूर्ण वादे को बचाने की लड़ाई लड़ रहा होता है।
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