पहले सरकारी शिक्षा को कमजोर किया, शिक्षा का बाजारीकरण किया—अब Employability crisis और कोचिंग “माफिया” बता रही सरकार?
भारत में कोचिंग सिस्टम को “माफिया” बताने और युवाओं में Employability Crisis की चिंता के बीच बड़ा सवाल यह है—जब सरकारी शिक्षा व्यवस्था कमजोर हुई और शिक्षा का बाजारीकरण बढ़ा, तब कोचिंग उद्योग इतना शक्तिशाली कैसे बना? आखिर समाधान कोचिंग पर कार्रवाई है या सरकारी शिक्षा का पुनर्निर्माण?
By- Sudhir Taliyan
सरकार आज रोजगारयोग्यता की चिंता कर रही है, लेकिन सवाल यह है—जिस सरकारी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना था, उसे कमजोर किसने किया?
भारत में शिक्षा की कहानी इन दिनों एक अजीब मोड़ पर खड़ी है।
एक तरफ Economic Advisory Council to the Prime Minister के सदस्य संजीव सान्याल कहते हैं कि भारत में “employability problem” है—यानी समस्या केवल नौकरियों की संख्या की नहीं, बल्कि ऐसे युवाओं की भी है जिन्हें कंपनियाँ अपने काम के लिए तैयार नहीं पातीं। दूसरी तरफ वही सान्याल भारत के coaching-class system को “mafia” जैसे तीखे शब्द से संबोधित करते हुए उसकी गंभीर scrutiny की बात करते हैं।
दोनों बातें पहली नजर में अलग-अलग दिखाई देती हैं।
लेकिन वास्तव में वे एक ही कहानी के दो अध्याय हैं।
और इस कहानी का सबसे असुविधाजनक सवाल यह है—
अगर आज coaching centres शिक्षा व्यवस्था को बिगाड़ रहे हैं, तो आखिर वह परिस्थिति पैदा किसने की जिसमें सरकारी और सार्वजनिक शिक्षा कमजोर होती गई और कोचिंग एक समानांतर शिक्षा-व्यवस्था बन गई?
क्या coaching अपने आप पैदा हुई?
क्या माता-पिता अचानक बाजारवादी हो गए?
क्या बच्चों ने स्वयं तय किया कि स्कूल की शिक्षा पर्याप्त नहीं है?
या हमने धीरे-धीरे ऐसी व्यवस्था बनाई जिसमें शिक्षा का अर्थ ज्ञान से ज्यादा प्रतियोगिता, परीक्षा, डिग्री, रैंक और नौकरी की दौड़ हो गया?
यहीं से असली बहस शुरू होती है।
एक समय था जब स्कूल ही शिक्षा का केंद्र था
भारत के छोटे शहरों और कस्बों में एक समय स्कूल केवल चारदीवारी नहीं था।
वह ज्ञान का केंद्र था।
वहीं शिक्षक बच्चे को पढ़ाता था, वहीं उसकी शंकाएँ दूर होती थीं, वहीं वह गणित सीखता था, वहीं भाषा सीखता था, वहीं विज्ञान की प्रयोगशाला देखता था और वहीं उसे यह समझने का अवसर मिलता था कि दुनिया केवल पाठ्यपुस्तक के पन्नों में नहीं है।
सरकारी स्कूलों की अपनी सीमाएँ थीं, लेकिन शिक्षा को पूरी तरह बाजार के हवाले करने की मानसिकता तब इतनी मजबूत नहीं थी।
एक शिक्षक की सामाजिक प्रतिष्ठा थी।
एक सरकारी स्कूल में पढ़ना गरीब होने का प्रमाण नहीं माना जाता था।
लेकिन धीरे-धीरे तस्वीर बदली।
शिक्षा में निजी निवेश बढ़ा।
Private schools बढ़े।
Private colleges बढ़े।
Professional courses महंगे हुए।
Entrance examinations की संख्या बढ़ी।
प्रतियोगिता बढ़ी।
और फिर एक नया उद्योग पैदा हुआ—
Coaching industry.
शुरुआत में कोचिंग जरूरत थी।
फिर वह विकल्प बनी।
फिर वह सुविधा बनी।
और अंततः कई क्षेत्रों में वह अनिवार्यता बन गई।
आज कई परिवारों के लिए सवाल यह नहीं है कि बच्चे को coaching भेजें या नहीं।
सवाल है—
किस coaching में भेजें?
जब स्कूल पर भरोसा कम होता है, बाजार अवसर खोज लेता है
बाजार खाली जगह नहीं छोड़ता।
जहाँ सार्वजनिक व्यवस्था कमजोर होती है, वहाँ निजी बाजार प्रवेश करता है।
अगर स्कूल में पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं, तो private tutor आएगा।
अगर स्कूल में परीक्षा की तैयारी पर्याप्त नहीं है, तो coaching आएगी।
अगर सरकारी कॉलेज में practical exposure कमजोर है, तो private training institute आएगा।
अगर विश्वविद्यालय में industry linkage कमजोर है, तो certification industry आएगी।
और धीरे-धीरे शिक्षा का हर अधूरापन एक commercial opportunity बन जाता है।
समस्या तब शुरू होती है जब सार्वजनिक शिक्षा इतनी कमजोर कर दी जाए कि निजी शिक्षा विकल्प न रहकर मजबूरी बन जाए।
यही अंतर समझना जरूरी है।
कोचिंग को दोष देना आसान है, लेकिन कारण तक जाना कठिन
सान्याल ने coaching system की scrutiny की बात करते हुए कहा कि भारत के educational framework में इन institutes के माध्यम से subversion जैसी समस्या पैदा होती है। उन्होंने चीन का उदाहरण देते हुए बताया कि वहाँ भी coaching ने शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित किया था। साथ ही उन्होंने examination system की integrity, question-paper security और student performance के वास्तविक मूल्यांकन की आवश्यकता पर जोर दिया।
उनकी चिंता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
लेकिन यदि हम सिर्फ coaching teacher को “माफिया” कहकर बहस समाप्त कर दें, तो हम बीमारी के लक्षण पर चर्चा करेंगे, बीमारी की जड़ पर नहीं।
क्योंकि एक coaching teacher तब पैदा होता है जब लाखों परिवार यह मानने लगते हैं कि—
“स्कूल से सफलता नहीं मिलेगी।”
एक coaching centre तब फलता-फूलता है जब समाज में यह धारणा बनती है कि—
“सिर्फ डिग्री से नौकरी नहीं मिलेगी।”
और coaching industry तब विशाल बाजार बनती है जब—
“एक परीक्षा में सफलता”
को
“पूरे जीवन की सफलता”
से जोड़ दिया जाता है।
शिक्षा का बाजार और अवसर की असमानता
कोचिंग की सबसे बड़ी समस्या केवल फीस नहीं है।
इसका गहरा संबंध समान अवसर से है।
मान लीजिए दो बच्चे एक ही परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं।
एक के माता-पिता लाखों रुपये की coaching, test series, hostel, study material और personal mentoring का खर्च उठा सकते हैं।
दूसरा बच्चा सरकारी स्कूल से पढ़कर घर में बिजली, इंटरनेट और शांत पढ़ाई की जगह के लिए भी संघर्ष कर रहा है।
परीक्षा दोनों की है।
लेकिन तैयारी की दुनिया अलग-अलग है।
फिर हम कहते हैं—
“जो मेहनत करेगा वही जीतेगा।”
यह वाक्य सुनने में सुंदर है।
लेकिन अगर शुरुआती रेखा ही अलग हो तो केवल दौड़ने की गति को सफलता का पैमाना कैसे बनाया जा सकता है?
यही शिक्षा के बाजार का सबसे बड़ा नैतिक प्रश्न है।
और फिर आता है “Employability”
आज सरकार और आर्थिक नीति-निर्माता employability की बात कर रहे हैं।
सान्याल ने भी कहा कि भारत में बड़ी समस्या employability की है और कंपनियों को “right mix of skills” वाले उम्मीदवार खोजने में कठिनाई होती है।
यह चिंता महत्वपूर्ण है।
क्योंकि भारत में लाखों युवा हर साल स्कूल और कॉलेज से निकलते हैं।
उनके हाथ में degree होती है।
लेकिन नौकरी देने वाला पूछता है—
क्या आप problem solve कर सकते हैं?
क्या आप communication कर सकते हैं?
क्या आप technology का इस्तेमाल कर सकते हैं?
क्या आप data समझ सकते हैं?
क्या आप team में काम कर सकते हैं?
क्या आप ग्राहक की समस्या समझ सकते हैं?
क्या आप नई परिस्थिति में सीख सकते हैं?
और कई बार जवाब होता है—
“डिग्री है, लेकिन practical experience नहीं।”
यहीं शिक्षा और रोजगार के बीच की खाई दिखाई देती है।
लेकिन यहाँ भी सवाल पूछना जरूरी है
अगर graduate employable नहीं है तो सिर्फ छात्र को दोष क्यों?
अगर विश्वविद्यालय ने उसे चार साल तक केवल परीक्षा और डिग्री के लिए तैयार किया, तो industry-ready skill कहाँ से आएगी?
अगर curriculum वर्षों तक industry की जरूरत से पीछे रहा, तो युवा को दोष देने से समस्या हल होगी?
अगर स्कूल में laboratory नहीं, college में practical training नहीं और classroom में project-based learning नहीं, तो graduation के बाद अचानक employer-ready बनने की उम्मीद क्यों?
यहाँ सरकार, विश्वविद्यालय, स्कूल, उद्योग और समाज—सभी की जिम्मेदारी है।
Employability की कमी का पूरा बोझ युवा के कंधों पर डाल देना आसान है, लेकिन न्यायपूर्ण नहीं।
शिक्षा और रोजगार के बीच टूटी हुई कड़ी
भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक विचित्र विरोधाभास है।
हम बच्चों से कहते हैं—
“पढ़ो।”
वे पढ़ते हैं।
फिर कहते हैं—
“अच्छे अंक लाओ।”
वे अंक लाते हैं।
फिर कहते हैं—
“प्रतियोगी परीक्षा दो।”
वे परीक्षा देते हैं।
फिर कहते हैं—
“डिग्री लो।”
वे डिग्री लेते हैं।
और अंत में बाजार पूछता है—
“तुम कर क्या सकते हो?”
यहीं युवा ठहर जाता है।
क्योंकि शिक्षा ने उसे यह सिखाया ही नहीं कि ज्ञान को काम में कैसे बदला जाए।
क्या हमने परीक्षा को शिक्षा समझ लिया?
यह शायद आज की सबसे बड़ी भूल है।
परीक्षा शिक्षा का एक माध्यम हो सकती है।
लेकिन शिक्षा परीक्षा नहीं है।
फिर भी भारत में परीक्षा धीरे-धीरे शिक्षा का अंतिम लक्ष्य बन गई।
और जब परीक्षा लक्ष्य बनती है तो coaching स्वाभाविक रूप से मजबूत होती है।
क्योंकि coaching का business model ज्ञान के व्यापक विकास पर नहीं, बल्कि measurable performance पर टिका होता है।
कितने प्रश्न सही?
कितने अंक?
कितनी rank?
कितनी percentile?
कितने selections?
और फिर advertising शुरू होती है।
“हमारे इतने selections।”
“हमारे इतने toppers।”
“हमारे इतने ranks।”
लेकिन एक सवाल शायद ही पूछा जाता है—
इन हजारों विद्यार्थियों में कितनों का जीवन वास्तव में बेहतर हुआ?
“Selection” की अर्थव्यवस्था
कोचिंग उद्योग का सबसे शक्तिशाली शब्द है—
Selection.
क्योंकि selection aspirant को सपना देता है।
लेकिन किसी भी competitive examination में selection सीमित होता है।
यदि हजारों लोग एक छोटी संख्या की सीटों के लिए लड़ रहे हैं, तो coaching market का विस्तार selection की संख्या से नहीं, आकांक्षा की संख्या से होता है।
यानी उद्योग के लिए जरूरी नहीं कि हर विद्यार्थी सफल हो।
जरूरी यह है कि हर विद्यार्थी सफलता की संभावना खरीदने को तैयार रहे।
यहीं शिक्षा और बाजार के बीच तनाव पैदा होता है।
सरकारी शिक्षा को मजबूत करना ही असली समाधान है
अगर सरकार सचमुच coaching dependency कम करना चाहती है तो पहला सवाल coaching centres की संख्या नहीं होना चाहिए।
पहला सवाल होना चाहिए—
सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता कैसी है?
कक्षा में शिक्षक पर्याप्त हैं?
बच्चे पढ़ना समझ रहे हैं?
गणित की बुनियादी क्षमता कैसी है?
Science practical हो रहा है?
Digital literacy कैसी है?
Career counselling है?
Competitive examinations के लिए foundational support है?
अच्छी library है?
खेल और कला की जगह है?
अगर इन सवालों के जवाब कमजोर हैं तो coaching पर कार्रवाई करना ऐसा होगा जैसे पेड़ की शाखाएँ काटकर यह मान लेना कि जड़ स्वस्थ हो गई।
सरकार ने स्वयं coaching regulation की जरूरत स्वीकार की है
यह भी महत्वपूर्ण है कि सरकार ने coaching sector की समस्याओं को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया है।
शिक्षा मंत्रालय ने 2024 में Coaching Centres के regulation के लिए guidelines जारी की थीं। उनमें registration, fees, infrastructure, counselling, grievance mechanism, misleading claims और monitoring जैसे विषय शामिल किए गए। यह स्वयं इस बात का संकेत है कि coaching ecosystem अब इतना बड़ा हो चुका है कि उसे सार्वजनिक नीति के दायरे में देखना आवश्यक हो गया है।
लेकिन regulation अंतिम समाधान नहीं है।
क्योंकि regulation यह तय कर सकता है कि coaching centre क्या करे।
लेकिन यह तय नहीं कर सकता कि माता-पिता अपने बच्चे को coaching के लिए मजबूर क्यों महसूस करते हैं।
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उसका उत्तर स्कूल और विश्वविद्यालय की गुणवत्ता में छिपा है।
शिक्षा का निजीकरण बनाम शिक्षा का बाजारीकरण
इन दोनों शब्दों में अंतर है।
Private education का अर्थ है निजी क्षेत्र की भागीदारी।
Marketisation का अर्थ है शिक्षा को इस तरह देखना कि विद्यार्थी customer, शिक्षक service provider और शिक्षा commodity बन जाए।
यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है।
जब शिक्षा commodity बनती है तो उसकी कीमत उसकी सामाजिक उपयोगिता से नहीं, उसकी market demand से तय होने लगती है।
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फिर engineering महंगी हो सकती है क्योंकि उसका demand है।
Medical education महंगी हो सकती है।
Coaching महंगी हो सकती है।
Foreign degree महंगी हो सकती है।
और गरीब परिवार के लिए शिक्षा धीरे-धीरे aspiration नहीं, financial burden बन जाती है।
सबसे बड़ा प्रश्न: सरकारी शिक्षा को किसने कमजोर होने दिया?
यह सवाल किसी एक सरकार तक सीमित नहीं है।
भारत में शिक्षा का बाजारीकरण एक लंबी प्रक्रिया है।
केंद्र और राज्य—दोनों स्तरों पर अलग-अलग समय में नीतियाँ बनीं।
Private participation बढ़ा।
Public institutions पर दबाव बढ़ा।
Education की मांग तेजी से बढ़ी।
Population और aspirations बढ़ीं।
Technology बदली।
और बाजार ने इस मांग को पकड़ लिया।
इसलिए पूरी समस्या का राजनीतिक उत्तर किसी एक पार्टी या एक सरकार को दोषी ठहराकर नहीं दिया जा सकता।
लेकिन मौजूदा सरकारों की जिम्मेदारी जरूर है कि वे अब इस प्रवृत्ति को पलटें।
अगर आज सरकार employability की चिंता कर रही है, तो उसे यह भी बताना होगा कि सरकारी education system को industry-ready, skill-oriented और intellectually मजबूत बनाने के लिए क्या किया गया?
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Employability का अर्थ केवल नौकरी पाने की क्षमता नहीं
Employability को भी संकीर्ण अर्थ में नहीं देखना चाहिए।
एक युवा केवल इसलिए employable नहीं है कि वह किसी कंपनी के लिए काम कर सकता है।
उसे यह भी सक्षम होना चाहिए कि वह:
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नया काम सीख सके;
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technology बदलने पर खुद को बदल सके;
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entrepreneurship कर सके;
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समस्या पहचान सके;
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समाधान खोज सके;
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communication कर सके;
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नागरिक के रूप में जिम्मेदारी निभा सके।
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शिक्षा का अंतिम लक्ष्य केवल “कंपनी के लिए कर्मचारी” तैयार करना नहीं होना चाहिए।
भारत को स्वतंत्र सोचने वाले नागरिक और सक्षम कार्यबल, दोनों चाहिए।
क्या coaching पूरी तरह बुरी है?
नहीं।
यह कहना भी गलत होगा कि हर coaching teacher शोषक है या हर coaching institute खराब है।
देश में हजारों ईमानदार शिक्षक हैं जिन्होंने सीमित संसाधनों वाले विद्यार्थियों को सफलता दिलाई है।
कई coaching institutes ने गुणवत्तापूर्ण academic support दिया है।
समस्या individual teacher नहीं, systemic dependence है।
जब पूरा education ecosystem coaching के बिना अधूरा लगने लगे, तब समस्या पैदा होती है।
इसलिए बहस “coaching बनाम government school” की नहीं होनी चाहिए।
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बहस होनी चाहिए—
“ऐसी शिक्षा व्यवस्था कैसे बने जिसमें coaching विकल्प हो, मजबूरी नहीं?”
हमें किस तरह की शिक्षा चाहिए?
भारत को ऐसी शिक्षा चाहिए जिसमें बच्चा केवल यह न सीखे कि सही उत्तर कौन-सा है।
वह यह भी सीखे कि—
सही प्रश्न कैसे पूछा जाता है।
वह केवल formula याद न करे।
वह यह समझे कि formula बना क्यों।
वह केवल इतिहास की तारीखें न याद करे।
वह इतिहास से वर्तमान को समझना सीखे।
वह केवल computer चलाना न सीखे।
वह technology से समस्या हल करना सीखे।
वह केवल degree न पाए।
वह क्षमता लेकर निकले।
समाधान का रास्ता
सरकार अगर सचमुच coaching ecosystem को बदलना चाहती है तो पाँच मोर्चों पर काम जरूरी है।
पहला—सरकारी स्कूलों में निवेश
शिक्षक, laboratories, libraries, technology और foundational learning को प्राथमिकता मिले।
दूसरा—उच्च शिक्षा में industry linkage
हर degree को internship, apprenticeship, project और practical exposure से जोड़ा जाए।
तीसरा—coaching sector में पारदर्शिता
Selection claims, fees, refund policies और advertising पर स्पष्ट नियम हों।
चौथा—vocational education को सम्मान
ITI और skilled trades को “कम पढ़े लोगों” का विकल्प मानने की सामाजिक मानसिकता बदली जाए।
पाँचवाँ—परीक्षा सुधार
अगर जीवन की सफलता कुछ परीक्षाओं पर निर्भर होगी तो coaching का दबाव बना रहेगा।
परीक्षाओं में multiple pathways, skill assessment और practical competency का हिस्सा बढ़ना चाहिए।
अंत में एक असुविधाजनक सवाल
आज जब एक वरिष्ठ आर्थिक सलाहकार यह कहते हैं कि भारत में coaching system “mafia” जैसा बन गया है, तो देश को उनकी बात सुननी चाहिए।
लेकिन वहीं रुकना नहीं चाहिए।
अगला सवाल उनसे, शिक्षा मंत्रालय से, राज्य सरकारों से और पूरे राजनीतिक तंत्र से पूछा जाना चाहिए—
यह coaching economy इतनी बड़ी हुई कैसे?
क्यों लाखों माता-पिता को लगता है कि स्कूल पर्याप्त नहीं है?
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क्यों एक बच्चे की शिक्षा स्कूल के बाद भी चार-पाँच घंटे coaching मांगती है?
क्यों graduation के बाद भी उसे skill course करना पड़ता है?
क्यों कंपनियाँ कहती हैं कि graduates में सही skills नहीं हैं?
और सबसे महत्वपूर्ण—
अगर सरकारी शिक्षा व्यवस्था मजबूत होती, तो क्या coaching का यह साम्राज्य इतना बड़ा हो पाता?
शायद नहीं।
इसलिए आज coaching teacher को कटघरे में खड़ा करने से पहले हमें उस पूरी व्यवस्था को आईने में देखना चाहिए जिसने coaching को जन्म दिया, उसे बढ़ाया और अंततः उसे शिक्षा के समानांतर खड़ा कर दिया।
सरकार आज employability की बात कर रही है।
यह अच्छी बात है।
सरकार आज coaching system की scrutiny की बात कर रही है।
यह भी जरूरी है।
लेकिन देश को केवल coaching regulation नहीं चाहिए।
उसे education reconstruction चाहिए।
क्योंकि समस्या सिर्फ यह नहीं कि कुछ coaching centres बच्चों को परीक्षा के लिए तैयार कर रहे हैं।
समस्या यह है कि हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था कहीं न कहीं बच्चे को जीवन के बजाय परीक्षा के लिए तैयार करने लगी है।
और जब शिक्षा का लक्ष्य परीक्षा हो जाता है, तब coaching उसका बाजार बन जाती है।
जब शिक्षा का लक्ष्य नौकरी बन जाता है, तब degree उसका टिकट बन जाती है।
और जब शिक्षा बाजार बन जाती है, तब गरीब परिवार सबसे पहले उसकी कीमत चुकाता है।
भारत को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें एक गरीब किसान का बच्चा, एक मजदूर की बेटी, एक छोटे दुकानदार का बेटा और एक महानगर के समृद्ध परिवार का बच्चा—सभी को कम-से-कम गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक शिक्षा का समान आधार मिले।
उसके बाद जो निजी विकल्प लेना चाहे, ले।
लेकिन किसी बच्चे का भविष्य इस बात पर निर्भर न हो कि उसके माता-पिता coaching की फीस भर सकते हैं या नहीं।
क्योंकि शिक्षा कोई luxury product नहीं है।
यह लोकतंत्र की बुनियाद है।
और अगर सरकार को आज employability crisis दिखाई दे रहा है, तो उसे केवल युवाओं से यह नहीं पूछना चाहिए कि—
“तुम job-ready क्यों नहीं हो?”
उसे खुद से भी पूछना चाहिए—
“हमने तुम्हें job-ready बनाने वाली शिक्षा दी कहाँ थी?”
यही वह प्रश्न है जिससे असली सुधार शुरू होगा।
और शायद तब भारत को coaching के “माफिया” से लड़ने के लिए केवल डंडे और नियमों की जरूरत नहीं पड़ेगी।
जब सरकारी स्कूल और विश्वविद्यालय फिर से भरोसेमंद बनेंगे, तो coaching की मजबूरी अपने आप कमजोर होगी।
तब शिक्षा बाजार की वस्तु नहीं, समाज की साझा पूंजी बनेगी।
और यही वह बदलाव है जिसकी भारत को आज सबसे ज्यादा जरूरत है।
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