BRICS @ 20: क्या दुनिया को बहुध्रुवीय व्यवस्था देने में विफल हो रहा है BRICS?
BRICS की 20वीं वर्षगांठ पर गहन विश्लेषण। जानिए क्यों BRICS अब तक वैश्विक वित्तीय व्यवस्था का विकल्प नहीं बन पाया, डॉलर प्रभुत्व, सप्लाई चेन, भू-राजनीति और भविष्य की चुनौतियों पर विस्तृत राय।
Writer- Sudhir Taliyan
Chaudhary - Talan Khap
BRICS @ 20: दुनिया बदलने का दावा, लेकिन बहुध्रुवीय व्यवस्था अभी भी अधूरी क्यों?
मॉस्को में जश्न, लेकिन असली सवाल अभी बाकी है
मॉस्को में BRICS की 20वीं वर्षगांठ के अवसर पर विभिन्न देशों के प्रतिनिधि एकत्र हुए। भारत, रूस, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका सहित सदस्य देशों और साझेदार देशों के राजनयिकों ने दो दशक की यात्रा का जश्न मनाया। चर्चा हुई कि BRICS ने वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज़ को कितना मजबूत बनाया और भविष्य की विश्व व्यवस्था को किस दिशा में ले जा सकता है।
लेकिन इस समारोह से कहीं बड़ा प्रश्न यह है कि:
जब BRICS दुनिया की आधी से अधिक आबादी और लगभग 40 प्रतिशत से अधिक वैश्विक अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है, तब भी वह विश्व व्यवस्था को वास्तविक रूप से बहुध्रुवीय (Multipolar) क्यों नहीं बना पाया?
यही प्रश्न आज BRICS की सबसे बड़ी चुनौती है।
20 साल की यात्रा: उपलब्धियां कम नहीं हैं
2006 में शुरू हुआ BRICS शुरू में सिर्फ BRIC था—ब्राजील, रूस, भारत और चीन।
2010 में दक्षिण अफ्रीका जुड़ा और BRICS बना।
इसके बाद मिस्र, इथियोपिया, ईरान, यूएई और इंडोनेशिया जैसे देशों के शामिल होने से इसका प्रभाव लगातार बढ़ा। आज BRICS केवल एक आर्थिक समूह नहीं बल्कि पश्चिमी वर्चस्व वाली व्यवस्था के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।
कुछ प्रमुख उपलब्धियां:
1. न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB)
BRICS ने विश्व बैंक और IMF के विकल्प के रूप में न्यू डेवलपमेंट बैंक बनाया।
अब तक अरबों डॉलर की परियोजनाओं को वित्तपोषित किया जा चुका है।
2. ग्लोबल साउथ की आवाज
अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के देशों को पहली बार ऐसा मंच मिला जहां वे पश्चिमी देशों के एजेंडे से अलग अपनी प्राथमिकताएं रख सकें।
3. व्यापार में स्थानीय मुद्राओं का प्रयोग
रूस-चीन, भारत-रूस और कई अन्य देशों के बीच डॉलर के बजाय स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ा है।
4. वैश्विक शक्ति संतुलन
G7 के एकाधिकार को चुनौती देने वाली सबसे बड़ी आर्थिक और राजनीतिक ताकत के रूप में BRICS उभरा है।
फिर भी बहुध्रुवीय विश्व क्यों नहीं बन रहा?
यहीं से असली बहस शुरू होती है।
BRICS के पास जनसंख्या है।
BRICS के पास बाजार है।
BRICS के पास ऊर्जा संसाधन हैं।
BRICS के पास उत्पादन क्षमता है।
https://politicsinsightindia.com/new/g7-summit-2026-india-benefit-or-symbolic-diplomacy
फिर भी वह अमेरिका-केन्द्रित वैश्विक वित्तीय व्यवस्था का विकल्प क्यों नहीं बन पाया?
कारण स्पष्ट हैं।
सबसे बड़ी कमजोरी: साझा वित्तीय प्रणाली का अभाव
आज दुनिया का अधिकांश व्यापार डॉलर में होता है।
अंतरराष्ट्रीय भुगतान SWIFT नेटवर्क के माध्यम से होता है।
विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा डॉलर आधारित है।
BRICS ने वर्षों से "डी-डॉलराइजेशन" की बात की है लेकिन अब तक कोई मजबूत साझा भुगतान प्रणाली लागू नहीं कर पाया।
यही कारण है कि अमेरिका जब किसी देश पर प्रतिबंध लगाता है तो उसका प्रभाव पूरी दुनिया पर दिखाई देता है।
रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान यही हुआ।
रूस के बैंकिंग नेटवर्क पर पश्चिमी प्रतिबंधों ने पूरी दुनिया को दिखा दिया कि वैश्विक वित्तीय प्रणाली कितनी केंद्रीकृत है।
BRICS ने इसका विकल्प बनाने की बात तो की, लेकिन गति बेहद धीमी रही।
BRICS Currency की चर्चा हुई, लेकिन निर्णय नहीं
पिछले कुछ वर्षों में BRICS Currency या साझा मुद्रा की चर्चा खूब हुई।
लेकिन सवाल खड़ा हुआ:
उसका नियंत्रण किसके पास होगा?
भारत और चीन के बीच विश्वास का स्तर क्या है?
https://politicsinsightindia.com/new/india-brics-global-power-shift
क्या ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका इसके लिए तैयार हैं?
क्या छोटे सदस्य देश चीन के आर्थिक प्रभाव को स्वीकार करेंगे?
यही वे प्रश्न हैं जिन्होंने साझा मुद्रा की दिशा में प्रगति को धीमा कर दिया।
भारत-चीन तनाव: BRICS की सबसे बड़ी राजनीतिक बाधा
BRICS की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण आधार भारत और चीन का सहयोग है।
लेकिन वास्तविकता यह है कि दोनों देशों के बीच सीमा विवाद, रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और भू-राजनीतिक अविश्वास मौजूद है।
जब समूह के दो सबसे बड़े सदस्य पूरी तरह एकमत नहीं होते, तो बड़े संस्थागत फैसले आगे नहीं बढ़ पाते।
BRICS का विस्तार आसान था।
BRICS का एकीकरण कठिन है।
आर्थिक शक्ति है, लेकिन सप्लाई चेन एकीकृत नहीं
कोविड महामारी ने दिखा दिया कि दुनिया कितनी नाजुक सप्लाई चेन पर निर्भर है।
आज भी:
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चीन उत्पादन का केंद्र है
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भारत सेवाओं का बड़ा केंद्र है
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रूस ऊर्जा शक्ति है
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ब्राजील कृषि महाशक्ति है
लेकिन इन क्षमताओं को जोड़कर एक वैकल्पिक सप्लाई चेन नेटवर्क नहीं बनाया गया।
यदि BRICS देश सामूहिक औद्योगिक रणनीति बनाते, तो पश्चिमी देशों पर निर्भरता काफी कम हो सकती थी।
सैन्य सुरक्षा पर लगभग शून्य सहयोग
NATO के पास सामूहिक सुरक्षा ढांचा है।
यूरोपीय संघ के पास संस्थागत व्यवस्था है।
लेकिन BRICS के पास ऐसा कोई सुरक्षा तंत्र नहीं।
यह संगठन आर्थिक सहयोग की बात करता है, लेकिन यदि किसी सदस्य देश पर आर्थिक या सैन्य दबाव आता है, तो सामूहिक प्रतिक्रिया की कोई स्पष्ट प्रणाली नहीं है।
यही वजह है कि BRICS अभी भी एक मंच है, गठबंधन नहीं।
क्या BRICS सिर्फ बयान देता है?
यह सवाल कई विशेषज्ञ पूछते हैं।
हर शिखर सम्मेलन में:
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बहुध्रुवीय विश्व
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वैश्विक न्याय
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संस्थागत सुधार
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समावेशी विकास
- India Voices Concern Over Tariffs on Russian and Iranian Oil at BRICS Meeting
जैसे शब्द सुनाई देते हैं।
लेकिन जमीन पर परिवर्तन की गति बेहद धीमी है।
यही कारण है कि आलोचक कहते हैं:
BRICS के पास दृष्टि है, लेकिन क्रियान्वयन की गति नहीं।
अमेरिका और पश्चिम क्यों चिंतित हैं?
क्योंकि BRICS का महत्व केवल वर्तमान में नहीं, भविष्य में है।
यदि BRICS:
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साझा भुगतान नेटवर्क बना ले,
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स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ा दे,
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न्यू डेवलपमेंट बैंक का विस्तार कर दे,
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ऊर्जा व्यापार को डॉलर से बाहर ले जाए,
तो वैश्विक शक्ति संतुलन बदल सकता है।
इसी संभावना ने BRICS को दुनिया की सबसे चर्चित संस्थाओं में शामिल कर दिया है।
दुनिया को विकल्प की जरूरत क्यों है?
यह प्रश्न सिर्फ राजनीति का नहीं बल्कि आम नागरिक का भी है।
जब:
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सप्लाई चेन टूटती है,
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ऊर्जा संकट आता है,
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प्रतिबंधों से खाद्य कीमतें बढ़ती हैं,
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युद्धों का असर वैश्विक महंगाई में दिखता है,
तो सबसे ज्यादा नुकसान आम लोगों को होता है।
दुनिया को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें:
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कोई एक देश वैश्विक वित्त नियंत्रित न करे,
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कोई एक मुद्रा पूरे व्यापार पर हावी न हो,
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कोई एक शक्ति वैश्विक संस्थाओं को नियंत्रित न करे।
यही बहुध्रुवीय व्यवस्था का मूल विचार है।
BRICS को अब क्या करना चाहिए?
यदि BRICS वास्तव में विश्व व्यवस्था बदलना चाहता है, तो अगले दशक में उसे पांच बड़े कदम उठाने होंगे।
1. BRICS Pay System
SWIFT के विकल्प के रूप में स्वतंत्र भुगतान नेटवर्क।
2. Local Currency Settlement
सदस्य देशों के बीच अधिकतम व्यापार स्थानीय मुद्राओं में।
3. Supply Chain Alliance
ऊर्जा, खाद्य, दवाओं और सेमीकंडक्टर क्षेत्र में साझा रणनीति।
4. Crisis Response Fund
आर्थिक संकट के समय सदस्य देशों को त्वरित सहायता।
5. Institutional Integration
सिर्फ घोषणाओं से आगे बढ़कर नियम आधारित ढांचा।
निष्कर्ष: BRICS के सामने ऐतिहासिक अवसर
मॉस्को में 20वीं वर्षगांठ का उत्सव केवल अतीत का जश्न नहीं है।
यह भविष्य की परीक्षा भी है।
आज BRICS दुनिया की बड़ी आबादी, विशाल संसाधनों और तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करता है। कई आकलनों के अनुसार BRICS और उसके साझेदार देश वैश्विक आबादी के लगभग आधे से अधिक हिस्से तथा विश्व अर्थव्यवस्था के 40 प्रतिशत से अधिक हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं।
लेकिन केवल आकार से इतिहास नहीं बदलता।
इतिहास तब बदलता है जब दृष्टि, नेतृत्व और क्रियान्वयन एक साथ आते हैं।
यदि BRICS आपसी खींचतान, भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और निर्णयहीनता से ऊपर उठकर वास्तविक आर्थिक, वित्तीय और संस्थागत विकल्प प्रस्तुत कर देता है, तो 21वीं सदी की विश्व व्यवस्था बदल सकती है।
अन्यथा, BRICS एक ऐसा मंच बनकर रह जाएगा जो हर वर्ष बहुध्रुवीय विश्व की बात तो करता है, लेकिन उसे बनाने की दिशा में निर्णायक कदम नहीं उठा पाता।
दुनिया इंतजार कर रही है।
सवाल यह नहीं है कि BRICS कितना बड़ा है।
सवाल यह है कि BRICS कितना साहसी है।
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