धर्म खतरे में नहीं, खतरे में इंसान है!

धर्म, मंदिर-मस्जिद और हिंदू-मुसलमान की राजनीति के शोर में क्या भारत के असली मुद्दे पीछे छूट रहे हैं? बेरोज़गारी, महंगाई, किसान, शिक्षा, स्वास्थ्य और भ्रष्टाचार के बीच यह लेख इंसानियत, संविधान और राष्ट्र के भविष्य पर गंभीर सवाल उठाता है।

धर्म खतरे में नहीं, खतरे में इंसान है!

मंदिर–मस्जिद से आगे: अब इंसान और भारत को बचाने की जरूरत

प्रकाश कमलताई गोपालराव पोहरे

प्रधान संपादक, महाराष्ट्र

आज देश में सबसे ज़्यादा बिकने वाला माल अगर कोई है, तो वह है—हिंदू बनाम मुसलमान!

महंगाई, बेरोज़गारी, किसानों की समस्याएँ, शिक्षा, स्वास्थ्य, भ्रष्टाचार, पर्यावरण और सीमाओं की सुरक्षा—ये सभी मुद्दे पीछे छूट चुके हैं। आज हर चर्चा का अंत धर्म पर होता है और हर चुनाव की शुरुआत भी धर्म से होती है। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति है।

आज देश में केवल "हिमू–मंम–भापा" का महामृत्युंजय मंत्र की तरह प्रयोग किया जा रहा है। हिमू अर्थात हिंदू–मुसलमान, मंम अर्थात मंदिर–मस्जिद और भापा अर्थात भारत–पाकिस्तान। इन भावनात्मक नारों के कारण देश की वास्तविक समस्याएँ दब जाती हैं और उनका समाधान होने के बजाय धार्मिक वैमनस्य और अधिक बढ़ता जाता है।

आज केवल दिल्ली ही नहीं, बल्कि पूरे देश में युवा और जागरूक नागरिक सड़कों पर क्यों उतर रहे हैं? दुनिया भर में बसे भारतीय प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं? इसका उत्तर भी इसी कृत्रिम विवाद में छिपा है। रोजगार, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य के अवसर जैसे वास्तविक मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाकर उन्हें धार्मिक और भावनात्मक विवादों में उलझाया जा रहा है। परिणामस्वरूप असंतोष बढ़ रहा है और वही असंतोष अब सड़कों पर दिखाई देने लगा है।

महात्मा गांधी कहा करते थे, "मुझे अपना धर्म जितना प्रिय है, उतने ही दूसरे धर्म भी प्रिय हैं।" उनके लिए धर्म का अर्थ घृणा नहीं, बल्कि सत्य, अहिंसा और पारस्परिक सम्मान था। उन्होंने स्पष्ट कहा था—"हम पहले भारतीय हैं, उसके बाद हिंदू, मुसलमान, सिख या ईसाई।"

स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में पूरी दुनिया को बताया था कि भारत की संस्कृति सभी धर्मों को स्वीकार करने वाली संस्कृति है। उनका ज़ोर कर्म, शक्ति और श्रेष्ठ मनुष्य निर्माण पर था। वे कहते थे, "जिस दिन तुम्हें प्रत्येक मनुष्य में ईश्वर दिखाई देने लगेगा, उसी दिन तुम सच अर्थों में धार्मिक बनोगे।"

भगवान बुद्ध ने "अत्तदीपो भव" का संदेश देते हुए विवेक का मार्ग दिखाया। उन्होंने यह भी सिखाया कि मनुष्य अपनी पाँचों इन्द्रियों—नाक, कान, आँख, जीभ और त्वचा—से प्राप्त प्रत्यक्ष अनुभव पर विश्वास करे। केवल किसी के कहने से अंधविश्वास न करे, बल्कि स्वयं परखकर शाश्वत सत्य को स्वीकार करे।

संत तुकाराम ने कहा—"जो दुखियों और पीड़ितों को अपना मानता है, वही सच्चा संत है।" संत कबीर ने कहा—"हिंदू कहैं मोहि राम पियारा, तुर्क कहैं रहमाना।
आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना।।

इन सभी संतों का संदेश केवल एक था—धर्म से बड़ा इंसान है।

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने भारतीय संविधान को स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की त्रिसूत्री पर खड़ा किया। उनका स्पष्ट मत था कि यदि समाज में बंधुत्व नहीं होगा तो लोकतंत्र भी टिक नहीं सकेगा। इसलिए धर्म के नाम पर समाज में वैमनस्य फैलाना केवल सामाजिक अपराध नहीं, बल्कि संविधान की आत्मा पर भी आघात है।

हर धर्म मनुष्य को अनुशासन सिखाता है।
जैन धर्म अहिंसा और संयम का संदेश देता है।
इस्लाम समय का पालन, रोज़ा, ज़कात, नशामुक्ति और समाज के वंचित वर्गों के प्रति उत्तरदायित्व की शिक्षा देता है।
बौद्ध धर्म विवेक, करुणा और मध्यम मार्ग का उपदेश देता है।
हिंदू परंपरा "वसुधैव कुटुम्बकम्" तथा "एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति" के माध्यम से विविधता में एकता और सभी मतों के सम्मान की शिक्षा देती है।

फिर प्रश्न यह उठता है कि जब धर्म अच्छे हैं, तो समाज बुरा क्यों होता जा रहा है?

क्योंकि समस्या धर्म में नहीं है...
समस्या धर्म के राजनीतिक व्यापार में है।

आज केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में धर्म के नाम पर लोगों की भावनाओं का शोषण कर सत्ता, भ्रष्टाचार और आर्थिक लूट का खेल खेला जा रहा है। इतना ही नहीं, प्रभु श्रीराम जैसे करोड़ों लोगों की आस्था के प्रतीकों को भी राजनीति और बाज़ार की गणित से नहीं बख्शा गया। आस्था बेची जा रही है और मंदिरों की दानपेटियाँ तक लूट का माध्यम बनती जा रही हैं।

आज धर्म आस्था का विषय कम और वोट बैंक का विषय अधिक बन चुका है। जनता को रोजगार नहीं, बल्कि गुस्सा चाहिए; विकास नहीं, बल्कि वैमनस्य चाहिए; समस्याओं का समाधान नहीं, बल्कि नारे चाहिए—ऐसा वातावरण जानबूझकर बनाया जा रहा है।

इतिहास के घावों को भूलना नहीं चाहिए, लेकिन उन पर राजनीति का नमक भी नहीं छिड़कना चाहिए। मुगलों के आक्रमण इतिहास हैं, विभाजन की पीड़ा एक सच्चाई है; लेकिन वर्ष 2026 के भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौतियाँ रोजगार, शिक्षा, कृषि, पानी, स्वास्थ्य और विज्ञान हैं। इतिहास से सीख लेनी चाहिए, बदला नहीं।

हिंदुओं को मुस्लिम समाज से अनुशासन, समय की पाबंदी, मेहनत और कारीगरी सीखनी चाहिए। मुस्लिम समाज को हिंदू परंपरा से विचारों की स्वतंत्रता, दर्शन, विविधता का सम्मान और ज्ञान की समृद्ध परंपरा सीखनी चाहिए। प्रतिस्पर्धा अच्छे गुणों की होनी चाहिए, घृणा की नहीं।

यदि किसी रेखा को छोटा करना हो तो उसके पास उससे बड़ी रेखा खींचनी पड़ती है। दूसरे को छोटा करके कोई बड़ा नहीं बनता। दूसरे के धर्म को नीचा दिखाकर अपना धर्म महान नहीं हो जाता।

आज देश को मंदिर–मस्जिद के विवादों से अधिक मनुष्य निर्माण करने वाले विचारों की आवश्यकता है। क्योंकि धर्म कभी खतरे में नहीं होता...

खतरे में होता है इंसान, और जब इंसान खतरे में पड़ जाता है तो राष्ट्र भी सुरक्षित नहीं रह सकता।

आज राष्ट्र अत्यंत चिंताजनक स्थिति में पहुँच चुका है। हमें गंभीरता से विचार करना होगा कि हम वास्तव में प्रगति कर रहे हैं या अधोगति की ओर बढ़ रहे हैं। जो विकास दिखाई दे रहा है, वह केवल कंक्रीट की सड़कों और इमारतों तक सीमित है। कंक्रीट के ये जंगल कहीं-कहीं विकास से अधिक भ्रष्टाचार की दलदल में धँसे हुए दिखाई देते हैं।

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देश आज़ाद हुआ था तब न धन था, न संसाधन। फिर भी अनेक सार्वजनिक संस्थाएँ बनीं, बड़े उद्योग स्थापित हुए और शिक्षा के द्वार समाज के हर वर्ग के लिए खुले। उस समय भी भ्रष्टाचार था, लेकिन वह "आटे में नमक" के समान था। आज स्थिति उलट गई है—भ्रष्टाचार "नमक में आटा" बन चुका है।

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आज प्रश्न यह नहीं है कि हिंदू खतरे में है या मुसलमान। असली प्रश्न यह है कि कहीं भारत ही खतरे में तो नहीं है?

जब किसी राष्ट्र में धर्म, जाति और भावनात्मक नारों का शोर विकास से बड़ा हो जाता है, तब उस राष्ट्र की अधोगति शुरू हो जाती है। इतिहास गवाह है—कोई भी साम्राज्य सबसे पहले बाहरी शत्रुओं से नहीं हारता; वह पहले भीतर से भ्रष्टाचार, अन्याय, असमानता, अंधभक्ति, अनाचार और आपसी घृणा से खोखला होता है।

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आज भारत के सामने भी यही खतरा खड़ा है। नागरिकों को धर्म के नाम पर बाँटा जा रहा है, जबकि बेरोज़गारी, शिक्षा, कृषि, उद्योग, स्वास्थ्य, पर्यावरण और भ्रष्टाचार जैसे ज्वलंत मुद्दों को जानबूझकर पीछे धकेला जा रहा है। सत्ता को प्रश्न पूछने वाला नागरिक नहीं, बल्कि नारे लगाने वाला समर्थक चाहिए। यह लोकतंत्र नहीं, बल्कि लोकतंत्र के पतन की शुरुआत है।

देश मंदिरों, मस्जिदों, ऊँची प्रतिमाओं या भव्य इमारतों से महान नहीं बनता। देश महान बनता है ईमानदार नागरिकों, मेहनतकश किसानों, कर्मठ मजदूरों, वैज्ञानिकों, शिक्षकों, न्यायप्रिय व्यवस्था और जागरूक मतदाताओं से।

इसलिए अब समय आ गया है कि हर भारतीय स्वयं से केवल एक प्रश्न पूछे—

क्या मैं धर्म के लिए जी रहा हूँ, या धर्म के नाम पर किसी की राजनीति का साधन बन गया हूँ?

यदि हर व्यक्ति इस प्रश्न का उत्तर अपने अंतःकरण से पूछ ले, तो भारत को किसी बाहरी दुश्मन से डरने की आवश्यकता नहीं रहेगी।

और अंत में...

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राम मंदिर बनाने से रामराज्य नहीं आता; राम के चरित्र, न्याय और मर्यादा को जीवन में उतारने से रामराज्य आता है।

मस्जिद बनाने से अल्लाह प्रसन्न नहीं होते; ईमानदारी, करुणा और इंसाफ से जीवन जीने पर अल्लाह प्रसन्न होते हैं।

बुद्ध की प्रतिमा स्थापित करने से बुद्ध जीवित नहीं होते; विवेक जागृत होने पर बुद्ध हमारे भीतर जीवित होते हैं।

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की प्रतिमा लगाने से संविधान सुरक्षित नहीं होता; संविधान के स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्यों को जीवन में उतारने से राष्ट्र सुरक्षित होता है।

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और इसलिए...

आज देश को धर्म बचाने वाले नेता नहीं, मनुष्य बनाने वाले नेता चाहिए।

देश को मंदिर–मस्जिद की राजनीति नहीं, बल्कि अच्छे विद्यालय, विश्वविद्यालय, अनुसंधान केंद्र, उद्योग, समृद्ध कृषि और न्यायपूर्ण व्यवस्था चाहिए।

याद रखिए...

धर्म हजारों वर्षों से जीवित है और आगे भी जीवित रहेगा।

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लेकिन यदि इंसान टूट गया, समाज बिखर गया और राष्ट्र कमजोर हो गया, तो कोई भी धर्म सुरक्षित नहीं रह पाएगा।

इसलिए...

धर्म बचाने से पहले इंसान को बचाइए।
इंसान बचेगा तो इंसानियत बचेगी...
इंसानियत बचेगी तो भारत बचेगा।

क्योंकि...
धर्म खतरे में नहीं है... खतरे में इंसान है!

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