‘जय-जय मोदी, हर-हर मोदी’: जब नेता भगवान बन जाए, समझिए लोकतंत्र खतरे में है!

दिल्ली प्रेस क्लब में ‘मोदी चालीसा’ और प्रधानमंत्री के कटआउट की आरती ने व्यक्तिपूजा, सत्ता की भक्ति और लोकतंत्र की दिशा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या नेता को भगवान बनाने की मानसिकता लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरे की घंटी है?

‘जय-जय मोदी, हर-हर मोदी’: जब नेता भगवान बन जाए, समझिए लोकतंत्र खतरे में है!

By- Ch. Sudhir Taliyan

दिल्ली के प्रेस क्लब में प्रधानमंत्री के कटआउट की आरती, ‘भगवान श्री नरेंद्र मोदी चालीसा’ और धार्मिक अंदाज में नारे—यह महज अंधभक्ति का तमाशा नहीं, लोकतंत्र की आत्मा के लिए एक असहज चेतावनी है

भारत में पिछले कई वर्षों से एक नारा लगातार सुनाई देता रहा है—“हिन्दू खतरे में है।” चुनावी सभाओं से लेकर सोशल मीडिया तक, टीवी स्टूडियो से लेकर राजनीतिक भाषणों तक, यह वाक्य बार-बार दोहराया गया। कभी धर्म खतरे में बताया गया, कभी संस्कृति, कभी मंदिर, कभी परंपरा।

लेकिन 20 अगस्त 2026 को दिल्ली के Press Club of India में जो दृश्य सामने आया, उसने इस पूरे विमर्श को उलटकर हमारे सामने एक बिल्कुल दूसरा सवाल रख दिया है—

क्या अब हिन्दू नहीं, देश और लोकतंत्र खतरे में है?

क्योंकि यदि एक निर्वाचित प्रधानमंत्री की तस्वीर को देवता की तरह सजाया जाए, उसके सामने आरती उतारी जाए, उसे भगवान के रूप में प्रस्तुत किया जाए, “जय-जय मोदी, हर-हर मोदी” के नारे लगाए जाएं और उसके नाम पर “भगवान श्री नरेंद्र मोदी चालीसा” का पाठ किया जाए, तो यह केवल किसी समर्थक की निजी श्रद्धा नहीं रह जाती।

यह उस लोकतांत्रिक मानसिकता की परीक्षा बन जाती है जिसमें जनता शासक को चुनती है—शासक जनता का भगवान नहीं बनता।

और सबसे विचलित करने वाली बात यह है कि यह दृश्य किसी बंद कमरे, किसी निजी आश्रम या किसी समर्थक के घर में नहीं हुआ।

यह दिल्ली के प्रेस क्लब में हुआ।

वह जगह, जिसे भारतीय पत्रकारिता में सत्ता से सवाल पूछने, असहमति व्यक्त करने और सार्वजनिक जीवन की जवाबदेही तय करने के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।

यहीं से इस घटना की गंभीरता कई गुना बढ़ जाती है।


एक तस्वीर, जो बहुत कुछ कह रही है

सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कटआउट को धार्मिक प्रतीकों के साथ प्रस्तुत किया गया। उनके सामने आरती की गई और धार्मिक शैली में स्तुति की गई। रिपोर्टों के अनुसार बैनर पर “भगवान श्री नरेंद्र मोदी चालीसा” लिखा था और प्रतिभागियों के बीच “जय जय मोदी, हर हर मोदी” जैसे नारे सुनाई दिए। कुछ रिपोर्टों में कटआउट को भगवान राम जैसी वेशभूषा में दिखाए जाने का भी उल्लेख है।

दृश्य असहज करने वाला इसलिए नहीं है कि कोई व्यक्ति मोदी का समर्थक है।

समर्थन लोकतंत्र का अधिकार है।

किसी को मोदी पसंद हैं—ठीक।

किसी को मोदी महान नेता लगते हैं—ठीक।

किसी को लगता है कि मोदी ने देश के लिए बहुत काम किया—ठीक।

किसी को लगता है कि मोदी ने उसके समुदाय के लिए अच्छा किया—यह भी उसका अधिकार है।

लेकिन समस्या उस क्षण शुरू होती है जब राजनीतिक समर्थन धार्मिक आराधना का रूप लेने लगता है।

क्योंकि लोकतंत्र में नेता की पूजा नहीं होती।

नेता की परीक्षा होती है।

नेता से सवाल पूछे जाते हैं।

नेता के फैसलों की आलोचना होती है।

नेता की नीतियों का हिसाब लिया जाता है।

नेता चुनाव हारता है तो सत्ता से बाहर हो जाता है।

भगवान चुनाव नहीं हारते।

प्रधानमंत्री हार सकते हैं।

यही अंतर लोकतंत्र और व्यक्तिपूजा के बीच की सबसे मोटी रेखा है।


प्रेस क्लब में यह दृश्य और भी भयावह क्यों है?

यदि किसी समर्थक ने अपने घर में मोदी की तस्वीर के सामने आरती की होती, तो इसे निजी आस्था कहकर छोड़ दिया जा सकता था।

लेकिन Press Club of India?

यह सिर्फ एक इमारत नहीं है।

यह भारतीय पत्रकारिता की सार्वजनिक स्मृति का हिस्सा है।

वह स्थान जहां सत्ता आती है और पत्रकार सवाल पूछते हैं।

जहां सरकारों के निर्णयों पर बहस होती है।

जहां विपक्ष अपनी बात रखता है।

जहां नागरिक समाज अपनी आवाज उठाता है।

जहां लोकतंत्र का चौथा स्तंभ सत्ता के सामने खड़ा दिखाई देना चाहिए।

और उसी परिसर में एक निर्वाचित प्रधानमंत्री को देवता के रूप में स्थापित करने वाला कार्यक्रम सामने आए—तो असहज होना स्वाभाविक है।

यह किसी राजनीतिक दल के खिलाफ पूर्वाग्रह नहीं।

यह लोकतांत्रिक विवेक की अनिवार्य प्रतिक्रिया है।

Press Club of India ने बाद में स्पष्ट किया कि उसने कार्यक्रम आयोजित नहीं किया था। उसके अनुसार हॉल एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए किराये पर लिया गया था, लेकिन किराये की शर्तों का उल्लंघन होने पर क्लब अधिकारियों ने हस्तक्षेप करके कार्यक्रम रुकवा दिया।

यह स्पष्टीकरण महत्वपूर्ण है।

इसलिए यह कहना गलत होगा कि “प्रेस क्लब ने मोदी चालीसा आयोजित की।”

लेकिन इससे मूल सवाल खत्म नहीं होता।

बल्कि दूसरा सवाल पैदा होता है—

जिस जगह लोकतंत्र की निगरानी होनी चाहिए, वहां लोकतांत्रिक नेता की आरती करने का विचार आखिर पहुंचा कैसे?


भक्ति जब राजनीति में प्रवेश करती है

भारत में भक्ति की परंपरा हजारों साल पुरानी है।

लेकिन भारतीय लोकतंत्र की परंपरा भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।

महात्मा गांधी ने सत्ता को नैतिकता के सामने रखा।

डॉ. आंबेडकर ने संविधान को व्यक्ति से ऊपर रखा।

नेहरू ने संस्थाओं को व्यक्ति से बड़ा बनाने की कोशिश की।

जयप्रकाश नारायण ने सत्ता के खिलाफ जनता की ताकत दिखाई।

भारतीय लोकतंत्र की पूरी यात्रा इस सिद्धांत पर खड़ी है कि कोई व्यक्ति राष्ट्र से बड़ा नहीं है।

लेकिन व्यक्तिपूजा इस सिद्धांत को धीरे-धीरे उलट देती है।

पहले नेता लोकप्रिय होता है।

फिर नेता महान होता है।

फिर नेता अचूक माना जाता है।

फिर नेता की आलोचना देशद्रोह जैसी लगने लगती है।

फिर नेता पार्टी से बड़ा हो जाता है।

फिर संस्था से बड़ा हो जाता है।

और अंततः—

नेता को भगवान बना दिया जाता है।

यहीं लोकतंत्र की रीढ़ में दरार पड़ती है।

क्योंकि जिस व्यक्ति को भगवान बना दिया गया, उससे सवाल कौन पूछेगा?


“हिन्दू खतरे में है” से “लोकतंत्र खतरे में है” तक

यहां एक कड़वी बात कहनी जरूरी है।

वर्षों से कहा गया कि हिन्दू खतरे में है।

लेकिन हिन्दू धर्म इतना कमजोर नहीं है कि उसे किसी प्रधानमंत्री के पोस्टर की जरूरत पड़े।

राम को बचाने के लिए प्रधानमंत्री की आरती की आवश्यकता नहीं।

कृष्ण को राजनीतिक कटआउट की आवश्यकता नहीं।

हनुमान को किसी सत्ता की कृपा की जरूरत नहीं।

सनातन परंपरा किसी एक नेता के सत्ता में रहने या न रहने से समाप्त नहीं हो जाएगी।

धर्म सत्ता से बड़ा है।

और जिस दिन धर्म को सत्ता की सीढ़ी बना दिया जाता है, उस दिन नुकसान धर्म का भी होता है और लोकतंत्र का भी।

यदि भगवान राम की छवि को लेकर कोई राजनीतिक नेता देवत्व के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो यह केवल राजनीति का धार्मिकरण नहीं है।

यह धर्म का भी राजनीतिकरण है।

और यह दोनों के लिए खतरनाक है।


सबसे बड़ा प्रश्न नरेंद्र मोदी से है

यहां आलोचना का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र वही व्यक्ति होना चाहिए जिसके नाम पर यह पूरा तमाशा हुआ।

नरेंद्र मोदी।

प्रधानमंत्री ने 2015 में अपने नाम पर मंदिर बनाए जाने पर स्वयं तीखी आपत्ति जताई थी।

12 फरवरी 2015 को उन्होंने कहा था कि उनके नाम पर मंदिर बनाए जाने की खबर से वे “appalled” थे और इसे भारतीय परंपराओं के विरुद्ध बताया था। उन्होंने ऐसे मंदिर न बनाने की अपील भी की थी।

उस समय उनका रुख बिल्कुल स्पष्ट था।

“मुझे भगवान मत बनाइए।”

लेकिन आज 2026 में तस्वीर बदल चुकी है।

अब उनके नाम पर न केवल मंदिर की चर्चा है, बल्कि “मोदी चालीसा” का सार्वजनिक पाठ सामने आया है।

बिहार राज्य ट्रांसजेंडर वेलफेयर बोर्ड से जुड़े राजन सिंह ने इस कार्यक्रम का बचाव किया और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार प्रधानमंत्री को समर्पित लगभग ₹112 करोड़ के मंदिर की योजना का भी उल्लेख किया। यह अभी एक प्रस्ताव है; इसे स्वीकृत सरकारी परियोजना मानना सही नहीं होगा।

तो सवाल बिल्कुल सीधा है—

प्रधानमंत्री अब क्या सोचते हैं?

क्या 2015 वाला विचार आज भी कायम है?

क्या वे आज भी कहते हैं—

“मेरे नाम पर मंदिर मत बनाइए, मुझे भगवान मत बनाइए?”

यदि हां, तो उन्हें बोलना चाहिए।

यदि नहीं, तो देश को यह जानने का अधिकार है कि क्या बदल गया?

और यदि वे इस घटना को गलत मानते हैं, तो इतनी बड़ी सार्वजनिक बहस के बीच उनकी चुप्पी क्यों?


क्या प्रधानमंत्री भी भगवान बनाए जाना चाहते हैं?

यह सवाल कठोर है।

लेकिन लोकतंत्र में कुछ सवाल असुविधाजनक होने के कारण पूछना बंद नहीं किए जा सकते।

मैं यह दावा नहीं कर रहा कि नरेंद्र मोदी ने स्वयं किसी को उन्हें भगवान बनाने का आदेश दिया।

ऐसा कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

लेकिन यह पूछना पूरी तरह जायज है—

क्या प्रधानमंत्री इस प्रकार की व्यक्तिपूजा को अस्वीकार करेंगे?

क्या वे कहेंगे—

“मैं प्रधानमंत्री हूं, भगवान नहीं।”

क्या वे अपने समर्थकों से कहेंगे कि लोकतंत्र में किसी जीवित राजनीतिक व्यक्ति की आरती न उतारें?

क्या वे अपने नाम पर प्रस्तावित मंदिर को भी उसी तरह अस्वीकार करेंगे जैसे 2015 में किया था?

या फिर उनकी चुप्पी को उनके समर्थक अपनी सुविधा के अनुसार पढ़ते रहेंगे?

यहां प्रधानमंत्री की एक स्पष्ट सार्वजनिक प्रतिक्रिया आवश्यक है।

क्योंकि मौन कभी-कभी तटस्थ नहीं होता।

मौन कई बार एक ऐसी जगह बना देता है जिसमें दूसरे लोग अपनी कल्पनाएं भर देते हैं।


तानाशाही पहले संविधान नहीं तोड़ती, मानसिकता बदलती है

तानाशाही हमेशा बंदूक लेकर दरवाजे पर दस्तक नहीं देती।

कई बार वह बहुत खूबसूरत नारों के साथ आती है।

वह कहती है—

“नेता महान है।”

फिर—

“नेता देश है।”

फिर—

“नेता की आलोचना देश की आलोचना है।”

फिर—

“नेता की आलोचना करने वाला देशद्रोही है।”

और अंत में—

“नेता को प्रश्न मत पूछो।”

यह मानसिक परिवर्तन किसी भी लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक है।

इसीलिए Press Club का दृश्य केवल एक अजीब राजनीतिक घटना नहीं है।

यह एक मानसिक चेतावनी है।

आज आरती है।

कल स्तुति होगी।

परसों आलोचना को अपमान कहा जाएगा।

और उसके बाद सवाल पूछना अपराध जैसा महसूस कराया जा सकता है।

यही वह ढलान है जहां लोकतंत्र धीरे-धीरे अपनी आत्मा खोता है।


लोकतंत्र में नागरिक भक्त नहीं होता

यह बात शायद सबसे ज्यादा दोहराए जाने की जरूरत है।

नागरिक का काम भक्त बनना नहीं है।

नागरिक का काम सवाल करना है।

अगर प्रधानमंत्री सड़क बनाते हैं—पूछिए सड़क की गुणवत्ता कैसी है।

अगर सरकार रोजगार देती है—पूछिए कितने रोजगार मिले।

अगर अर्थव्यवस्था बढ़ती है—पूछिए उस वृद्धि का लाभ किसे मिला।

अगर किसान की आय बढ़ने का दावा है—पूछिए किसान की वास्तविक आय कितनी बढ़ी।

अगर शिक्षा में सुधार हुआ है—पूछिए सरकारी स्कूलों की स्थिति क्या है।

अगर देश विश्वगुरु बनने की ओर बढ़ रहा है—पूछिए नागरिक की जिंदगी में क्या बदला।

यही लोकतंत्र है।

लेकिन यदि नागरिक कहे—

“मोदी जी भगवान हैं, उनसे सवाल कैसे करें?”

तो लोकतंत्र की पहली ईंट वहीं गिर जाती है।


और पत्रकारिता का क्या होगा?

यह प्रश्न Press Club की वजह से और अधिक महत्वपूर्ण है।

पत्रकारिता का जन्म सत्ता की प्रशंसा करने के लिए नहीं हुआ।

पत्रकारिता का काम सत्ता से असहज प्रश्न पूछना है।

राजा के दरबार में कवि होते थे।

लोकतंत्र में पत्रकार होते हैं।

दरबारी कहता है—

“महाराज महान हैं।”

पत्रकार पूछता है—

“महाराज, जनता की समस्या कब हल होगी?”

यही फर्क है।

इसलिए Press Club में प्रधानमंत्री की आरती का दृश्य पत्रकारिता के मूल स्वभाव से टकराता हुआ प्रतीत होता है।

यह अच्छा हुआ कि Press Club ने कहा कि उसने कार्यक्रम आयोजित नहीं किया और नियमों के उल्लंघन पर उसे रोक दिया।

लेकिन असली सवाल अब भी कायम है—

क्या हमारी पत्रकारिता इतनी मजबूत है कि वह सत्ता की आरती से इनकार कर सके?


भगवान राम को भी राजनीति से बचाने की जरूरत है

इस घटना का एक दूसरा पहलू भी है जिसे राजनीतिक बहस अक्सर भूल जाती है।

प्रधानमंत्री को भगवान राम के रूप में प्रस्तुत करना केवल प्रधानमंत्री का महिमामंडन नहीं है।

यह भगवान राम की छवि का भी राजनीतिक उपयोग है।

राम भारतीय सभ्यता के महान सांस्कृतिक प्रतीक हैं।

उन्हें किसी जीवित राजनेता के चेहरे पर चिपका देना धर्म की गरिमा बढ़ाता है या घटाता है?

यह सवाल उन लोगों को भी पूछना चाहिए जो स्वयं को धर्म और संस्कृति का सबसे बड़ा रक्षक बताते हैं।

अगर किसी दूसरे दल का नेता किसी भगवान के रूप में प्रस्तुत किया जाता, तो क्या यही लोग चुप रहते?

यदि उत्तर “नहीं” है, तो फिर राजनीतिक सुविधा के अनुसार धार्मिक भावनाओं का पैमाना क्यों बदल जाता है?

धर्म का सम्मान तभी होगा जब उसे सत्ता के चरणों में गिरवी नहीं रखा जाएगा।


व्यक्तिपूजा का सबसे बड़ा नुकसान स्वयं समर्थक को होता है

यह बात मोदी समर्थकों को भी समझनी चाहिए।

यदि आप अपने नेता से प्रेम करते हैं, तो सबसे बड़ा सम्मान यह नहीं कि उसकी आरती करें।

सबसे बड़ा सम्मान यह है कि उसके काम का समर्थन करें।

उसकी उपलब्धियों का तथ्य रखें।

उसकी गलतियों पर भी सवाल करें।

और उससे कहें—

“हम आपके समर्थक हैं, आपके भक्त नहीं।”

क्योंकि भक्त नेता को कमजोर करता है।

आलोचनात्मक समर्थक नेता को मजबूत करता है।

भक्त कहता है—

“आप कभी गलत नहीं हो सकते।”

समर्थक कहता है—

“आप सही हैं तो हम आपके साथ हैं, गलत हैं तो आपको बताएंगे।”

देश को भक्त नहीं चाहिए।

देश को जागरूक नागरिक चाहिए।


और यदि आज नहीं बोले तो कब बोलेंगे?

यह प्रश्न सिर्फ प्रधानमंत्री से नहीं है।

यह प्रश्न भाजपा से है।

यह प्रश्न विपक्ष से है।

यह प्रश्न पत्रकारों से है।

यह प्रश्न बुद्धिजीवियों से है।

यह प्रश्न धर्मगुरुओं से है।

और सबसे ज्यादा—

यह प्रश्न आम नागरिक से है।

क्या हम ऐसी राजनीति चाहते हैं जिसमें नेता के पोस्टर के सामने आरती हो?

क्या हम ऐसी राजनीति चाहते हैं जिसमें नेता के नाम की चालीसा बने?

क्या हम ऐसी राजनीति चाहते हैं जिसमें राजनीतिक आलोचना को धर्म-विरोधी बताकर चुप कराया जाए?

क्या हम ऐसी राजनीति चाहते हैं जिसमें चुनावी जनादेश धीरे-धीरे धार्मिक आस्था में बदल जाए?

अगर नहीं—

तो अभी बोलना होगा।

क्योंकि लोकतंत्र का बचाव तब नहीं होता जब तानाशाही स्थापित हो चुकी होती है।

लोकतंत्र का बचाव तब होता है जब उसके भीतर तानाशाही की मानसिकता दिखाई देना शुरू होती है।


2015 से 2026: सवाल सिर्फ इतना है कि बदल कौन गया?

2015 में मोदी के नाम पर मंदिर बना।

मोदी ने कहा—यह उन्हें स्वीकार नहीं।

मंदिर हट गया।

2026 में फिर उनके नाम पर मंदिर की चर्चा।

अब दिल्ली में उनके कटआउट के सामने आरती।

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अब “भगवान श्री नरेंद्र मोदी चालीसा।”

अब “जय-जय मोदी, हर-हर मोदी।”

तो सवाल बहुत सरल है—

क्या 2015 के नरेंद्र मोदी और 2026 के नरेंद्र मोदी के बीच कोई अंतर है?

या अंतर केवल इतना है कि तब भक्तों ने मंदिर बनाया था और आज भक्तों की राजनीतिक शक्ति कहीं अधिक दिखाई देती है?

इसका उत्तर प्रधानमंत्री ही दे सकते हैं।

और उन्हें देना चाहिए।


देश को भगवान नहीं, प्रधानमंत्री चाहिए

भारत को भगवानों की कमी नहीं है।

भारत की आध्यात्मिक परंपरा इतनी विशाल है कि उसमें करोड़ों लोग अपनी आस्था के लिए स्थान पा सकते हैं।

लेकिन भारत को जवाबदेह प्रधानमंत्री चाहिए।

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हमें ऐसा प्रधानमंत्री चाहिए जिसके सामने नागरिक सवाल पूछ सके।

जिसके सामने पत्रकार कठिन प्रश्न रख सके।

जिसकी नीतियों की आलोचना हो सके।

जिसकी पार्टी चुनाव हार सके।

जिसके फैसले अदालत में चुनौती दिए जा सकें।

जिसकी सरकार संसद में घिरी जा सके।

और जिसे अंततः जनता सत्ता से हटा सके।

यही लोकतंत्र है।

भगवान को चुनाव नहीं लड़ना पड़ता।

प्रधानमंत्री को लड़ना पड़ता है।

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भगवान से आरटीआई नहीं मांगी जाती।

सरकार से मांगी जाती है।

भगवान के बजट की जांच CAG नहीं करता।

सरकार के खर्च की करता है।

भगवान संसद में जवाब नहीं देते।

प्रधानमंत्री और मंत्री देते हैं।

तो फिर प्रधानमंत्री को भगवान क्यों बनाया जा रहा है?


सबसे बड़ा खतरा आरती नहीं—आरती के बाद की चुप्पी है

आरती करने वाले कुछ लोग थे।

उन्हें रोक दिया गया।

Press Club ने स्पष्टीकरण दे दिया।

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वीडियो वायरल हो गया।

सोशल मीडिया पर बहस हो गई।

लेकिन इस पूरी कहानी में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है—

प्रधानमंत्री क्या कहते हैं?

2015 में उन्होंने स्वयं कहा था कि उनके नाम पर मंदिर बनाना उन्हें विचलित करता है और भारतीय परंपरा के विरुद्ध है।

तो 2026 में उनके नाम पर “मोदी चालीसा” होने पर उनकी प्रतिक्रिया क्या है?

क्या वह इसे अस्वीकार करेंगे?

क्या वह कहेंगे—

“मुझे भगवान मत बनाइए।”

यदि वे ऐसा कहते हैं तो लोकतांत्रिक मर्यादा मजबूत होगी।

यदि वे चुप रहते हैं तो सवाल और बड़ा होगा।

और यदि कभी वे स्वयं इस तरह की स्तुति को स्वीकार करते दिखाई दिए, तो देश को उससे भी बड़ा प्रश्न पूछना पड़ेगा—

क्या भारत में लोकतांत्रिक नेतृत्व अब व्यक्तिपूजा की दिशा में जा रहा है?


अंतिम बात: हिन्दू खतरे में है या नागरिक?

वर्षों तक हमें बताया गया—

“हिन्दू खतरे में है।”

आज हमें एक दूसरा सवाल पूछना चाहिए—

“नागरिक कितना सुरक्षित है?”

क्योंकि जब नागरिक भक्त बनता है, लोकतंत्र कमजोर होता है।

जब नेता भगवान बनता है, संविधान छोटा होने लगता है।

जब आलोचना अपमान बनती है, संस्थाएं कमजोर होती हैं।

जब पत्रकार सवाल पूछने के बजाय आरती करने लगते हैं, चौथा स्तंभ खोखला हो जाता है।

और जब जनता अपने चुने हुए प्रतिनिधि को देवता बना देती है, तब सत्ता के सामने खड़े होने वाली सबसे जरूरी चीज—नागरिक विवेक—धीरे-धीरे खत्म होने लगता है।

इसलिए दिल्ली के Press Club की यह घटना हंसी-मजाक का विषय नहीं होनी चाहिए।

यह केवल “मोदी चालीसा” का विवाद नहीं है।

यह भारत की राजनीतिक संस्कृति का आईना है।

और आईने में जो चेहरा दिखाई दे रहा है, वह बहुत आरामदायक नहीं है।

देश को मोदी भगवान नहीं चाहिए।
देश को मोदी-विरोध भी नहीं चाहिए।
देश को मोदी-भक्ति भी नहीं चाहिए।

देश को चाहिए—

संविधान।

संसद।

स्वतंत्र पत्रकारिता।

स्वतंत्र संस्थाएं।

सवाल पूछने वाली जनता।

और ऐसा प्रधानमंत्री—

जिसके सामने जनता हाथ जोड़कर आरती न उतारे,

बल्कि लोकतांत्रिक अधिकार से कह सके—

“प्रधानमंत्री जी, आपने जो वादा किया था, उसका हिसाब दीजिए।”

यही लोकतंत्र है।

और शायद आज के भारत में इससे बड़ा कोई राष्ट्रभक्ति का नारा नहीं।

क्योंकि लोकतंत्र में सत्ता की आरती नहीं होती—सत्ता की जवाबदेही होती है।

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